भाजपा लगा रही उदयपुर में एड़ी चोटी का जोर, वहीं कांग्रेस लग रही सुस्त !
उदयपुर में नगर निगम निकाय चुनावों की सरगर्मियाँ जोरों पर है। जहाँ भाजपा ने सिर्फ चार पुराने पार्षदों को मौका देकर जनता के सामने सिद्ध कर दिया है कि उनके पूर्ववर्ती पार्षदों ने जनता को निराश किया है वही वर्तमान भाजपा उम्मीदवार भी पूर्व पार्षदों को अपने साथ प्रचार में शामिल नहीं कर जनता की नाराजगी से बचने की कोशिश कर रहे है। टिकट वितरण में भी अंतिम समय में एक घंटे में लिस्ट में नाम बदल जाना कई कहानियों को जन्म दे रहा है वही भाजपा के अन्दर खेमे जबरदस्त राजनीती अब भी जारी है और कार्यकर्ताओँ में दबे स्वर असंतोष कही इस बार पासा न पलट दे।
बरहाल भाजपा बोर्ड के पास इस बार सीवर लाइन के अतिरिक्त ज्यादा कुछ बताने को नहीं है और सीवर परियोजना ने जनता को नाको चने चबवायें भी है। रोचक बात ये भी है कि पूर्व महापौर को इस बार चुनाव प्रचार में भी कम देखा जा रहा है और भाजपा आलाकमान को पता है कि जनता में वर्तमान बोर्ड को लेकर जबरदस्त नाराजगी है। वैसे भी सीवर परियोजना स्मार्ट सिटी का प्रोजेक्ट थी जिसे न तो स्मार्ट सिटी ढंग से पूरा कर पा रही है और न ही नगर निगम उदयपुर।
उदयपुर की सड़कों के बुरे हाल किसी से छुपे नहीं है और आवारा पशुओं की समस्या से वर्तमान बोर्ड निजात नहीं दिला पाया। शहर के सारे बगीचे खस्ताहाल है। सड़कों के डिवाइडर टूटे पड़े है और उनके रंग सभी सड़को पर एक समान न होकर रंगीले है। (कही हरे ,कही नीले ) पर्यटन स्थलों पर सफाई नहीं है और न ही पीने का पानी। साथ ही उदयपुर का कोई ऐसा बगीचा या पर्यटन स्थल ऐसा नहीं है जहाँ की सारी लाइट्स चालू हो या निगम का कोई पहरेदार वहाँ मिले।
दिल्ली गेट फव्वारा और गार्डन नगर निगम उदयपुर बोर्ड की सफलताओं की कहानी खुद ब खुद कह रहा है। शहर की ज्यादातर लाइट्स के पोल का कलर जंग खा चूका है और इनके वायर नीचे निकल कर दुर्घटना को बुलाते रहते है और शहर के कई इलाको की लाइट्स आज तक बंद है। नगर निगम उदयपुर बोर्ड के निर्माण कार्यों की गुणवत्ता की कहानी सड़कों के पेच खुद कहते है जो पहली बारिश में उधड़ जाते है और कई जगह पैच ऐसे लगा दिए जाते है मानों पैच नहीं स्पीड बैरियर बना दिए गए हो।
पर्यटन स्थल जैसे दूध तलाई और फतहसागर की रोड आज तक टूटी पड़ी है और न तो वहाँ कोई सीवर लाइन डाली गयी और न ही कोई दूसरा काम किया गया। पर्यटक धूल खाकर इस बार कह गए कि क्या हो गया है उदयपुर जैसे बेहतरीन शहर को ? वर्तमान भाजपा बोर्ड न तो झीलों के बहते पानी को बचा पाया और न ही गोवर्धन सागर पाल को लीक होने से बचा पाया। दुर्भाग्य तो ये भी है कि स्वरुप सागर से लीक होकर बहते करोड़ो लीटर पानी को आज तक दुरुस्त करने की भाजपा बोर्ड ने कोई पहल नहीं की।
वर्तमान भाजपा बोर्ड स्मार्ट सिटी के कामों को अपनी उपलब्धियाँ बता कर गिना रहा है जबकि गैर भाजपा शाषित स्मार्ट शहरो में भी ये सभी काम अच्छे से हो रहे है। आयड़ नदी प्रोजेक्ट को भाजपा ने भाखड़ा नांगल से भी बड़ा प्रोजेक्ट मान लिया है और यही कारण है कि कई सालों बाद भी आज तक प्रोजेक्ट पूरा नहीं हुआ।
बरहाल भाजपा अपने बूथ कार्यकर्ताओ के भरोसे जीत के भरोसे पर कायम है और धारा 370,राम जन्मभूमि ,सर्जिकल स्ट्राइक और मोदी जी के नाम को लेकर चुनावी मैदान में है क्योंकि शहर के कामों को लेकर कुछ ख़ास उपलब्धियाँ भाजपा बोर्ड के खाते में है नहीं।
वही कांग्रेस निकाय चुनाव को लेकर जितनी संजीदा दिखनी चाहिए उतनी उदयपुर शहर में नज़र नहीं आ रही। जहाँ भाजपा दिया कुमारी और कैलाश मेघवाल जैसे दिग्गज नेताओं को उदयपुर बुलाकर जनता का दिल जितने में जुटी है वही कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सड़को पर इक्का दुक्का ही नज़र आ रहे है। कांग्रेस अगर सही रणनीति से चुनाव प्रचार करती है तो जनता के रोष को वो वोटों में तब्दील कर सकती है लेकिन चुनावी रणनीति का अभाव कांग्रेसी खेमे में साफ़ नज़र आ रहा है। हालाँकि इस बार निकाय चुनावों में कांग्रेस ने कई ऐसे चेहरों को मौका दिया है जो लोकप्रिय होने के साथ उच्च शिक्षित भी है। लेकिन कांग्रेस अब तक उदयपुर में भाजपा को घेरने में असफल ही रही है।
वही उदयपुर बदलाव दल और जनता सेना इस बार कोई चमत्कार भी कर सकती है। अगर भाजपा और कांग्रेस के रिजल्ट्स हरियाणा राज्य के चुनाव जैसे आते है तो निश्चित तौर पर उदयपुर की राजनीती करवट ले सकती है।