गौ माता है परेशान,लेकिन राजा नहीं होते हैरान,गौवंश की हलक में जान !
इस कहानी का किसी व्यक्ति,वस्तु,शहर या संस्था से कोई ताल्लुक नहीं है और यदि कोई समानता पायी जाती है तो ये संयोग मात्र होगा।
सभागार में माननीय राजा साहेब वातानुकूलित यन्त्र के नीचे अपने सभासदों के साथ बैठे है। हालाँकि बड़े राजा ज्ञानी है ,कुशल है और ईमानदार भी, फिर भी इनके गुट में कम सभासद ही बैठते है। वैसे भी छोटे राजा की ज्यादा चलती है। उनके कक्ष में ही सभासदों सहित अन्य लोग हमेशा बैठे रहते है। सुना है कि मंगोल देश से आयी बीमारी के दौर में वैसे भी वृद्ध राजा को आराम की सलाह दी गयी है फिर भी राजा तो राजा है। विद्वान भी है लेकिन सभासदों सहित अन्य कई लोग छोटे राजा के साथ बड़े राजा को भी सलाम करते है लेकिन चलती छोटे राजा की ही है।
सभासद भी अलग अलग गुटों में है लेकिन अभी मुद्दे गर्म है। चलचित्र बनाने वाले पीछे पड़े है। साथ ही समाचार वेब जगह वाले तेरी ट्यूब और चेहरा वाली किताब से राज व्यवस्था के पीछे लगे पड़े है। अभी तीन चार दिन से अपशिस्ट निस्तारण स्थल पर राज गौशाला पकड़ समिति के लोगों पर आरोप है कि उक्त स्थल पर ये समिति वाले ही गौमाता छोड़ रहे है। कई चलचित्र समाचार और लिखित समाचार वालों ने खूब तथ्य रखे। गायें बहुलक खा रहीं थीं । बहुलक खाने से पेट फूल कर मर भी रही होंगी।
जैसे ही समाचार आये, कुछ विरोधी सभासद अपने अपने रथों के माध्यम से अपशिस्ट निस्तारण स्थल पर पहुँचे। छाया चित्र लिए और चल चित्र बनाये गए। गायें अपशिस्ट खा रही थी। कुछ अस्थि पंजर भी पड़े थे। एक समझदार सभासद लगभग चीख़ ही पड़ा कि ये अपशिस्ट निस्तारण केंद्र है अथवा मृत पशु निस्तारण स्थल ? कुछ और सभासद दुविधा में आ गए कि किया क्या जाए ?
शिकायत की गयी बड़े राजा को। बड़े राजा के पूर्वज गायें को आज तक मानते आए है,पूजते आये है और इन्ही गौमाता के नाम पर जनता का विश्वास रूपी मत भी हासिल करते है ,फिर भी बड़े राजा ने ज्यादा ध्यान नही दिया और बात को आयी गयी कर दी । इन्ही दिनों छोटे राजा और साथियों ने तो बाकायदा तीर्थाटन कर समूची सभा के कुछ अन्य दल के सभासदों को छोड़ प्रजा को संदेश दिया कि कोई मंगोल देश से आयी महामारी नहीं है। समय को जिया जाय। अगले दिन ही हरियाली अमावस पर मनोरंजक कार्यक्रम भी रखें गए लेकिन प्रजा पर फिलहाल ढेरों प्रतिबंध है।
छोटे राजा चलचित्र और लिखित कारीगरों की बातों पर ध्यान नही देते है। उनका मानना है मुद्दें जल्दी ही एक दो दिन में ठंडे पड़ जाते है। इसलिए आनन्द करों । छोटे राजा परवाह नहीं करते। खैर चलचित्र और लिखित कारीगरों की बातों पर प्रजा को विश्वास है इसलिए देर सवेर दूरगामी परिणाम होंगे। ये तय है। जो साम्राज्य और राज परिवार अपने यहाँ के लिखित कारीगरों की नहीं सुनता, उनकी जनता एक दिन सुन लेती है।
कई विपक्षी सभासदों ने तो यहाँ तक कह डाला कि राज्य व्यवस्था गायों की देखभाल नहीं कर सकती तो हर सभासद 2 -2 गाय रख कर राहत देगा। लेकिन कुछ ही सभासदों ने सहमति प्रदान की। बाकी मुँह पर हमेशा की तरह ताला लगाए बैठे रहे।
कुछ अत्यधिक समझदार सभासदों का कहना था कि ये साजिश है। गाँव वालो की गायें ही अपशिस्ट निस्तारण स्थल पहुँच जाती है। वहीं दूसरे विरोधी गुट के सभासद बोले कि ये गायें राज्य गौशाला से छोड़ी गयी गायें है। लेकिन अपशिस्ट निस्तारण स्थल पर बैल ज्यादा दिखाई देते है और गायें कम। मतलब साफ है कि राज्य गौशाला से जब्त की गयी गायें तो प्रजा छुड़वा के ले जाती है। लेकिन बैल कोई नही ले जाता और राज्य गौशाला के लोग इन बैलों को दूर छोड़ने के बजाय अपशिस्ट निस्तारण स्थल के कुछ दूर ही छोड़ आते है।
विरोधी सभासद गायों की दयनीय स्थिति पर द्रवित है लेकिन गौमाता का समर्थन कर चुन कर आये सभी सभासदों को इस मामले में साँप सूंघ गया है। भला गौमाता कॄपा थोड़े ही देगी। कृपा तो छोटे और बड़े राजा देंगे। बिल्ली के गले मे घंटी डालने का माद्दा इन सभासदों में नही है।
लेकिन इस द्वन्द में गौ माता की जान पर बन आई है। कोई प्रभावी कदम अब तक नही उठाये गए है। लेकिन छोटे राजा ने तुरंत कुछ पशु पाश रथों को अपशिस्ट निस्तारण स्थल पर भेज गौ माता को वहाँ से हटाने का काम शुरू कर दिया है।
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