एक साथ कई फिल्में देखेंगे आप ‘भूत बंगला’ में
इससे पहले 1965 में एक मूवी आई थी ‘भूत बंगला’, जिसे महमूद ने बनाया था, तनुजा और नजीर हुसैन को भी लिया था. आरडी वर्मन ने इस मूवी में ‘आओ ट्विस्ट करें’ जैसा गाना मशहूर गाना भी दिया था. घर के मालिक और बाद में बेटों की हत्या पर आधारित इस मूवी का केवल टाइटिल अक्षय कुमार की नई मूवी में लिया गया है. लेकिन आप इस मूवी को देखेंगे तो आप पाएंगे कि आप एक नहीं बल्कि कई मूवीज एक साथ देख रहे हैं, कभी लगेगा ये ‘भूलभुलैया’ है, कभी लगेगा ‘जानी दुश्मन’ है, कभी लगेगा ‘मां’ है तो कभी ‘शैतान’ लगेगी. लेकिन ज्यादा दिमाग ना लगाएं तो फिल्म पैसा वसूल है, एंटरटेनमेंट की भरपूर डोज है. इसके लिए आप निर्देशक प्रियदर्शन की सराहना कर सकते हैं. हां दिमाग लगाते ही फिल्म औसत लगने लगती है.
जिस तरह टाइटिल महमूद की मूवी से लिया गया है, संजीव कुमार की फिल्म ‘जानी दुश्मन’ से आइडिया लिया गया है, जिसमें नई नवेली दुल्हनें गायब हो जाती हैं. पिछले साल आई काजोल की फिल्म ‘मां’ से रक्तबीज राक्षस जैसा एक पौराणिक आइडिया लिया गया है और एक नया राक्षस ‘वधू-सुर’ तैयार किया गया है. हॉलीवुड मूवी लाइट्स आउट से भी कुछ सींस क्लाइमेक्स में इस्तेमाल किए गए हैं कि कैसे भूत रोशनी से डरकर गायब हो जाता है. लेकिन वही राक्षस सैकड़ों मशालों की रोशन में खुलकर खेलता है, तो थोड़ा अजीब भी लगता है.
कहानी है एक दैत्य की बेटी और देवता के बेटे के प्रेम से पैदा हुए अवांछित बेटे की, जो भगवान विष्णु के ‘मोहिनी अस्त्र’ में फंसकर मर जाता है औऱ उसे जिंदा करने की कोशिशें 36000 पूर्णिमाओं से हो रही है. ज्वालाबाद में एक तांत्रिक की हवेली क मंदिर में लगे मंत्रोच्चार के यंत्र से ऐसी कोशिशें रोकी जाती रही हैं. लेकिन एक दिन उस तांत्रिक के बेटे की वजह से अनर्थ हो जाता है. मरने से पहले वो तांत्रिक अपने नाती अर्जुन (अक्षय कुमार) के नाम वो हवेली कर जाता है, जो अपनी बहन की डेस्टिनेशन वैडिंग के लिए जगह ढूंढ रहा है. प्रियदर्शन की फिल्मों की तरह मूवी के सारे किरदार उसी गांव में इकट्ठा होने शुरू होते हैं और फिर शुरू होता है वधूसुर का खेल.
सो हॉरर कॉमेडी के नाते मूवी में काफी आनंद आम परिवारों को आएगा, ये तय है. यूं भी परेश रावल, राजपाल यादव, असरानी, मनोज जोशी, तब्बू जैसे चेहरों के होते हुए कॉमेडी की कमी तो नहीं होने वाली. लेकिन अक्षय कुमार उसे और गहराई में उतार देते हैं, अपने मुंह पर चप्पल पड़वा कर और साथ में पीछे से अपनी पैंट उतरवाकर ‘बम एक्सपोजर’ के साथ. इससे पहले की फिल्मों में भी अक्षय अपने मुंह पर थुकवा चुके हैं, सूसू भी करवा चुके हैं. लोगों को ये भी शिकायत है कि अक्षय हर सीन में हावी हैं, प्रियदर्शन की बाकी फिल्मों की तरह उनके बाकी पात्रों को इतनी जगह नहीं मिली है. उस पर अक्षय का डबल रोल भी है. जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा उनकी हीरोइन वामिका गब्बी को उठाना पड़ा है. उनका रोल और बेहतरीन हो सकता था, ‘भूलभुलैया’ सीरीज की विद्या बालान और तब्बू की तरह.
ऐसे में राजपाल यादव के ‘मैं कोई मंदिर का घंटा हूं जो आकर जब चाहे बजा जाता है’, ‘ये कोई हवेली है, इसे खंडहर घोषित क्यों नहीं कर देते’ जैसे डायलॉग्स पुरानी फिल्मों से डालना देखकर लगता है निर्देशक ने पुरानी फिल्में कुछ ज्यादा ही देख लीं. यहां तक अक्षय का एक लुक भी ‘2.0’ (रोबोट) जैसा लगता है. ये भी समझ नहीं आता है कि कौन सा ज्योतिषी ‘बख्शीश’ लेता है, ज्योतिषी का इस तरह अपमान की जरूरत ही क्या थी, वो कहीं से फनी नहीं लगता. एक ही मूवी में आप ज्योतिष को गलत और भूत-राक्षसों को सही कैसे ठहरा सकते हैं. तब्बू और मनोज जोशी जैसे किरदारों को एकदम जाया किया गया. असरानी हमेशा की तरह अपनी इस आखिरी मूवी में भी शानदार लगे हैं तो राजेश शर्मा और जिस्सू सेन गुप्ता को जितने भी सीन मिले हैं, उन्होंने खुद को साबित किया है.
प्रियदर्शन की तारीफ इस बात में है कि उन्होंने मूवी को कही कमजोर नहीं पड़ने दिया, कहानी को इस तरह से समेटा कि एक एक सीन के बाद सस्पेंस आपको आगे का देखने की उत्सुकता में सीट से उठने नहीं देता. अक्षय ने भी जबरन अपने सफेद बालों या बूढ़ेपन को शो नहीं किया. दोनों की सिचुएशनल कॉमेडी के मास्टर हैं. हां कोई और पात्र ज्यादा उभरकर नहीं आ पाया, म्यूजिक भी लोगों को सर चढ़कर नहीं बोल रहा, बावजूद इसके लोग फिल्म देखकर अच्छा टाइमपास मान रहे है. सो परिवार के साथ एक बार देखने का आइडिया बुरा नहीं है.