राजस्थान दिवस : मेवाड़ नहीं शामिल होता तो आज आधा राजस्थान होता पाकिस्तान का हिस्सा !
30 मार्च 1949 के दिन राजस्थान भारत गणराज्य का हिस्सा बन गया । राजस्थान के भारत में विलय की कहानी भी कम दिलचस्प नहीं है। 1947 में जब देश आजाद हुआ था और मुगल और अंग्रेजों की शासन पर पकड़ लगभग खत्म हो चुकी थी और देशी रियासतों ने फिर से राज करने के लिए ताकत जुटाना शुरू कर दिया था।
मौजूदा राजस्थान के भौगोलिक क्षेत्र को देखा जाय तो आजादी के वक्त राजस्थान में 22 रियासतें थीं जिनमें से केवल अजमेर (मेरवाड़ा) ब्रिटिश शासन के कब्जे में था और बाकी 21 रियासतें स्थानीय शासकों के अधीन थीं। ब्रिटिश सरकार से भारत के आजाद होते ही अजमेर रियासत भारतीय स्वतंत्रता अधिनियम, 1947 के करारों के मुताबिक खुद-ब-खुद भारत का हिस्सा बन गयी।
शेष 21 रिसासतों में से ज्यादातर राजा खुद को स्वतंत्र राज्य बनाने की मांग कर रहे थे। राजाओं का कहना था कि उन्होंने आजादी के लिए संघर्ष किया है और उन्हें शासन चलाने का अच्छा तजुर्बा भी है इसलिए उनके राज्यों को स्वतंत्र राज्य के तौर पर भारत में शामिल किया जाए और शासन उनके ही अधीन बना रहने दिया जाए।
18 मार्च 1948 के दिन लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल और उनके सचिव वी.पी. मेनन ने एकीकृत राजस्थान के लिए अलग-अलग राजाओं को भारत में शामिल होने की प्रक्रिया के लिए राजी करने की कोशिशें शुरू कीं और नवंबर 1956 तक मौजूदा राजस्थान का खाका बनाया गया ।
मोहम्मद अली जिन्ना जोधपुर (मारवाड़) को भी पाकिस्तान में मिलाना चाहता था, वहीं जोधपुर के शासक हनवंत सिंह कांग्रेस के विरोध और अपनी सत्ता स्वतंत्र अस्तित्व की महत्वाकांक्षा में पाकिस्तान में शामिल होना चाहते थे। अगस्त 1947 में हनवंत सिंह धौलपुर के महाराजा तथा भोपाल के नवाब की मदद से जिन्ना से मिलने गए।
हनवंत सिंह की जिन्ना से बंदरगाह की सुविधा, रेलवे का अधिकार, अनाज तथा हथियारों के आयात आदि के विषय में बातचीत हुई। जिन्ना ने उन्हे हर तरह की शर्तों को पूरा करने का आश्वासन दे दिया। भोपाल के नवाब के प्रभाव में आकर हनवंत सिंह ने उदयपुर के महाराणा से भी पाकिस्तान में सम्मिलित होने का आग्रह किया। लेकिन उदयपुर ने हनवंत सिंह के प्रस्ताव को यह कहते हुए ठुकरा दिया कि एक हिंदू शासक हिंदू रियासत के साथ मुसलमानों के देश में शामिल नहीं होगा।
हनवन्तसिंह को भी इस बात ने प्रभावित किया और पाकिस्तान में मिलने के सवाल पर फिर से सोचने को मजबूर कर दिया। पाकिस्तान में मिलने के मुद्दे पर जोधपुर का माहौल तनावपूर्ण हो चुका था। जोधपुर के ज्यादातर जागीरदार और जनता पाकिस्तान में शामिल होने के खिलाफ थे। माउन्टबेटन ने भी हनवंत सिंह को समझाया कि धर्म के आधार पर बंटे देश में मुस्लिम रियासत न होते हुए भी पाकिस्तान में मिलने के उनके फैसले से सांप्रदायिक भावनाएं भड़क सकती हैं। वहीं सरदार पटेल किसी भी कीमत पर जोधपुर को पाकिस्तान में मिलते हुए नहीं देखना चाहते थे।
इसके लिए सरदार पटेल ने जोधपुर के महाराज को आश्वासन दिया कि भारत में उन्हें वे सभी सुविधाएं दी जाएंगी जिनकी मांग पाकिस्तान से की गई थी। जिसमें शस्रों का, अकालग्रस्त इलाकों में खाद्यानों की आपूर्ति, जोधपुर रेलवे लाइन का कच्छ तक विस्तार आदि शामिल था। हालांकि मारवाड़ के कुछ जागीरदार भारत में भी विलय के विरोधी थे। वे मारवाड़ को एक स्वतंत्र राज्य के रुप में देखना चाहते थे लेकिन महाराजा हनवन्त सिंह ने समय को पहचानते हुए भारत-संघ के विलयपत्र पर 1 अगस्त, 1949 को हस्ताक्षर किए।