<?xml version = "1.0" encoding = "UTF-8" ?>
<rss xmlns:atom="http://www.w3.org/2005/Atom" version="2.0">
	<channel>
		<atom:link href="https://newsagencyindia.com/rss/" rel="self" type="application/rss+xml"/>
		<title>News Agency India</title>
		<description>
		<![CDATA[
		News Agency India		]]>
		</description>
		<link>https://newsagencyindia.com/</link>
		<lastBuildDate>Mon, 20 Apr 2026 13:45:30 +0530</lastBuildDate>
		<pubDate>Mon, 20 Apr 2026 13:45:30 +0530</pubDate>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						मेवाड़ ने कैसे नींव डाली मुग़लिया पतन की,क्यों शिवाजी ने मेवाड़ महाराणा का किया अनुसरण !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<div class="grid-section">
<div class="row clearfix">
<div class="col-md-12 column"><img src="https://megaportal.in/media/1778/mewarlogo.jpg" alt="" />
<h1>मेवाड़ ने कैसे नींव डाली मुग़लिया पतन की,क्यों शिवाजी ने मेवाड़ महाराणा का किया अनुसरण !</h1>
<p>1669 ई.में में औरंगजेब शाही फौज के साथ अजमेर पहुंचा। लेकिन लेकिन महाराणा राजसिंह व औरंगजेब के बीच फिर सुलह हुई और युद्ध को टाला गया। <strong>महाराणा राजसिंह ने "विजयकटकातु" की उपाधि धारण की।</strong></p>
<p>1671 ई. में औरंगजेब की बहिन रोशन आरा का इन्तकाल हो गया। 1674 ई. महाराणा ने देबारी के दरवाजे का निर्माण करवाया। 1676 ई.में औरंगजेब के बड़े बेटे शहजादे मुहम्मद सुल्तान की मृत्यु हो जाती है। अब औरंगजेब हिन्दुस्तान भर में मन्दिरों को तुड़वाने वगैरह के नए हुक्म जारी किए देता है। 2 अप्रैल 1679 ई. में औरंगजेब ने हिन्दुस्तान में जजिया कर दोबारा लागू कर दिया।</p>
<p>तब गुस्से में महाराणा राजसिंह ने औरंगजेब को एक खत लिखा | यहां पूरा खत ना लिखकर मैं सिर्फ उसका थोड़ा सा वर्णन करता हूँ कि "<strong>आप अगर हमसे दोस्ती का बर्ताव करना चाहते हैं, तो जज़िया कर को खत्म कर दीजिये | आपके पूर्वज बादशाह अकबर ने जज़िया खत्म किया था | अब उसे फिर से लागू करना ठीक न होगा | यदि आप ऐसा ना कर पाये, तो हमें दुश्मनी का बर्ताव भी अच्छे से आता है।</strong> "</p>
<p>जज़िया के विरोध में एक खत जो वीर शिवाजी महाराज ने औरंगजेब को लिखा, उसमें महाराणा राजसिंह का जिक्र मिलता है | वीर शिवाजी ने इसमें औरंगजेब को चुनौती दी है, जो कुछ इस तरह है "<strong>हिन्दुओं को डरा-धमकाकर जज़िया वसूल न किया जावे, तो आपकी सल्तनत के लिए बेहतर होगा | आप हमसे जज़िया वसूल करने से पहले मेवाड़ के राणा राजसिंह से जज़िया वसूल करें | अगर वे देने के लिए तैयार हो जावें तब हमारे पास आइयेगा।</strong>"</p>
<p>मेवाड़-मारवाड़ की घटना - मारवाड़ के अजीतसिंह के संरक्षक राठौड़ दुर्गादास के नेतृत्व में राठौड़ों ने जगह-जगह शाही मुग़लीया थानों पर धावे बोले, तब औरंगजेब ने अजमेर आकर मारवाड़ के विरुद्ध सैनिक अभियान भेजे | राठौड़ दुर्गादास ने महाराणा राजसिंह को अजीतसिंह को संरक्षता प्रदान करने व सैनिक सहायता के लिए पत्र लिखा | राजपूताने में महाराणा राजसिंह के अलावा कोई शासक नहीं था, जो औरंगजेब को चुनौती दे सके, इसलिए महाराणा ने राठौड़ दुर्गादास का प्रस्ताव स्वीकार किया | महाराणा ने अजीतसिंह को 12 गाँवों समेत केलवा का पट्टा देकर मेवाड़ में सुरक्षा प्रदान की |</p>
<p><strong>अब हिन्दुस्तान की स्थिति ऐसी थी कि मेवाड़-मारवाड़ में दोस्ती का बर्ताव हुआ और दोनों रियासतें मुगलों के खिलाफ हुईं।हिन्दु विरोधी कार्यों से औरंगजेब को हिन्दुस्तान में विद्रोह भी झेलने पड़ रहे थे। उधर दक्षिण में वीर छत्रपति शिवाजी के नेतृत्व में मराठा बहादुरों ने मुगलों की बखिया उधेड़ दी। </strong></p>
<p>पूरे हिन्दुस्तान में बगावत का असर हुआ, पर बादशाही फौज की संख्या बहुत ज्यादा थी और इतने बड़े मुगल साम्राज्य का अन्त होना आसान काम न था। महाराणा राजसिंह व औरंगजेब के बीच वार्ता, सन्धि, उपहार वगैरह का आदान-प्रदान,खत लिखने व धमकियों का दौर समाप्त हुआ। औरंगजेब ने खुद अपनी बड़ी मुगल फौज के साथ मेवाड़ पर हमला करने के लिए कूच किया। महाराणा राजसिंह ने अपने पूर्वज महाराणा प्रताप व महाराणा अमरसिंह के लड़ने का तरीका इख्तियार किया और राजपरिवार व जरुरी फौज के साथ मेवाड़ के पहाड़ों में प्रस्थान किया।</p>
<p>तत्कालीन शूरवीर महाराणा राजसिंह द्वारा फौजी जमावड़ा महीनों पहले से चल रहा था। उन्हें पता था कि किस तरह जनता को सबसे पहले बचाना है। <br />बादशाह औरंगज़ेब ने शहज़ादे मुहम्मद आज़म, सादुल्ला खां, इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां को उदयपुर पर हमला कर वहां के मन्दिर वगैरह तोड़ने के साथ उदयपुर को लूटने भेजा।</p>
<p>वो दिन आ ही गया जब मुगल फौज लड़ते हुए उदयपुर आ पहुंची, तो वहां इन्होंने पूरा उदयपुर खाली पाया।</p>
<p>महाराणा राजसिंह प्रजा व सेना सहित अरावली के पहाड़ों में जा चुके थे। सादुल्ला खां व इक्का ताज खां फौज समेत उदयपुर के जगदीश मंदिर के सामने पहुंचे, जो कि उदयपुर के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक था व इसको बनाने में भारी धन (उस समय के लगभग 15 लाख रूपये ) खर्च हुआ था।</p>
<p>इस मंदिर की रक्षा के लिए नरू बारहठ सहित कुल 20 योद्धा तैनात थे, जिसका विवरण सुनकर आप की आँखे भीग जाएँगी। जब महाराणा राजसिंह राजपरिवार व सामंतों और जनता सहित पहाड़ों में प्रस्थान कर रहे थे तब किसी सामन्त ने महाराणा के बारहठ नरू को ताना दिया कि " जिस दरवाज़े पर तुमने बहुत से दस्तूर (नेग) लिए हैं, उसको लड़ाई के वक़्त ऐसे ही कैसे छोड़ोगे ?"</p>
<p>नरू बारहठ साहब एक क्षण मौन के बाद हुंकारे - "जब तक नरु बारहठ के धड़ पर शीष रहेगा तब तक ठाकुर जी (जगदीश मन्दिर) की सीढ़िया कोई आतातायी नहीं चढ़ सकेगा। एकलिंग विजयते नमः"।</p>
<p>नरू बारहठ के अपने 20 साथी भी कहाँ मानने वाले थे और वे भी उनके साथ यहीं रुक गए।</p>
<p>पूरा उदयपुर ख़ाली था। घण्टाघर से हाथीपोल तक संन्नाटा। एक भी आदमी नहीं। यहाँ तक कि शहर के स्वानो तक को अनहोनी की आशंका हो गयी थी शायद। वो भी गायब थे लेकिन तोते और चिड़ियाओं की आवाज़े सुनसान मरघट जैसे सन्नाटे को यदा कदा चीर रही थी।</p>
<p>सबसे पहले नरु के साथियों ने शहर के सारे मंदिरों की पूजा की।कई शंख एक साथ ऐसे बजाये गए मानों सैकड़ो लोग रणभेरी बजा रहे हो। ठण्ड की इस रात में भी सभी की भुजाएँ फड़क रही थी। मौत का कोई खौंफ नहीं। आँखों में इतना तेज़ मानो सूरज की रश्मियाँ हो। <br />निर्देशानुसार रात सभी लोग जगदीश मंदिर आ गए।</p>
<p><strong>मेवाड़ (उदयपुर) के सारे दरवाजे जैसे उदयपोल,किशनपोल,एकलिंगगढ़,ब्रह्मपोल,चांदपोल,गड़िया देवरा पोल ,हाथीपोल और दिल्ली दरवाजा बंद किये जा चुके थे। लेकिन उस रात दिवाली मनायी गयी थी मेवाड़ के हर दरवाज़े पर सैकड़ो मशालें और दीप जलायें थे नरु के साथियों ने।</strong></p>
<p>मुग़ल फौज इतनी खौफ़जदा थी कि उसने रात में शहर पर हमला करने की हिम्मत न की। उधर नरु और साथियों ने आखिरी आरती की जगदीश मन्दिर में। एक दूसरे को बधाइयाँ दी गयी शहीद हो जाने की ख़ुशी में। शस्त्रों की पूजा के बाद अश्वों की पूजा की गयी।</p>
<p>केसरिया बाना (पगड़ी) पहने हर योद्धा इतरा रहा था। सभी मन्दिर के पीछे अपने घोड़ों के साथ मरने के लिए तैयार खड़े थे। एक ही सुर में तेज़ आवाज़े जगदीश मंदिर से पूरे शहर में गूंझ रही थी <strong>"एकलिंगनाथ की जय !जय माता दी ! हर हर महादेव। हर हर महादेव।"</strong> हर मेवाड़ी योद्धा की आँखों में ख़ून उतर आया था।</p>
<p>आखिर वो घडी आ गयी जब सारे दरवाजे तोड़ते हुए सुबह 9 बजे के के करीब मुगल फौज जगदीश मंदिर के पास ढलान पर भटियाणी चौहटा और घण्टाघर तक आ गयी। औरंगज़ेब के शहज़ादे मुहम्मद आज़म, सादुल्ला खां, इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां की सेना अब भी आगे बढ़ने से कतरा रही थी क्योंकि पूरा उदयपुर खाली था और रात तक शंख नाद की आवाज़े आ रही थी। हुंकारे आ रही थी। सेना के साथ शहज़ादे मुहम्मद आज़म भी किसी अनहोनी की आशंका में थे। सादुल्ला खां ने अपने खास 50 सिपाहियों की टोली को आगे टोह लेने भेजा। जगदीश चौक तक आते आते सब के सब 50 हलाक कर दिए गए। खून से सड़क लाल हो चुकी थी। रक्त बहता हुआ ढलान में मुग़ल सेना की ओर आता दिखा। मुग़ल सेना में हड़कम्प मच गया।</p>
<p>स्थिति को इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां ने सम्भाला और सेना से आगे बढ़ने को कहा। तभी हर हर महादेव के नारे बुलंद हो उठे। सुनसान शहर थर्रा उठा। मंदिर की उत्तर वाले दरवाज़े (जहाँ आज स्कूल है )से एक योद्धा लड़ने के लिए बाहर आया और ऐसी गति मानों बिजली चलीं आ रही हो। केसरिया बाना पहने पहला माचातोड़ यौद्धा अपना अंतिम कर्तव्य निभाने निकल चूका था। हर हर महादेव के हुंकार और घोड़े की टाप की आवाज़ों के साथ पत्थर सड़को पर खुर ज्यादा ही आवाज़ कर रहे थे।हर माचातोड़ यौद्धा कम से कम 50 दुश्मनों को मारकर ही अपना जीवन धन्य समझता। जैसे ही एक माचातोड़ यौद्धा शहीद होता उसी समय दूसरा माचातोड़ यौद्धा ढलान मे हूंकार भरता हुआ नीचे मुग़ल ख़ेमे में घुस कर कई मुग़लो को फ़ना कर देता।ऐसे ही मंदिर से एक-एक कर माचातोड़ यौद्धा बाहर आते गए। शाम होने चली आयी थी।</p>
<p>मुग़ल सेना सदमे में डरी हुई थी और हैरान भी थी माचातोड़ यौद्धा की वीरता पर। मुग़ल सेना में माचातोड़ यौद्धा को लेकर फुस फुसाहट हो रही थी और हर कोई नए माचातोड़ यौद्धा का इंतज़ार कर रहा था। किसी को पता नहीं था ऐसे कितने ओर माचातोड़ यौद्धा अभी भी छिपे है ऊपर मन्दिर की ओर ?<br />लेकिन समय और नियति पहले ही नरु बारहठ की वीरता का किस्सा लिख चुकी थी। आखिर में नरू बारहठ बाहर आए और बड़ी बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। केसरिया बाना पहने जिन्दा रहते हुए उनकी तलवार ने कई मुग़ल सिप्पसालारो को हलाक कर दिया। शीश कटने के बाद भी उनका धड़ तलवार चलाता रहा। मुग़ल सैनिक इधर उधर भागते फ़िरे। नरू बारहठ के शहीद होते ही मुग़ल सेना ने डर कर एक घण्टे ओर इंतज़ार किया। उसके बाद बादशाही फौज ने जगदीश मंदिर में मूर्तियों को तोड़कर मंदिर को तहस-नहस कर दिया।</p>
<p><em><strong>इतिहासकार : जोगेन्द्र नाथ पुरोहित</strong></em></p>
<p>शोध :<strong>दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</strong></p>
<p>Email:<strong>erdineshbhatt@gmail.com</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<img src="https://megaportal.in/media/1680/mewar.jpg" alt="" /></div>
</div>
</div>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/history-of-mewar-and-mughals						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/history-of-mewar-and-mughals </guid>
