जंग और चुनाव के बीच मोदी सरकार विदेशी मोर्चे पर क्यों लगी थी एक के बाद एक समझौते में
हाल ही में पाकिस्तान के पेट्रोलियम मंत्री अली मलिक का बयान भारत में भी चर्चा का विषय बन गया. मलिक ने कहा, ‘हमारे पास एक दिन का तेल रिजर्व नहीं लेकिन भारत जब चाहे तब एक इशारे पर कितना भी तेल हासिल कर सकता है’. पाकिस्तान एक मुस्लिम देश है, मुस्लिम देशों के पास ही सबसे ज्यादा तेल के भंडार हैं, अमेरिका, चीन, रूस सब उसके दोस्त हैं. ईरान और अमेरिका ने शांति वार्ता के लिए भी पाकिस्तान को ही चुना, बावजूद इसके ये हाल है. भारत पर ज्यादा फर्क नहीं पड़ा तो इसके पीछे मोदी सरकार के वो निर्णय और विदेशी समझौते हैं जो उसने 2014 से देश को आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में किए हैं और कुछ हालिया भी.
सबसे पहले हमें समझना होगा कि भारत की पूर्ण आत्मनिर्भरता में सबसे बड़े रोड़े क्या है? ऐसे उत्पाद है, जो भारत या भारतीयों के लिए बहुत जरूरी हैं और उनके लिए हमें दुनियां भर के देशों पर निर्भर रहना पड़ता है. एलपीजी को लेकर देश पहली बार चेता है. तो सबसे बड़ी समस्या क्रूड ऑयल और पेट्रोलियम उत्पादों की ही है. भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा क्रूड ऑयल आयातक है, 85 से 87 प्रतिशत तेल बाहर से आता है. जिसमें 30 से 37 प्रतिशत सस्ता तेल रूस से आ रहा है. ईराक से हम 18-23 प्रतिशत और सऊदी अरब, यूएई, अमेरिका (लाइटर क्रूड) से हम 13-19 प्रतिशत तक क्रूड ऑयल लेते हैं. एलपीजी (80 से 85 प्रतिशत) और एलएनजी का एक बड़े हिस्से के लिए भारत कतर समेत खाड़ी देशों पर निर्भर है.
भारत दनियां भर की फार्मेसी है, लेकिन एंटीबायोटिक्स और विटामिंस के लिए कई जरूरी तत्वों (एक्टिव फार्मास्युटिकल इंग्रीडेंट्स) के लिए भारत दूसरे देशों खासकर चीन पर निर्भर रहता है. वैकल्पिक ऊर्जा श्रोतों से जुड़ी जरूरतों जैसे सौर ऊर्जा के उपकरणों, इलैक्ट्रिक वाहनों की लिथियम बैटरी, इलैक्ट्रोनिक जरूरतों जैसे सिलिकॉन वैफर्स, रेयर अर्थ, मैग्नेट, कोबाल्ट, ग्रेफाइट आदि के लिए भारत की चीन पर निर्भरता है. सेमीकंडक्टर जैसे इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों के लिए भी हम 90 प्रतिशत तक आयात पर निर्भर हैं. लेकिन मोदी सरकार ने इस दिशा में जो सेमीकंडक्टर मिशन शुरू किया है, जल्द वो चौंकाने वाले नतीजे देगा. फर्टिलाइजर्स, यूरिया, डीएपी के लिए भी भारत चीन, रूस, सऊदी अरब और मोरक्को से 8 बिलियन डॉलर का सालाना आयात करता है. खाद्य तेलों के लिए भी हमारी 55 से 60 प्रतिशत निर्भरता इंडोनेशिया, मलेशिया, अर्जेंटीना, ब्राजील जैसे देशों पर रही है. मेडिकल उपकरणों के लिए भी हम काफी हद तक आयात पर निर्भर रहे हैं. ऐसा ही हाल रक्षा क्षेत्र में भी था, लेकिन अब ये निर्भरता 65 से 70 प्रतिशत घटी है.
2014 से भी मोदी सरकार ने ना केवल ‘मेक इन इंडिया’ अभियान शुरू किया बल्कि तेल के क्षेत्र में भी बड़े निर्णय लिए, भारत के रणनीतिक पेट्रोलियम भंडार के लिए 53 लाख मीट्रिक टन का भंडारण बनाया जा चुका है. करीब 65 लाख मीट्रिक टन भंडारण निर्माणाधीन है. पिछले एक दशक में शोधन क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है. हाइड्रोकार्बन एक्सप्लोरेशन एंड लाइसेंसिंग लाइसेंस (HELP) 2016 और ओपन एकरेज लाइसेंसिंग पॉलिसी (OALP) के साथ 100 प्रतिशत विदेशी निवेश निर्णयों ने इस क्षेत्र में चमत्कारिक बदलाव किए हैं.
विदेशी समझौतों का भी बहुत बड़ा योगदान है. जो आर्थिक कम और रणनीतिक ज्यादा हैं. भारत का ऊर्जा आयात आधार (कच्चा तेल, एलपीजी, गैस) 27 से बढ़कर 41 देशों तक पहुंच गया है, जिससे किसी एक क्षेत्र पर निर्भरता कम हो गई है. इसमें खाड़ी देशों और ओमान, अल्जीरिया, अंगोला और अर्जेंटीना जैसे उभरते आपूर्तिकर्ताओं के साथ उच्च स्तरीय समझौते और दौरे शामिल हैं, अमेरिकी और वेनेजुएला के कच्चे तेल की खरीद भी इसमें शामिल है.
