निजी स्कूल डाल रहे खतरे में शहर को,फीस के लिए कोरोना काल में कॉपी सबमिशन और ऑनलाइन टेस्ट का नाटक !
निजी स्कूल फीस वसूलने के लिए नित्य नए नए पैंतरे आजमाते जा रहे है। स्कूल अब अपने स्टाफ और अन्य खर्चों के लिए ऑनलाइन क्लास के जरिये बच्चों की आँखों की बली लेना चाहते है। साथ ही मानसिक स्वास्थ्य पर कुठाराघात करना चाहते है क्योंकि कई बच्चों को ऑनलाइन क्लास में या तो कुछ समझ आ नहीं रहा या इनके घरों में मोबाइल नेटवर्क ढंग से नहीं आने पर वीडियो क्लासो में बच्चें समझ नहीं पाते। ऐसे में कई बच्चों में हीन भावना पनप रही है क्योंकि कुछ बच्चें समझ पाते और ज्यादातर बच्चें नहीं।
कभी ऑनलाइन क्लासेज तो कभी ऑनलाइन होम वर्क ।
पहले ही अभिभावकों की आर्थिक स्थिति खराब है और जेब की हालत पतली है। ऐसे में भी निजी स्कूलों ने फीस के लिए ऑनलाइन क्लासेज की नोटंकी शुरू की थी। जबकि कई परिवारों में एक से ज्यादा बच्चें है और मोबाइल भी एक ही है और ऑनलाइन क्लास की पढ़ाई का समय भी एक । ऐसे में अभिभावकों के साथ समस्या ये भी है कि वो किस बच्चें को फ़ोन या लैपटॉप उपलब्ध करवाए और किसे नहीं ?
कोरोना काल में जहाँ आमदनी के स्रोत खत्म हो गए है और हर कोई आर्थिक दुश्वारियों से गुज़र रहा है ,वहीं अभिभावकों को बच्चों को ऑनलाइन पढ़वाने के लिए हज़ारो रुपये के इंटरनेट रिचार्ज हर महीने करवाने पड़ रहे है क्योंकि ऑनलाइन वीडियो क्लासेज में जहाँ मोबाइल डेटा ज्यादा खर्च होता है वहीं इसमें तेज़ स्पीड इंटरनेट की जरूरत भी होती है।
शहर के कई स्कूल बाकायदा चुपके चुपके 5-10 बच्चों के बैच को सप्ताह में एक बार चुपचाप स्कूल बुला रहे है। ऐसे में अगर किसी संक्रमित घर से बच्चा स्कूल कहीं वायरस लेकर पहुँच गया तो न केवल बच्चों की जान सांसत में आ जाएगी बल्कि संबंधित टीचर का परिवार, स्कूल और मोहल्ले तक भी वायरस पहुँच जाएगा। लेकिन स्कूलों को न तो अपने स्टाफ की फ़िक्र है और न ही बच्चों की।
हद तो तब हुई जब शहर के एक मिशनरी स्कूल ने बाकायदा अभिभावकों को कॉपी सबमिशन के लिए नोटिस भेज दिया है। बाकायदा तारीख वाइज और क्लास वाइज अभिभावकों को बुलाया गया है। आपकों बताते चले कि इस स्कूल में हर क्लास में औसतन 50 बच्चें है और हर क्लास में कम से कम पाँच सेक्शन है। मतलब साफ है कि स्कूल में प्रतिदिन 250 के आसपास अभिभावकों का आना होगा और ऐसे में कोरोना संक्रमण फैलने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता।
चूँकि कई शहरों में अब संक्रमण ज्यादा फैल रहा है और उदयपुर शहर भी इससे अछूता नहीं है । ऐसे में अगर कहीं किसी संक्रमित परिवार के बच्चें की कॉपी के द्वारा वायरस टीचर तक पहुँचा तो न केवल टीचर का परिवार और मोहल्ला ख़तरे में पड़ जाएगा बल्कि उस टीचर से जुड़े कम से कम 500 बच्चों के परिवारों में कॉपियों के माध्यम से वायरस शहर के विभिन्न मोहल्लों तक पहुँच जाएगा। जहाँ पहले ही जनता नोटों को सैनिटाइज करते करते परेशान है वहीं क्या अब वो कॉपीज को सैनिटाइज कर पाएँगे क्या ?
फीस हासिल करने के लिए और अभिभावकों को जोड़े रखने के लिए अब स्कूल ऑनलाइन टेस्ट करवाने जा रहे है। बाकायदा स्कूल ने अपनी वेबसाइट पर कॉपी सबमिशन का टाइम टेबल क्लास वाइज अपलोड कर दिया है। इसमें कही पर अभिभावकों को बैच वाइज नहीं बुलाया गया है। उदयपुर शहर में जहाँ पहले ही विभिन्न मोहल्लों में कोरोना दस्तक दे चुका है और लोग बाहर निकलने से बच रहें ,साथ ही सरकार की गाइड लाइन में भी अत्यंत गंभीर काम होने पर ही बाहर निकलने की सलाह दी गयी है,ऐसे में अभिभावकों को स्कूल बुला कर स्कूल्स अभिभावक सहित पूरे शहर को खतरे में डाल सकते है।
साथ ही स्कूल वालों ने अपनी वेबसाइट पर एग्जाम (परीक्षा समय सारणी) भी अपलोड कर दी है। परीक्षाएं वस्तुनिष्ठ प्रश्नों के आधार पर ली जाएगी और वो भी नियत समय पर। अगर किसी कारण नेट नही चला या फ़ोन डाउन हुआ तो ऐसी स्थिति में क्या होगा ? बच्चें औऱ अभिभावक दोनों ही परेशान है।
वहीं कुछ बच्चों ने तो ऑनलाईन एग्जाम के लिए बाकायदा जुगाड़ की तैयारियां भी कर ली है। बच्चें दोस्तों को घर बुलाकर एक साथ परीक्षा देने का प्लान बना रहे है। स्पष्ट है कि ऐसी परीक्षाओं का कोई औचित्य ही नहीं है। पहले ही फ़ोन पर घंटो प्रतिदिन आँखें कुजा कर बच्चे पढ़ाई को समझने की कोशिश कर रहे है और कई तो अवसाद में भी आ रहे है ,अब ऑनलाइन एग्जाम के नाम पर इनके मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ रहा है।
मतलब साफ है कि अभिभावकों का तो पीसना तय है। पहले ही जेब की हालत खराब है। ऐसे में किताबों और कॉपी के साथ उन्हें हर महीने फीस देनी है। साथ ही इंटरनेट रिचार्ज पर खर्चा भी करना है। उसके बाद बच्चों के साथ फ़ोन पर नज़र भी रखनी है और डरते डरते इन्हें कॉपियां जँचवाने स्कूल भी जाना है और डर में भी रहना कि कॉपियों के साथ स्कूल से कहीं कोरोना वायरस घर न आ जायें।
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