					<pubDate>Fri, 01 Nov 2024 15:16:21 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						महाराणा प्रताप के शौर्य की ऐसी कहानी जो आपको अब तक मालूम न होगी !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<div class="grid-section">
<div>
<div class="row clearfix">
<div class="col-md-12 column">
<div><img src="https://megaportal.in/media/1590/maharana1.jpg" alt="" />
<h1>महाराणा प्रताप के शौर्य की ऐसी कहानी जो आपको अब तक मालूम न होगी !</h1>
<p><strong>महाराणा प्रताप सिंह उदयपुर, मेवाड में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है।</strong> उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया।महाराणा प्रताप का <strong>जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग</strong> में हुआ था। महाराणा प्रताप की माता का नाम जयवंता बाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप को बचपन में <strong>कीका</strong> के नाम से पुकारा जाता था।</p>
<p>राणा उदयसिंह केे दूसरी रानी धीरबाई जिसे राज्य के इतिहास में रानी भटियाणी के नाम से जाना जाता है, यह अपने पुत्र कुंवर जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी। प्रताप केे उत्तराधिकारी होने पर इसकेे विरोध स्वरूप जगमाल अकबर केे खेमे में चला जाता है। महाराणा प्रताप का <strong>प्रथम राज्याभिषेक मेंं 28 फरवरी, 1572 में गोगुन्दा</strong> में होता हैै, लेकिन विधि विधानस्वरूप राणा प्रताप का <strong>द्वितीय राज्याभिषेक 1572 ई. में ही कुुंभलगढ़़ दुुर्ग</strong> में हुआ, दूूूसरे राज्याभिषेक में <strong>जोधपुर का राठौड़ शासक राव चन्द्रसेेन</strong> भी उपस्थित थे।</p>
<p><br /><strong>राणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल 11 शादियाँ की थी उनके पत्नियों और उनसे प्राप्त उनके पुत्रों पुत्रियों के नाम है:-</strong></p>
<ul>
<li>महारानी अजब्धे पंवार :- अमरसिंह और भगवानदास</li>
<li>अमरबाई राठौर :- नत्था</li>
<li>शहमति बाई हाडा :-पुरा</li>
<li>अलमदेबाई चौहान:- जसवंत सिंह</li>
<li>रत्नावती बाई परमार :-माल,गज,क्लिंगु</li>
<li>लखाबाई :- रायभाना</li>
<li>जसोबाई चौहान :-कल्याणदास</li>
<li>चंपाबाई जंथी :- कल्ला, सनवालदास और दुर्जन सिंह</li>
<li>सोलनखिनीपुर बाई :- साशा और गोपाल</li>
<li>फूलबाई राठौर :-चंदा और शिखा</li>
<li>खीचर आशाबाई :- हत्थी और राम सिंह</li>
</ul>
<p><strong>1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 20000 राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80000 की सेना का सामना किया</strong>। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने अपना अश्व (घोड़ा)दे कर महाराणा को बचाया। उनके प्रिय अश्व <strong>चेतक</strong> की भी मृत्यु हुई। <strong>यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें 17000 लोग मारे गए।</strong> मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा की हालत दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती चली गई ।</p>
<p>महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि <strong>मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था</strong> इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर <strong>1572 ई. में जलाल खाँ</strong> प्रताप के खेमे में गये, इसी क्रम में <strong>मानसिंह (1573 ई. में )</strong>, <strong>भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में )</strong> तथा <strong>राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. )</strong> <strong>प्रताप</strong> को समझाने के लिए पहुँचे, <strong>लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश ही किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और हमें हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध देखने को मिला ।</strong></p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><strong>हल्दीघाटी का युद्ध:</strong></span> यह युद्ध <strong>18 जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था</strong>। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- <strong>हकीम खाँ सूरी</strong>। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व <strong>मानसिंह</strong> तथा <strong>आसफ खाँ</strong> ने किया था । इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन <strong>अब्दुल कादिर बदायूनीं</strong> ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से <strong>जेहाद</strong> की संज्ञा दी। <strong>इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की</strong>। वहीं ग्वालियर नरेश '<strong>राजा रामशाह तोमर</strong>' भी अपने तीन पुत्रों '<strong>कुँवर शालीवाहन</strong>', '<strong>कुँवर भवानी सिंह'</strong> '<strong>कुँवर प्रताप सिंह</strong>' और <strong>पौत्र बलभद्र सिंह</strong> एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गए ।</p>
<p><strong>इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजयी नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए।</strong> अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर ऐसा है नहीं,ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><strong>दिवेेेेर का युुद्ध:</strong></span></p>
<p><strong>राजस्थान के इतिहास 1582 में दिवेर का युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण कर्नल जेम्स टाॅड ने इस युद्ध को "मेवाड़ का मैराथन" कहा |</strong></p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><strong>सफलता और अवसान:</strong></span></p>
<p><strong>1579 से 1585 तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उलझा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने 1585 में मेवाड़ से मुगलो से मुक्ति के प्रयत्नों को और भी तेज कर लिया। महाराणा की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया ,उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था ,पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत 1585 में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए,परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई।</strong>महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सीधारणे के बाद पुनः आगरा ले आया।</p>
<p><strong>'एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।</strong></p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><strong>महाराणा प्रताप सिंह के मृत्यु पर अकबर की प्रतिक्रिया:</strong></span></p>
<p>अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था पर उनकी यह लड़ाई कोई व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम नहीं थी, हालांकि अपने सिद्धांतों और मूल्यों की लड़ाई थी। एक तरह अकबर जो अपने क्रूर साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था,दुसरी तरफ महाराणा प्रताप थे जो अपनी भारत मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जानता था कि महाराणा जैसा वीर कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आंसू आ गए।महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के समय अकबर लाहौर में था और वहीं उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है।</p>
<p>अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है:-</p>
<p>"<strong>अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी</strong><br /><strong>गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी</strong><br /><strong>नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली</strong><br /><strong>न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली</strong><br /><strong>गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी</strong><br /><strong>निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी</strong>"</p>
<p>अर्थात्</p>
<p><strong>हे !गहलोत राणा प्रतापसिंह ,आपकी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निश्वास के साथ आंसू टपकाए। क्योंकि तूने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया। तूने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि तू अपना आडा यानि यश या राज्य तो गंवा गया लेकिन फिर भी तू अपने राज्य के धूरी को बांए कंधे से ही चलाता रहा। तेरी रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही तू खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गया। तू कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहा और तेरा रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा। इसलिए मैं कहता हूं कि तू सब तरह से जीत गया और बादशाह हार गया।</strong></p>
<p>अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना पूरा जीवन का बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और उनके स्वामिभक्त अश्व चेतक को शत-शत कोटि-कोटि प्रणाम।</p>
<p>अकबर द्वारा गुजरात की विजय के बाद मेवाड़ ने फिर से ध्यान आकर्षित किया। वह पूरी तरह से जानता था कि मेवाड़ समस्या का समाधान किए बिना उसके अन्य राजपूत राज्यों के साथ गठबंधन स्थिर नहीं हो सका। <strong>संयोग से उसी वर्ष (1572) राणा उदय सिंह की मृत्यु हो गई और थोड़े समय के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई हुई। राणा प्रताप गोगुन्दा में मेवाड़ के शासक के रूप में सफल हुए। शीघ्र ही बाद में उन्होंने अपनी राजधानी को कुंभलगढ़ नामक एक बहुत सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर दिया।</strong> मेवाड़ को अकबर ने लगातार आधीनता स्वीकार करने के लिए उन्हीं शर्तों पर मुगलों की अधीनता में शामिल करने को कहा जो अन्य राजपूत सरदारों को पेश की गई थी। सितम्बर 1572 को राणा प्रताप के दरबार में जलाल खान कुरची अकबर के दूत बनकर आये पर वह प्रताप को मुगलों के अधिपत्य को स्वीकार करने के लिए समझाने में नाकाम रहे और निराश होकर लौटे। अकबर के दूत राजा यार सिंह जो 1573 में भेजे गए थे वो भी वांछित परिणाम प्राप्त करने में विफल रहे। अक्टूबर 1573 में अकबर ने प्रताप को लुभाने मुगल में अग्रणी राजपूत राजा भगवंत दास कच्छवाहा प्रमुख और को भेजने का एक और प्रयास किया।</p>
<p><strong>अकबर चाहता था कि महाराणा प्रताप अकबर के दरबार में व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज़ कर मित्रता का हाथ पकड़ दासता स्वीकार कर ले ।</strong></p>
