1918 में उदयपुर में फैला प्लेग,सोना खरीदने को कोई न था तैयार,लोग अपनों को छोड़ हुए थे भाग खड़े !
वर्तमान में कोरोना महामारी ने मानवता को हिला कर रख दिया है। देश के कई हिस्सों से लोगों के काल कवलित होने की खबरें आ रही है। चिताओं के फोटो मीडिया की सुर्खियां बने हुए है। कहीं कहीं लोग अस्पताल से अपनों की लाशें तक लेने से कतरा रहे है। कहीं कहीं मृतकों को अंतिम संस्कार तक मयस्सर नहीं हो रहा है। कुछ मतलबी लोग अपने परिजनों को बीमार ही छोड़ दे रहे तो कहीं ऐसी खबरें भी आ रही कि कुछ बेगैरत लोग अपने परिजनों को या तो ताले में बंद कर गए है या सड़कों पर किस्मत के भरोसे छोड़ रहे। कहीं ऐसा भी हुआ कि खुद के संक्रमित होने के बाद परिजन संक्रमित न हो जाये, इस डर से आत्महत्या जैसे कदम तक उठा रहे। वही मुनाफ़ाखोर गिद्ध बनते नज़र आ रहे,वही कुछ लोग ऐसे समय में भी स्वयंसेवा कर रहे है। बीमारों को मदद पहुँचा रहे है और बीमार परिवारों को खाना तक मुहैया करवा रहे है।
ये पैटर्न ऐसा नहीं कि पहली बार मानवता ने देखा हो। इससे पहले भी लगभग हर शताब्दी में कोई न कोई ऐसी महामारी आयी है जिसने लोगों की परीक्षा ली है और हर बार मानवता की जीत हुई है। ऐसे ही एक वाक्ये को आज हम आपके सामने ला रहे है जो 1918 में भारत में प्लेग महामारी से जुड़ा है। इससे राजस्थान का मेवाड़ भी अछूता नहीं रहा।
ये सिलसिला उदयपुर के प्रख्यात इतिहासकार जोगेन्द्र नाथ पुरोहित के दादाजी जो मेवाड़ घराने के प्रोटोकॉल अफसर थे ,उन्होंने अपनी डायरी में अपने हाथों से लिखा है और यहाँ पर हमने उस स्क्रिप्ट को वेबसाइट पर पोस्ट भी किया है। चूँकि पूरी कहानी मेवाड़ी में लिखी गयी थी तो समझने के लिए जोगेन्द्र नाथ जी ने कई घण्टों की अथक मेहनत से हमारी टीम के वरिष्ठ दिनेश भट्ट के साथ मिलकर अपने पाठकों को रूबरू करवाया है। उक्त डायरी का पेज 20 फरवरी 1918 के दिन लिखा गया है।
लेखक ने आंखों देखा हाल बताया कि कार्तिक सुदी दशम से हवेली के कोठार में चूहों का मरना यकायक शुरू हो गया और चूहों का मरना हर दिन जारी रहा। यह सिलसिला मार्गशीर्ष महीने से शुरू हुआ और मेवाड़ के महाराणा प्लेग के कारण से जयसमंद की ओर निकल पड़े। पौष महीना शुरू होते ही रानी साहिबा, जोधपुर बाई जी ,रानी जी, कंवर जी और उनकी दादी जी नाहर मगरा की ओर प्रस्थान कर गए। उदयपुर शहर का खाली होना अब शुरू हो चुका था। पौष महीने के शुरू होते ही शहर की हालत ऐसी हो गई के शहर के एक चौथाई लोग ही अब शहर में बाकी रह गए थे। लेखक के दादाजी ने अपनी भाभी से कहा कि चलो यहां से निकल चलते हैं। लेकिन भाभी ने कहा कि मैं तो कट्ठे मन से यहीं पर रहूंगी। मैं उदयपुर शहर छोड़कर नहीं जाऊंगी।
यकायक चूहों का मरना बढ़ता चला गया। चूहों के मरने से मकानों में अब बदबू आने लगी थी तो शहर में यह हुकुम (आदेश ) किया गया कि किसी भी व्यक्ति को अपने मकानों की निचली मंजिल में अब नहीं रहना है। सभी लोगों को ऊपर की मंजिल में अब रहना ही श्रेयस्कर होगा। लेखक के दादाजी के कोठार में इतनी संख्या में चूहे मरने लग गए कि सब तरफ बदबू का आलम समा गया। बदबू के मारे अब सबका सर फटा जा रहा था। वही बदबू के कारण हवेली में काम करने वाले नौकर तक काम करने से इनकार करने लगे। घर के संभ्रांत लोगों को अब अनाज घर को सुबह 10:00 बजे से लेकर रात को 11:00 बजे तक सफाई करना पड़ता था, वर्ना बदबू के मारे हालात बुरे हो जाते। राजा के साथ गए हुए लेखक के एक नौकर को नाहर मगरा से दोबारा उदयपुर बुलाया गया था कि घर पर छोटा मोटा काम किया जा सके और लेखक बराबर अपनी हवेली छोड़ने के लिए परिवारियों को कहते हैं लेकिन उन्होंने उदयपुर और हवेली छोड़ने की बात से इनकार कर दिया
शहर इतना वीरान हो गया था कि दिन में 2:00 बजे अगर आप हाथीपोल से महलों तक लोगों की गिनती करो तो बमुश्किल 10 लोग भी नहीं मिल पा रहे थे और शाम को भी हालत थी के एक भी आदमी बाहर नजर नहीं आ रहा था। बच्चों को उनके अभिभावक इस तरह की कहानी सुना रहे थे कि एक दैत्य राक्षस बाहर घूम रहा है इसलिए अब बाहर निकलना ठीक नहीं है। लोग दिन में आकर बाजार में व्यापार करते और शाम ढलने से पहले ही लौटने को आतुर हो जाते और जिस दैत्य का जिक्र लोग कर रहे थे ,वो और कोई नहीं प्लेग नामक बीमारी रूपी दैत्य ही था।
