कोरोना काल मे प्रभु को भुला देवस्थान, कई मंदिरों में पहुंचाया नहीं अब तक भोग (प्रसाद ) !
सम्पूर्ण राज्य के सार्वजनिक मंदिरों की देखरेख करने वाले देवस्थान विभाग का मुख्य कार्यालय उदयपुर में है। जिसके अंतर्गत मंदिरों से जुड़ी आय व्यय व रखरखाव का कार्य देवस्थान विभाग करता है। देवस्थान में कर्मचारियों से लेकर अधिकारियों का भारी भरकम महकमा होता है जो देवस्थान के अंतर्गत आने वाले मंदिरों का प्रबंधन करते है। पुजारियों की तनख्वाह और मन्दिरो की पूजन सामग्री, प्रसाद आदि भी देवस्थान विभाग ही उपलब्ध करवाता है।
कोरोना महामारी के कारण लगाए गए लॉक डाउन का असर मंदिरों पर भी हुआ। वायरस प्रसार को रोकने के लिए मंदिरो के द्वार आम जनता के लिये बंद कर दिए गए,केवल मात्र आरती व पूजा अर्चना के लिये पुजारियों को स्वीकृति दी गई।
कोरोना काल के लगभग 125 दिन बाद जब न्यूज़ एजेंसी इंडिया डॉट कॉम की टीम मंदिरों के मौजूदा हालात जानने पहुँची तो दंग रह गई। पाया गया कि कई मंदिरों के द्वार तक पक्षियों की बीट और धूल बिखरी पसरी थी। जब मंदिरों के बारे में अन्य जानकारी जुटाई गई तो पता लगा कि कई मंदिरों में पूजा आरती के समय प्रसाद भी देवस्थान विभाग द्वारा पिछले कई दिनों से उपलब्ध नही करवाया गया। उच्चाधिकारियों से बात करने पर उन्होंने बताया कि कोरोना के कारण मंदिरों में प्रसाद की व्यवस्था नही की गई ,यह बड़े आश्चर्य के साथ दुःखद भी है कि सृष्टि के स्वामी प्रसाद से वंचित है जबकि देवस्थान के कर्मचारियों को कोरोना काल में भी तनख्वाह मिलती रही है।
अधिकारियों ने बात करने पर बताया कि कोरोना काल में प्रसाद की व्यवस्था नहीं की गयी अलबत्ता कुछ मंदिरों को मिश्री प्रसाद के लिए पहुँचाई गयी थी। (हालांकि मिश्री कई मंदिरो में कई दिन पहले ही खत्म हो गयी और कुछ जागरूक और धर्म परायण पुजारी अपनी जेब से प्रसाद खरीद कर प्रभु को नित्य भोग लगा रहे है। )
अधिकारियों के अनुसार लॉक डाउन में प्रसाद वितरित करने से वायरस प्रसार होने का खतरा था लेकिन एक बात समज़ से परे है कि जब केवल पुजारी ही मंदिर में प्रवेश और पूजा के लिए अधिकृत है तो वहाँ वायरस कैसे फ़ैल सकता है ? क्या कारण था कि बहुत छोटे से प्रसाद के खर्चे को विभाग ने प्रभु की सेवा के लिए जरुरी नहीं समझा।
अति तो तब हुई कि अनलॉक होने के बाद 6 अगस्त तक भी देवस्थान विभाग ने कई मंदिरों को प्रसाद सामग्री अब तक पुजारियों तक नहीं पहुंचाई। कई मंदिरों में आज तक प्रभु भूखे बैठे है और देवस्थान विभाग आँखे मूंदे बैठा है।
भारतीय सभ्यता में मंदिरों में प्रसाद जिसे प्रभु का भोग भी कहा जाता है का बड़ा धार्मिक महत्व है जिसकी अनदेखी किया जाना बहुत बड़ी मानवीय भूल के साथ पाप की श्रेणी में भी आता है। मंदिरों में प्रसाद की मात्रा का नही भावना का महत्व है। यदि मिश्री के कुछ दानों का भोग लगा कर भी पशु पक्षियों को खिला दिया जाता तो भक्त और प्रभु के बीच के संबंधों पर चोट नही लगती।
पत्रकार : जयवन्त भैरविया और दिनेश भट्ट
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