<p>व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत करने के लिए प्रताप की अनिच्छा भगवंत दास और अकबर के सन्देश की शर्तों को खारिज कर दिया| <strong>अकबर राणा प्रताप की व्यक्तिगत उपस्थिति पर जोर देते थे। दूतो द्वारा किए गए असफल प्रयासो के बाद अकबर का रवैया और सख्त हो गया था और फिर फलस्वरूप मान सिंह की कमान के तहत एक शक्तिशाली सेना को राणा प्रताप को दंडित करने के लिए भेजा गया। युद्ध योजना की निगरानी हेतू अकबर सम्राट 1576 को व्यक्तिगत रूप से अजमेर गए थे पर जैसा कि सर्वविदित है कि मुगल सेना राजपूत सेना पर भारी पड़ी और राणा प्रताप 1576 में हल्दीघाटी के युद्ध के बाद कोलियारी ठिकाने पर आ गए और एक पहाड़ी शहर में शरण ली।</strong></p>
<p><strong>इस जीत के बाद सम्राट अकबर राजधानी आगरा लौट गए । राणा प्रताप पर अपनी चोटों से उबरने के बाद कुंभलगढ़ लौट आए अपने खोए हुए भू भाग को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया।</strong> मुगलों के खिलाफ राजपूत प्रमुखों के एक समूह का एक गठबंधन करने में उन्होंने सफलता प्राप्त की । प्रताप की इन शत्रुतापूर्ण गतिविधियों का पता अकबर को व्यक्तिगत रूप से अजमेर में ही चल गया और भगवंत दास और मान सिंह को उनके और अन्य के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मेवाड़ की और भेजा। अजमेर में सम्राट अकबर की उपस्थिति मजबूत थी और सैन्य कार्रवाई के वांछित परिणाम आ सकते थे। उधर ईडर और सिरोही के शासको ने एक के बाद एक कर अकबर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और मुग़ल अधिपत्य स्वीकार कर लिया।साथ ही राणा प्रताप को भी गोगुन्दा से भागने के लिए मजबूर किया गया था और वे शाही अधिकार को तब तक टालते रहे जब तक कि उनकी 1597 में मृत्यु हो गई लेकिन मेवाड़ राजपूताना में पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया था ।</p>
<p><strong>हालांकि कई महत्वपूर्ण सैन्य कमांडर जैसे भगवंत दास (1577) , शाहबाज़ खान कम्बोह (1577),अब्दुर रहीम खान-इकन (1580) और राजा जगमीमथ (1584 ) को उनके खिलाफ भेजा गया लेकिन वे राणा को शाही सेवा में शामिल होने के लिए मजबूर करने में विफल रहे। उन्होंने चावंड में एक नई राजधानी की नींव भी रखी।1597 में उनके बड़े बेटे और उत्तराधिकारी ने अमर सिंह की मृत्यु के बाद कुछ समय के लिए अपने पिता की नीति को जारी रखा। लेकिन लगातार युद्धों के कारण उनकी सैन्य शक्ति में काफी गिरावट आई और उन्होंने अपने कई क्षेत्रों को खो दिया। अमर सिंह ने इसे बेहतर बनाने के लिए कड़ी मेहनत की अपने राज्य के आंतरिक कामकाज और उसके साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश की।</strong>&nbsp;अगम ने 1599 में मेवाड़ पर आक्रमण शुरू किया।</p>
<p>अकबर ने राजकुमार सलीम के साथ सेना के कमांडर राजा मान सिंह को अजमेर से मेवाड़ जाने को कहा लेकिन सलीम ने ऑपरेशन में कोई दिलचस्पी नहीं ली क्योंकि वह मुगल सिंहासन पर कब्जा करने की साजिश रचने में लगे हुआ था। बाद में उदयपुर की एक छोटी यात्रा करते हुए उन्होंने इसे पूरी तरह से राजा मान सिंह पर छोड़ दिया। इनमें मुग़ल सेनाएँ केवल अटाला में पद स्थापित करने में सफल रहीं और मोही, बागोर, माण्डल ,मांडलगढ़, चित्तौड़ और अन्य स्थानों पर मुग़ल सेना कब्ज़े में असफल रही। कुछ समय बाद मान सिंह को बंगाल जाना पड़ा और उस्मान के विद्रोह के कारण सलीम ने आगरा की ओर प्रस्थान किया। 1603 में एक बार फिर अकबर ने मेवाड़ पर अभियान चलाने का फैसला किया। राजकुमार सलीम के साथ कई प्रमुख राजपूत राजाओ के जैसे साजगरैयाथ, माधो सिंह, सादिक खान आदि) को आदेश दिया कि वे सभी 1599 में अधूरे रह गए कार्य को पूरा करने के लिए मेवाड़ की ओर चलें। लेकिन सलीम ने आदेशों का पालन करने से इनकार कर दिया। बिना किसी और इंतजार के अकबर ने खुसरू को कमान संभालने के लिए नियुक्त किया गया लेकिन अभियान नहीं चल सका। अकबर की बीमारी के बाद उनकी मृत्यु हो गयी ।<strong>&nbsp;स्पष्ट है कि अकबर अपने जीवन काल के दौरानअपने समकालीन सिसोदिया प्रमुख राणा प्रताप और अमर सिंह को पूरी तरह हराने में असफल रहे और मुगलिया सल्तनत का अधिपत्य मेवाड़ पर हो न पाया ।</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong>नोट&nbsp;: उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</strong></p>
<p><strong>Disclaimer:</strong>​All the information on this website is published in good faith and for general information purpose only. www.newsagencyindia.com does not make any warranties about the completeness, reliability and accuracy of this information. Any action you take upon the information you find on this website&nbsp; www.newsagencyindia.com&nbsp;, is strictly at your own risk.&nbsp; www.newsagencyindia.com&nbsp;will not be liable for any losses and/or damages in connection with the use of our website.</p>
<p>&nbsp;</p>
<img src="https://megaportal.in/media/1592/maharana4.jpg" alt="" /></div>
</div>
</div>
</div>
</div>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/maharana-pratap-warrior-of-mewar						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/maharana-pratap-warrior-of-mewar </guid>
					<pubDate>Thu, 09 May 2024 10:00:17 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप जीते, बनायी थी हॉलीवुड फिल्म ‘300’ वाली योजना !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<div class="grid-section">
<div>
<div class="row clearfix">
<div class="col-md-12 column">
<div><img src="https://megaportal.in/media/1630/haldi.jpg" alt="" />
<h1>हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप जीते, बनायी थी हॉलीवुड फिल्म &lsquo;300&rsquo; वाली योजना !</h1>
<p>उदयपुर के के मीरा कन्या महाविधालय के एक प्रोफेसर डाक्टर चंद्रशेखर शर्मा ने एक शोध किया । इस शोध में उन्होंने पाया कि कि <strong>हल्दीघाटी की 18 जून 1576 की लड़ाई में महराणा प्रताप ने अकबर को हराया था।</strong> डॉ. शर्मा ने अपने रिसर्च में प्रताप की जीत के पक्ष में ताम्र पत्रों के प्रमाण जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय में जमा कराए हैं। शर्मा की खोज के अनुसार युद्ध के बाद अगले एक साल तक महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के आस-पास के गांवों की जमीनों के पट्टे ताम्र पत्र के रूप में बांटे थे जिन पर एकलिंगनाथ के दीवान प्रताप के हस्ताक्षर हैं।</p>
<p><strong>उस समय जमीनों के पट्टे जारी करने का अधिकार सिर्फ राजा को ही होता था। जो साबित करता है कि प्रताप हीं युद्ध जीते थे। डॉ. शर्मा ने शोध किया है कि हल्दीघाटी युद्ध के बाद मुगल सेनापति मान सिंह व आसिफ खां के युद्ध हारने से अकबर नाराज हुए थे। दोनों को छह महीनें तक दरबार में नहीं आने की सजा दी गई थी। शर्मा कहते हैं कि अगर मुगल सेना जीतती तो अकबर अपने प्रिय सेनापतियों को दंडित नहीं करते। इससे साफ जाहिर है कि महाराणा ने हल्दीघाटी के युद्ध को संपूर्ण साहस के साथ जीता था।</strong></p>
<p>लोगों का एक खास तबका इस नए &lsquo;इतिहास&rsquo; को बहुत पसंद कर रहा है। लेकिन सच्चाई क्या मानी जाए? आइए नजर डालते हैं जून 1576 में हुए हल्दीघाटी के इस युद्ध की ऐसी बातों पर जो अब तक हमारी जानकारी में नहीं रही है। ये जानकारियां सदियों तक सार्वजनिक दायरे से बाहर थी।</p>
<p><strong>हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 ई. को खमनोर एवं बलीचा गांव के मध्य तंग पहाड़ी दर्रे से आरम्भ होकर खमनोर गांव के किनारे बनास नदी के सहारे मोलेला तक कुछ घंटों तक चला था।</strong> युद्ध में निर्णायक विजय किसी को भी हासिल नहीं हो सकी थी लेकिन मेवाड़ी सेनाओं ने मुग़लो के छक्के छुड़ा दिए थे । इस युद्ध मे महाराणा प्रताप के सहयोगी राणा पूंजा का सहयोग रहा ।इसी युद्ध में महाराणा प्रताप के सहयोगी झाला मान, हाकिम खान,ग्वालियर नरेश राम शाह तंवर सहित देश भक्त कई सैनिक देशहित बलिदान हुए। उनका प्रसिद्ध घोड़ा चेतक भी मारा गया था।</p>
<p>हल्दीघाटी राजस्थान की दो पहाड़ियों के बीच एक पतली सी घाटी है। मिट्टी के हल्दी जैसे रंग के कारण इसे हल्दी घाटी कहा जाता है। इतिहास का ये युद्ध हल्दीघाटी के दर्रे से शुरू हुआ लेकिन महाराणा वहां नहीं लड़े थे, उनकी लड़ाई खमनौर में चली थी। मुगल इतिहासकार अबुल फजल ने इसे <strong>&ldquo;खमनौर का युद्ध&rdquo;</strong> कहा है । राणा प्रताप के चारण कवि रामा सांदू &lsquo;झूलणा महाराणा प्रताप सिंह जी रा&rsquo; में लिखते हैंः&ldquo;महाराणा प्रताप अपने अश्वारोही दल के साथ हल्दीघाटी पहुंचे, <strong>परंतु भयंकर रक्तपात खमनौर में हुआ</strong>। &rdquo;</p>
<p><strong>हॉलीवुड फिल्म &lsquo;300&rsquo; वाली योजना थी !</strong></p>
<p>2006 में रिलीज हुई डायरेक्टर ज़ैक श्नाइडर की हॉलीवुड फिल्म है &lsquo;300&rsquo; । इतिहास के एक चर्चित युद्ध पर बनी इस फिल्म में राजा लियोनाइडस अपने 300 सैनिकों के साथ 1 लाख लोगों की फौज से लड़ता है। पतली सी जगह में दुश्मन एक-एक कर अंदर आता है और मारा जाता है।</p>
<p>राणा प्रताप ने इसी तरह की योजना बनाई थी। मगर मुगलों की ओर से लड़ने आए सेनापति मानसिंह घाटी के अंदर नहीं आए। मुगल जानते थे कि घाटी के अंदर इतनी बड़ी सेना ले जाना सही नहीं रहेगा। कुछ समय सब्र करने के बाद राणा की सेना खमनौर के मैदान में पहुंच गई। इसके बाद ज़बरदस्त नरसंहार हुआ. कह सकते हैं कि 4 घंटों में 400 साल का इतिहास तय हो गया।</p>
<p>महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गये, इसी क्रम में मानसिंह (1573 ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में ) तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश ही किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और हमें हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध देखने को मिला |</p>
<p>अल बदायुनी के अनुसार जो युद्ध का गवाह भी था, राणा की सेना में 3,000 घुड़सवारों और लगभग 400 भील धनुर्धारियों की गिनती की, जो मेरजा के प्रमुख पुंजा के नेतृत्व में थे। दोनों पक्षों के पास युद्ध के हाथी थे, लेकिन राजपूतों के पास कोई गोला-बारूद या तोपे नहीं थी।</p>
<p>दोनों सेनाओं के बीच असमानता के कारण, राणा ने मुगलों पर एक जोरदार हमला करने का विकल्प चुना, जिससे कई लोग मारे गए। हकीम खान सूर और रामदास राठौर ने मुग़लो को भागने पर मजबूर कर दिया और जबकि राम साह तनवार और भामा शाह ने मुगलो पर कहर बरपाया, जो भागने के लिए मजबूर थे। मुल्ला काज़ी ख़ान और फतेहपुर सीकरी शेखज़ादों के कप्तान दोनों घायल हो गए, लेकिन बरहा के सैयदों ने दृढ़ता से काम किया और माधो सिंह के अग्रिम पंक्ति के लिए पर्याप्त समय दिया।</p>
<p>मुग़लो को खदेड़ने के बाद, राम साह तोवर ने अपने कमांडर से जुड़ने के लिए खुद को केंद्र की ओर बढ़ाया। वह जगन्नाथ कच्छवा द्वारा मारे जाने तक प्रताप सिंह की सफलतापूर्वक रक्षा में सफल रहे थे। जल्द ही मुगल सेना, माधो सिंह के आगमन से चकित हो घबरा गयी थी,और सामने अकबर की सेना से सैय्यद हाशिम के होश खट्टे हो गए ।डोडिया के कबीले नेता भीम सिंह, मुगल सेनापति को अपने हाथी से मार डाला ।</p>
