सरकारी विभाग उड़ा रहे सूचना के अधिकार कानून की धज्जियां !
सूचना का अधिकार कानून सरकारी विभागों में अनियमतायें और भ्रष्टाचार उजागर कर सरकारी कार्यो में पारदर्शिता लाने के लिये है। यह आमजन को प्रदत्त ऐसा अधिकार / हथियार है जिससे वह सरकारी रिकॉर्ड और दस्तावेजों से वांछित सूचना प्राप्त कर सकता है। जिसके द्वारा वह सरकारी कार्यालयों में समस्त गतिविधियों के गुण दोष, अनियमताओ और विभागीय शिथिलतायें उत्पन्न होने के कारण जान सकता है। सरकारी कार्यो में लगने वाले पैसों के उपयोग के बारे में जान सकता है। सरकारी आय व्यय के बारे में जान सकता है। कर्मचारियों/ अधिकारियों के अधिकार व जनता के प्रति जवाबदेही के बारे में उत्तरदायित्व के बारे में जान सकता है। इसके अलावा अन्य कई बातें है जिन्हें वह सूचना के अधिकार के द्वारा जान सकता है।
सूचना के अधिकार में RTI आवेदन के साथ 10 रुपए नकद या पोस्टल आर्डर लगाकर डाक या स्वयं उपस्थित होकर प्रस्तुत किया जाता है।इसके साथ ही ऑनलाइन आवेदन कर भी सुचना प्राप्त की जा सकती है। 30 दिन में या तो सूचना या फिर अस्वीकार करने का जवाब, कारण सहित आवेदक को बताना होता है। 30 दिन में सूचना उपलब्ध कराए जाने पर 2 रुपये प्रति पेज की राशि और CD में लिये जाने पर तय शुल्क देय होता है। BPL कार्ड धारकों के लिये यह पूर्णतया निःशुल्क है। 30 दिन में सूचना उपलब्ध न करवाए जाने अथवा जवाब से असंतुष्ट होने पर उस विभाग के प्रथम अपीलीय अधिकारी को लोकसूचना अधिकारी के विरुद्ध प्रथम अपील प्रस्तुत करनी होती है । आवेदक के पास जवाब प्राप्त होने या 30 दिन पश्चात, प्रथम अपील हेतु 60 दिनों का समय होता है।
लोक सूचना अधिकारी का दायित्व होता है कि वह 45 दिनों के भीतर अपील की सुनवाई कर आवेदक को संतुष्ट करें। सूचना उपलब्ध करवाए या फिर सूचना उपलब्ध न करवाने का उपयुक्त कारण विधि का उल्लेख करते हुए बताए। प्रथम अपीलीय अधिकारी द्वारा अपील का निस्तारण न करने अथवा 45 दिनों में सूचना उपलब्ध न करवाने पर आवेदक द्वारा राज्य लोक सूचना आयोग के सूचना आयुक्त को द्वितीय अपील की जाती है। इस हेतु आवेदक के पास प्रथम अपील की सुनवाई की दिनाँक के बाद या फिर प्रथम अपील प्रस्तुत करने की दिनाँक के 45 दिनों के पश्चात 90 दिनों का समय द्वितीय अपील हेतु होता है।
राज्य लोक सूचना आयोग के सूचना आयुक्त द्वितीय अपील प्राप्त होने पर संबंधित सरकारी अथवा गैर सरकारी विभाग जो RTI के दायरे में आते है उन्हें नोटिस जारी कर सूचना उपलब्ध कराने और एक तय दिनाँक को राज्य लोक सूचना आयोग में उपस्थित होने के लिये आदेशित करते है। प्रस्तुत दस्तावेजों और विभाग के लोक सूचना अधिकारी द्वारा दिये जवाबों के बाद सूचना आयुक्त अपना निर्णय देते है। आवेदक स्वयं भी उपस्थित होकर अपनी पैरवी कर सकता है।
बिना किसी जवाब सूचना उपलब्ध न कराए जाने पर जुर्माने के साथ सूचना उपलब्ध करवाए जाने के आदेश होते है। यदि लोक सूचना अधिकारी ने कोई जवाब तय समय मे आवेदक को दिया है जो टालमटोल वाला होकर या विधि अनुरूप नही है, तब भी जुर्माने / अर्थ दंड के साथ ही सूचना उपलब्ध करवाना लोक सूचना अधिकारी के लिये अनिवार्य हो जाता है। सूचना आयुक्त अर्थदंड का निर्धारण करते है और सूचना आवेदक को निःशुल्क उपलब्ध करवाने के आदेश देते है।
लेकिन उदयपुर के कई सरकारी विभाग जिनमे नगर निगम, पुलिस विभाग, UIT, RTO विभाग, AVVNL विभाग अपने संभावित भ्रस्टाचारो या सूचना प्रकटन से होने वाली किसी अनियमताओ को छिपाने के लिये अधिकांश आवेदकों को आवेदन के पश्चात सूचना उपलब्ध नही करवा रहे है । मात्र कुछ प्रतिशत आवेदकों को साधारण सूचनाएं ही उपलब्ध हो रही है।
सबसे बड़ी बात यह कि इन विभागों में प्रथम अपीलीय अधिकारी उच्च पदों पर आसीन व्यक्ति होते है,जिन्होंने पद सँभालने के बाद आज तक किसी भी प्रथम अपील की सुनवाई में अपेक्षित रुचि नही दिखाई है। ऐसा किन कारणों से किया जा रहा है यह एक जाँच का विषय है। सरकारी विभागों में सूचना उपलब्ध न करवाये जाने के कारण आवेदक अब सूचना आयोग की शरण लेने लग गए है। जिसके बाद सूचना तो देनी ही होगी साथ ही सूचना के अधिकार कानून का मख़ौल उड़ाए जाने के कारण संबंधित विभाग की छवि भी जनता में खराब होगी।
पत्रकार : जयवन्त भैरविया

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