उदयपुर की समस्याओं का हल स्मार्ट सिटी उदयपुर,पर बनना होगा पहले खुद स्मार्ट !
उदयपुर शहर इन दिनों सोशल नहीं मीडिया सहित न्यूज़ चैनल पर छाया हुआ है। लोग जमकर नगर निगम उदयपुर ,UIT उदयपुर सहित स्मार्ट सिटी उदयपुर पर खासा गुस्साए हुए है और होना भी चाहिये। जिस तरह से लापरवाह होकर इन तीनों विभागों ने उदयपुर शहर का सत्यानाश किया है उसकी बानगी उदयपुर निवासी सोशल मीडिया पर धुआँधार पोस्ट कर रहे है लेकिन प्रशाषन मूक दर्शक बना हुआ है और बिना जनता को अपने साथ लिए चोरी चोरी चुपचाप अपने पापों को ढ़कने में व्यस्त है और महापौर के अनुसार जनता में कोई उदयपुर को लेकर कोई रोष नहीं है। मान लिया भाईसाब के रोष नहीं है पर क्या आपको नहीं लगता कि कहीं न कहीं भारी चूक हुई है और एहम बात ये भी है कि पूर्व गृहमंत्री ने भी अपने गृह शहर को लेकर कोई नए निर्देश वर्तमान भाजपा निगम बोर्ड को नहीं दिए है।
आखिर चूक कहाँ हो रही है ,आइये जानते है कुछ ऐसी बाते जो शायद आपको सच्चाई बता दे :
1. कहने को उदयपुर स्मार्ट सिटी है पर स्मार्ट सिटी लिमिटेड के पास कोई अधिकार ही नहीं है सिटी को लेकर। उदयपुर स्मार्टसिटी लिमिटेड के पास न तो कोई सेंट्रल कमान है जिसमे नगरनिगम और UIT समन्वय के साथ काम कर सके। हर विभाग अपनी मन चाही इच्छा से प्रोजेक्ट लाता है और शुरू कर देता है उदयपुर में काम।
2. स्मार्ट सिटी लिमिटेड के मुख्य कार्यकारी अधिकारी को दो दो पोस्ट दी हुई है जिस कारण जितना समय उदयपुर को मिलना चाहिए उतना उदयपुर को नहीं मिल पा रहा है फलस्वरूप परिणाम हम सबके सामने है।
3. समूचे नगर निगम उदयपुर ,UIT उदयपुर सहित स्मार्ट सिटी उदयपुर में ठेकेदारों का एक नेक्सस है जो सारे ठेके हथियाता है और इसमें अधिकारियों की भी मिलीभगत होती है। मतलब काम की गुणवत्ता का ध्यान नहीं रख कर ठेकेदार अधिकारियों को खुश रखते है और कट पहुँचा कर उदयपुर के प्रोजेक्ट्स को मनमाने ढंग से पूरा करते है।
4.उदयपुर के प्रोजेक्ट्स को लेकर गंभीर नहीं होते है यहाँ के अधिकारी।इसका साफ़ अंदाजा आप फतहसागर के रानी रोड पर बनाये गए टापुओं से देख सकते है जिसमे झील के पारिस्थिकी तन्त्र से खिलवाड़ कर के UIT उदयपुर ने यहाँ ऐसे टापू बना दिए जो पोले हो गए। न तो पानी में बढ़ने वाले पौधे लगाए गए और ना हीं राष्ट्रीय झील संरक्षण नीति के नियमों का पालन किया गया।
5. नगर निगम उदयपुर सहित UIT उदयपुर के इंजीनियर इतने दक्ष है कि न तो झील के रिसाव को ये बंद कर सकते है और न ही ये बड़े पेड़ों को निर्माण के दौरान शिफ्ट। जहाँ लाखों रूपये वेतन मिल रहा है वहाँ अगर इनके पास संसाधन और योग्यता नहीं है तो क्या ये उदयपुर को ऐसे ही छोड़ देंगे। आपको बताते चले कि स्वरूपसागर पाल से तीन जगह बेहद गंभीर रिसाव हो रहा है जिसे नगर निगम उदयपुर सहित UIT उदयपुर और सिंचाई विभाग गंभीर मुद्दा नहीं मानता है। जब हादसा होगा तभी मुद्दा गंभीर होगा लेकिन फिलहाल नहीं। लेकिन एक बात समझ से परे है कि चलो मान लिया कि आपके लिए ये मुद्दा गंभीर नहीं पर करोड़ो लीटर साफ़ पानी का नालियों में बह रहा है जो लोगों के पीने के काम आ सकता था लेकिन नगर निगम के अधिकारी पिछले 25 दिन में दो बार दौरे तो कर चुके है पर इस रिसाव को रोकने के लिए न कोई योजना अब तक बनाई गयी और न ही कोई काम किया गया।