<p>महाराणा ने अपने हाथी जिसका नाम राम प्रसाद था ,को मैदान में लाने का आदेश दिया।अपने युद्ध के हाथियों के के साथ मेवाड़ियों ने मुग़लो को भागने पर मजबूर कर दिया।राणा प्रताप की तरफ से प्रसिद्ध &lsquo;रामप्रसाद&rsquo; और &lsquo;लूना&rsquo; समेत 100 हाथी थे। मुगलों के पास इनसे तीन गुना हाथी थे। मुगल सेना के सभी हाथी किसी बख्तरबंद टैंक की तरह सुरक्षित होते थे और इनकी सूंड पर धारदार खांडे बंधे होते थे।राणा प्रताप के पास चेतक समेत कुल 3,000 घोड़े थे। मुगल घोड़ों की गिनती कुल 10,000 से ऊपर थी।</p>
<p>लेकिन एक मेवाड़ी योद्धा के सामने 5 मुग़ल थे। धीरे धीरे लड़ाई का ज्वार शिफ्ट हो रहा था और राणा प्रताप ने जल्द ही तीर और भाले से से घायल हो गए। यह महसूस करते हुए कि दिन खत्म होने वाला है और समय के साथ मेवाड़ को महाराणा प्रताप की ज्यादा जरुरत है,वीर बिंदा झाला ने अपने सेनापति से शाही छतरी अपने घोड़े पर लेकर सजा ली और मेवाड़ी मुकुट पहन खुद को राणा बताते हुए मुग़लो की सेना के हुजुम की तरफ चल पड़े। पता था उन्हें ये उनका आखरी युद्ध है। फिर भी जोश और आँखों में चमक लिए उन्होंने सैकड़ो मुगलों को अपनी तलवार का निशाना बना दिया । उनके बलिदान और 350 अन्य सैनिकों जो पीछे रह गए जो समय को खरीदने के लिए लड़े और उनके राणा और उनकी सेना के आधे भाग को मेवाड़ की रक्षा हेतु बचा लिया ।</p>
<p>रामदास राठौर तीन घंटे की लड़ाई के बाद मैदान पर मारे गए लोगों में से एक थे। राम साह टोनवर के तीन बेटे- सलिवाहन, बहान, और प्रताप टोनवार - मृत्यु में अपने पिता के साथ शामिल हो गए।</p>
<p>दोनों तरफ राजपूत सैनिक थे। उग्र संघर्ष में एक स्तर पर, बदायुनी ने आसफ खान से पूछा कि मैत्रीपूर्ण और दुश्मन राजपूतों के बीच अंतर कैसे किया जाए। आसफ खान ने जवाब दिया, "जिसको भी आप पसंद करते हैं, जिस तरफ भी वे मारे जा सकते हैं, उसे गोली मार दें, यह इस्लाम के लिए एक लाभ होगा।"</p>
<p>1572 ईस्वी में राणा उदय सिंह की मृत्यु हो गई और थोड़े समय के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई हुई| राणा प्रताप गोगुन्दा में मेवाड़ के शासक के रूप में सफल हुए। शीघ्र ही बाद में उन्होंने अपनी राजधानी को कुंभलगढ़ नामक एक बहुत सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर दिया। मेवाड़ को अकबर ने लगातार आधीनता स्वीकार करने के लिए उन्हीं शर्तों पर मुगलों की अधीनता में शामिल करने को कहा जो अन्य राजपूत सरदारों को पेश की गई थी| सितम्बर 1572 को राणा प्रताप के दरबार में जलाल खान कुरची अकबर के दूत बनकर आये पर वह प्रताप को मुगलों के अधिपत्य को स्वीकार करने के लिए समझाने में नाकाम रहे और निराश होकर लौटे। अकबर के दूत राजा यार सिंह जो 1573 में भेजे गए थे वो भी वांछित परिणाम प्राप्त करने में विफल रहे| अक्टूबर 1573 में अकबर ने प्रताप को लुभाने मुगल में अग्रणी राजपूत राजा भगवंत दास कच्छवाहा प्रमुख और को भेजने का एक और प्रयास किया|</p>
<p>अकबर चाहता था कि महाराणा प्रताप अकबर के दरबार में व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज़ कर मित्रता का हाथ पकड़ दासता स्वीकार कर ले | <br />व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत करने के लिए प्रताप की अनिच्छा भगवंत दास और अकबर के सन्देश की शर्तों को खारिज कर दिया| अकबर राणा प्रताप की व्यक्तिगत उपस्थिति पर जोर देते थे। दूतो द्वारा किए गए असफल प्रयासो के बाद अकबर का रवैया और सख्त हो गया था और फिर फलस्वरूप मान सिंह की कमान के तहत एक शक्तिशाली सेना को राणा प्रताप को दंडित करने के लिए भेजा गया।</p>
<p>इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजयी नहीं हुआ था। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूतो ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।</p>
<p>महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 20000 राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80000 की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने अपना अश्व दे कर महाराणा को बचाया। उनके प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें 17000 लोग मारे गए।</p>
<p><strong>हल्दीघाटी का युद्ध:</strong> यह युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- हकीम खाँ सूरी।इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया था । इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गए ।</p>
<p>अब यहां मुख्य रूप से देखने योग्य युद्ध स्थल रक्त तलाई,शाहीबाग,हल्दीघाटी दर्रा,प्रताप गुफा,चेतक समाधी एवं महाराणा प्रताप स्मारक देखने योग्य है। युद्धभूमि रक्त तलाई में शहीदों की स्मृति में बनी हुई है। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित सभी स्थल निःशुल्क दर्शनीय है।</p>
<p><strong>नोट&nbsp;: उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</strong></p>
<p><strong>Disclaimer</strong>&nbsp;:​All the information on this website is published in good faith and for general information purpose only. www.newsagencyindia.com does not make any warranties about the completeness, reliability and accuracy of this information. Any action you take upon the information you find on this website&nbsp; www.newsagencyindia.com&nbsp;, is strictly at your own risk.&nbsp; www.newsagencyindia.com&nbsp;will not be liable for any losses and/or damages in connection with the use of our website.</p>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/haldi-ghati-battle-won-by-maharana-pratap						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/haldi-ghati-battle-won-by-maharana-pratap </guid>
					<pubDate>Thu, 09 May 2024 09:58:53 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						चाहते महाराणा तो घात लगा मार सकते थे मान को !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<div class="grid-section">
<div class="row clearfix">
<div class="col-md-12 column">चाहते महाराणा तो घात लगा मार सकते थे मान को !
<p>महाराणा प्रताप चाहते तो हल्दी घाटी का युद्ध होने से पहले ही उसे खत्म कर सकते थे। उनका दुश्मन सेनापति मानसिंह अपने 1000 सैनिकों के साथ मेवाड़ में था और उसकी सुचना महाराणा प्रताप सहित सभी सामन्तो को मिल गयी। फिर भी महाराणा प्रताप ने दुश्मन सेनापति मानसिंह को धोखे से पकड़ना उचित नहीं समझा।</p>
<p>अकबर के विशाल साम्राज्य में मेवाड़ जैसे छोटे से प्रदेश का स्वतंत्र अस्तित्व उसके लिए असहनीय तो था ही लेकिन ये उसके गुरूर पर हमेशा पड़ती थप्पड़ जैसा था। महाराणा प्रताप द्वारा गुजरात मार्ग पर आए दिन शाही फौज पर हमले करते और शाही सेना हमेशा डर के साये में गुजरात जाया करती।</p>
<p><strong>अकबर के 4 सन्धि प्रस्तावों को महाराणा प्रताप द्वारा ठुकरा दिया गया था।</strong> वही महाराणा प्रताप और मानसिंह के बीच अनबन पहले से चल रही थी। अकबर व्यक्तिगत रुप से महाराणा प्रताप को अपने सामने झुकता हुआ देखना चाहता था।</p>
<p><strong>मैग्जीन दुर्ग</strong> -इस दुर्ग को अकबर ने 1571-72 ई. में अजमेर में बनवाया था। इसे <strong>अकबर का किला व अकबर का दौलत खाना</strong> भी कहते हैं। अकबर ने हल्दीघाटी युद्ध की रणनीति इसी दुर्ग में बनाई थी हल्दीघाटी में मुगलों की तरफ से लड़ने वाला प्रसिद्ध इतिहासकार अब्दुल कादिर बंदायूनी था । बंदायूनी ने इस युद्ध का वर्णन बिना पक्षपात के किया है।</p>
<p>युद्ध से पहले एक दिन बंदायूनी अकबर के कक्ष में गया और अकबर से कहा "<strong>शहंशाह, मैं जंग के बाद राजपूतों के खून से अपनी दाढ़ी रंगना चाहता हूँ , अगर आपकी इजाजत हो तो ?"बंदायूनी लिखता है "शहंशाह ने मुझे इजाजत के साथ-साथ खुशी से 56 अशर्फियाँ भी दीं।</strong> " अब्दुल कादिर बदायूंनी ने शैख अब्दुल नबी से विदा ली, तब अब्दुल नबी ने उससे कहा कि "जब दोनों फौजों में जंग हो तब मुझे भी याद रखना और मेरी तरफ से भी दुआ मांगना। ऐसे वक्त मुझे भूलना मत। "बंदायूनी ने फातिहा पढ़ा और हथियार-घोड़ा लेकर निकल पड़ा।</p>
<p>बंदायूनी ने इस युद्ध को "<strong>गोगुन्दा का युद्ध</strong>" कहा जबकि अबुल फजल ने इस युद्ध को "<strong>खमनौर का युद्ध</strong>" कहा है। अक्सर एक गलतफहमी है की इस युद्ध का नाम हल्दीघाटी होने से ये समझ लिया जाता है कि ये युद्ध हल्दीघाटी में ही हुआ। हल्दीघाटी में तो महाराणा प्रताप ने छापामार युद्ध लड़े थे, लेकिन हल्दीघाटी का युद्ध खमनौर में हुआ था । महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी से होकर ही खमनौर में प्रवेश किया था।</p>
<p>अमरकाव्य, राजप्रशस्ति और यहां तक की महाराणा प्रताप की तरफ से युद्ध में भाग लेने वाले चारण कवि रामा सांदू ने भी ये युद्ध खमनौर में ही होना लिखा है। दरअसल मानसिंह ने हल्दीघाटी में प्रवेश किया ही नहीं, क्योंकि वह जानता था कि हल्दीघाटी जैसी दुर्गम घाटी में मेवाड़ से जीतना मुमकिन नहीं। मानसिंह ने हल्दीघाटी से ठीक पहले खमनौर में ही महाराणा प्रताप का इन्तजार किया था ।खमनौर में जिस स्थान पर युद्ध हुआ, वो जगह समतल थी और<strong> रक्त तलाई</strong> के नाम से मशहूर हुई । कर्नल जेम्स टॉड ने इस युद्ध को "<strong>मेवाड़ की थर्मोपल्ली</strong>" कहा है।</p>
<p>महाराणा प्रताप की तरफ से इस युद्ध में जिन्दा बचने वाले चारण कवियों में प्रमुख <strong>रामा सांदू </strong>व<strong> गोरधन बोगस</strong> थे, जिन्होंने इस युद्ध का कुछ वर्णन किया है । चारण कवियों का काम लड़ना नहीं था, पर जब ये लोग युद्धभूमि में जाते थे, तो वहां भी अपने शौर्य और बलिदान से बड़ा नाम कमाते ।</p>
<p>मांडलगढ़ में मानसिंह 2 माह (मध्य अप्रैल से मध्य जून) तक रुका रहा।</p>
<p><strong>इन्हीं 2 महिनों में हुई कुछ घटनाएँ घटित हुई जो इस तरह हैं -</strong></p>
<p>महाराणा प्रताप के बहनोई <strong>शालिवाहन तोमर</strong> सबसे पहले मानसिंह के नेतृत्व में आने वाली मुगल फौज के पड़ाव की खबर लेकर महाराणा प्रताप के पास पहुंचे। महाराणा प्रताप राजा रामशाह तोमर के घर पहुंचे और सभी सामन्तों को भी वहीं बुलाकर सलाह-मशवरा किया गया। इस सभा में <strong>बड़ी सादड़ी के झाला बींदा/मानसिंह, महाराणा के मामा जालौर के मानसिंह सोनगरा, देलवाड़ा के झाला मानसिंह, राव संग्रामसिंह, सरदारगढ़ के भीमसिंह डोडिया, बिजौलिया के डूंगरसिंह पंवार, शेरखान चौहान, सेढू महमूद खां, पत्ता चुण्डावत के पुत्र कल्याण सिंह, आलम राठौड़, नंदा प्रतिहार, नाथा चौहान, हरिदास चौहान, दुर्गादास, प्रयागदास भाखरोत, कूंपा के पुत्र जयमल, मंत्री भामाशाह</strong> आदि उपस्थित थे।</p>
