कोरोना वायरस महामारी की थर्ड वेव में बच्चों पर ज्यादा असर होने की बातें प्रोपोगेंडा तो नहीं ?
कोरोना वायरस महामारी की थर्ड वेव (तीसरी लहर) में बच्चों पर ज्यादा असर करने की बात कहा से शुरू हुई इसकी चर्चा अभी तक सुस्त प्रायः है। शुरुआत में कोरोना को लेकर कहा गया था कि यह बच्चों को प्रभावित नहीं करती और हुआ भी ऐसा ही । लेकिन अब कई एक्सपर्ट्स को लगता है कि तीसरी लहर का बच्चों पर खासा असर होगा। वही महाराष्ट्र के अहमदनगर में लगभग 10,000 बच्चों और टीनएजर्स के कोविड पॉजिटिव टेस्ट होने की खबर ने अभिभावकों को खासा परेशान कर दिया है।
देश में कई अस्पताल अपने यहां चाइल्ड वार्ड तैयार कर रहे हैं। वही दूसरी और पीडियाट्रीशियंस को तीसरी लहर से ज्यादा उसके पहले बनाये जाने वाले 'हाइप' को लेकर चिंता है। आखिर डर का माहौल क्यों बनाया जा रहा है क्योंकि कोरोना वायरस से बच्चे हों या बड़े, सबको बराबर खतरा है। इस बात की संभावना बेहद कम है कि तीसरी लहर मुख्य रूप से सिर्फ बच्चों को ही प्रभावित करेगी। क्योंकि अगर बड़ी संख्या में कोविड-19 मरीज सामने आते हैं तो उनमें बच्चों के होने की भी संभावना भी बनी रहती है क्योंकि बच्चे रहते ही परिवार में है और परिवार में यदि कोई संक्रमित होता है तो संक्रमित होने का खतरा उन्हें भी होता है। कोविड से बच्चों को उतना ही खतरा है जिनका वयस्कों को।
वही एक डायग्नोस्टिक कंपनी ने कई शहरों के सर्वे में पाया कि 10-17 साल के बच्चों में से करीब एक-चौथाई में ऐंटीबॉडीज थीं। फिर भी अधिकतर बच्चे एसिम्प्टोमेटिक थे। अधिकतर बच्चों का टेस्ट इसलिए होता है क्योंकि वे मरीजों के 'हाई रिस्क कॉन्टैक्ट्स' होते हैं, इसलिए नहीं कि उनमें कोरोना के लक्षण दिखते हैं। इसमें भी ज्यादातर बच्चे घर में ही ठीक हो जाते हैं। डेटा बताते है कि कोविड-19 संक्रमित 99% बच्चे घर में ही रिकवर हो जाते हैं।

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