सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार सभी विवाहों का पंजीकरण अनिवार्य
जयपुर, 27 सितम्बर। सुप्रीम कोर्ट द्वारा सीमा कुमार बनाम अश्विनी कुमार केस में वर्ष 2006 में दिये गये फैसले के अनुसार देश में हुए प्रत्येक विवाह का पंजीकरण अनिवार्य है। विवाह का पंजीकरण किसी प्रकार से विवाह को वैधता प्रदान नहीं करता और ना ही न्यायालय में बाल विवाह को शून्य घोषित कराये जाने में बाधक है। यह एक कानूनी दस्तावेज के रूप में उपलब्ध रहता है। इससे बच्चों की देखभाल एवं उनके विधिक अधिकारों को संरक्षण मिलता है। राज्य में सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार वर्ष 2006 के बाद से ही सभी विवाहों के पंजीकरण किये जा रहे हैं। यह संशोधन विधेयक 2021 भी सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अनुपालना में सभी विवाहों के पंजीकरण की प्रक्रिया को सुगम बनाने के लिए पारित किया गया है। पूर्व में भी वर्ष 2016 में 04, 2017 में 10 एवं 2018 में 17 बाल विवाह पंजीकृत किये गए हैं।
बच्चों को विधिक कानूनी अधिकार एवं अन्य लाभ मिलेंगे
पूर्व के कानून में वैवाहिक युगल जिनका विवाह पंजीकृत नहीं था, उनमें से किसी एक अथवा दोनों की मृत्यु हो जाने पर उनके विवाह रजिस्ट्रेशन का कोई प्रावधान नहीं था इससे उनके बच्चों को विधिक अधिकार नहीं मिल पाते थे। नये संशोधन में अपंजीकृत मृतक युगल के विवाह के पंजीकरण का प्रावधान इसलिए किया गया है ताकि उनके बच्चों और परिजनों को कानूनी अड़चनें नहीं आएं। विवाह पंजीयन होने से बच्चों को सरकारी नौकरी, उत्तराधिकार, अनुकंपा नियुक्ति, मूल निवास प्रमाण पत्र, पेंशन जैसे लाभ एवं अन्य विधिक कानूनी अधिकार मिल सकेंगे।
पूर्व में जिला स्तर पर ही विवाह रजिस्ट्रीकरण अधिकारी का प्रावधान था लेकिन संशोधन के बाद अतिरिक्त जिला विवाह रजिस्ट्रीकरण अधिकारी और ब्लॉक विवाह रजिस्ट्रीकरण अधिकारी की नियुक्ति का प्रावधान जोड़ा गया है। इससे ग्रासरूट लेवल पर विवाह पंजीयन कार्य की प्रभावी मॉनिटरिंग एवं समीक्षा हो सकेगी।
बाल विवाह उन्मूलन के लिए कटिबद्ध है सरकार
बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के अनुसार बाल विवाह होने के पश्चात वर अथवा वधू अपने विवाह को शून्यकरणीय घोषित करवा सकते हैं। यदि वयस्क है तो स्वयं के द्वारा और अवयस्क होने पर संरक्षक या वाद-मित्र के माध्यम से याचिका दायर की जा सकती हैं। नया विधेयक किसी भी दृष्टिकोण से बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम, 2006 के कडे़ प्रावधानों को कमजोर नहीं करता। बाल विवाह का पंजीकरण होने से अधिनियम में वर-वधू को प्रदत्त विवाह शून्यकरण के अधिकार का हनन नहीं होगा।
राज्य सरकार बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई के उन्मूलन के लिए पूरी तरह से कटिबद्ध है। उपखण्ड अधिकारी एवं तहसीलदार को उनके क्षेत्र में बाल विवाहों को रोकने के लिए बाल विवाह प्रतिषेध अधिकारी नियुक्त किया गया है। बाल विवाह की सूचना मिलने पर प्रशासन समय-समय पर रोकथाम सहित जिम्मेदार पक्षों के खिलाफ अधिनियम के प्रावधानों के अनुसार कठोर कार्यवाही अमल में लाता है। प्रदेश में वर्ष 2019-20 में 523 तथा 2020-21 में 160 बाल विवाह रूकवाये गये हैं।
राजस्थान विवाहों का अनिवार्य पंजीकरण (संशोधन) विधेयक, 2021 को लेकर प्रदेश में भ्रम फैलाने के प्रयास किए जा रहे हैं। राजस्थान विधानसभा द्वारा 18 सितम्बर को पारित यह विधेयक वास्तव में किसी भी तरह से बाल विवाह को वैध नहीं बनाता।
पूर्व में लागू राजस्थान विवाहों का अनिवार्य रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 2009 की धारा, 08 के अनुसार वर एवं वधू के विवाह पंजीयन के लिए आवेदन की उम्र 21 वर्ष तय की गई थी जबकि वधू के लिए विवाह की कानूनी उम्र 18 वर्ष है। संशोधन के द्वारा इस त्रुटि को दूर किया गया है।
Disclaimer : All the information on this website is published in good faith and for general information purpose only. www.newsagencyindia.com does not make any warranties about the completeness, reliability and accuracy of this information. Any action you take upon the information you find on this website www.newsagencyindia.com , is strictly at your own risk

https://play.google.com/store/apps/details?id=com.wincompete&hl=en