<p>राजा रामशाह तोमर ने प्रस्ताव रखा कि मुगलों से खुले में युद्ध लड़ना ठीक न रहेगा। सभी सामन्तों समेत महाराणा प्रताप ने भी इस प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि मुगल फौज का नेतृत्व मानसिंह कर रहा था। यहां अकबर की रणनीति काम आई कि मानसिंह को सेनापति बनाने के बाद महाराणा प्रताप को सामने आना ही होगा। इस पर महाराणा प्रताप ने कहा कि क्यों न सीधे मांडलगढ़ पर ही हमला कर दिया जावे?</p>
<p>सभी ने ये प्रस्ताव भी स्वीकार नहीं किया। (इस सभा कि जानकारी '<strong>राणा रासौ</strong>' ग्रन्थ से ली गई है)अबुल फजल इस घटना को कुछ इस तरह लिखता है -"मानसिंह बादशाही फौज के साथ मांडलगढ़ पहुंचा | राणा ने गुरुर में आकर बादशाही लश्कर का ख्याल न करके मानसिंह को अपना मातहत जमींदार समझते हुए मांडलगढ़ पर हमला करने का इरादा किया, पर उसके खैरख्वाहों ने उसे ऐसा करने से रोक दिया। "</p>
<p>महाराणा प्रताप का साथ देने के लिए राजा रामशाह तोमर के नेतृत्व में 300 तोमर वीर भी थे।<strong> इनके खर्च के लिए महाराणा प्रताप राजा रामशाह तोमर को प्रतिदिन 800 मुद्राएं प्रदान करते थे।</strong> सभी ग्रन्थों में राजा रामशाह तोमर का नाम बड़े ही आदर से लिया गया है । ये पाण्डवों के वंशज थे ।</p>
<p>महाराणा प्रताप ने गोगुन्दा व उसके आसपास की जमीने उजाड़ दी, फसलें खत्म कर दीं, नागरिकों को कुम्भलगढ़ व दूसरे स्थानों पर भेजकर जगह खाली करवाई, ताकि मुगल फौज को रसद वगैरह ना मिल सके व मेवाड़ के नागरिक मुगलों के अत्याचारों से बच सकें। मानसिंह अपने 1000 सैनिकों के साथ मेवाड़ के जंगलों में शिकार के लिए निकला और अनजाने में वह महाराणा प्रताप के पड़ाव के नजदीक पहुंच गया था। <br />एक भील गुप्तचर ने महाराणा प्रताप को इस बात की सूचना दी। महाराणा प्रताप के पास मानसिंह को पराजित करने का सुनहरा अवसर था। सभी सामन्तों ने मानसिंह पर हमला करने का प्रस्ताव रखा। पर बड़ी सादड़ी के झाला मान/बींदा ने कहा कि हम मानसिंह को धोखे से नहीं हरा सकते है,ये राजपूती मान खिलाफ बात होगी। महाराणा प्रताप ने भी झाला मान की इस बात पर सहमति जताई।</p>
<p>महाराणा प्रताप सेना सहित कुम्भलगढ़ से गोगुन्दा पधारे। फिर वे गोगुन्दा से रवाना हुए और खमनौर से 10 मील दक्षिण-पश्चिम में लोसिंग (ढाणा) गाँव में पहुंचे और फिर महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी दर्रे पर अपने 3000 सैनिकों को जमा किया। हल्दीघाटी दर्रे से एक बार में केवल 1-2 व्यक्ति ही जा सकते थे।</p>
<div class="gmail_default"><strong>नोट&nbsp;: उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</strong></div>
<div class="gmail_default">&nbsp;</div>
<div class="gmail_default"><strong>Disclaimer</strong> :​All the information on this website is published in good faith and for general information purpose only. www.newsagencyindia.com does not make any warranties about the completeness, reliability and accuracy of this information. Any action you take upon the information you find on this website&nbsp; www.newsagencyindia.com&nbsp;, is strictly at your own risk.&nbsp; www.newsagencyindia.com&nbsp;will not be liable for any losses and/or damages in connection with the use of our website.</div>
<div class="gmail_default">&nbsp;</div>
<img src="https://megaportal.in/media/1744/zzzz.jpg" alt="" /></div>
</div>
</div>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/maharana-pratap-was-great-warrior						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/maharana-pratap-was-great-warrior </guid>
					<pubDate>Thu, 09 May 2024 09:56:02 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						महाराणा प्रताप के डर से ले गया अकबर अपनी राजधानी लाहौर, प्रताप की मौत की ख़बर पर छलक आये थे अकबर के आँसू						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>महाराणा प्रताप सिंह उदयपुर, मेवाड में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है।उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया।महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था। महाराणा प्रताप की माता का नाम जयवंता बाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था।राणा उदयसिंह केे दूसरी रानी धीरबाई जिसे राज्य के इतिहास में रानी भटियाणी के नाम से जाना जाता है, यह अपने पुत्र कुंवर जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी। प्रताप केे उत्तराधिकारी होने पर इसकेे विरोध स्वरूप जगमाल अकबर केे खेमे में चला जाता है। महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक मेंं 28 फरवरी, 1572 में गोगुन्दा में होता हैै, लेकिन विधि विधानस्वरूप राणा प्रताप का द्वितीय राज्याभिषेक 1572 ई. में ही कुुंभलगढ़़ दुुर्ग में हुआ, दूूूसरे राज्याभिषेक में जोधपुर का राठौड़ शासक राव चन्द्रसेेन भी उपस्थित थे।</p>
<p>1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 20000 राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80000 की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने अपना अश्व (घोड़ा)दे कर महाराणा को बचाया। उनके प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें 17000 लोग मारे गए।मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था,इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गये, इसी क्रम में मानसिंह (1573 ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में )तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे,लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश ही किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और हमें हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध देखने को मिला ।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p><strong><span style="color: #ba372a;">हल्दीघाटी का युद्ध</span></strong></p>
<p>ये युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- हकीम खाँ सूरी। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया था । इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह' 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गए ।</p>
<p>इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजयी नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए।अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर ऐसा है नहीं,ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।</p>
<p><strong><span style="color: #ba372a;">दिवेेेेर का युुद्ध</span></strong></p>
<p>राजस्थान के इतिहास 1582 में दिवेर का युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण कर्नल जेम्स टाॅड ने इस युद्ध को "मेवाड़ का मैराथन" कहा ।</p>
<p><strong><span style="color: #ba372a;">सफलता और अवसान</span>:</strong></p>
<p><strong>1579 से 1585 तक पूर्व</strong> उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह को दबाने में उलझा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने 1585 में मेवाड़ से मुगलो से मुक्ति के प्रयत्नों को और भी तेज कर लिया। महाराणा की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया ,उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था ,पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत 1585 में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए,परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई।</p>
<p>&nbsp;</p>
<p>महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सीधारणे के बाद पुनः आगरा ले आया।'एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।</p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>महाराणा प्रताप सिंह के मृत्यु पर अकबर की प्रतिक्रिया</strong></span></p>
<p>अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था,लेकिन उनकी यह लड़ाई कोई व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम नहीं थी, हालांकि अपने सिद्धांतों और मूल्यों की लड़ाई थी। एक तरह अकबर जो अपने क्रूर साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था,दुसरी तरफ महाराणा प्रताप थे जो अपनी भारत मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जानता था कि महाराणा जैसा वीर कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आंसू आ गए।महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के समय अकबर लाहौर में था और वहीं उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है।अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है:-</p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी</strong></span></p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी</strong></span></p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली</strong></span></p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी</strong></span></p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी</strong></span></p>
<p><strong>अर्थात हे ! गहलोत राणा प्रतापसिंह ,आपकी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निश्वास के साथ आंसू टपकाए। क्योंकि आपने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया। आपने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि आप अपना आडा यानि यश या राज्य तो गवां गये लेकिन फिर भी आपने अपने राज्य की धूरी को बांए कंधे से ही चलाते रहे। आपकीं रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही आप खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गये। आप कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहे और आपका रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा। इसलिए मैं कहता हूं कि आप सब तरह से जीत गये और बादशाह हार गया।</strong></p>
<p>अकबर द्वारा गुजरात की विजय के बाद मेवाड़ ने फिर से ध्यान आकर्षित किया। वह पूरी तरह से जानता था कि मेवाड़ समस्या का समाधान किए बिना उसके अन्य राजपूत राज्यों के साथ गठबंधन स्थिर नहीं हो सका। संयोग से उसी वर्ष (1572) राणा उदय सिंह की मृत्यु हो गई और थोड़े समय के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई हुई। राणा प्रताप गोगुन्दा में मेवाड़ के शासक के रूप में सफल हुए। शीघ्र ही बाद में उन्होंने अपनी राजधानी को कुंभलगढ़ नामक एक बहुत सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर दिया।</p>
