जयपुर, 1 अक्टूबर। अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस के अवसर पर राजस्थान विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग ने 'एजिंग विद डिग्निटी: लर्निंग, रिसर्च एंड फील्ड एक्सपीरियंस' विषय पर सात दिवसीय अल्पकालिक प्रशिक्षण कार्यक्रम (एसटीटीपी) का शुभारंभ किया। उद्घाटन सत्र प्रातः 11:30 बजे विश्वविद्यालय परिसर स्थित दर्शनशास्त्र विभाग के सेमिनार हॉल में आरंभ हुआ। शिल्पी मेमोरियल ट्रस्ट और मानव सेवा ट्रस्ट राजस्थान के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम का उद्देश्य वृद्धावस्था को अनुभव, संस्कृति, सामाजिक ज्ञान और मानवीय संबंधों के एक आयाम के रूप में समझना है, साथ ही विद्यार्थियों को सार्थक क्षेत्रीय अनुभव उपलब्ध कराना है।
कार्यक्रम की अध्यक्षता राजस्थान विश्वविद्यालय के कुलपति एवं मुख्य अतिथि प्रो. भगवती प्रसाद सारस्वत ने की। सत्र का शुभारंभ अध्यक्ष के स्वागत, दीप प्रज्वलन और भारत माली द्वारा प्रस्तुत सरस्वती वंदना के साथ हुआ।
विभागाध्यक्ष एवं कार्यक्रम की संयोजक डॉ. मोनिका राव ने वृद्धावस्था के प्रति विभाग की निरंतर प्रतिबद्धता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि 'एजिंग विद डिग्निटी' केवल एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि शिक्षण, शोध और सतत क्षेत्रीय सहभागिता की दशकभर लंबी यात्रा का हिस्सा है। वर्ष 2016 में 'सोशियोलॉजी ऑफ एजिंग' को एक विशिष्ट प्रश्नपत्र के रूप में आरंभ किया गया, साथ ही शोध पद्धति, स्वस्थ वृद्धावस्था और संज्ञानात्मक वृद्धावस्था के क्षेत्रों में भी पहल की गई। पिछले पाँच वर्षों से विद्यार्थियों को क्षेत्रीय सर्वेक्षण और आकलन के लिए वृद्धाश्रमों में ले जाने के अनुभव के आधार पर विभाग ने इस कार्यक्रम की शुरुआत की।
उन्होंने कहा कि वृद्धावस्था को गरिमा, अनुभव और सामाजिक सहभागिता के दृष्टिकोण से देखा जाना चाहिए। संयुक्त राष्ट्र के स्वस्थ वृद्धावस्था दशक (2021–2030) के संदर्भ में उन्होंने विद्यार्थियों को क्षेत्रीय भ्रमण के माध्यम से चार वृद्धाश्रमों से जोड़ने की योजना की जानकारी दी, जिससे युवाओं की ऊर्जा और वरिष्ठ नागरिकों के अनुभव का संगम हो सकेगा। उन्होंने 'क्वांटम विलेज' की अवधारणा को एक समाजशास्त्रीय संबंधपरक रूपक के रूप में प्रस्तुत किया, जो कोई वैज्ञानिक या चिकित्सकीय मॉडल नहीं है। इसमें वृद्धजनों को परिवार, युवाओं और व्यापक समुदाय से जुड़े सक्रिय भागीदार के रूप में देखा गया है। उन्होंने विश्वविद्यालय के प्राध्यापकों, अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए सेवानिवृत्ति विदाई समारोह आरंभ करने हेतु कुलपति प्रो. भगवती प्रसाद सारस्वत के प्रति आभार भी व्यक्त किया।
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में माननीय कुलपति प्रो. भगवती प्रसाद सारस्वत ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस केवल औपचारिक एक दिवसीय आयोजन बनकर न रह जाए, बल्कि यह भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों पर चिंतन का अवसर बने। उन्होंने संयुक्त परिवारों से एकल परिवारों की ओर बढ़ते रुझान और बदलते अंतर-पीढ़ीगत संबंधों को समाजशास्त्रीय अध्ययन के महत्वपूर्ण क्षेत्र बताया। माता-पिता और बुजुर्गों के प्रति दायित्व, सम्मान और संस्कार पर बल देते हुए उन्होंने कहा कि विभाग की भूमिका शोध, प्रकाशन और संगोष्ठियों तक सीमित नहीं है, बल्कि बदलती सामाजिक संरचनाओं और पारिवारिक संबंधों पर निरंतर संवाद तक विस्तृत है। इस पहल का स्वागत करते हुए और विभाग को बधाई देते हुए उन्होंने बुजुर्गों को परिवार, समाज और संस्कृति की जीवंत स्मृति बताया, जिनके अनुभवों में सामाजिक ज्ञान का वह भंडार समाया है जिसे कोई पुस्तक