आइसोलेशन नहीं होने की वजह से मर गए थे मेवाड़ और सूरत के प्लेग की महामारी में हज़ारों लोग !
एक पुरानी कहावत थी कि प्लेग रोग सिंधु नदी नहीं पार कर सकता।लेकिन 19वीं शताब्दी में प्लेग ने भारत में अपने पैर पसारने शुरू कर दिए। सन् 1815 में तीन वर्ष के अकाल के बाद गुजरात, कच्छ और काठियावाड़ में धीरे धीरे प्लेग रोग फैलने लगा। अगले वर्ष हैदराबाद (सिंध) और अहमदाबाद में लोग प्लेग से मरने लगे। सन् 1836 में पाली (मारवाड़) से चलकर यह रोग मेवाड़ पहुँच गया । मेवाड़ में पहली बार प्लेग की भयंकर बीमारी फ़ैली, जिसकी शुरुआत राजियावास गांव से हुई, जो की नाथद्वारा के कोठारिया गाँव के नज़दीक है। फिर धीरे-धीरे यह रोग पूरे मेवाड़ में फ़ैल गया। मेवाड़ में प्रजा को हिदायत दी गई कि चूहों के मरते ही घर खाली कर दिए जाएं और बीमारों को अलग रखा जाए, लेकिन लोगों ने यह बात हल्के में ले ली। नतीजा ये हुआ कि कई लोग मर गए, फिर लोगों ने घर छोड़ दिए और खेतों में छप्पर डालकर बस गए, लेकिन यह बीमारी वहां भी फ़ैल गई। प्लेग के कारण हज़ारों लोगों की मृत्यु हो गई।
आपको सितंबर 1994 गुजरात के सूरत शहर में प्लेग के ताडंव याद हीं होंगे। एकाएक प्लेग महामारी ने पूरे सूरत शहर को अपने आगोश में ले लिया। लोगों के मरने का सिलसिला इतनी तेजी से शुरू हुआ कि अस्पताल पहुँचने से पहले मौत ने उन्हें निगलना शुरू कर दिया था। सूरत में बडे पैमाने पर पलायन शुरू हो गया। पहले शहर के रईसों ने शहर को छोडा फिर तो एक हफ्ते के अंदर सूरत शहर की 25% आबादी बाहर चली गई। सूरत में बडी संख्या में उप्र और बिहार के गरीब मजदूर रहते थे और जब उनका पलायन शुरू हुआ तो वो अपने साथ प्लेग के किटाणु अपने घर ले गए और फिर वहां भी प्लेग फैल गया। एक सरकारी रिपोर्ट के अनुसार 1994 में देश में 1800 करोड़ का नुकसान हुआ। कई हजार लोग इस महामारी में मारे गए थे और सूरत के पलायन को आजादी के बाद का सबसे बड़ा पलायन कहा गया।
ब्रिटिश अखबारों में इसे मध्यकालीन श्राप कहा गया।