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Current News / दानवीर भामाशाह के बजाय नाचने वाली के नाम से विरासत का नाम रखा उदयपुर नगर निगम ने !

clean-udaipur दानवीर भामाशाह के बजाय नाचने वाली के नाम से विरासत का नाम रखा उदयपुर नगर निगम ने !
News Agency India July 01, 2019 04:00 PM IST

 

भामाशाह अपनी दानवीरता के कारण इतिहास में अमर हो गए। भामाशाह के सहयोग ने ही महाराणा प्रताप को जहाँ संघर्ष की दिशा दी, वहीं मेवाड़ को भी आत्मसम्मान दिया। कहा जाता है कि जब महाराणा प्रताप अपने परिवार के साथ जंगलों में भटक रहे थे, तब भामाशाह ने अपनी सारी जमा पूंजी महाराणा को समर्पित कर दी। तब भामाशाह की दानशीलता के प्रसंग आसपास के इलाकों में बड़े उत्साह के साथ सुने और सुनाए जाते थे।

महाराणा प्रताप के लिए उन्होंने अपनी निजी सम्पत्ति में इतना धन दान दिया था कि जिससे 25000 सैनिकों का बारह वर्ष तक निर्वाह हो सकता था। प्राप्त सहयोग से महाराणा प्रताप में नया उत्साह उत्पन्न हुआ और उन्होंने पुन: सैन्य शक्ति संगठित कर मुगल शासकों को पराजित करा और फिर से मेवाड़ का राज्य प्राप्त किया।

भामाशाह बेमिसाल दानवीर एवं त्यागी पुरुष थे। आत्मसम्मान और त्याग की यही भावना उनके स्वदेश, धर्म और संस्कृति की रक्षा करने वाले देश-भक्त के रूप में शिखर पर स्थापित कर देती है। उनके लिए पंक्तियाँ कही गई हैं-

वह धन्य देश की माटी है, जिसमें भामा सा लाल पला।
उस दानवीर की यश गाथा को, मेट सका क्या काल भला॥

ऐसी विरल ईमानदारी एंव स्वामी भक्ति के फलस्वरूप भामाशाह के बाद उनके पुत्र जीवाशाह को महाराणा प्रताप के पुत्र अमर सिंह ने भी प्रधान पद पर बनाये रखा । जीवाशाह के उपरांत उनके पुत्र अक्षयराज को अमर सिंह के पुत्र कर्ण सिंह ने प्रधान पद पर बनाये रखा ।इस तरह एक ही परिवार की तीन पीढ़ियो ने मेवाड़ मे प्रधान पद पर स्वामीभक्ती एंव ईमानदारी से कार्य कर जैन धर्म का मान बढ़ाया । महाराणा स्वरूप सिंह एंव फतेह सिंह ने इस परिवार के लिए सम्मान स्वरुप दो बार राजाज्ञाएँ निकाली कि इस परिवार के मुख्य वंशधर का सामूहिक भोज के आरंभ होने के पूर्व तिलक किया जाये । जैन श्रेष्टी भामाशाह की भव्य हवेली चित्तौड़गढ तोपखाना के पास आज जीर्ण शीर्ण अवस्था मे है ।

वक्त चलता है रूकता नहीं एक पल में ये आगे निकल जाता है ।

महाराणा प्रताप और भामाशाह कि दास्तां सभी को पता है। क‌ई पट्टों परवानों और ताम्र पत्रों पर भामाशाह के हस्ताक्षर इतिहास शोध में शोधकर्ताओं के लिए महत्वपूर्ण स्थान रखते हैं परन्तु भामाशाह ने अपना अंतिम समय जहाँ बिताया ,जो हवेली भामाशाह का निवास हुआ करता था,उसे आज उदयपुर वासियों सहित नगर निगम उदयपुर और स्मार्टसिटी उदयपुर तक भूल चूके है।हवेली के नाम पर मात्र एक दरवाजा रह गया है वो भी उन महानुभाव भामाशाह के नाम पर न होकर एक नाचने वाली बददु भगतण के नाम पर हो गया है।

पहले ये दरवाजा दीवान जी पोल के नाम से जाना जाता था। यहां से अन्दर जाकर दीवान जी की बगीची और हवेली हुआ करती थी 1848 से 1874 तक के मध्य काल में हवेली की जगह जगतशिरोमणि और गोकुल चन्द्रमा जी के मन्दिर का निर्माण हुआ था। हवेली का बचा हिस्सा महाराणा सज्जनसिंह जी ने एक नाचने वाली बददु भगतण जी को दे दिया था तब से यह दीवान जी की पोल बददू जी का दरवाजा कहलाने लगी।

By adopting Smart City Udaipur and Nagariganj Udaipur, the information should be provided to the generation today by placing a board of information of the extraordinary monarch and tyagi men, bamashah.

Blessed Udaipur Blessed Udaipur legacy!

दानवीर भामाशाह के बजाय नाचने वाली के नाम से विरासत का नाम रखा उदयपुर नगर निगम ने !

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