भारतीय प्रशासनिक व्यवस्था की कटु यथार्थता: सत्तांतरण की अनिवार्य शल्य-क्रिया
सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री पद संभालते ही 24 घंटे भी पूरे न होने पाए थे कि प्रशासनिक मशीनरी में एक भारी-भरकम मध्यरात्रि शल्य-क्रिया संपन्न हो गई। पूर्व शासन के प्रति निष्ठावान माने जाने वाले 40 से अधिक शीर्ष आईपीएस अधिकारियों एवं जिलाधिकारियों का अचानक स्थानांतरण कर दिया गया। यह घटना मात्र एक व्यक्तिगत या दलगत निर्णय नहीं, अपितु भारतीय नौकरशाही की संरचनात्मक विकृति का जीवंत दर्पण है।
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311 तथा सेवा नियमावलियों के आड़ में नौकरशाही को तटस्थ एवं संवैधानिक संरक्षक के रूप में कल्पित किया गया था, किंतु वास्तविकता इसके सर्वथा विपरीत है। राज्यों में शासन परिवर्तन होते ही पुलिस एवं प्रशासनिक उच्चाधिकारियों का सामूहिक शुद्धिकरण (purge) एक स्थापित परंपरा बन चुकी है। यह प्रक्रिया न केवल शासन की निरंतरता को बाधित करती है, अपितु संवैधानिक मूल्यों—विशेषतः 'निष्पक्षता' एवं 'कानून का शासन'—को भी क्षति पहुंचाती है।
पश्चिम बंगाल में 2026 के विधानसभा चुनावों के उपरांत भाजपा की भारी विजय एवं सुवेंदु अधिकारी के मुख्यमंत्री पद ग्रहण के पश्चात् यह प्रशासनिक पुनर्गठन हुआ। इससे पूर्व चुनाव आयोग ने भी स्वयं कई दौर के स्थानांतरण किए थे, जो निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के उद्देश्य से किए गए माने जाते हैं। किंतु नया शासन अपने विश्वसनीय अधिकारियों को प्रमुख पदों पर नियुक्त करने की प्रक्रिया में तेजी ला रहा है। यह चक्र हर राज्य में दोहराया जाता है—चाहे उत्तर प्रदेश हो, बिहार, या महाराष्ट्र। सत्ता परिवर्तन का प्रथम कार्यवाहक आदेश प्रायः 'ट्रांसफर-पोस्टिंग' सूची ही होता है।
यह स्थिति नौकरशाही को 'राजनीतिक सेना' में परिवर्तित कर देती है। अधिकारी दो श्रेणियों में विभक्त हो जाते हैं—'हमारे' और 'उनके'। जो 'उनके' होते हैं, उन्हें या तो निष्क्रिय पदों पर धकेल दिया जाता है या अपमानजनक स्थानांतरण का शिकार बनाया जाता है। परिणामस्वरूप, योग्यता, अनुभव एवं निष्पक्षता का मानदंड गौण होकर 'निष्ठा' (loyalty) प्रमुख हो जाता है। इससे न केवल शासनिक दक्षता क्षीण होती है, बल्कि पुलिस बल का नैतिक चरित्र भी संदिग्ध हो उठता है।
यह प्रणाली 'स्थायी सरकार' की अवधारणा को व्यर्थ सिद्ध करती है। लोकतंत्र में नौकरशाही को राजनीतिक नेतृत्व के प्रति उत्तरदायी तो होना चाहिए, किंतु संवैधानिक मूल्यों के प्रति अंधानुकरणीय निष्ठा रखनी चाहिए, न कि सत्ताधारी दल के प्रति। दुर्भाग्यवश, कैडर नियम, All India Services Act तथा राज्य सरकारों के नियंत्रण ने इसे 'राजनीतिक एजेंट' बना दिया है।
सुवेंदु अधिकारी का यह कदम आश्चर्यजनक नहीं है; यह अपेक्षित था। कोई भी नया शासन, विशेषकर 15 वर्षीय सत्तावधि के पश्चात्, जिसमें प्रशासनिक तंत्र पर एक दल का गहरा प्रभाव माना जाता था, बिना इस 'सफाई' के आगे नहीं बढ़ सकता। किंतु यही वास्तविकता भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना है—जहां हर सत्तांतरण 'विजेता ले जाता है सब कुछ' का सिद्धांत लागू होता है।
यदि हम वास्तव में संवैधानिक नौकरशाही चाहते हैं, तो स्थानांतरण नीति को अधिक पारदर्शी एवं न्यायिक निगरानी के अधीन लाना होगा। अन्यथा, यह चक्रव्यूह निरंतर चलता रहेगा—आज सुवेंदु अधिकारी कर रहे हैं, कल कोई अन्य करेगा। प्रशासन संवैधानिक होगा या निजी सेना, यह निर्भर करता है हमारी सामूहिक राजनीतिक परिपक्वता पर।
यह 'ब्रूटल रियलिटी' है, किंतु इसे अपरिहार्य मान लेना हमारी सामूहिक असफलता होगी। सुधार की मांग केवल विपक्ष में रहते समय नहीं, सत्ता में रहते समय भी करनी होगी। अन्यथा, लोकतंत्र केवल चुनावी होगा, शासकीय नहीं।