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clean-udaipur विरासत का ही पता नहीं स्मार्ट सिटी उदयपुर को और तोड़ कर कर रही पुनर्निमाण !
News Agency India September 01, 2019 02:17 PM IST

विरासत का ही पता नहीं स्मार्ट सिटी उदयपुर को और तोड़ कर कर रही पुनर्निमाण !

स्मार्ट सिटी उदयपुर यूँ तो कई योजनाओं के माध्यम से उदयपुर को फायदा पहुंचाने की कोशिश कर रही है लेकिन उसके हर प्रयास में प्रतिबद्धत्ता की कमी नज़र आती है चाहे इसका सीवर लाइन प्रोजेक्ट हो या विरासत संरक्षण !

स्मार्ट सिटी उदयपुर का हर प्रोजेक्ट प्लानिंग और विशेषज्ञ के अभाव में बर्बाद होता चला जा रहा है। इसकी एक बानगी आप जगदीश चौक से स्कूल की तरफ जाती रोड के किनारे महादेव मंदिर के नीचे होने वाले काम से देख सकते है जहाँ स्मार्ट सिटी उदयपुर दीवार का नवनिर्माण करवा रही थी और इस दीवार पर 1580 ईस्वी में जगदीश मंदिर और उदयपुर को बचाने वाले नरु सिंह बारहठ का स्मारक था और एक स्मारक पट्टिका भी लगी थी। इस पूरी स्मारक को तोड़ दिया गया है और इसकी बजाय वहाँ दीवार बनायी जा रही है।

आपको बताते चले कि जब 1580 ईस्वी में औरंगज़ेब जनवरी की तेज़ कड़कड़ाती ठण्ड में सेनाओं ने मेवाड़ की सीमा पर आकर डेरा डाल लिया तो उससे पहले महाराणा राजसिंह प्रजा व सेना सहित अरावली के पहाड़ों में जा चुके थे। जब महाराणा राजसिंह राजपरिवार व सामंतों और जनता सहित पहाड़ों में प्रस्थान कर रहे थे तब किसी सामन्त ने महाराणा के बारहठ नरू को ताना दिया कि " जिस दरवाज़े पर तुमने बहुत से दस्तूर (नेग) लिए हैं, उसको लड़ाई के वक़्त ऐसे ही कैसे छोड़ोगे ?"

नरू बारहठ साहब एक क्षण मौन के बाद हुंकारे - "जब तक नरु बारहठ के धड़ पर शीष रहेगा तब तक ठाकुर जी (जगदीश मन्दिर) की सीढ़िया कोई आतातायी नहीं चढ़ सकेगा। एकलिंग विजयते नमः"।नरू बारहठ के अपने 20 साथी भी उनके साथ यहीं रुक गए।

आखिर वो घडी आ गयी जब सारे दरवाजे तोड़ते हुए सुबह 9 बजे के के करीब मुगल फौज जगदीश मंदिर के पास ढलान पर भटियाणी चौहटा और घण्टाघर तक आ गयी। औरंगज़ेब के शहज़ादे मुहम्मद आज़म, सादुल्ला खां, इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां की सेना अब भी आगे बढ़ने से कतरा रही थी क्योंकि पूरा उदयपुर खाली था और रात तक शंख नाद की आवाज़े आ रही थी। हुंकारे आ रही थी। सेना के साथ शहज़ादे मुहम्मद आज़म भी किसी अनहोनी की आशंका में थे। सादुल्ला खां ने अपने खास 50 सिपाहियों की टोली को आगे टोह लेने भेजा। जगदीश चौक तक आते आते सब के सब 50 हलाक कर दिए गए। खून से सड़क लाल हो चुकी थी। रक्त बहता हुआ ढलान में मुग़ल सेना की ओर आता दिखा। मुग़ल सेना में हड़कम्प मच गया।

स्थिति को इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां ने सम्भाला और सेना से आगे बढ़ने को कहा। तभी हर हर महादेव के नारे बुलंद हो उठे। सुनसान शहर थर्रा उठा। मंदिर की उत्तर वाले दरवाज़े (जहाँ आज स्कूल है )से एक योद्धा लड़ने के लिए बाहर आया और ऐसी गति मानों बिजली चलीं आ रही हो। केसरिया बाना पहने पहला माचातोड़ यौद्धा अपना अंतिम कर्तव्य निभाने निकल चूका था। हर हर महादेव के हुंकार और घोड़े की टाप की आवाज़ों के साथ पत्थर सड़को पर खुर ज्यादा ही आवाज़ कर रहे थे।हर माचातोड़ यौद्धा कम से कम 50 दुश्मनों को मारकर ही अपना जीवन धन्य समझता। जैसे ही एक माचातोड़ यौद्धा शहीद होता उसी समय दूसरा माचातोड़ यौद्धा ढलान मे हूंकार भरता हुआ नीचे मुग़ल ख़ेमे में घुस कर कई मुग़लो को फ़ना कर देता।ऐसे ही मंदिर से एक-एक कर माचातोड़ यौद्धा बाहर आते गए। शाम होने चली आयी थी।

मुग़ल सेना सदमे में डरी हुई थी और हैरान भी थी माचातोड़ यौद्धा की वीरता पर। मुग़ल सेना में माचातोड़ यौद्धा को लेकर फुस फुसाहट हो रही थी और हर कोई नए माचातोड़ यौद्धा का इंतज़ार कर रहा था। किसी को पता नहीं था ऐसे कितने ओर माचातोड़ यौद्धा अभी भी छिपे है ऊपर मन्दिर की ओर ?

लेकिन समय और नियति पहले ही नरु बारहठ की वीरता का किस्सा लिख चुकी थी। आखिर में नरू बारहठ बाहर आए और बड़ी बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। केसरिया बाना पहने जिन्दा रहते हुए उनकी तलवार ने कई मुग़ल सिप्पसालारो को हलाक कर दिया। शीश कटने के बाद भी उनका धड़ तलवार चलाता रहा। मुग़ल सैनिक इधर उधर भागते फ़िरे। नरू बारहठ के शहीद होते ही मुग़ल सेना ने डर कर एक घण्टे ओर इंतज़ार किया। उसके बाद बादशाही फौज ने जगदीश मंदिर में मूर्तियों को तोड़कर मंदिर को तहस-नहस कर दिया।

इन 20 माचातोड़ योद्धाओं का चित्र जगदीश मंदिर में प्रवेश करते ही बांयी तरफ लगा हुआ है और ऐसे वीर शिरोमणि मेवाड़ी नरु सिंह बारहठ की पहले से उदयपुर उपेक्षा करता आ रहा है। हद तो अब हुई कि स्मार्ट सिटी उदयपुर ने इतिहास और ज्ञान के अभाव में विरासत को ही खत्म कर दिया।

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