उदयपुर में कोरोना निःशुल्क राशन व्यवस्था बन रही फ्लॉप प्रोग्राम, योजना में है घोटाले के पेच !
उदयपुर सहित पूरे भारत में कोरोना महामारी के प्रकोप के कारण भारत सरकार द्वारा लॉक डाउन के कारण जहाँ जनता घरों में बंद है वहीं कई ऐसे लोग भी है जो रोज कमाते थे और रोज खाते थे लेकिन अब उनके अपने घरों में भूखे मरने की नोबत आती जा रही है।
हालाँकि स्थानीय प्रशाषन ने निःशुल्क अन्नपूर्णा किट देने की योजना को अमल में लाने की कोशिश की है और 15 दिन के राशन किट के लिए भामाशाहों और सरकार के सहयोग से गरीबों तक राहत पहुंचाने का प्रयास किया है। लेकिन इस योजना में लापरवाही और कालाबाजारी के ऐसे पेच छोड़ दिये गए है जिससे ये योजना सफल होने की बजाय घोटाले की ओर जा सकती है।
आइए जानते है कि क्या क्या पेच है इस योजना में ?
सबसे पहले इस योजना को न तो ऑनलाइन किया गया और न ही सूचना प्रबधंन के लिए किसी सूचना प्रौद्योगिकी आधारित सिस्टम का इस्तेमाल किया गया ,फलस्वरूप ये स्पष्ट नही हुआ कि क्या वास्तविक जरूरत मंद को राहत रसद सामग्री पहुँच रही है या नही ?
जबकि ऐसा सिस्टम एक दिन में बनाया जा सकता है जिसमे जरूरत मंद लोग सीधे मिस्ड कॉल या वेबसाइट के माध्यम से अपने आधार नंबर के साथ सरकार से मदद का आग्रह कर सकते थे और सिस्टम को ये पता चल जाता कि किन किन व्यक्तियों तक राहत पहुँच चुकी है और किन तक नहीं। ऐसी व्यवस्था से लोग बार बार एक ही घर मे राशन नही ले जा सकते थे।
इस योजना में जनप्रतिनिधियों जैसे पार्षदों को जोड़ा नही गया बल्कि केवल कार्यपालिका से जुड़े अधिकारी जैसे BLO,नगर निगम अधिकारी और नगर विकास प्रन्यास के साथ रसद अधिकारियों को वितरण की कमान सौपी गयी। चूँकि ये सभी अधिकारी वार्ड और बूथ से बाहर के आदमी होते है और उन्हें बूथ और वार्ड की उतनी जानकारी भी नही होती है जितनी जन प्रतिनिधि की। फलस्वरूप इस योजना में इन अधिकारियों से जुड़े लोग फायदा उठा रहे है।
जनप्रतिनिधियों को केवल फ़ोन पर जरूरत मंदो की सूची देने का आग्रह ये अधिकारीगण पार्षदों को कर रहे है लेकिन किन लोगों को मदद दे चुके है और कितने को बाकी है ? इसकी जानकारी न तो इन अधिकारियों के पास है और न पार्षद के पास। कोढ़ में खाज तो ये है जिम्मेदार रसद विभाग न तो बाजार में कालाबाजारी रोक पा रहा है और न ही निःशुल्क राशन व्यवस्था को वास्तविक लोगों तक पहुँचा पा रहा है।
कई जगह ये अधिकारी भी परेशान हो रहे है क्योंकि शहर के कई इलाकों के एक ही परिवार के दस दस लोग राशन किट एक ही घर पर ले जा रहे है। साथ ही प्रशाषन के पास ये सुनिश्चित करने का तरीका नही है किसने कितनी बार योजना का फायदा उठा लिया है?
