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clean-udaipur मेवाड़ में नवरात्रि का इतिहास ,खड्ग पूजा और राजपरिवार !
News Agency India October 01, 2019 12:57 PM IST

मेवाड़ में नवरात्रि का इतिहास ,खड्ग पूजा और राजपरिवार !

मेवाड़ में नवरात्रि का समय शोर्य शक्ति भक्ति तपस्या साधना के रूप में यह उत्सव प्राचीन काल से चला आ रहा है ।


मेवाड़ हमेशा से वीरता, त्याग और बलिदान की भूमि  रहा है लेकिन यह ये भूमि शक्ति और भक्ति की भूमि भी है। यहां कई शक्तिपीठ हैं जो लोगों की आस्थाओं से जुड़े हुए हैं। मंदिरों में स्थापित मां दुर्गा के विविध रूप के पीछे कई कथाएं प्रचलित हैं। मां के दर्शनों से कई रोग निवारण होते हैं तो लोगों के कष्टों को भी मां हरती है। नवरात्रा में भक्तों की आस्था देखने लायक होती है। कोई सैकड़ों किमी. दूर से पैदल चला आ रहा है तो कोई लोटते हुए दर्शनों के लिए पहुंच रहा है। कोई मांगी गई मन्नतों के लिए अनुष्ठान करवा रहा है तो कोई सोने-चांदी के चढ़ावे कर रहा है। यह सब लोगों की आस्था व श्रद्धा ही है जिसके कारण इनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई है।

मेवाड़ में नवरात्रि से दशहरा तक का समय लगातार सैनिक बलिदान, तपस्या और आराधना रुप में मनाया जाता रहा है। सर्वप्रथम गुलाब बाग में लोटन मंगरी पर खड्ग जी की स्थापना करी जाती थी।आज भी खड्ग जी का स्थान और छतरियां गुलाब बाग में लोटन मंगरी पर स्थित है। ये छतरियां उन सन्तों की है जो साधना करते करते निर्वाण प्राप्त कर ग‌ए। मठ के साधु राजमहलो से बाजे गाजे की सवारी के साथ खड्ग जी को गुलाब बाग लेकर आते और सन्त वही हाथों में खडग जी को लेकर लगातार नौ दिन बिना हिले डुले सभी दैनिक कार्यों पर रोक लगाकर तपस्या करतें थे।  

उधर राजमहलो में सभी सैनिक एकत्रित होकर शस्त्र अभ्यास करते। घुड़सवारी ,भाले तलवार के कौशल का प्रदर्शन करते। शक्ति की उपासना के साथ राज्य चिन्ह और विजय ध्वज फहराया जाता। घोड़े की जीन रिपेयर की जाती थी। तलवारों के धार लगवायी जाती और पुराने लश्करों की साफ सफाई की जाती। ये एक प्रकार के दशहरे पर प्रदर्शन की तैयारी का ही स्वरुप होता था। इस समय जागिरदार और सैनिकों को चौकियां ट्रांसफर की जाती थी। सभी सैनिक जागिरदार महाराणा के पास मुजरा (हाज़िरी )करने आते और उनकी चौकिया बदल दी जाती थी।  

नवरात्रि पर जिस खड्ग की पुजा की जाती थी उसके बारे में किवदन्ति है कि पद्मनी ने मेवाड़ के खराब समय पर जौहर किया था। इसके बाद अल्लाउद्दीन खिलजी का शासन हुआ। सती पद्मनी ने बहरी जोगन देवी का रुप धारण कर खड्ग महाराणा हम्मीर को देकर कहां कि इस खड्ग से तु मातृभूमि की बेड़ियां काट डाल। तब महाराणा हम्मीर ने युद्ध शुरू कर मेवाड़ पर पुनः अपना विजय परचम फहराया। तभी से यह खड्ग महाराणा भूपालसिह जी के काल तक लादुवास गांव के साधु खड्ग को तपस्या से सिद्ध करतें रहे है।
 
मेवाड़ में नवरात्रि की चतुर्थी को 'झलका चोथ' कहते हैं।  इस दिन महाराणा और उमराव सरदार पुर्ण रणवेश में होकर सेना लेकर मन्दिर जाते थे । पुरे लवाजमे जिरहबख्तर के साथ लोहे के टोपे हथियार कवच आदि से सुसज्जित सवारी निकाली जाती थी। 

दशहरा युद्ध प्रस्थान के लिए शुभ माना गया है। दशहरे के दिन महाराणा के चार तीर चारों दिशाओं के चार दरवाजे पर विधिवत पुजन कर रख दिए जाते अर्थात अब कभी भी युद्ध में प्रस्थान कर सकते हैं मुहूर्त की कोई आड़ नहीं है।

इतिहासकार : जोगेन्द्र नाथ पुरोहित

शोध :दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)

Email:erdineshbhatt@gmail.com Contact: 8233776786

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