ईरान युद्ध से बढ़ते तनाव के बीच भारत ने कई महत्वपूर्ण फ्री ट्रेड एग्रीमेंट (FTA) या समकक्ष समझौते (जैसे CEPA, CETA, TEPA) पर काम तेज किया या निष्कर्ष पर पहुंचाया. हालिया समझौते में प्रमुख हैं, 27 सदस्य देशों वाली यूरोपियन यूनियन के साथ ऐतिहासिक मुक्त व्यापार समझौता, ब्रिटेन, न्यूजीलैंड, ओमान और 4 देशों वाली यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन (EFTA) के साथ व्यापार समझौता आदि. हालांकि इजरायल, अमेरिका, सऊदी, यूएई के साथ अभी बातचीत जारी है.
इन समझौतों से भारत को क्या फायदा होगा? न्यूजीलैंड ने 20 बिलियन डॉलर (1.7 लाख करोड़ रुपए) तो EFTA ने 100 बिलियन डॉलर (8.5 लाख करोड़ रुपए) के निवेश का वायदा किया है. EFTA के साथ हुए समझौते से 10 लाख नौकरियां पैदा होंगी. यूके के साथ व्यापार 34 बिलियन डॉलर सालाना बढ़ने का अनुमान है. यूरोपियन यूनियन के साथ 97% टैरिफ लाइंस पर भारत को प्राथमिकता मिलेगी, टेक्सटाइल और कृषि क्षेत्र को फायदा होगा. निर्यात दोगुना हो सकता है. न्यूजीलैंड से आयातित वाइन, डेयरी उत्पादों पर नियंत्रित शुल्क लगेगा लेकिन भारतीय उत्पाद शुल्क मुक्त होंगे.
यूरोपियन यूनियन से समझौते से टेक्सटाइल, अपैरल, लेदर, फुटवेयर, जेम्स एंड ज्वेलरी आदि पर EU के 12-17% शुल्क तुरंत शून्य हो गए. टेक्सटाइल एक्सपोर्ट् 7 बिलियन डॉलर से 30-40 बिलियन डॉलर तक बढ़ सकता है. इस समझौते से अमेरिका के ऊंचे शुल्कों का तोड़ निकलेगा, सप्लाई चैन विविधता बढ़ेगी. फार्मा, मेडिकल उपकरण,. आईटी, वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों को लाभ होगा और विदेशी निवेश बढ़ेगा.
इन समझौतों को इस रणनीति से किया गया है कि टेक्नोलॉजी ट्रांसफर जैसी शर्तों से भारत को आत्मनिर्भर होने में सहायता मिले. भारत के हर जरूरी क्षेत्र को इसका लाभ मिले. जिन क्षेत्रों में हम दूसरे देशों पर ज्यादा निर्भर हैं, उनमें सप्लाई चैन में विविधता हो, यानी हॉर्मूज जैसी मुसीबतों के समय कोई दूसरा विकल्प भी हो. तीसरे युवाओं को प्रशिक्षण व पेशेवरों को मौके भी मिले, जैसे न्यूजीलैंड हर साल 5,000 अस्थाई रोजगार एंट्री वीजा प्रशिक्षित भारतीय पेशेवरों (IT, हेल्थकेयर, इंजीनियरिंग, एजुकेशन, कंस्ट्रक्शन, AYUSH, योगा आदि) को देगा. साथ ही कृषि, डेयरी जैसे संरक्षित क्षेत्रों को कोई नुकसान नहीं पहुंचेगा.
दूसरे देशों पर निर्भरता कम करने के लिए भी कई सारी बड़ी उपलब्धियां इन 12 सालों मोदी सरकार ने हासिल की हैं. रक्षा उत्पादन 1.5 लाख करोड़ पार कर गया है तो निर्यात 25 हजार करोड़ पहुंच गया है. हम 100 देशों को रक्षा उत्पाद बेच रहे हैं. मोबाइल का आयात शून्य हो गया है तो निर्यात 127 गुना तक बढ़ गया है. कुल इलेक्ट्रोनिक्स प्रोडक्शन भी 6 गुना बढ़ गया है, कृषि उत्पादन में भी मोदी सरकार की उपलब्धियां कम नहीं. बहुत जल्द हर ब्लॉक में एक सरकारी वेयर हाउस होगा. पीएलआई, मेक इन इंडिया जैसे तमाम योजनाओं के जरिए उद्योग जगत ने चमत्कार कर दिखाया है.
ऐसे में ‘ट्रम्प के लगातार बदलते टैरिफ’ और ईरान युद्ध जैसे भू-राजनैतिक तनावों का असर कम करने के लिए कई मोर्चों पर एक साथ लड़ना, दूर की सोचना, सड़क-बिजली-रेल आदि के आधारभूत ढांचे से लेकर गलत कानूनों को हटाना, ‘ईज ऑफ डूइंग बिजनेस’ जैसे कदमों से मोदी सरकार ने एक ऐसे विकसित भारत की नींव तो रख दी है, जिससे कोई बिगाड़ना नहीं चाहता, हर मंच पर सम्मान मिलता है, उसकी अर्थव्यवस्था की गति कोई रोक नहीं सकता, जिसकी रफ्तार पर कोई संदेह नहीं करता, जिसके नेता की लोकप्रियता उनके नेता से ज्यादा होती है. लेकिन ये अचानक आए संकट ये बताते हैं कि उनसे निपटने के लिए बहुध्रुवीय विश्व में बिना मूल्यों को खोए नागरिकों की आकांक्षाओं पर खरा उतरने के लिए ऐसे रणनीतिक समझौतों के जरिए वैकल्पिक रास्ते ढूंढते रहना होगा और मोदी सरकार ने ये इस मोर्चे पर अहम उपलब्धियां हासिल की हैं, वो भी बिना किसी को नाराज किए.