ट्यूशन फीस का 70 % लेने के बजाय कुल फीस का 70 % ले रहे स्कूल, हो सकती है जल्द कार्यवाही ऐसे स्कूलों पर !
कोरोना काल में जहाँ हर व्यक्ति आर्थिक रूप से तंगहाली से गुजर रहा है, वहीं स्कूल फीस कोढ़ में खाज का काम कर रही है। कई अभिभावकों के पास स्कूल फीस भरने के पैसे नहीं है, फिर भी अभिभावक इधर उधर से उधार लेकर बच्चों की फीस भरने की जुगत लगा रहे है। पहले ही ऑनलाइन क्लास के लिए अतिरिक्त मोबाइल और लैपटॉप के साथ इंटरनेट रिचार्ज के बोझ ने अभिभावकों की आर्थिक रूप से कमर तोड़ रखी है।
आपको बताते चले कि राजस्थान उच्च न्यायालय ने निजी स्कूलों को छात्रों से ट्यूशन फीस का 70 प्रतिशत इकट्ठा करने की अनुमति दी है। यह आदेश तब आया जब यह राज्य सरकार द्वारा कोविद -19 के मद्देनजर स्कूलों को तीन महीने के लिए फीस जमा करने से रोकने के आदेश की याचिका पर सुनवाई कर रहा था। कोर्ट ने कहा कि फीस नहीं चुकाने पर छात्रों को ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल होने से रोका जा सकता है, लेकिन उन्हें निष्कासित नहीं किया जाएगा।
न्यायमूर्ति संजीव प्रकाश शर्मा का यह आदेश राजस्थान में सोसाइटी ऑफ कैथोलिक एजुकेशन इंस्टीट्यूशंस और अन्य संगठनों की याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान आया था।
लेकिन उदयपुर सहित राजस्थान के कई स्कूल वाले कोर्ट के आदेश को अनदेखा कर ट्यूशन फीस की 70 प्रतिशत राशि लेने के बजाय कुल स्कूल फीस का 70 % ले रहे है। ( ये स्कूल वालों की नयी इबारत है। पिछले सत्र तक स्कूल फीस स्ट्रक्चर में अलग अलग मद जैसे ट्यूशन फी,स्पोर्ट्स फी, एग्जाम फी और कंप्यूटर फीस जैसे कई अलग अलग मदों पर अलग अलग राशि लेकर कुल फीस रिसिप्ट पर लिखा करते थे।)
हद तो तब हो गयी जब ये स्कूल बाकायदा अपनी वेबसाइटों पर ट्यूशन फीस शब्द की बजाय स्कूल फीस शब्द का इस्तेमाल कर रहे है। या तो इन्हें किसी का डर नहीं है या ये परवाह नहीं कर रहे है। साथ ही ये स्कूल अब अभिभावकों को SMS कर फीस जमा करवाने को कह रहे है। कई स्कूल वाले तो बाकायदा अभिभावकों को फोन कर फीस जमा करवाने के लिए कह रहे है।
अब आपकों स्कूल की गणित समझाते है कि स्कूल कह रहे कि उन्हें अपने शिक्षकों के साथ गैर शिक्षण कर्मियों को भी वेतन देना पड़ रहा है। सबसे पहले शिक्षकों की बात करते है।
एक शिक्षक औसतन 3 क्लासेज के लगभग 4 सेक्शन्स को पढ़ाता है और हर सेक्शन में औसतन 50 विद्यार्थी पढ़ते है। ऐसे में अगर हर विद्यार्थी से अगर 500 रूपये (हक़ीक़त में इससे कहीं गुना ज्यादा पैसा लिया जा रहा ) भी लिए जाय तो उस शिक्षक के कोटे से स्कूल को प्रतिमाह 3 लाख रुपये मिल सकते है और यदि हम विद्यार्थी और क्लास की संख्या आधी भी कर दे तो भी 1.5 लाख के आसपास फीस स्कूल जमा कर शिक्षक के साथ इन क्लासेस से जुड़े गैर शिक्षण कर्मियों को वेतन दे सकता है।

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इसके साथ ही शिक्षकों को न तो स्कूल जाना पड़ रहा है इस कारण आवागमन खर्च भी नहीं है। अगर इंटरनेट और विद्युत खर्च भी जोड़े तो अतिरिक्त 1000 रुपए शिक्षकों को ऑनलाइन क्लास के लिए खर्च करने पड़ रहे है।
लेकिन अभिभावकों की सुनने वाला कोई नहीं है। कई आर्थिक रूप से कमजोर अभिभावक खून के आँसू रो रहे है।
स्कूलों की फीस के इस गोरखधंधे पर न्यूजएजेंसीइण्डिया.कॉम के वरिष्ठ दिनेश भट्ट ने जब बाल कल्याण समिति, उदयपुर के अध्यक्ष ध्रुव कुमार चारण से बात की तो उन्होंने तुरंत संज्ञान लेते हुए राजस्थान राज्य बाल संरक्षण आयोग के अध्यक्ष को पत्र लिख कर विद्यालयों को पाबंद करने की बात कही। साथ ही ये भी कहा कि आयोग जल्द ही इस विषय पर वैधानिक कार्यवाही कर अभिभावकों को राहत देने का प्रयास करेगा।
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