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News Agency India December 01, 2019 09:16 AM IST

उदयपुर नगर निगम स्वच्छता रेटिंग 2020 में कोसों पीछे,जानिए कारण !

किसी समय राजस्थान का सबसे साफ और स्वच्छ माने जाने वाला शहर स्वच्छता सर्वेक्षण मैं पिछले 3 सालों से लगातार निचले पायदान ओं की ओर खिंचा चला जा रहा है। उदयपुर की सड़कें गलियां पार्क और बाजार राजस्थान में ही नहीं अपितु पूरे भारतवर्ष में सबसे साफ माने जाते थे लेकिन पिछले 5 वर्षों में जिस हिसाब से उदयपुर को और उदयपुर नगर निगम को स्वच्छता के क्षेत्र में नए कदम उठाने थे और नवाचार लाने थे ,उसमें उदयपुर नगर निगम सहित स्मार्ट सिटी उदयपुर फेल होती नजर आ रही है ,वही राजस्थान के अन्य शहर जैसे डूंगरपुर अजमेर जयपुर उदयपुर से आगे निकलते जा रहे हैं।

स्वच्छता केवल सरकार का काम नहीं अपितु नागरिकों का भी काम होता है लेकिन उदयपुर नगर निगम और स्मार्ट सिटी उदयपुर पिछले 3 सालों से न तो स्वच्छता के संबंध में सघन जागरूकता अभियान चला पाए और ना ही स्वच्छता सर्वेक्षण को लेकर बोर्ड फ्लेक्स सूचना पट्ट शहर की गलियों, वार्डों और सड़कों पर लगवा पाए। अब जब स्वच्छता सर्वेक्षण का अंतिम महीना चल रहा है तब कहीं जाकर उदयपुर नगर निगम ने स्वच्छता सर्वेक्षण संबंधित जानकारी वाले पोस्टर और फ्लेक्स अत्यंत ही कम संख्या में शहर के मुख्य मार्गों पर लगाए हैं और क्वालिटी भी ऐसी की पहली तेज हवा में इनका फटना तय है क्योंकि इन्हें चिपकाया भी ऐसे ही गया है जैसे 10 15 दिन ही इन्हें चलाना हो।

उदयपुर नगर निगम और स्मार्ट सिटी स्वच्छता सर्वेक्षण में पिछड़ने के लिए स्वयं जिम्मेदार है क्योंकि इन दोनों ने ही जनता को साथ लेने की और सूचना तकनीकी आधारित ऐप का इस्तेमाल करने की आज तक पहल नहीं की है। तकनीक और सोशल मीडिया के जमाने में उदयपुर नगर निगम की अपनी कोई ऑनलाइन ऐप नहीं है जिसके माध्यम से उदयपुर के निवासी स्वच्छता और अन्य मामलों से संबंधित शिकायतें उदयपुर नगर निगम के अधिकारियों तक पहुंचा सके और न ही कोई ऐसा सिस्टम है जिससे यह सभी शिकायतें सीधे अधिकारियों तक ईमेल के फॉर्म में पहुंच सकें और जिम्मेदारी तय हो सके। स्वच्छता सर्वेक्षण 2020 में इस बार भी सूचना तकनीकी आधारित आधारित ऐप का इस्तेमाल करने वाले शहरों के लिए 40 नंबर अतिरिक्त निर्धारित किए गए हैं ,लेकिन खेद का विषय है कि पिछले 3 सालों में उदयपुर नगर निगम अपनी कोई एप या शिकायत निवारण पोर्टल उदयपुर की जनता को दे पाया।

जब तक आप जनता की समस्याओं को सीधे नहीं सुनेंगे और जब तक आप स्वच्छता के संबंध में कोई ऐसा ऑनलाइन पोर्टल या मोबाइल एप्प नागरिकों को प्रोवाइड नहीं करेंगे जिससे वे सीधे स्वच्छता और अन्य शिकायतों के लिए नगर निगम जैसे निकायों से जुड़ सकें, तब तक उस शहर का साफ होना और स्वच्छ होना पूर्णतया मुमकिन नहीं है क्योंकि स्वच्छता के लिए सरकार ही नहीं अपितु नागरिकों का योगदान अत्यंत आवश्यक है।

