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भील और हिंदू धर्म
News Agency India November 01, 2021 05:02 PM IST

भील और हिंदू धर्म

भील, जिन्हें भारत की सबसे पुरानी और सबसे बड़ी जनजातियों में से एक मानाजाता है, दक्षिणी राजस्थान की पहाड़ियों, जंगलों और पश्चिमी भारत के पड़ोसी क्षेत्रों में निवास करते हैं। कभी वे राजस्थान, गुजरात, मालवा, मध्य प्रदेश और बिहार के कुछ हिस्सों में शासक थे। कुछ भीलों ने राजपूतों के साथ संबंध स्थापित किए। कुछ राजपूत राज्यों में, एक भील के द्वारा नए राजा के माथे पर अपने खून से टीका लगाने की प्रथा थी।

मध्य युग में जब बाहरी आक्रांताओं ने भारत की राजसत्ता को हथियाने की कोशिश की तब भील राजाओं, भील सरदारों तथा स्थानीय राजाओं के भील सैनिकों ने वनों का आश्रय लिया। धीरे-धीरे कठिन भौगोलिक परिस्तिथियाँ-वन, पहाड़ और घने जंगलों में जाकर वो रहने लगे, परन्तु अपनी वंश परंपरा के अनुरुप देवी-देवताओं की शक्ति, चमत्कार और श्रद्धा पर वे निरंतर बने रहे। इसमें बहुत अधिक परिवर्तन नहीं हुआ परन्तु भगवान शिव और आदि शक्ति के प्रतिरूप अपने देवी-देवताओं में गोत्र के अनुसार कुछ स्थानीय नाम परिवर्तन हुए हैं। देव आह्वान के गीत, पितर देवों के गीत, लोकगीत, युवाओं के गीत, देवताओं की आराधना और इतिहास के नायकों के गीतों में अपनी सनातन संस्कृति को संजोए रहे।

भील परंपराएं हिंदू धर्म के साथ लंबे समय से जुड़ाव प्रदर्शित करती हैं।

भील महादेव, पार्वती (उनकी पत्नी), हनुमान, भैरों और माताजी (देवी काली) की पूजा आराधना करते हैं। कई अन्य देवताओं (बागदेव, भैरवदेव, भाटीदेव आदि) की भी पूजा की जाती है। भील होली, दशहरा, दिवाली और राखी के त्योहार मनाते हैं। उनकी शादी की रस्में भी उनके हिंदू भाइयों के समान हैं, जिसमें दूल्हा और दुल्हन पवित्र अग्नि के चारों ओर घूमते है। एक महत्वपूर्ण भील संस्था 'गवरी' है, जो एक नृत्य नाटक है जिसमें मजबूत अनुष्ठान तत्व हैं जो महादेव और पार्वती के जीवन के विभिन्न प्रसंगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। प्रत्येक भील गांव का एक ग्राम देव होता है।

भील जनजाति सनातन परंपरा की वाहक रही है। उपलब्ध पुरातात्विक साक्ष्य एवं जनश्रुति के अनुसार नीलगिरि की पहाड़ियों में स्थित नील भगवन की मूर्ति भील शासक राजा विश्ववासु द्वारा स्थापित की गयी थी। भादवा माता मंदिर, नीमच (मध्य प्रदेश), भीलों की कुलदेवी मानी जाती है। जनश्रुति के अनुसार रूपा भील के स्वप्न में माता ने साक्षात दर्शन दिए थे। सप्तशृंगी महाराष्ट्र में स्थानीय भीलों की एक कुलदेवी है। गुजरात स्थित शबरी धाम व उदयपुर स्थित आमजा माता भीलों से सम्बंधित है। भिलट देव भीलो के प्रमुख देवता माने जाते है जो अगवान शिव का ही एक रूप है। भगवान गेपरनाथ मदिर,कोटा (राजस्थान), एक प्रसिद्ध शिव मंदिर है जिसका निर्माण भील राजाओं ने अपने शैव गुरु के सहयोग से किया था। भीलों के प्रत्येक गोत्र की एक कुलदेवी है जो दर्शाती है की जनजातियां कितनी सनातनी एवं अखंड हिन्दू समाज का अंग हैं।

सबसे महत्वपूर्ण त्योहार 5 दिनों तक चलने वाला बेणेश्वर मेंला (आदिवासियों का कुंभ है जो 5000 साल पुराना माना जाता है) है जो जनवरी या फरवरी के दौरान डूंगरपुर जिले के बेणेश्वर धाम (भगवान शिव का लगभग 600 साल पुराना मंदिर) में पवित्र नदियों (सोम, माही) के संगम पर मनाया जाता है । मेला हिंदू कैलेंडर के अनुसार आयोजित किया जाता है, जो माघ शुक्ल एकादशी से शुरू होकर माघ शुक्ल पूर्णिमा तक चलता है।

मूल रूप से यह मेंला पूरी तरह से भगवान शिव को समर्पित था, लेकिन बाद में महान संत मावजी महाराज (गहराई से सम्मानित संत जिनको भगवान विष्णु के अवतारों में से एक के रूप में माना जाता है) के भक्तों द्वारा अगवान विष्णु को भी समर्पित कर दिया गया। मावजी महाराज ने इस क्षेत्र में लंबे समय तक तपस्या की थी। ऐसा माना जाता है कि बचपन से ही लोग उनके संत स्वभाव और चमत्कारों के कारण उनका सम्मान करने लगे थे।

यह भी माना जाता है कि उन्होंने 12 साल की उम्र में घर छोड़ सबला के पास सुनैया पहाड़ियों की गुफा में 12 साल तक तपस्या की और फिर माघ शुक्ल एकादशी पर दर्शन देते हुए बानेश्वर में फिर से प्रकट हुए।

यह न केवल राजस्थान, बल्कि पड़ोसी राज्यों जैसे मध्य प्रदेश और गुजरात से भी बड़ी संख्या में आदिवासियों को आकर्षित करता है। यह भीलों का एक वार्षिक मिलन है, जो भगवान शिव और विष्णु की पूजा के लिए आते हैं और हरिद्वार, प्रयाग और पुष्कर जैसे अन्य स्थानों पर अपने मृतकों की अस्थि को विसर्जित करने सहित अपने मृतकों का श्राद्ध भी करते हैं। भक्त ब्रह्मा मंदिर, गायत्री मंदिर, वाल्मीकि मंदिर, शबरी मंदिर, हनुमान
मंदिर आदि सहित आसपास के कई अन्य मंदिरों में भी जाते हैं।

इतनी समांताओं के बाद भी हिंदुओं और आदिवासियों को बांटने की कोशिशें जारी हैं। क्या ये समाज को बाटने की साजिश नहीं है? सवाल यह है कि इस बंटवारे से किसे फायदा होगा। आदिवासियों को खुद के बारे में सोचने की ज़रुरत है। 'आदिवासी' धर्म मिलते ही
उनका अनुसूचित जनजाति' होने का फायदा खत्म हो जाएगा और उन्हे 'अल्प-संख्यक' समाज का दर्जा मिल जायेगा, जबकी साजिशकर्ता अपनी 'फूट डालो और शासन करो' की साजिश में सफल हो जायेंगे।

 

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