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clean-udaipur जगदीश मंदिर मेवाड़ी वैभव,इतिहास,युद्ध और त्याग की कहानी !
News Agency India July 02, 2019 03:12 AM IST

जगदीश मंदिर मेवाड़ी वैभव,इतिहास,युद्ध और त्याग की कहानी !

उदयपुर की पहचान जगदीश मंदिर का निर्माण और प्रतिष्ठा महाराणा जगतसिंह ने 13 मई 1752 ईस्वी गुरुवार के दिन भव्य समारोह के साथ की थी। समारोह भी ऐसा जिसमे उस समय पूरे शहर सहित समूचे मेवाड़ को आमंत्रित किया गया। महाराणा ने सैकड़ो हाथी,घोड़े, हज़ारों गायों और कई गाँवो को मन्दिर व्यवस्था को दान किया। साथ ही मंदिर बनाने वाले सूत्रधार भाणा उसके पुत्र को सोने और चाँदी के हाथी के साथ चित्तौड़ के पास एक गांव दान किया गया। मंदिर की विशाल प्रशस्ति कृष्णभट्ट से लिखवायी गयी।मेवाड़ के इतिहास के सबसे समृद्ध शिलालेख जगदीश मंदिर की प्रशस्ति है जिसे पढ़कर आपको मेवाड़ के समृद्ध अध्यात्म और बेहतर राजकाज की व्यवस्था देखने में आएगी। मंदिर के पास धाय के मंदिर का निर्माण महाराणा की धाय नौजू बाई ने करवाया था जो आज उपेक्षा का शिकार है।

शुरुआत में महाराणा स्वयं रथयात्रा में रथ को मंदिर प्राँगण में खींचते और बाद में रथ को बड़ा बाजार होते हुए माजी के मंदिर से पुनः जगदीश मंदिर लाया जाता। पुरे शहर को भोजन कराया जाता। धीऱे धीरे राज काज और अन्य उलज़नो के कारण रथयात्रा सिर्फ मंदिर प्रांगण तक सीमित रह गयी। 1996 में जन प्रयासो के बाद इसे दुबारा शुरू किया गया।

सिन्धुर दीधा सातसै ,हय वय पाँच हज़ार।
एकावन सासन दिया,जगपत जगदातार।।
अर्थात जगत के दाता जगत सिंह 700 हाथी ,5 हज़ार घोड़े और 51 गाँव दान किये।

 

जगदीश मंदिर की प्रशस्ति शिला प्रथम श्लोक 110 -111 के अनुसार उस समय महाराणा जगतसिंह ने अरबों रुपयों का कल्पवृक्ष जो स्फटिक की वेदी पर बना था जिसके मूल में नीलम मणि ,सर पर लेहसनिया और कंधो पर हीरे ,शाखों पर माणिक ,पत्तो की जगह मूंगा और उसके नीचे ब्रह्मा,विष्णु ,शिव और कामदेव की मूर्तियाँ बनी थी।

यह मन्दिर महाराणा जगत सिंह जी प्रथम ने 15 लाख रूपये लगाकर दुबारा 1652 ईस्वी में बनवाया था लेकिन औरंगजेब द्वारा नुकसान पहुंचाने पर महाराणा संग्राम सिंह ने इसे फिर दुरूस्त करवाया। आज भी जगदीश मन्दिर की बाहर तक्षण शैली की मुर्तियां खण्डित है।

इतना वैभव धीरे धीरे दिल्ली के बादशाह के कानों तक भी पहुँचा और बादशाह औरंजेब महाराणा जगत सिंह के बेटे महाराणा राजसिंह के समय में जगदीश मंदिर और उदयपुर के मंदिरो को लूटने माण्डल से होता हुआ देबारी घाटे पर पंहुचा और शहज़ादा मुहम्मद आज़म के साथ मुग़ल सेना से राठौड़ गौरासिंह (बल्लूदासोत) ने लोहा लिया और वीरगति पायी। लड़ाई में रावत मानसिंह (सारंगदेवोत) गंभीर घायल हो गये।देबारी घाटे पर मुग़ल सेना का अधिकार हो गया। बादशाह ने शहज़ादा मुहम्मद ,आज़म सादुल्लाख़ा, ख़ानेजहाँ ,रहुल्लाखा और इक्का ताज खान को उदयपुर भेजा। उदयपुर पहुँचने पर उन्होंने उदयपुर खाली पाया। मुग़ल फौज जैसे ही जगदीश मन्दिर गिराने पहुँची तो महाराणा राज सिंह के बारहठ नरु जी के नेतृत्व में एक एक कर के मंदिर से माचातोड़ योद्धा निकले। पूरे दिन 20 योद्धाओं ने हज़ारों की मुग़ल सेना को रोके रखा। अंत में सभी माचातोड़ योद्धा वीर गति को प्राप्त हुए। इनका एक फोटो मंदिर के मुख्य गर्भ गृह में प्रवेश करते ही देखा जा सकता है और नरु बारहठ की समाधी का पत्थर स्कूल वाले गेट के नीचे आप देख सकते है।

जगदीश मंदिर को बचाने की इस गौरव गाथा के बाद विडम्बना ही है कि इस मंदिर में आने वाले प्रतिदिन सैंकड़ों श्रद्धालुओं को इस अभूतपूर्व बलिदान की भनक तक नहीं है | मेवाड़ के दुर्ग तो दुर्ग सही, यहां का हर मंदिर राजपूतों के बलिदान की खूनी गाथा अपने अंदर समेटे हुए है।

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