<p>मेवाड़ को अकबर ने लगातार आधीनता स्वीकार करने के लिए उन्हीं शर्तों पर मुगलों की अधीनता में शामिल करने को कहा जो अन्य राजपूत सरदारों को पेश की गई थी। सितम्बर 1572 को राणा प्रताप के दरबार में जलाल खान कुरची अकबर के दूत बनकर आये पर वह प्रताप को मुगलों के अधिपत्य को स्वीकार करने के लिए समझाने में नाकाम रहे और निराश होकर लौटे। अकबर के दूत राजा यार सिंह जो 1573 में भेजे गए थे वो भी वांछित परिणाम प्राप्त करने में विफल रहे। अक्टूबर 1573 में अकबर ने प्रताप को लुभाने मुगल में अग्रणी राजपूत राजा भगवंत दास कच्छवाहा प्रमुख और को भेजने का एक और प्रयास किया।अकबर चाहता था कि महाराणा प्रताप अकबर के दरबार में व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज़ कर मित्रता का हाथ पकड़ दासता स्वीकार कर ले । व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत करने के लिए प्रताप की अनिच्छा भगवंत दास और अकबर के सन्देश की शर्तों को खारिज कर दिया। अकबर राणा प्रताप की व्यक्तिगत उपस्थिति पर जोर देते थे। दूतो द्वारा किए गए असफल प्रयासो के बाद अकबर का रवैया और सख्त हो गया था और फिर फलस्वरूप मान सिंह की कमान के तहत एक शक्तिशाली सेना को राणा प्रताप को दंडित करने के लिए भेजा गया। युद्ध योजना की निगरानी हेतू अकबर सम्राट 1576 को व्यक्तिगत रूप से अजमेर गए थे पर जैसा कि सर्वविदित है कि मुगल सेना राजपूत सेना पर भारी पड़ी और राणा प्रताप 1576 में हल्दीघाटी के युद्ध के बाद कोलियारी ठिकाने पर आ गए और एक पहाड़ी शहर में शरण ली। इसके बाद सम्राट अकबर राजधानी आगरा लौट गए । राणा प्रताप पर अपनी चोटों से उबरने के बाद कुंभलगढ़ लौट आए अपने खोए हुए भू भाग को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया। मुगलों के खिलाफ राजपूत प्रमुखों के एक समूह का एक गठबंधन करने में उन्होंने सफलता प्राप्त की । प्रताप की इन शत्रुतापूर्ण गतिविधियों का पता अकबर को व्यक्तिगत रूप से अजमेर में ही चल गया और भगवंत दास और मान सिंह को उनके और अन्य के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मेवाड़ की और भेजा। अजमेर में सम्राट अकबर की उपस्थिति मजबूत थी और सैन्य कार्रवाई के वांछित परिणाम आ सकते थे। उधर ईडर और सिरोही के शासको ने एक के बाद एक कर अकबर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और मुग़ल अधिपत्य स्वीकार कर लिया। साथ ही राणा प्रताप को भी गोगुन्दा से भागने के लिए मजबूर किया गया था और वे शाही अधिकार को तब तक टालते रहे जब तक कि उनकी 1597 में मृत्यु हो गई लेकिन मेवाड़ राजपूताना में पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया था । हालांकि कई महत्वपूर्ण सैन्य कमांडर जैसे भगवंत दास (1577) , शाहबाज़ खान कम्बोह (1577),अब्दुर रहीम खान-इकन (1580) और राजा जगमीमथ (1584 ) को उनके खिलाफ भेजा गया लेकिन वे राणा को शाही सेवा में शामिल होने के लिए मजबूर करने में विफल रहे। उन्होंने चावंड में एक नई राजधानी की नींव भी रखी।1597 में उनके बड़े बेटे और उत्तराधिकारी ने अमर सिंह की मृत्यु के बाद कुछ समय के लिए अपने पिता की नीति को जारी रखा। लेकिन लगातार युद्धों के कारण उनकी सैन्य शक्ति में काफी गिरावट आई और उन्होंने अपने कई क्षेत्रों को खो दिया। अमर सिंह ने इसे बेहतर बनाने के लिए कड़ी मेहनत की अपने राज्य के आंतरिक कामकाज और उसके साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश की। अगम ने 1599 में मेवाड़ पर आक्रमण शुरू किया।अकबर ने राजकुमार सलीम के साथ सेना के कमांडर राजा मान सिंह को अजमेर से मेवाड़ जाने को कहा लेकिन सलीम ने ऑपरेशन में कोई दिलचस्पी नहीं ली क्योंकि वह मुगल सिंहासन पर कब्जा करने की साजिश रचने में लगे हुआ था। बाद में उदयपुर की एक छोटी यात्रा करते हुए उन्होंने इसे पूरी तरह से राजा मान सिंह पर छोड़ दिया। इनमें मुग़ल सेनाएँ केवल अटाला में पद स्थापित करने में सफल रहीं और मोही, बागोर, माण्डल ,मांडलगढ़, चित्तौड़ और अन्य स्थानों पर मुग़ल सेना कब्ज़े में असफल रही।</p>
<p>कुछ समय बाद मान सिंह को बंगाल जाना पड़ा और उस्मान के विद्रोह के कारण सलीम ने आगरा की ओर प्रस्थान किया। 1603 में एक बार फिर अकबर ने मेवाड़ पर अभियान चलाने का फैसला किया। राजकुमार सलीम के साथ कई प्रमुख राजपूत के साथ कई प्रमुख राजपूत राजाओ के जैसे साजगरैयाथ, माधो सिंह, सादिक खान आदि) को आदेश दिया कि वे सभी 1599 में अधूरे रह गए कार्य को पूरा करने के लिए मेवाड़ की ओर चलें। लेकिन सलीम ने आदेशों का पालन करने से इनकार कर दिया। बिना किसी और इंतजार के अकबर ने खुसरू को कमान संभालने के लिए नियुक्त किया गया लेकिन अभियान नहीं चल सका। अकबर की बीमारी के बाद उनकी मृत्यु हो गयी ।</p>
<p><strong>स्पष्ट है कि अकबर अपने जीवन काल के दौरान अपने समकालीन सिसोदिया प्रमुख राणा प्रताप और अमर सिंह को पूरी तरह हराने में असफल रहे और मुगलिया सल्तनत का अधिपत्य मेवाड़ पर हो न पाया ।</strong></p>
<p>&nbsp;</p>
<p><em>उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</em></p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/afraid-of-maharana-pratap-akbar-took-his-capital-to-lahore-the-news-of-prataps-death-had-spilled-ove						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/afraid-of-maharana-pratap-akbar-took-his-capital-to-lahore-the-news-of-prataps-death-had-spilled-ove </guid>
					<pubDate>Thu, 09 May 2024 09:54:46 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						हल्दीघाटी युद्ध के बाद अगले 10 साल में मेवाड़ में क्या हुआ ?						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>इतिहास से जो पन्ने हटा दिए गए हैं,वे सब एक एक करके सामने आ रहे है। अब तक के सिस्टम ने जान बूझ कर सनातनी वीर राजाओं के सच्चे इतिहास को पाठ्यक्रम में आगे आने ही नहीं दिया है। ज्यादातर वामपंथी इतिहासकार भारतीय समृद्ध इतिहास से बेचैनी महसूस करते दिखाई देते है।</p>
<p>इतिहास में तो ये भी नहीं पढ़ाया गया है कि हल्दीघाटी युद्ध में जब महाराणा प्रताप ने कुंवर मानसिंह के हाथी पर जब प्रहार किया तो शाही फ़ौज पांच छह कोस दूर तक भाग गई थी और अकबर के आने की अफवाह से पुनः युद्ध में सम्मिलित हुई है। ये वाकया अबुल फज़ल की पुस्तक अकबरनामा में दर्ज है।</p>
<p><strong>क्या हल्दी घाटी अलग से एक युद्ध था..या एक बड़े युद्ध की छोटी सी घटनाओं में से बस एक शुरूआती घटना?</strong></p>
<p>महाराणा प्रताप को इतिहासकारों ने हल्दीघाटी तक ही सिमित करके मेवाड़ के इतिहास के साथ बहुत बड़ा अन्याय किया है। वास्तविकता में हल्दीघाटी का युद्ध , महाराणा प्रताप और मुगलो के बीच हुए कई युद्धों की शुरुआत भर था मुग़ल न तो प्रताप को पकड़ सके और न ही मेवाड़ पर अधिपत्य जमा सके। हल्दीघाटी के बाद क्या हुआ वो हम बताते हैं।</p>
<p>हल्दी घाटी के युद्ध के बाद महाराणा के पास सिर्फ 7000 सैनिक ही बचे थे और कुछ ही समय में मुगलों का कुम्भलगढ़, गोगुंदा , उदयपुर और आसपास के ठिकानों पर अधिकार हो गया था। उस स्थिति में महाराणा ने “गुरिल्ला युद्ध” की योजना बनायीं और मुगलों को कभी भी मेवाड़ में सेटल नहीं होने दिया।महाराणा के शौर्य से विचलित अकबर ने उनको दबाने के लिए 1576 में हुए हल्दीघाटी के बाद भी हर साल 1577 से 1582 के बीच एक एक लाख के सैन्यबल भेजे जो कि महाराणा को झुकाने में नाकामयाब रहे।</p>
<p>हल्दीघाटी युद्ध के पश्चात् महाराणा प्रताप के खजांची भामाशाह और उनके भाई ताराचंद मालवा से दंड के पच्चीस लाख रुपये और दो हज़ार अशर्फिया लेकर हाज़िर हुए। इस घटना के बाद महाराणा प्रताप ने भामाशाह का बहुत सम्मान किया और दिवेर पर हमले की योजना बनाई। भामाशाह ने जितना धन महाराणा को राज्य की सेवा के लिए दिया उस से 25 हज़ार सैनिकों को 12 साल तक रसद दी जा सकती थी। बस फिर क्या था..महाराणा ने फिर से अपनी सेना संगठित करनी शुरू की और कुछ ही समय में 40000 लडाकों की एक शक्तिशाली सेना तैयार हो गयी।</p>
<p>उसके बाद शुरू हुआ हल्दीघाटी युद्ध का दूसरा भाग जिसको इतिहास से एक षड्यंत्र के तहत या तो हटा दिया गया है या एकदम दरकिनार कर दिया गया है। इसे बैटल ऑफ़ दिवेर कहा गया गया है।</p>
<p>बात सन १५८२ की है, विजयदशमी का दिन था और महराणा ने अपनी नयी संगठित सेना के साथ मेवाड़ को वापस स्वतंत्र कराने का प्रण लिया। उसके बाद सेना को दो हिस्सों में विभाजित करके युद्ध का बिगुल फूंक दिया। एक टुकड़ी की कमान स्वंय महाराणा के हाथ थी दूसरी टुकड़ी का नेतृत्व उनके पुत्र अमर सिंह कर रहे थे।</p>
<p>कर्नल टॉड ने भी अपनी किताब में हल्दीघाटी को Thermopylae of Mewar और दिवेर के युद्ध को राजस्थान का मैराथन बताया है। ये वही घटनाक्रम हैं जिनके इर्द गिर्द आप फिल्म 300 देख चुके हैं। कर्नल टॉड ने भी महाराणा और उनकी सेना के शौर्य, तेज और देश के प्रति उनके अभिमान को स्पार्टन्स के तुल्य ही बताया है जो युद्ध भूमि में अपने से 4 गुना बड़ी सेना से यूँ ही टकरा जाते थे।</p>
<p>दिवेर का युद्ध बड़ा भीषण था, महाराणा प्रताप की सेना ने महाराजकुमार अमर सिंह के नेतृत्व में दिवेर थाने पर हमला किया। हज़ारो की संख्या में मुग़ल, राजपूती तलवारो बरछो भालो और कटारो से बींध दिए गए।</p>
<p>युद्ध में महाराजकुमार अमरसिंह ने सुलतान खान मुग़ल को बरछा मारा जो सुल्तान खान और उसके घोड़े को काटता हुआ निकल गया।उसी युद्ध में एक अन्य राजपूत की तलवार एक हाथी पर लगी और उसका पैर काट कर निकल गई।</p>
<p>महाराणा प्रताप ने बहलोलखान मुगल के सर पर वार किया और तलवार से उसे घोड़े समेत काट दिया। शौर्य की ये बानगी इतिहास में कहीं देखने को नहीं मिलती है। उसके बाद यह कहावत बनी की मेवाड़ में सवार को एक ही वार में घोड़े समेत काट दिया जाता है।ये घटनाये मुगलो को भयभीत करने के लिए बहुत थी। बचे खुचे ३६००० मुग़ल सैनिकों ने महाराणा के सामने आत्म समर्पण किया।</p>
<p>दिवेर के युद्ध ने मुगलो का मनोबल इस तरह तोड़ दिया की जिसके परिणाम स्वरुप मुगलों को मेवाड़ में बनायीं अपनी सारी 36 थानों, ठिकानों को छोड़ के भागना पड़ा, यहाँ तक की मुगल कुम्भलगढ़ का किला तक रातो रात खाली कर भाग गए।</p>
<p>दिवेर के युद्ध के बाद प्रताप ने गोगुन्दा , कुम्भलगढ़ , बस्सी, चावंड , जावर , मदारिया , मोही , माण्डलगढ़ जैसे महत्त्वपूर्ण ठिकानो पर कब्ज़ा कर लिया। इसके बाद भी महाराणा और उनकी सेना ने अपना अभियान जारी रखते हुए सिर्फ चित्तौड़ को छोड़ के मेवाड़ के सारे ठिकाने/दुर्ग वापस स्वतंत्र करा लिए।</p>
<p>अधिकांश मेवाड़ को पुनः कब्जाने के बाद महाराणा प्रताप ने आदेश निकाला की अगर कोई एक बिस्वा जमीन भी खेती करके मुसलमानो को हासिल (टैक्स) देगा , उसका सर काट दिया जायेगा। इसके बाद मेवाड़ और आस पास के बचे खुचे शाही ठिकानो पर रसद पूरी सुरक्षा के साथ अजमेर से मगाई जाती थी।</p>
<p>दिवेर का युद्ध न केवल महाराणा प्रताप बल्कि मुगलो के इतिहास में भी बहुत निर्णायक रहा। मुट्ठी भर राजपूतो ने पुरे भारतीय उपमहाद्वीप पर राज करने वाले मुगलो के ह्रदय में भय भर दिया। दिवेर के युद्ध ने मेवाड़ में अकबर की विजय के सिलसिले पर न सिर्फ विराम लगा दिया बल्कि मुगलो में ऐसे भय का संचार कर दिया की अकबर के समय में मेवाड़ पर बड़े आक्रमण लगभग बंद हो गए।</p>
