अप्रैल में भयावह होता कोरोना, क्या है गाइडलाइन्स ? कहाँ हो गयी गलती ?
गृह मंत्रालय ने कोरोना महामारी (COVID -19) के नियंत्रण एक आदेश आज जारी किया था जो 1 अप्रैल, 2021 से लागू हो गया और 30 अप्रैल 2021 तक लागू रहेगा। गाइडलाइंस खास तौर पर कोविड-19 के संक्रमण पर रोक पाने का प्रयास थी जो पिछले कई महीने से चल रहा था। ये गाइडलाइन्स कोरोना महामारी (COVID-19) मामलों में बढ़ोतरी को ध्यान में रखते हुए, जिसे देश के कुछ हिस्सों में देखा गया था, मार्च 2021 तक के अनुभवों के आधार पर राज्य / केंद्रशासित प्रदेश सरकारों को देश के सभी हिस्सों में टेस्ट-ट्रैक-ट्रीट (Test- Track-Treat) प्रोटोकॉल को सख्ती से लागू करने के लिए निर्देशित करती है। इसके साथ ही अपेक्षा की गयी कि हर किसी से COVID उचित व्यवहार का पालन सुनिश्चित करना और सभी टार्गेट ग्रुप को कवर करने के लिए टीकाकरण अभियान को बढ़ाने से ही महामारी पर नियन्त्रण पाया जा सकता है।
इसके साथ ही ये भी जोर दिया गया कि रोजमर्रा की चीजों को फिर से शुरू करने के लिए और महामारी को पूरी तरह से दूर करने के लिए निर्धारित नियंत्रण रणनीति (Fixed control strategy) का सख्ती से पालन करने की जरूरत है, और एमएचए (MHA) और Ministry of Health & Family Welfare (MOHFW) के जारी दिशा-निर्देशों / एसओपी का कड़ाई से पालन जरुरी था।
गृह मंत्रालय के दिशानिर्देश के मुताबिक जिन राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में आरटीपीसीआर टेस्ट (RTPCR Test) कम किये जा रहे थे,उन इलाको में टेस्ट की संख्या बढ़ाने को कहा गया और वहां टेस्ट की संख्या को बढ़ाकर 70% तक लाने को निर्देशित भी किया गया। इसके साथ ही नए पॉजिटिव मरीज़ मिलने के बाद उसके सम्पर्क में आए लोगों का जल्द से जल्द पता लगाकर उन्हें आइसोलेट करने को भी कहा गया। साथ ही ये भी कहा गया कि उनकी टेस्टिंग के बाद ज़रूरत के हिसाब से उनका इलाज किया जाए। सरकार की नई गाइडलाइन्स के अनुसार कंटेनमेंट जोन की जानकारी जिला कलेक्टर वेबसाइट पर डाल दी जाएगी और इसके अलावा सार्वजनिक जगहों पर SOP (standard operating procedure) का सख़्ती से अमल किये जाने को कहा गया।
इसके साथ ही राज्य सरकारों को पाबंदी लगाने की छूट भी दी गयी। गाइडलाइन में कहा गया है कि कोरोना मामलों को ध्यान में रखते हुए जिला उप-जिला और शहर/वॉर्ड स्तर पर पाबंदी लगायी जा सकती हैं। इसके साथ छोटे क्षेत्र जहाँ कोरोना संक्रमित ज्यादा आ रहे है उन्हें चिन्हित कर माइक्रो कन्टेनमेंट जोन चिन्हित कर संक्रमित लोगों के 80 प्रतिशत लोगों के क्लोज सम्पर्को को 72 घण्टे के भीतर ट्रेस करने के बाद क्वारंटीन और फॉलोअप की बात कही गयी।
लेकिन अप्रैल महीने के शुरूआती दौर में देश के कई राज्यों से एकाएक कोरोना संक्रमितों का आँकड़ा बढ़ने लगा और आज 9 अप्रैल की शाम तक देश के कई राज्यों से सहसा सबसे तेज़ संक्रमण की खबरें आ रही है और कोविद अस्पतालों के साथ निजी अस्पतालों में जगह नहीं बची है। कई शहरो में यकायक संक्रमण इस तरह बढ़ा है जो आज तक देखा नहीं गया।
गलती कहाँ हुई फिर ?
ऐसा नहीं है कि केवल भारत भर में ही यकायक संक्रमण दर में वृद्धि हुई है अपितु विश्व के कई देशो में वायरस का ये मानवीय भूल वाला पैटर्न देखा जा रहा है। लोगों ने सोचा कि टीका आ गया मतलब इलाज़ आ गया और लापरवाही होनी शुरू हो गयी। जहाँ आम समुदाय लापरवाह होकर प्रोटोकॉल का पालन नहीं करता पाया गया वही सरकारों के चुनाव और उनकी भीड़ भरी रैलियों ने लोगों के लापरवाही के हौसलों को चार चाँद लगा दिए। इसके साथ ही टेस्ट,ट्रैक और ट्रीट की निति पीछे छूट गयी। कोरोना से लड़ने का अभियान अब सिर्फ टीकाकरण अभियान बन गया और जिले स्तर से लेकर केंद्र तक इस सोच को भी आगे हवा मिलती रही।
लोग बाज़ारो में वायरस लेकर दौड़ रहे थे और संक्रमित होने के बावजूद टेस्ट करवाने में देरी भी कर रहे थे और जिन लोगों को बीमारी के लक्षण आ रहे वो इलाज़ हेतु जा रहे थे लेकिन कुछ लोग ऐसे भी थे जो नादानी में संक्रमित होते हुए भी बाज़ारों में घूम रहे थे,गोया कि केवल सर्दी झुकाम जैसा मर्ज हो। हद ये भी हो गयी कि अब पड़ौसी को भी संक्रमितों की खबर नहीं मिल पा रही थी। सभी टीकाकरण महाअभियान समझ आगे बढ़ रहे थे और राज्यों के साथ जिलों के संदर्भित जिम्मेदारों में टीकाकरण की होडा - होड़ी चल पड़ी थी। ऐसा नहीं कि ये होडा - होड़ी कसूरवार थी , टेस्ट ट्रैक और ट्रीट पॉलिसी ज़िम्मेदार नज़र अंदाज कर रहे थे। और परिणाम अब आपके सामने है कि जिन जिलों में कभी प्रतिदिन कोरोना संक्रमितों का औसत 10 -20 था वहाँ सहसा 50-100 होता नज़र आया और कई भारत भर के कई राज्यों के जिलों में भारी संक्रमण दर देखी जा रही है। हालात बदल गये है और अब रणनीति भी बदलने की जरुरत है।
बरहाल माइक्रो कन्टेंटमेंट जोन पॉलिसी इस भयावह संक्रमण के दौर में हाँफती नज़र आ रही है और राज्य अपने लेवल पर SOP जारी भी कर चुके है लेकिन ये दौर अगर ज्यादा दिन चल गया तो बड़ी भूल साबित हो सकती है। राज्य मुँह फैलाए केन्द्र की और देख रहे कि अगर कोई सख्त गाइडलाइन्स आये तो उसका जिम्मा केन्द्र को परितोषिक के रूप में दिया जा सके तो वही केन्द्र अभी चुनावों में मस्त है और सत्ता और विपक्ष दोनों चुनावी आयोजनों से लोगों की जिंदगी में चौपड़ के पासे फेक रहे है।

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