पूरी तरह सहेज नहीं सकती। उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वृद्धजनों के साथ अपने जुड़ाव को केवल सामाजिक सेवा के प्रमाणपत्र तक सीमित न करें, क्योंकि सेवा का वास्तविक मूल्य प्रमाणपत्र में नहीं, बल्कि उस मानवीय रूपांतरण में है जो व्यक्ति और समाज के भीतर घटित होता है। उन्होंने कहा कि गरिमामय वृद्धावस्था पाँच सिद्धांतों पर टिकी है, अर्थात सम्मान, सहभागिता, स्वायत्तता, सुरक्षा और सार्थकता, तथा ऐसे समाज के निर्माण का आह्वान किया जो 'गरिमा के साथ वृद्धावस्था' से आगे बढ़कर 'गरिमा के साथ जीवन' और 'साथ-साथ आगे बढ़ने' की भावना को अपनाए। कुलपति प्रो. भगवती प्रसाद सारस्वत ने सकारात्मक वृद्धावस्था की अवधारणा पर आधारित स्वस्थ वृद्धावस्था विषयक प्रमाणपत्र पाठ्यक्रम आरंभ करने की विभाग की पहल को भी सहर्ष स्वीकृति प्रदान की।
विशिष्ट अतिथि, प्रख्यात समाजशास्त्री एवं प्रखर लेखिका प्रो. ऋतु सारस्वत ने वृद्धजनों को सामाजिक शक्ति, अनुभव और ज्ञान का स्रोत बताया तथा पीढ़ियों के बीच संवाद को समाज की एक महत्वपूर्ण आवश्यकता कहा। उन्होंने अकेलेपन, भावनात्मक सुरक्षा, विश्वास और सुनने की संस्कृति को बुजुर्गों तथा आज के युवाओं, दोनों की चुनौतियों से जोड़ते हुए युवा पीढ़ी से आग्रह किया कि वे बुजुर्गों का हाथ थामें, ताकि अकेलेपन और अवसाद को कम किया जा सके। उन्होंने कहा कि सार्थक संवाद दोनों पीढ़ियों के लिए सुरक्षा, अपनत्व और संतोष का भाव रचता है, और बुजुर्गों के अनुभव एक अमूल्य सामाजिक पूँजी हैं श्री पी.सी. जैन ने 'टाइम बैंक' की अवधारणा और वरिष्ठ नागरिकों के लिए इसके महत्व को समझाया। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे आगे आकर सहयोग करें और इस अनूठी पहल को सफल बनाने में योगदान दें।
वृद्धावस्था अध्ययन एवं वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण में उत्कृष्ट योगदान के लिए 'रिसर्च एक्सीलेंस एंड सर्विस टू सोसाइटी अवार्ड' प्रदान किया गया। समाजशास्त्र के क्षेत्र में प्रखर लेखन के लिए राजस्थान सरकार के उच्च शिक्षा विभाग की समाजशास्त्री प्रो. ऋतु सारस्वत , जरा-विज्ञान (जेरोन्टोलॉजी) के क्षेत्र में प्रतिष्ठित प्रकाशनों के लिए राजस्थान विश्वविद्यालय के गृह विज्ञान विभाग की विभागाध्यक्ष प्रो. शुभा दुबे; तथा जरा-विज्ञान के क्षेत्र में उल्लेखनीय शोध के लिए जयपुर के इंस्टीट्यूट ऑफ डेवलपमेंट स्टडीज के डॉ. हरचंद को प्रदान किया गया। यह सम्मान वृद्धावस्था अध्ययन और बुजुर्गों के कल्याण में उनके योगदान की मान्यता स्वरूप दिया गया। शिल्पी मेमोरियल ट्रस्ट और मानव सेवा ट्रस्ट ने उच्च शिक्षा में जरा-विज्ञान संबंधी शोध को प्रोत्साहित करने के लिए समाजशास्त्र विभाग की अध्यक्ष डॉ. मोनिका राव को भी सम्मानित किया। कार्यक्रम को राजस्थान तकनीकी विश्वविद्यालय, कोटा के कुलपति की गरिमामयी उपस्थिति ने भी गौरवान्वित किया।
विभाग के विद्यार्थियों ने मानव सेवा ट्रस्ट और वृद्धाश्रमों से आए वरिष्ठ नागरिकों को समर्पित सांस्कृतिक प्रस्तुति दी, जो कार्यक्रम में सहभागी भी रहे। कुलपति और डॉ. राव ने शिल्पी मेमोरियल ट्रस्ट के श्री रामजस जी तथा मानव सेवा ट्रस्ट के श्री कौशल सत्यार्थी जी को सम्मानित किया। मानव सेवा ट्रस्ट राजस्थान ने अपनी स्थापना के दस वर्ष पूर्ण होने के अवसर पर विवरणिका का विमोचन भी किया।
सत्र का समापन डॉ. संदीप कुमार के धन्यवाद ज्ञापन के साथ हुआ, जिनके समर्पित प्रयास पूरे कार्यशाला के आयोजन और समन्वय में अत्यंत सराहनीय रहे। शैक्षणिक विमर्श, वृद्धजनों के जीवनानुभव, युवा सहभागिता और सामाजिक उत्तरदायित्व को एक सूत्र में पिरोते हुए इस कार्यक्रम ने पीढ़ियों के बीच संवाद और गरिमामय वृद्धावस्था की दिशा में एक सार्थक मंच प्रदान किया।