वोटर लिस्ट में नाम का अडंगा, कैसे बनेंगे पट्टे ?
प्रशासन शहरों के संग शिविर में आमजन के पट्टे बनाने हेतु आवश्यक दस्तावेजो में साधारण वर्ग के लिये 1990 से पूर्व और आरक्षित जातियो से जुड़े वर्ग के लिये 1996 से पहले की वोटर लिस्ट में नाम होना और आवेदन के साथ उसकी सत्यापित प्रतिलिपि संलग्न करना अनिवार्य है। लेकिन जिला कलेक्ट्रेट के निर्वाचन विभाग में जाने पर आवेदकों को चक्कर आ रहे है, अधिकांश वोटर लिस्ट बहुत ही जीर्ण शीर्ण अवस्था मे होकर लगभग नष्ट हो चुकी है या अपनी अंतिम अवस्था मे है। इसके अलावा अव्यवस्था का आलम यह है कि इन लिस्टो में अपना नाम ढूंढना घास में सुई ढूंढने के बराबर है।
अब यदि किसी आवेदक के वार्ड की वोटर लिस्ट नष्ट हो चुकी होगी या फिर अव्यवस्था के कारण मिलना संभव नही होगा तो फिर उसका पट्टा कैसे बनेगा यह एक विषय है।
पट्टे के आवेदन हेतु ऑनलाइन प्रक्रिया है जिसमें आवेदन करने हेतु आवेदक स्वयं की SSO id से या फिर E मित्र के जरिये भी आवेदन कर सकता है, लेकिन आवेदकों को जागरूक करने की बजाय गुमराह किया जा रहा है। नगर निगम औऱ जिला प्रशासन को जब खाता नकले और राजस्व रिकॉर्ड , नक्शे डिजिटल किये जाकर ऑनलाइन उपलब्ध है तो फिर वोटर लिस्ट को अब तक ऑनलाइन कर आधार कार्ड से संलग्न क्यों नही किया गया ? शहर के आवेदको की वोटर लिस्टो को डिजिटल कर ऑनलाइन किया जाना चाहिए था ताकि आवेदक उसे इंटरनेट के जरिये प्राप्त कर पाता।
आवेदकों के कई दस्तावेज यदि प्रारंभ में ही आधार कार्ड से अटेच कर दिये जाते तो इन शिविरों का सुविधा का अधिक लाभ आवेदकों को मिल पाता
अब जो भीड़ इन दस्तावेजों की पूर्ति के लिये हो रही है उसके कारण कोरोना प्रोटोकॉल की भी धज्जियां उड़ रही है। सरकार को यदि जनता को लाभ पहुँचाना है तो वोटर लिस्ट की जगह अन्य माध्मों का भी विकल्प रखना चाहिए साथ ही आवेदकों को दलालों के चुंगल से बचाना भी महत्वपूर्ण होगा।
जयवंत भैरविया की कलम से
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