स्थानीय प्रशासन स्वच्छता एप के लिए आज भी 7 साल से पुरानी एक्शन उदयपुर ऐप का जिक्र किया करता है जो कि इतनी विकसित भी नहीं है शिकायत करने वालों को यह बता सके कि उनकी शिकायत सुन ली गई है और संबंधित अधिकारी को भेज दी गई है अथवा आपकी शिकायत का स्टेटस संबंधित अधिकारियों को भेज दिया गया है ना ही यह ऐप संबंधित अधिकारियों को कोई सूचना दे पाती है। ढेरों खामियाँ होने के बाद भी एक्शन उदयपुर एप्प का ज़िक्र किया जाता है और इस एप्प की बानगी देखिये कि मैंने स्वयं ने पिछले एक साल में तक़रीबन 5 बार शिकायतें भेजी जिसके लिए आज तक न तो उदयपुर नगर निगम ने कोई एक्शन लिया और एक्शन एप्प से जुड़े अधिकारियों ने। साथी एक्शन उदयपुर ऐप पर अगर आप कोई शिकायत करते हैं तो उसका महीनों तक कोई निवारण नहीं होता है और ना ही कोई अधिकारी इस संबंध में शिकायतकर्ता से संपर्क करने की कोशिश करता है। यदि आप सूचना तकनीकी आधारित ऐप के माध्यम से जनता की समस्या नहीं सुनेंगे, स्वच्छता की समस्या नहीं सुनेंगे तो शहर कैसे स्वच्छ हो पाएगा? आज के जमाने में कौन व्यक्ति ऑफिस आकर प्रार्थना पत्र देकर सफाई के लिए सूचना देता है?

यदि उदयपुर नगर निगम सूचना तकनीकी आधारित मोबाइल ऐप का इस्तेमाल करता है तो न केवल वह शिकायतकर्ताओं की शिकायतों पर नजर रख सकता है अपितु संबंधित वार्ड से संबंधित जमादारो और अन्य कर्मचारियों को मोबाइल पर सीधे संदेश भेजकर समस्या का समाधान तुरंत करवाया भी जा सकता है। क्योंकि क्योंकि सूचना तकनीकी आधारित सेवाओं का इस्तेमाल करने से सिस्टम में पारदर्शिता आ जाती है और जवाबदेही बढ़ जाती है, इसलिए उदयपुर नगर निगम के अधिकारी और कर्मचारी नहीं चाहते हैं कि कोई ऐसा सिस्टम बने जिसके माध्यम से उदयपुर की जनता अपनी शिकायतें सीधे उदयपुर नगर निगम तक पहुंचा सके अगर जनता ऐप के माध्यम से अपनी शिकायतें सीधे नगर निगम तक पहुंचाने लगी तो निगम के कामों की पोल खुल सकती है और कर्मचारियों के कामों का आकलन सीधे अधिकारियों तक पहुंच सकता है।

स्वच्छता सर्वेक्षण के लिए जन जागरूकता संबंधित अभियान उदयपुर नगर निगम अंतिम दिनों में ही चलाया करता है। बोर्ड फ्लेक्स बैनर आदि अंतिम दिनों में लगाने पर जनता उतनी जागरूक नहीं हो पाती है जितनी होनी चाहिए। साथ ही पूरे साल स्वच्छता समर अभियान के तहत स्कूलों में कार्यशाला अभियान आदि भी संचालित ढंग से नहीं किए जाते हैं। स्वच्छता सर्वेक्षण के लिए शहर के बाजार बस स्टैंड रेलवे स्टेशन और पर्यटन स्थलों की सफाई के लिए कई मापदंड तय किए गए हैं लेकिन उदयपुर नगर निगम के स्वास्थ्य शाखा के कर्मचारी उदयपुर को स्वच्छ बनाने में असफल होते नजर आ रहे हैं। वही राजस्थान और भारत के अन्य शहर बहुत कम समय में उदयपुर से कोसों आगे निकल चुके हैं।

सब्जी बाजारों और शहर की सड़कों पर घूमने वाले आवारा मवेशियों को पकड़ने में उदयपुर नगर निगम अब तक फेल होती नजर आ रही है। कहने को उदयपुर नगर निगम ने 400 से ज्यादा गाये उदयपुर नगर निगम के काइन हाउस में भर रखी है लेकिन फिर भी उदयपुर की सड़कों पर गाय और बैलों का आतंक किसी से छुपा नहीं है। रात्रिकालीन सफाई आज भी उदयपुर में एक सपना बनी हुई है वही डूंगरपुर जैसा शहर इस मामले में अव्वल बना हुआ है