<p>इस घटना से क्रोधित अकबर ने हर साल लाखों सैनिकों के सैन्य बल अलग अलग सेनापतियों के नेतृत्व में मेवाड़ भेजने जारी रखे लेकिन उसे कोई सफलता नहीं मिली। अकबर खुद 6 महीने मेवाड़ पर चढ़ाई करने के मकसद से मेवाड़ के आस पास डेरा डाले रहा लेकिन ये महाराणा द्वारा बहलोल खान को उसके घोड़े समेत आधा चीर देने के ही डर था कि वो सीधे तौर पे कभी मेवाड़ पे चढ़ाई करने नहीं आया।</p>
<p>ये इतिहास के वो पन्ने हैं जिनको दरबारी इतिहासकारों ने जानबूझ कर पाठ्यक्रम से गायब कर दिया है,जिन्हें अब वापस करने का प्रयास किया जा रहा है।</p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/what-happened-in-mewar-in-the-next-10-years-after-the-haldighati-war						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/what-happened-in-mewar-in-the-next-10-years-after-the-haldighati-war </guid>
					<pubDate>Sat, 22 Apr 2023 18:38:16 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						भगवान बिरसा मुंडा की सच्ची विरासत						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>हर साल, बिरसा मुंडा की जयंती 09 नवंबर को मनाई जाती है।उनके अनुयायियों द्वारा उन्हें भगवान बिरसा मुंडा भी कहा जाता है। कई वामपंथी और 'चर्च विश्वदृष्टि के बौद्धिक उत्तराधिकारी हड़पने की कोशिश करते हैं। उनकी विरासत और आदिवासियों को गैर-हिंदुओं के रूप में भी प्रोजेक्ट करते हैं। वे आसानी से इस तथ्य को छुपाते हैं कि भगवान बिरसा मुंडा, जो शुरू में एक मिशनरी स्कूल में शिक्षित हुए, बाद में चर्च और ईसाई धर्म से मोहभंग हो गए थे।</p>
<p>भगवान बिरसा मुंडा वास्तव में अंग्रेजों द्वारा मारे गए थे क्योंकि वह आदिवासियों के बीच ईसाई धर्म के प्रसार के लिए खतरा थे और उन्होंने आदिवासियों के शोषण को चुनौती दी थी। विडंबना यह है कि आज उनकी हत्या के लिए जिम्मेदार ताकतें भगवान बिरसामुंडा की विरासत के ध्वजवाहक के रूप में खुद को पेश करके उनकी विरासत को हथियाने और आदिवासियों को मूर्ख बनाने की कोशिश कर रही थीं। ऐसा करने में, वे आसानी से इस तथ्य को छिपाते हैं कि एक वैष्णव प्रचारक, आनंद पंते ने ईसाई धर्म को त्यागने के बाद भगवान बिरसा को सलाह दी थी। भगवान बिरसा ने भगवदगीता, रामायण और महाभारत भी पढ़ी थी,जिससे उनका आध्यात्मिक परिवर्तन हुआ। उनके अनुयायियों ने उन्हें भगवान के 'अवतार' के रूप में देखा, जो सनातन धर्म की एक गहन विशेषता है।</p>
<p>बिरसा मुंडा पर एक किताब (गोपी कृष्ण कुंवर द्वारा लाइफ एंड टाइम्स ऑफ बिरसा मुंडा) बताती है कि उन्होंने 1899 के विद्रोह से पहले रांची के पास जगन्नाथ मंदिर में प्रार्थना की थी। 1895 में, उन्होंने बिरसैट नामक एक धार्मिक आंदोलन/ संप्रदाय की शुरुआत की, जिसमें सनातन धर्म के साथ कईसमानताएं थीं (इसे सनातन धर्म के कई संप्रदायों में से एक भी माना जा सकता है) और भगवान बिरसा अक्सर महाभारत और रामायण से उद्धृत होते हैं। अपने सनातनी वंश के स्पष्ट प्रतिबिंब में, उन्होंने आदिवासियों को ईसाई धर्म छोड़ने के लिए प्रोत्साहित किया; मांस, शराब, खैनी, बीड़ी का प्रतिबंधित सेवन,प्रतिबंधित गोहत्या; मितव्ययी जीवन जीने की अपील की; जादूटोना का विरोध किया; और जनेऊ धारण करने का आह्वान किया। कितने आधुनिक समय के निहित स्वार्थ, जो अपने निहित स्वार्थों को आगे बढ़ाने के लिए केवल भगवानबिरसा के नाम का उपयोग करते हैं, इन किरायेदारों का अनुसरण करने के इच्छुक थे ? सनातन धर्म के साथ भगवान बिरसा के घनिष्ठ संबंध को छिपाकर वे क्या हासिल करना चाहते थे।</p>
<p>उनकी उसी रणनीति के एक हिस्से के रूप में (भ्रमित-मूल धार्मिक पहचान के बारे में, कन्विंस-अपनी मूल धार्मिक पहचान को छोड़ने और गैर-सनातनी धर्मों में कनवर्ट करने के बारे में), आदिवासी विरोधी ताकतों की रणनीति हमेशा आदिवासियों को अलग-थलग करने की रही है, जिन्होंने सनातन की सबसे बड़ी ताकत, सनातन से और इस तरह उनकी सांस्कृतिक/ धार्मिक जड़ों को कमजोर कर देता है और उन्हें अन्य धर्मों में धर्मांतरण के लिए प्रेरित करता है। भारतीय आदिवासियों को इस साजिश को समझना और नाकाम करना होगा।</p>
<p> </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/true-legacy-of-bhagwan-birsa-munda						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/true-legacy-of-bhagwan-birsa-munda </guid>
					<pubDate>Wed, 30 Nov 2022 20:51:43 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						क्या है उदयपुर के सहस्त्र बाहु (सास-बहू मंदिर )का इतिहास						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>राजस्थान उदयपुर जिले में नागदा में सास बहू नाम से प्राचीन मंदिरों का समूह है। नागदा मेवाड़ के ईष्ट एकलिंग जी के धाम के पास ही है। मध्य में एक विशाल तालाब स्थित है।यहां के स्थानीय गुहिल शासकों के अभिलेखों में नागदा को नागद्रह कहागया है। तालाब के आखिरी छोर पर पहाड़ी की तलहटी में एक विशाल और ऊंची जगती पर सास बहू के मंदिर अवस्थित है। इनमे दो मुख्य मंदिर एवम अन्य छोटी देवकुलिकाएं है। लगभग सभी छोटे मंदिर ध्वस्त हो गए हैं। मुख्य दोनो मंदिर के गर्भगृह अंतराल और मंडप में निर्मित है। इन मंदिरों का शिखरभग्न हो चुका है। जिन्हे जीर्णोद्धार किया गया है।</p>
<p>इन मंदिरों के स्तंभ और अंदर की छत को खुदाई कर प्रतिमाओं से अलंकृत किया गया है। मंदिरों के बाहरी दीवारों पर विष्णु, शिव, पितामह, अष्ठदिकपाल आदि की भव्य प्रतिमाओं को स्थापित किया गया है। मंदिर को वातानुकूलित रखने के लिए विभिन्न ज्यामितीय आकृतियों वाली जालिकाएं बनाई गई है।</p>
<p>मंदिर के सामने विशाल तोरण द्वार निर्मित है। ये मंदिर मूल रूप से विष्णु को समर्पित रहे हैं। मंदिर में कालांतर के विभिन्न अभिलेखों में इसके जीर्णोद्धार का उल्लेख मिलता है। माना जाता है कि इल्तुतमिश के आक्रमण में इनमंदिरों को नष्ट किया गया था। सहस्रबाहु मंदिर होने का ऐसा कोई अभिलेख इस मंदिर से प्राप्त नहीं हुआ है। लोक में जिन रिश्तों में ये मंदिर निर्मित हुए वे आज भी उसी नाम से जग प्रसिद्ध हैं सास बहू के नाम से भारत में अनेक मन्दिर हैं। इनका सीधा अर्थ है: जुड़वां प्रसाद। जिसअधिष्ठान, जगती पर दो मन्दिर या निर्माण होते हैं उनको सास बहू, गुरु चेला, मामा भांजा, देवरानी जेठानी आदि नाम दिए जाते हैं। कई बार निर्माताओं के संबंध भी इसका कारण होते हैं। सहस्र बाहू जैसी कल्पना मिथ्या है और भ्रम फैलाने से ज्यादा कुछ नहीं। सहस्रबाहु मंदिर जैसी कोई परंपरा कभी नहीं रही। गुहिल रानी महालक्ष्मी और उसकी बहू हरियादेवी जो हूण राजकुमारी थी, को इन मंदिरों के निर्माण का श्रेय है। बात 10वीं सदी की हैं। (मेवाड़ का प्रारम्भिक इतिहास)</p>
<p>मेवाड़ के प्राचीन तीन मुख्य दर्शनीय मंदिरों में से एक यह सास बहू का मंदिर है जो उदयपुर के नजदीक ही है।किसी भी समय में जाकर इन मंदिरों एवम पास के एकलिंग धाम के दर्शन किए जा सकते हैं।</p>
<p>नरसिंह की दो प्रतिमाएं हैं इनमे एक प्रतिमा में भगवान् नर सिंह हिरण्यकश्यपु को जंघा पर रखकर उसके पेट को चीर कर उसका वध कर रहे, सामान्य तौर पर भगवान नरसिंह का यह रूप अन्य प्रतिमाओं और चित्रोंमें मिलता है। वहीं दुसरी प्रतिमा में भगवान् नरसिंह और हिरण्यकश्यपु दोनों लड़ते हुए प्रदर्शित है। यह स्वरूप दुर्लभ है।</p>
<p>दैनिक जीवन के क्रियाक्रलाप यथा प्रार्थना, नृत्य, गान, युद्ध, प्रेम, श्रृंगार, नायिकाओं आदि का खुबसूरत चित्रण।</p>
<p>देवालय के दाईं और बाईं दोनों तरफ प्रस्तर जालियां बनाई गई जिससे मंदिर वातानुकूलित रह सके। ऊपर स्तंभ पर भारवाहक अंकित है। जालियों के नीचे प्रतिमाओं का विग्रह है जिसमे गरुडवाही विष्णु मुख्य देव के रूप में विराजित हैं।</p>
<p>मंदिरों में भव्य एवम कलात्मक प्रतिमाएं स्थापित है। इन मूर्तियों में उमा महेश्वर, बैकुंठ विष्णुइंद्र, अग्नि, यम और भैरव की मूर्तियां आकर्षण का केंद्र है।</p>
<p>Source :@Modified_hindu9</p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/what-is-the-history-of-udaipurs-sahastra-bahu-or-saas-bahu-temple						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/what-is-the-history-of-udaipurs-sahastra-bahu-or-saas-bahu-temple </guid>
					<pubDate>Sat, 19 Nov 2022 08:44:12 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						देबारी दरवाज़े ने झेले कई युद्ध,वीरता और पराक्रम की कहानी है देबारी !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<div class="grid-section">
<div>
<div class="row clearfix">
<div class="col-md-12 column">
<div><img src="https://megaportal.in/media/1762/debari1.jpg" alt="" />
<h1>देबारी दरवाज़े ने झेले कई युद्ध,वीरता और पराक्रम की कहानी है देबारी !</h1>
<p><strong>3 मार्च 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद राजस्थान के राजाओं और महाराजाओं ने अपनी पैतृक सत्ता हासिल करने के लिए देबारी में मेवाड़,मारवाड़ और जोधपुर के राजा के बीच एक सन्धि हूई जिसके अनुसार राजकुमार अजीत सिंह कच्छवाहा ,राजा सवाई जयसिंह व मेवाड़ महाराणा अमरसिंह द्वितीय के मघ्य समझौता हुआ</strong>,<strong>समझौता जिसके अनुसार अजीतसिंह की मारवाड़ में, सवाई जयसिंह को आमेर मे पदस्थापित करने तथा महाराणा अमरसिंह द्वितीय की पुत्री का विवाह सवाई जयसिंह से करने एवं इस विवाह से उत्पन्न पुत्र की सवाई जयसिंह का उत्तराधिकारी घाषित करने पर सहमति हुई।</strong></p>
<p>महाराजा अजीतसिंह ने वीर दुर्गादास व अन्य सैनिको की मदद से जोधपुर पर अधिकार कर लिया और 12 मार्च, 1707 को उन्होंने अपने पैतृक शहर <strong>जोधपुर</strong> में प्रवेष किया। बाद में गलत लोंगों के बहकावे में आकर महाराजा अजीतसिंह ने वीर दुर्गादास जैसे स्वामीभक्त वीर को अपने राज्य से निर्वासित कर दिया, <strong>जहाॅ से वीर दुर्गादास दुःखी मन से मेवाड़ की सेवा में चले गये</strong> ।23 जून 1724 को महाराजा अजीतसिंह की इनके छोटे पुत्र बख्तसिंह की सोते हुए में हत्या कर दी।</p>
<p>महाराणा उदय सिंह जी ने जब सन <strong>1559</strong> में अपनी <strong>राजधानी उदयपुर</strong> बनायी तभी सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण इस देबारी दरवाजे का निर्माण करवाया था। इस दरवाजे ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। अकबर, जहांगीर और औरंगजेब के साथ मेवाड़ में युद्ध में यह दरवाजा दो बार तोड़ डाला गया था। काफी समय बाद महाराणा राज सिंह जी प्रथम ने सन 1629 और 1680 नए सिरे से दरवाजा पुनः बनवाया। उसके बाद आज तक अपनी प्राचीन वैभव की कहानी सुनाने वाले द्वार के साथ अनेक ऐतिहासिक प्रसंग घटनाएं और किंवदंतियां इस दरवाजे</p>
<img src="https://megaportal.in/media/1764/debari3.jpg" alt="" /> <img src="https://megaportal.in/media/1763/debari2.jpg" alt="" />
