महाराणा फतहसिंह जी नही गए दिल्ली दरबार,आज भी कुर्सी सजी है महलों में !
12 दिसंबर 1911 को दिल्ली दरबार को किंग जॉर्ज पंचम और रानी मैरी को भारत के सम्राट और महारानी के रूप में मनाने के लिए आयोजित किया गया था। सभी शासक राजकुमारों, महानुभावों, उस्ताद और अन्य गणमान्य व्यक्तियों ने द किंग और क्वीन की आज्ञा का पालन करने के लिए दिल्ली की यात्रा की। प्रोटोकॉल के अनुसार महाराणा फतहसिंह जी भी दिल्ली गए जहाँ उन्होंने रेलवे स्टेशन पर अन्य भारतीय शासकों के साथ वाइसराय से मुलाकात की। हालांकि वह दरबार में शामिल नहीं हुए, लेकिन ब्रिटिश डिक्टेट के प्रति अपना प्रतिरोध दिखाने के एक तरीके के रूप में दरबार में अपनी कुर्सी खाली छोड़कर उदयपुर लौट आए। बाद में चेयर को उदयपुर भेज दिया गया और अब द सिटी पैलेस संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है।
1911 का दिल्ली दरबार शायद ब्रिटिश राज का सबसे भव्य अखाड़ा था। भारत के राजा-सम्राट के रूप में किंग जॉर्ज V के राज्याभिषेक को यादगार बनाने के लिए कार्यक्रम में ब्रिटिश साम्राज्य के सभी लोग शामिल थे। उस समय इसकी लागत लगभग एक मिलियन पाउंड थी और तैयारी का एक वर्ष इसे निष्पादित करने में चला गया। भारत में हर रियासत के राजा और नवाब उपस्थिति में थे और राज के धूमधाम और भव्यता के बीच यह घोषणा की गई थी कि ब्रिटिश भारत की राजधानी को कलकत्ता से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया जाएगा।
जब दिल्ली में वायसराय लार्ड कर्जन थे तब उन्होंने बादशाह एडवर्ड सप्तम के राजतिलक के अवसर पर 1 जनवरी 1903 को दिल्ली में एक बड़े दरबार का आयोजन किया और भारत के महाराजा, राजा, नवाब आदि को आमंत्रित किया। जिसमें महाराणा श्री फतेह सिंह जी को भी 6 माह पूर्व निमंत्रण पत्र भेजा गया और पत्र व्यवहार भी जारी रखा गया।
लेकिन महाराणा ने अपने स्तर पर कभी स्वीकृति दी ही नहीं और लगातार इसे टालते रहे। इसका अर्थ यह है कि महाराणा की तरफ से पूर्ण मनाही की गई थी । अंग्रेज सरकार इन्हें बुलाना चाहती थी, चाहे दूसरे राजा एक या दो नहीं भी आवे तो कोई बात नहीं ! रेजिडेंट और ए. ए. जी. अधिकारी आदि सब ने खूब कोशिश की ,लेकिन महाराणा ने पूर्ण इंकार कर दिया परंतु आखिरी वक्त पर अपनी स्पेशल ट्रेन द्वारा दिल्ली पहुंचे और वायसराय से व्यक्तिगत मुलाकात करने के बाद उदयपुर के लिए प्रस्थान कर दिया। इस तरह महाराणा फतहसिंह दिल्ली दरबार में हाजिर हुए ही नहीं जैसा कि महाराणा प्रताप का प्रण था कि यह वंश किसी के सामने अपना सिर नहीं झुकाएगा।
इसी प्रकार सन 1911 ईस्वी में जब पंचम जॉर्ज बादशाह ने दिल्ली दरबार लगाया उसमें भी महाराणा दरबार में नहीं गए। जहां सारे के सारे राजा- महाराजा, नवाब आदि बड़ी शान से अपनी कुर्सियों पर बैठे थे, वहां महाराणा की कुर्सी खाली पड़ी रही। महाराणा शिष्टाचार के नाते केवल स्टेशन (सलीमाबाद) में मुलाकात कर उदयपुर के लिए प्रस्थान कर गए । दरबार में जो महाराणा के लिए कुर्सी लगी थी, वह खाली ही पड़ी रही। अंग्रेज गवर्नमेंट ने उदयपुर महाराणा के पास ही कुर्सी को भिजवा दिया क्योंकि उस पर और किसी को बैठने का अधिकार था ही नहीं।
दिल्ली दरबार आज उत्तरी दिल्ली के मॉडल टाउन में शांति स्वरूप त्यागी मार्ग पर स्थित कोरोनेशन पार्क नामक स्थान पर आयोजित किया गया था। किंग जॉर्ज और क्वीन जहां बैठे थे वहां एक स्मारक ओबिलिस्क खड़ा है।
ऐसा कहा जाता है कि मुगल कभी भी मुख्य रूप से मेवाड़ पर कब्जा नहीं कर पाए थे। उदयपुर के महाराणा ने भी ब्रिटिश राजशाही को भारत के सर्वोच्च शासकों के रूप में नहीं माना और यही कारण है कि 1911 में उदयपुर के महाराणा फतेह सिंह किंग जॉर्ज पंचम के सम्मान में आयोजित दिल्ली दरबार में उपस्थित नहीं थे। उदयपुर साम्राज्य प्रभावी रूप से स्वतंत्र था ।
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