स्वच्छता सर्वेक्षण में उदयपुर के पीछे होने के कारणों में स्वच्छता सर्वेक्षण से जुड़े अधिकारियों का स्वच्छता सर्वेक्षण 2020 के बारे में मूलभूत आधारित ज्ञान का नहीं होना है। साथ ही अंतिम दिनों में तैयारियां करना स्पष्ट तौर पर आपको नीचे के पायदान की ओर धकेलता है। स्वच्छता सर्वेक्षण के लिए कई बिंदुओं पर सारे शहर काम कर रहे हैं लेकिन कुछ बिंदु ऐसे भी हैं जिन पर अन्य शहर काम नहीं करते हैं और यही बिंदु आपको स्वच्छता सर्वेक्षण में आगे ले जा सकते हैं लेकिन उदयपुर नगर निगम ने इन बिंदुओं पर आज तक ध्यान देने की कोशिश नहीं की है और यही कारण है कि उदयपुर जैसा साफ शहर स्वच्छता सर्वेक्षण में निचले पायदान की ओर खिंचा चला जा रहा है

जब नगर निगम प्रशासन और स्वच्छ शहर की बात आती है तब मध्यप्रदेश की वाणिज्यिक राजधानी इंदौर का नाम जुबाँ पर सबसे पहले आता है। इंदौर जो लगातार तीन वर्षों में भारत का सबसे स्वच्छ शहर घोषित किया गया है। अब इंदौर का एक और कदम जो अनुकरण के योग्य है, शहर के जिला प्रशासन और नगरपालिका कर्मचारियों ने हर शुक्रवार को अपने कार्यालयों तक पहुंचने के लिए सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने का निर्णय लिया है। जिला कलेक्टर लोकेश जाटव और नगरनिगम आयुक्त आशीष सिंह ने इस बात को लेकर पहल भी की है ।

सार्वजनिक परिवहन और ट्रैफिक जाम से बचने को प्रोत्साहित करने के अलावा,इस योजना का उद्देश्य इस मिथक को ध्वस्त करना भी है कि अधिकारी लोग सार्वजनिक परिवहन का इस्तेमाल नहीं करते । उदाहरण के लिए कलेक्टर ने अब निजी संगठनों से अपील की है कि वे अपने कर्मचारियों को सप्ताह में कम से कम एक बार सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करें और इस तथ्य को देखते हुए कि इंदौर के लोग प्रशासन की पहल का बेहद समर्थन करते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह परियोजना भी सफल होगी।

राजस्थान सरकार को भी अपने कर्मचारियों को जयपुर में वरिष्ठ अधिकारियों और अन्य प्रमुख शहरों सहित सार्वजनिक परिवहन द्वारा यात्रा करने के निर्देश देकर एक सप्ताह में एक बार शुरू करने और नियत समय में नियमित रूप से और अधिक नियमित रूप से निर्देशन करना चाहिए। चूंकि समाज के एक बड़े वर्ग के लोग बसों, ट्रेनों और मेट्रो का उपयोग करते हैं, इसलिए अधिकारियों को इस कदम पर जनता की शिकायतें सुनने को मिलेंगी। सड़कों से दूर रहने वाले सैकड़ों सरकारी वाहनों को भी ईंधन की लागत में भारी बचत होगी। इससे निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के नौकरशाहों द्वारा सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करने की आदत बनने तक उम्मीद है कि यह एक व्यापक प्रभाव होगा। इंदौर से सीखे जाने वाले अन्य सबक भी हैं जो कुछ समय पहले खबरों में थे जब नगर आयुक्त ने छह महीने में डंप यार्ड से 13 लाख टन कचरे को साफ करवाया और 400 करोड़ रुपये की भूमि का अधिग्रहण किया।उदयपुर नगर निगम में कुछ कुशल अधिकारी भी हैं लेकिन वर्षों की सुस्ती ने पूरे सिस्टम को सुस्त बना दिया है। यदि इंदौर 2014 में स्वच्छता रेटिंग में 149 वें स्थान से बढ़कर तीन साल के भीतर नंबर 1 रैंक पर पहुंच सकता है, तो कोई कारण नहीं है कि उदयपुर देश का वेनिस होने के बाद भी एक समान उपलब्धि नहीं कर सकता है। जरूरत है कि सभी नौकरशाही इच्छाशक्ति और सार्वजनिक समर्थन की ।

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