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Current News / जवाहर कला केन्द्र में पद्मश्री से पुरस्कृत उस्ताद गफरुद्दीन खान मेवाती एवं उनके समूह द्वारा पंडून का कड़ा कला की दी भव्य एवं रोचक प्रस्तुति,

clean-udaipur जवाहर कला केन्द्र में पद्मश्री से पुरस्कृत उस्ताद गफरुद्दीन खान मेवाती एवं उनके समूह द्वारा पंडून का कड़ा कला की दी भव्य एवं रोचक प्रस्तुति,
Aayushman Bhatt March 16, 2026 09:23 AM IST

जयपुर, 15 मार्च। राजस्थान दिवस समारोह-2026 के अंतर्गत जवाहर कला केंद्र के कृष्णायन सभागार में रविवार (15 मार्च 2026) को कला-साहित्य एवं संस्कृति विभाग की ओर से शाम 6:30 बजे  पद्मश्री अवार्ड से पुरस्कृत उस्ताद गफरुद्दीन खान मेवाती एवं उनके समूह द्वारा पंडून का कड़ा गायन की भव्य प्रस्तुति दी गई।

 

उस्ताद गफरुद्दीन खान मेवाती एवं उनके समूह द्वारा पंडून का कड़ा गायन में महाभारत की कथा को लोक गायन शैली में प्रस्तुत किया। उन्होंने बगड़ बम-बम-बम लहरी गीत से कार्यक्रम की शुरुआत की। गफरुद्दीन खान मेवाती ने महाभारत के विभिन्न प्रसंगों अपनी सुरीली आवाज़ में गायन करमिट्टी की खुशबु की अनुभूति करवाई। इसके साथ ही उन्होंने महाभारत के महत्वपूर्ण किरदारों जैसे युधिष्ठिरभीमअर्जुननकुलसहदेव सहित पांडवोंद्रोपदीदुर्योधन सहित कौरव और अन्य किरदारों के रोचक संवाद को लोक गायकी के साथ प्रस्तुत किया।

 

उस्ताद गफरुद्दीन खान मेवाती एवं उनके समूह द्वारा पंडून का कड़ा गायन के साथ ही भपंग वादन भी किया। जिसमें भपंग की विभिन्न ध्वनियों ने खासा रोमांचित किया। भपंग वादन की जुगलबंदी भी पेश की गई। साथ ही प्रसिद्ध लोक गीत "दुनिया में हो रही है टर्र-टर्र" को प्रस्तुत किया जिससे पर दर्शकों ने भी कलाकारों का गायन में साथ दिया। इस दौरान दर्शकों ने समय-समय पर तालियां बजाकर कलाकारों का उत्साहवर्धन किया।

 

इस अवसर पर कला- साहित्य एवं संस्कृति तथा पुरातत्व उप सचिव एवं जवाहर कला केंद्र की अतिरिक्त महानिदेशक डॉ.अनुराधा गोगिया तथा वहां उपस्थित पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित उस्ताद अली तथा उस्ताद गनी की उपस्थिति में पद्मश्री अवार्ड से पुरस्कृत उस्ताद गफरुद्दीन खान मेवाती का साफा भेंट कर सम्मानित किया।

 

इस अवसर पर श्री राजेश आचार्य ने मंच संचालन किया पंडून का कड़ा गायन विभिन्न विशेषताओं पर प्रकाश भी डाला। उन्होंने बताया कि ऐतिहासिक रूप से पंडून का कड़ा गायन में 18 सौ से 25 सौ दोहो का गायन होता था किन्तु अब इस शैली में लगभग 700 से 800 दोहे ही गाये जाते हैं।

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