तुला- स्तंभ क्यों लगाए गए मेवाड़ के महलों में, क्या है इनकी कहानी ?
महाराणा जगत सिंह मेवाड़ के सिसोदिया राजवंश के 57 वें शासक थे । उन्होंने उदयपुर में चौबीस वर्षों तक शासन किया और राणा जगत के शासनकाल के दौरान राज्य में शांति और समृद्धि जारी रही। उन्हें मेवाड़ राजवंश का सबसे बड़ा बिल्डर माना जाता है। जगत सिंह का शासनकाल पूरी तरह से मेवाड़ की कला और वास्तुकला के विकास के लिए खर्च की कहानी कहता है। महाराणा जगत सिंह महाराणा कर्ण सिंह के पुत्र थे और 1628 ई में सिंहासन पर आसीन हुए।
महाराणा जगत सिंह ने पिछोला झील में जगमन्दिर महल का निर्माण करवाया था तथा जगदीश मन्दिर (पंचायतन शैली) बनवाया। इन्होने मन्दिर में जगन्नाथ राय प्रशस्ती लगवाईं। महाराणा जगत सिंह ने मोहन मन्दिर व स्वरूप सागर तालाब बनवाया। महाराणा जगत सिंह अपनी दानशीलता के लिए प्रसिद्ध थे। अपने जीवनकाल के दौरान, उन्होंने बड़ी मात्रा में धन, जवाहरात, उपहार में दिए हाथी, घोड़े दान किए और कई गाँवो को भी दान किया।
सिन्धुर दीधा सातसै, हैवर पाँच हज़ार।
एकावन सासण दिया, जगपत जगदातार।।
साईं करे परेवड़ा, जगतपरे दरबार।
पीछोले पाणी पियां, कण चुग्गां कोठार।।
हर साल अपने राजतिलक के दिन, वह तुलदान करते थे, खुद को चांदी में तौलते थे और उसे दान करते थे।
राजसमंद झील पर राजप्रशस्ति शिलालेख में उल्लेख है:
1648 ई में, उन्होंने ओंकारेश्वर मंदिर का दौरा किया और वहाँ सूर्यग्रहण के अवसर पर उन्होंने सोने का तुलदान किया। उन्होंने इस कार्यक्रम को मनाने के लिए एक तुला-स्तम्भ बनाया।
महाराणा जगत सिंह ने 1651 ई में जगदीश मंदिर (जगन्नाथ राय) का निर्माण करवाया । अभिषेक के दिन, उन्होंने बड़ी मात्रा में धन, जवाहरात और गाँवो को मन्दिर को दान भी किया। जगदीश मंदिर के शिलालेख में उल्लेख है कि उन्होंने एक कल्प-व्रत, सप्त-सागर, रत्न-धेनु और विश्व-चक्र सहित अन्य दान किए। जग मंदिर पैलेस का निर्माण उनके शासनकाल में पूरा हुआ और इसका नाम उनके नाम पर रखा गया।
उन्होंने मुगलों के साथ संधि की अनदेखी करते हुए चित्तौड़गढ़ में दुर्गों का पुनर्निर्माण किया। 1652 ई में महाराणा जगत सिंह की मृत्यु हो गई।
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