धन्य है उदयपुर का सुचना तकनीकी विभाग और आईटी प्रकोष्ठ के अधिकारी जो संकट की इस घडी में न तो प्रशाशन को सही गाइड लाइन दे पाए और न ही कोई सिस्टम बना कर उदयपुर एडमिनिस्ट्रेशन को दे पाये जिससे इस योजना को अंतिम जरुरत मंद तक पहुँचाया जा सके ।
इस संकट की घडी में न्यूज़एजेंसीइंडिया प्रशाशन की मदद के लिए सुचना प्रौद्योगिकी आधारित सिस्टम के लिए मार्गदर्शन देने को तैयार है जिससे अंतिम जरुरत मंद तक राहत सामग्री पहुंचायी जा सके और कोई भूखा न सोये।
हालाँकि स्थानीय प्रशाषन ने निःशुल्क अन्नपूर्णा किट देने की योजना को अमल में लाने की कोशिश की है और 15 दिन के राशन किट के लिए भामाशाहों और सरकार के सहयोग से गरीबों तक राहत पहुंचाने का प्रयास किया है। लेकिन इस योजना में लापरवाही और कालाबाजारी के ऐसे पेच छोड़ दिये गए है जिससे ये योजना सफल होने की बजाय घोटाले की ओर जा सकती है।
आइए जानते है कि क्या क्या पेच है इस योजना में ?
सबसे पहले इस योजना को न तो ऑनलाइन किया गया और न ही सूचना प्रबधंन के लिए किसी सूचना प्रौद्योगिकी आधारित सिस्टम का इस्तेमाल किया गया ,फलस्वरूप ये स्पष्ट नही हुआ कि क्या वास्तविक जरूरत मंद को राहत रसद सामग्री पहुँच रही है या नही ?
जबकि ऐसा सिस्टम एक दिन में बनाया जा सकता है जिसमे जरूरत मंद लोग सीधे मिस्ड कॉल या वेबसाइट के माध्यम से अपने आधार नंबर के साथ सरकार से मदद का आग्रह कर सकते थे और सिस्टम को ये पता चल जाता कि किन किन व्यक्तियों तक राहत पहुँच चुकी है और किन तक नहीं। ऐसी व्यवस्था से लोग बार बार एक ही घर मे राशन नही ले जा सकते थे।
इस योजना में जनप्रतिनिधियों जैसे पार्षदों को जोड़ा नही गया बल्कि केवल कार्यपालिका से जुड़े अधिकारी जैसे BLO,नगर निगम अधिकारी और नगर विकास प्रन्यास के साथ रसद अधिकारियों को वितरण की कमान सौपी गयी। चूँकि ये सभी अधिकारी वार्ड और बूथ से बाहर के आदमी होते है और उन्हें बूथ और वार्ड की उतनी जानकारी भी नही होती है जितनी जन प्रतिनिधि की। फलस्वरूप इस योजना में इन अधिकारियों से जुड़े लोग फायदा उठा रहे है।
जनप्रतिनिधियों को केवल फ़ोन पर जरूरत मंदो की सूची देने का आग्रह ये अधिकारीगण पार्षदों को कर रहे है लेकिन किन लोगों को मदद दे चुके है और कितने को बाकी है ? इसकी जानकारी न तो इन अधिकारियों के पास है और न पार्षद के पास। कोढ़ में खाज तो ये है जिम्मेदार रसद विभाग न तो बाजार में कालाबाजारी रोक पा रहा है और न ही निःशुल्क राशन व्यवस्था को वास्तविक लोगों तक पहुँचा पा रहा है।
कई जगह ये अधिकारी भी परेशान हो रहे है क्योंकि शहर के कई इलाकों के एक ही परिवार के दस दस लोग राशन किट एक ही घर पर ले जा रहे है। साथ ही प्रशाषन के पास ये सुनिश्चित करने का तरीका नही है किसने कितनी बार योजना का फायदा उठा लिया है?
धन्य है उदयपुर का सुचना तकनीकी विभाग और आईटी प्रकोष्ठ के अधिकारी जो संकट की इस घडी में न तो प्रशाशन को सही गाइड लाइन दे पाए और न ही कोई सिस्टम बना कर उदयपुर एडमिनिस्ट्रेशन को दे पाये जिससे इस योजना को अंतिम जरुरत मंद तक पहुँचाया जा सके ।
इस संकट की घडी में न्यूज़एजेंसीइंडिया प्रशाशन की मदद के लिए सुचना प्रौद्योगिकी आधारित सिस्टम के लिए मार्गदर्शन देने को तैयार है जिससे अंतिम जरुरत मंद तक राहत सामग्री पहुंचायी जा सके और कोई भूखा न सोये।