लोगों में प्लेग नामक बीमारी का कोई भान नहीं था,कुछ लोग तो इसे बीमारी भी नहीं मान रहे थे और लोग सोच रहे थे कि यह कोई देवी आपदा है। कोई प्लेग नामक बीमारी नहीं है लेकिन क्योंकि उस समय कोई अनाउंसमेंट नहीं हुआ करते थे। इंटरनेट और फोन,मोबाइल नहीं थे और न ही कोई अन्य सूचना के पढ़ाई-लिखाई का प्रचार-प्रसार ज्यादा नहीं था। डॉक्टर भी उतने नहीं थे। इस वजह से लोग प्लेग नामक बीमारी के बारे में ज्यादा नहीं जानते थे। लोगों में यह भी भ्रम पैदा हो गया था कि कोई राक्षस है जिसके कारण लोग बीमार हो रहे हैं और मरते चले जा रहे हैं।
जबकि जो लोग समझदार थे उन्हें पता पड़ चुका था कि प्लेग बीमारी मनुष्यता को खत्म करने आ चुकी है और यह दैत्य राक्षस कोई नहीं प्लेग ही है। जिस प्रकार आज कोरोना के टाइम में कई लोग इस बीमारी को नकारते हैं और कहते है कि कोई कोरोना वायरस बीमारी नहीं है। उसी तरीके से उस समय के कुछ लोग लापरवाही भी कर रहे थे। शहर की यह हालत हो गई थी कि अब मात्र दो हजार के आसपास ही लोग शहर में बच चुके थे ,बाकी लोग शहर छोड़ भाग चुके थे।
जिस तरह कोरोना महामारी में आज भी लोग प्रोटोकॉल का पालन नहीं कर रहे हैं, बेवजह घूम रहे हैं; उसी तरीके से लोग उस समय प्रोटोकॉल का पालन नहीं कर रहे थे। क्योंकि राज आज्ञा से कहा गया था कि अब लोगों को या तो शहर छोड़ देना है या दूसरी मंजिल पर चले जाना है या शहर छोड़ कर खेतों पर झोपड़ी बनाकर रहना शुरू कर देना है। हालत यह हो गई थी कि जिस व्यक्ति से सुबह बात की जाती शाम को उसी के अंतिम संस्कार में जाना पड़ता । जिन व्यक्तियों को अन्य बीमारियों के टीके लगे थे वह लोग भी अब मरते चले जा रहे थे।
200 आदमियों में अब केवल 10 व्यक्ति बच रहे थे। सलूंबर के नगर सेठ रूपचंद मोतीचंद जो कि 20 सालों से उदयपुर में मौजूद थे। उनकी मृत्यु प्लेग से हो जाती है और और उनका लड़का और बहू उनकी लाश को मकान में ताला लगाकर सलूंबर की ओर भाग गए। 4 दिन बाद जब लोगों ने सेठ को कहीं देखा नहीं तो हवेली का ताला तुड़वाया गया। सलूंबर राव जी इस घटना के दौरान स्वयं सेठ जी की हवेली के बाहर मौजूद थे। महामारी का ऐसा हाल हो गया था कि अब औलादे अपने अपने सगे संबंधियों और अपने पिता को भी मरते हुए छोड़ गए थे या मरने के बाद अंतिम संस्कार किए बिना भाग चले थे।
क्योंकि अब सगे संबंधी भी अपनों को छोड़कर भाग चुके थे। लोग मर रहे थे तो ऐसे में उदयपुर के कुछ भामाशाह ने प्रयास कर एक ठेला गाड़ी की व्यवस्था करवाई जिसके माध्यम से लोगों की लाशों को शमशान तक पहुंचाया जा सके। महामारी के कल में स्थिति यह हुई कि ₹100 के सामान के बदले कोई ₹70 का सामान भी नहीं दे रहा था। बहुमूल्य धातु सोने की बुरी हालत हुई थी कि कोई सोने जैसा बहुमूल्य धातु खरीदने को तैयार नहीं था और जहां ₹35 तोला सोना था उसके कोई ₹28 भी देने को तैयार नहीं था। जहां एक और 35 की जगह 28 रूपये प्रति तोला के भाव सोने के चल रहे थे वहीं दूसरी ओर लोग अब जेवर खरीदने को तैयार नहीं थे। लोगों से कहा जाता है कि अपने सोने को गला कर लाओ तब जाकर सोना खरीदेंगे। अब नौकर/मजदुर लोग भी नहीं मिल रहे थे। काम करने के लिए अब संभ्रांत लोगों को खुद आगे आना पड़ रहा था।
प्लेग की बीमारी सबसे पहले उदयपुर के मावली से शुरू हुई और धीरे-धीरे शहर की ओर बढ़ने लगी थी और महामारी का इतना विकराल रूप हुआ कि अब लोग दाह संस्कार के लिए बाजारों में आ खड़े हुए और शहर के कई मुख्य बाजारों में चिता जलने लग गई थी। शहर का कोई ऐसा हिस्सा नहीं जहां पर अंतिम संस्कार नहीं किए जा रहे हो। गणगौर घाट के किनारे तक चिताओं के कारण अटे पड़े थे।
इतिहासकार : जोगेन्द्र नाथ पुरोहित
शोध :दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)
