चेतक घोड़े की तुलना करी पुरुष अंग से,एकता कपूर से लोग नाराज !
पद्मावत फिल्म विवाद के बाद बालाजी टेलीफिल्म्स की एक कामुक वेब श्रृंखला के एक एपिसोड ने उदयपुर में हिंदू संगठनों और इतिहासकारों के विरोध को हवा दे दी है। इस बार विवाद के निशाने यह महाराणा प्रताप का वफादार और साहसी घोड़ा 'चेतक' है जिसे कथित तौर पर पुरुष सेक्स अंग के सन्दर्भ में दिखाया गया है। एपिसोड में से एक,जो वेब सीरीज 'गंदी बात सीजन 4' में एक लघु कथा है, पुरुष जननांगों और कामुकता को दर्शाने के लिए चेतक के नाम का कई बार उपयोग किया गया है।
सर्व समाज, शिव सेना और श्री राम सेना के सदस्यों ने शुक्रवार को कलेक्टर को ज्ञापन देकर वेब सीरीज पर प्रतिबंध लगाने और वेब सीरीज निर्माता से माफी माँगने की मांग की। “जो लोग महाराणा प्रताप का सम्मान करते हैं और उनकी पूजा करते हैं, उनका वफादार घोड़ा चेतक सिर्फ एक जानवर नहीं है, बल्कि एक लोक देवता’ (लोक देवता) के रूप में पूजा जाता है जिसने अपने मालिक को बचाने के लिए अपना जीवन अर्पण कर दिया था। महाराणा प्रताप और चेतक की प्रशंसा में गाए गए अधिकांश गाथा गीत उनके व्यक्तित्वों को समान रूप से वर्णित करते हैं क्योंकि उन्होंने कई गुणों को साझा किया है।
इतिहासकार जोगेन्द्र राजपुरोहीत कहते है कि - "यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि वेब श्रृंखला की टीम ने लाखों लोगों की भावनाओं को आहत किया है जो चेतक को उसकी वीरता के लिए सम्मान और सम्मान देते हैं। इतिहासकार दावा करते हैं कि केवल राजस्थान या भारत में ही नहीं, बल्कि विदेशों में भी चेतक को उनके साहस और वफादारी के लिए सम्मानित किया जाता है। "
चेतक की कहानी है राणा उदय सिंह और महाराणा प्रताप के जमाने से जुडी है। एक दिन एक सौदागर आया और उसने महाराणा उदय सिंह जी को 2 घोड़े बताए। एक का नाम ऐटक था और दुसरे का नाम चेटक। जब उदयसिह जी ने सोदागर से खासियत पुछी तब सौदागर ने दो खड्डे खुदवाकर ऐटक घोड़े के खुर उसमें डलवा कर पीघला सीसा भरवा दिया। फिर महाराणा के बेहतरीन चाबुक सवार को घोड़े के एड (छड़ से मारने ) लगाने को कहा। घोड़े ने इतनी ताकत से उछाल मारी कि उसके खुर उस गड्ढे में रह गए। तभी कुंवर प्रताप ने वह चेटक घोड़ा खरीद लिया ।
उदयपुर के के मीरा कन्या महाविधालय के एक प्रोफेसर डाक्टर चंद्रशेखर शर्मा ने एक शोध किया । इस शोध में उन्होंने पाया कि कि हल्दीघाटी की 18 जून 1576 की लड़ाई में महराणा प्रताप ने अकबर को हराया था। डॉ. शर्मा ने अपने रिसर्च में प्रताप की जीत के पक्ष में ताम्र पत्रों के प्रमाण जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय में जमा कराए हैं। शर्मा की खोज के अनुसार युद्ध के बाद अगले एक साल तक महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के आस-पास के गांवों की जमीनों के पट्टे ताम्र पत्र के रूप में बांटे थे जिन पर एकलिंगनाथ के दीवान (संरक्षक और राजा) महाराणा प्रताप के हस्ताक्षर हैं।
उस समय जमीनों के पट्टे जारी करने का अधिकार सिर्फ राजा को ही होता था। जो साबित करता है कि प्रताप हीं युद्ध जीते थे। डॉ. शर्मा ने शोध किया है कि हल्दीघाटी युद्ध के बाद मुगल सेनापति मान सिंह व आसिफ खां के युद्ध हारने से अकबर नाराज हुए थे। दोनों को छह महीनें तक दरबार में नहीं आने की सजा दी गई थी। शर्मा कहते हैं कि अगर मुगल सेना जीतती तो अकबर अपने प्रिय सेनापतियों को दंडित नहीं करते। इससे साफ जाहिर है कि महाराणा ने हल्दीघाटी के युद्ध को संपूर्ण साहस के साथ जीता था।
हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 ई. को खमनोर एवं बलीचा गांव के मध्य तंग पहाड़ी दर्रे से आरम्भ होकर खमनोर गांव के किनारे बनास नदी के सहारे मोलेला तक कुछ घंटों तक चला था। युद्ध में निर्णायक विजय किसी को भी हासिल नहीं हो सकी थी लेकिन मेवाड़ी सेनाओं ने मुग़लो के छक्के छुड़ा दिए थे । इस युद्ध मे महाराणा प्रताप के सहयोगी राणा पूंजा का सहयोग रहा ।इसी युद्ध में महाराणा प्रताप के सहयोगी झाला मान, हाकिम खान,ग्वालियर नरेश राम शाह तंवर सहित देश भक्त कई सैनिक देशहित बलिदान हुए। उनका प्रसिद्ध घोड़ा चेतक भी मारा गया था।
मेवाड़ में आज भी माणकचौक राजमहल उदयपुर में अश्व पुजन धुमधाम से होता है। यहां पर जब घोड़े बुढ़े हो जाते या बीमार हो जाते तब उन्हें सादड़ी भेज दिया जाता और राजमहलों की तरफ से दाना चारा पानी की आजीवन व्यवस्था कर दी जाती अर्थात घोड़ो को पेंशन दे दी जाती।
दुर्भाग्य है कि मेवाड़ी आन बान शान और वीरता के प्रतीक की तुलना मानव अंग से कर इतिहास सहित मेवाड़ की हँसी उड़ाई जा रही है।