6. उदयपुर को लेकर कितने संजीदा है यहाँ के अधिकारी कि कभी ये अपने ऑफिस टाइम पर नहीं पहुँच पाते है क्योंकि इन्हे फील्ड में कामों को देखना होता है और इन अधिकारियों के कामों को देखने वाले अधिकारी भी फील्ड में होते है ( पता नहीं फील्ड कौनसी दुनिया में है ?) आप कभी भी जाइए इन अधिकारियों से मिलने ऑफिस में। आपको एक ही जवाब मिलेगा साहब फील्ड में है।
7.ऐसे लोगो को विभाग का मुखिया बना दिया गया है जिन्हे उस विभाग के कामों की जानकारी ही नहीं है। उदाहरणार्थ आप उदयपुर नगर निगम के उध्यान विभाग को देख सकते है जहाँ काम करने वाले कर्मचारी अपने वरिष्ठ को बागवानी को लेकर गुमराह करते है और चूँकि विभाग के अफसर का बैकग्रॉउंड उद्यानिकी नहीं है तो वे भी चुपचाप मान लेते है। कर्मचारी अपनी ड्यूटी बजाते है लेकिन काम नहीं करते। इसकी बानगी ये है कि जहाँ सैलरी पर उध्यान विभाग प्रतिमाह 10 लाख रूपये प्रतिमाह खर्च कर रहा वही प्रतिमाह उध्यान विभाग उदयपुर की सड़कों पर 1000 पौधे भी लगा नहीं पाता। उदयपुर के बगीचों की हालात आप देखकर आसानी से लगा सकते है कि कितने मन लगन से उध्यान विभाग के कर्मचारी काम करते है उदयपुर नगर निगम के।महत्वपूर्ण बात ये है कि नगर निगम उदयपुर के पास खुद की 4 नर्सरियां और ढेरों कर्मचारी होने के बाद भी इन्हे पौधरोपण के लिए पौधे वन विभाग और अन्य नर्सरियों से खरीदने पड़ते है। साल भर कर्मचारी क्या करते है इससे अधिकारियों को कोई मत करकर लब नहीं है। बिना पौधे लगाए कागजों में पौधे लगा दिए गए और नियमित ऐसे पौधों को पानी पिलाकर ठेकेदारों ने पैसा ले लिया जहाँ पौधे लगाए ही नहीं गए थे। लापरवाही ऐसी कि सूरजपोल चौराहे के निर्माण के दौरान कई जिन्दा पेड़ों को शिफ्ट न करके सीधे उखाड़ फेंका गया।
8 . नगर निगम उदयपुर और UIT उदयपुर के कर्मचारियों और अधिकारियों के पास प्लानिंग नाम की कोई चीज़ नहीं है।क्वालिटी इंस्पेक्शन सिर्फ नाम का शब्द है इन विभागो में। जैसे रोड निर्माण के दौरान कभी पानी के उतार का न तो ध्यान रख कर सड़के बनायी जाती है और न ही सड़क बनाने के साथ नाली निर्माण किया जाता है फलस्वरूप रोड बनते ही बारिश में उधड़ जाती है।
9 . नगर निगम उदयपुर , UIT उदयपुर और उदयपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड अपने किसी भी काम में स्थानीय जनता के न तो व्यू लेती है न ही किसी प्रोजेक्ट में सलाहकार बनाती है। इसकी बानगी आपको उदयपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड के हेरिटेज संरक्षण के कामों को देख पता चल जाएगी जहाँ जगदीश मंदिर की नरु बारहठ की समाधी की विरासत का पता ही नहीं चला उदयपुर स्मार्ट सिटी लिमिटेड को और उनके ठेकेदार ने पूरी हेरिटेज ही तोड़ कर रख दी।
10. सीनियर अधिकारियों को प्रतिदिन के कामों की रिपोर्टिंग जैसी कोई व्यवस्था उदयपुर के इन विभागों के पास नहीं है और न ही वरिष्ठ अधिकारियों का कोई इक़बाल जिसे देख कर्मचारी ढंग से अपना काम अंदाज दे क्योंकि जहाँ का राजा अकर्मण्य होता है वहाँ के कर्मचारी तो उससे आगे बढ़ के निकम्मे होते है।