<p>से जुड़ी हुई है।</p>
<p>एक किवदंती यह भी है कि जिन दिनों महाराणा प्रताप अरावली की गोद में उदयपुर के पश्चिम में 15 किलोमीटर दूर उबेश्वर महादेव मंदिर के पास अपनी सेना के पुनर्गठन में लगे हुए थे तब मुगलों ने उन्हें वहीं घेरने का प्रयास किया। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। <strong>उबेश्वर महादेव</strong> का शिवलिंग बीच में से फट गया और उसमें से करोड़ों मधुमक्खियां निकली और मुगल सेना पर आक्रमण करके उसे <strong>देबारी दरवाजे</strong> के बाहर तक खदेड़ दिया। उस दिन से मधुमक्खियों ने देबारी दरवाजे पर ही अपना छत्ता बनाकर रहना शुरू कर दिया जिसे आज भी आप छत्तों के रूप में देख सकते है। एक ओर किवदंती जो कि इस बात को ओर भी प्रमाणित करते हैं वो है इस देबारी दरवाजे के नजदीक 223 वर्ष पुराना एक शिव मंदिर का होना। इस मंदिर का निर्माण महाराणा राज सिंह जी के माता जाला वंशी बसंत कूदी ने महाराणा की मृत्यु के बाद 1817 से 1819 के बीच में करवा कर, उसका नाम राजराजेश्वर महादेव रखा। देबारी दरवाजे को पुराने नाम देव बारी से भी कहा जाता है।<strong> देव बारी का अर्थ यहाँ देवताओं की खिड़की भी होता है।</strong> यहां पर मंदिर और बावडी है। जमीन से लगभग 15 फुट ऊंचाई पर बना हुआ मंदिर है और यह 20 स्तंभों पर टिका हुआ बहुत ही सुंदर मंदिर है।</p>
<p><strong>इसी मंदिर के नजदीक धर्मशाला बनी हुई थी जो 1555 में महारानी सोंगारिजी ने देबारी गेट पर एक बावड़ी और सराय (सराय / यात्रियों के लिए विश्राम गृह) का निर्माण कराया;जो खंडहर हो चुकी है।पास में ही विक्रमी संवत 1736 में जब औरंगजेब ने लड़ाई युद्ध छेड़ा था उनके विरुद्ध देबारी द्वार पर लड़े हुए युद्ध में वीरता दिखाने वाले राठौड़ गोरा सिंह जिन्हें घेर सिंह के नाम से जाना जाता है ,शहीद हो गये जिनकी याद में छतरी बनाई गयी जो अभी अच्छी हालत में नहीं है।</strong></p>
<p> </p>
<p><em><strong>इतिहासकार : जोगेन्द्र नाथ पुरोहित</strong></em></p>
<p>शोध :<strong>दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</strong></p>
<p>Email:<strong>erdineshbhatt@gmail.com</strong></p>
<div>
<div><span style="text-decoration: underline;"><strong>नोट</strong> </span>: उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</div>
<div> </div>
<div> </div>
<div><span style="text-decoration: underline;"><strong>Disclaimer</strong></span> :​ All the information on this website is published in good faith and for general information purpose only. <a href="http://www.newsagencyindia.com" target="_blank" rel="noopener" data-saferedirecturl="https://www.google.com/url?q=http://www.newsagencyindia.com&source=gmail&ust=1599836930815000&usg=AFQjCNEFstjDX9D-NG3GrOnR3qU88jI1dQ">www.newsagencyindia.com</a> does not make any warranties about the completeness, reliability and accuracy of this information. Any action you take upon the information you find on this website <a href="http://www.newsagencyindia.com" target="_blank" rel="noopener" data-saferedirecturl="https://www.google.com/url?q=http://www.newsagencyindia.com&source=gmail&ust=1599836930816000&usg=AFQjCNE8quE3gThRYpqlvdzmDJAWozE8Uw">www.newsagencyindia.com</a> , is strictly at your own risk. <a href="http://www.newsagencyindia.com" target="_blank" rel="noopener" data-saferedirecturl="https://www.google.com/url?q=http://www.newsagencyindia.com&source=gmail&ust=1599836930816000&usg=AFQjCNE8quE3gThRYpqlvdzmDJAWozE8Uw">www.newsagencyindia.com</a> will not be liable for any losses and/or damages in connection with the use of our website.</div>
</div>
<p> </p>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/history-of-debari-udaipur-mewar						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/history-of-debari-udaipur-mewar </guid>
					<pubDate>Sun, 31 Jul 2022 15:15:11 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						वीडियो : सज्जनगढ़ पर है क्या सुरंग? इतिहास और खास जानकारी आपको न होगी मालूम !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<div class="grid-section">
<div>
<div class="row clearfix">
<div class="col-md-12 column">
<div><img src="https://megaportal.in/media/1703/sajjan.jpg" alt="" />
<h1>वीडियो : सज्जनगढ़ पर है क्या सुरंग? इतिहास और खास जानकारी आपको न होगी मालूम !</h1>
<div class="video-wrapper"><iframe src="https://www.youtube.com/embed/g2mSS4wvjwY?feature=oembed" width="393" height="221" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div>
<div class="video-wrapper"><iframe src="https://www.youtube.com/embed/0teZ_JPDpm8?feature=oembed" width="393" height="221" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></div>
<p><strong>सज्जनगढ़ का नाम लेते ही रूमानी हवाओं के साथ ख़ास बेहतरीन एहसास हर उदयपुर वासी के साथ सैलानीयों का मन मोह लेता है। गर्मियों मे भी यहाँ कभी गर्मी का एहसास नहीं होता चाहे आप सज्जनगढ़ के किसी भी कमरे में बैठे हो।</strong> उदयपुर के हर कोने से नज़र आने और रात के अँधेरे में पहाड़ी पर रोशनी से नहाये दिखने पर लोग इसे हवा में लटका महल भी कह देते है। बारीश में बादलों के सज्जनगढ़ के नीचे आने के कारण इसे मानसून महल या बादल महल भी कहते है। आज ही के दिन जन्मे यानि 8 जुलाई 1859 जन्म विक्रम संवत 1916 आषाढ़ सुदी 9 को जन्मे महाराणा सज्जनसिंह के समय की ये इमारत हमें सदैव महाराणा सज्जनसिंह की याद बरकरार दिलाती रखेगी।</p>
<p>ये महाराणा अपने अल्प काल में उदयपुर को क‌ई सौगात देकर विदा हुए। जिसमें <strong>सज्जन निवास बाग (वर्तमान गुलाब बाग़), सज्जनगढ़ किला, सज्जन निवास यन्त्रनालय ,वीर विनोद इतिहास मेवाड़ गजेटियर छापाखाना</strong> जैसे कार्य सदैव उदयपुर के इतिहास में महाराणा सज्जन सिंह का नाम रोशन रखेंगे।</p>
<p>इसी श्रृंखला में महाराणा सज्जनसिंह जी के द्वारा बनवायी गयी इमारत जो आज वर्तमान समय में भी उदयपुर की महत्वपूर्ण विरासत में शुमार होती है।सज्जनगढ जिसे महाराणा ने योजनाबद्ध तरीके से तैयार करवाने का कार्य प्रारंभ <strong>1884</strong> ईस्वी में किया। यह गढ़ आज भी सैलानियों को आकर्षित करता है। महाराणा की योजना एक पहाड़ी जिसका नाम बन्सधरा है और जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई <strong>3100</strong> फिट है। यहां पर एक गढ़ को बनवाने का काम प्रारंभ किया और उद्देश्य था कि उंचाई देखते हुए सामरिक दृष्टि से यह उपयोगी हो। <strong>सज्जन सिंह जी महाराणा चाहतें थे इसकी उंचाई सात मंजिल तक हो ताकि यह एक लाईट हाउस के रूप में भी काम आ सके। इस गढ़ की ऊंचाई लगभग 1100 फिट हैं।</strong> यह वास्तु कला का अदभुत नमुना है।</p>
<p>यहां पर जनाना और मर्दाना महल बना हुआ है।सामरिक दृष्टि से अत्यंत मजबूत इस गढ़ के मुख्य द्वार से गढ़ के पीछे एक अंडर ग्राउंड वाटर टैंक बना है जो बरसाती पानी को पीने योग्य बनाकर इन विशाल टेंक में संचय करता है।<strong>इस टैंक में 1,95,500 लीटर पानी का संरक्षण होता है जो कि </strong></p>
<img src="https://megaportal.in/media/1716/sajjan7-7.jpg" alt="" /> <img src="https://megaportal.in/media/1712/sajjan7-3.jpg" alt="" /> <img src="https://megaportal.in/media/1714/sajjan7-5.jpg" alt="" /> <img src="https://megaportal.in/media/1707/sajjan4.jpg" alt="" /> <img src="https://megaportal.in/media/1704/sajjan1.jpg" alt="" /> <img src="https://megaportal.in/media/1726/zzzz.jpg" alt="" /> <img src="https://megaportal.in/media/1705/sajjan2.jpg" alt="" /> <img src="https://megaportal.in/media/1706/sajjan3.jpg" alt="" />
<p><strong>वर्तमान के 50 वाटर टैंकरों जितना पानी है। जहाँ प्रधानमन्त्री मोदी जल संरक्षण को को बढावा दे रहे है वही जल संरक्षण की पुरानी टेक्नोलॉजी और वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम का बेहतरीन सुनियोजन मेवाड के राजाओं ने 200 साल पहले ही कर लिया था और कमोबेश आप हर मेवाड़ी दुर्ग,महल,मंदिर या अन्य महलों में वाटर हार्वेस्टिंग सिस्टम कही न कहीं देख लेंगे क्योंकि राजाओं के पूर्वज इन्हे समझा गए थे अकाल का दर्द और पानी का महत्व।</strong></p>
<p>फिर गढ़ के अन्दर मुख्य होल में एक बड़ा सा <strong>दरीखाना</strong> है ,जहां पर अन्दर <strong>फव्वारो की व्यवस्था</strong> हैं और पीतल के फ़व्वारे भी ऐसे जिसमें चमक आज तक है। इसी दरीखाने में अंदर सामने पोल के नीचे <strong>सफ़ेद पत्थर के स्तंभो पर उभरे हुए फूलो की खूबसूरती</strong> देखते ही बनती है। इन्ही स्तंभो के ठीक ऊपर तीन सुन्दर नक्काशीदार गोखडें बने हुए जिसमे बीच वाला काले पत्थर का बना हुआ है और अन्य दो सफ़ेद संगमरमर से बने है। पीछे की ओर काफी बड़ा गोल दालान सा बना हुआ है।</p>
<p><strong>महत्वपूर्ण बात ये कि सज्जनगढ़ जहाँ अपने बेस से चार मंजिल ऊँचा है वही ये तीन मंजिल नीचे ओर है। नीचे की तरफ गुप्त कमरे है और दो मंजिल नीचे जाने पर अंतिम दो कमरों में पत्थरों के नीचे से गुप्त रास्ता जाता दिखता है (देखे वीडियो) लेकिन इन दोनों अंतिम कमरों में सुरंग जैसे लगने वाले इन गुप्त रास्तों को मलबे से पाट दिया गया है और ज्यादा जानकारी इस बावत न्यूज़एजेंसीइंडियाडॉटकॉम की टीम को नहीँ मिल सकी है । एक ओर महत्वपूर्ण बात ये कि इन कमरों की मंजिल की संरचना ऐसी है कि आपको नीचे जाने वाली सीढिया दिखती तक नहीं है। इसका मतलब साफ़ है कि कोई नीचे आए तो चकरा जाय कि रास्ता बंद है। अन्तिम कमरों में एक शौचालय भी जिसके पास कमरों में नीचे जाने जैसा कोई रास्ता है और इसमे मलबा पाट दिया गया है।</strong></p>
<p>आप जितना सज्जनगढ़ देखते है उसका आधा हिस्सा जनाना महल है जिसके अंदर प्रवेश करने पर सामने त्रिपोलिया और सामने गणेश देवड़ी भी है। अंदर की ओर चार मंजिला शानदार जनाना महल है जिसमे दूसरे तल पर पुलिस विभाग का वायरलेस ऑफिस भी है जिसमे एक कर्मचारी चौबीसों घंटे रहता है।</p>
<p>महाराणा सज्जनसिंह जी ने जब इस गढ़ को बनवाना प्रारम्भ किया। यह डेढ़ मंजिल तक ही बन पाया और महाराणा सज्जनसिंह का अल्पआयु में देवलोकगमन हो ग‌या। वे इसे सात मंजिल बनाना चाहते थें और इसके लिए पानी के जहाज से बेल्जियम से कांच मंगवाने की योजना थी। <br />परन्तु आकस्मिक निधन हो जाने पर बाद में महाराणा फतह सिंह जी के काल में इस योजना को छोटा कर दिया गया। कारण था दुर्ग तक दुर्गम पहुँच होना। आज भी इस दुर्ग में पहुंचना दुर्गम और कठिन है। इस गढ़ तक पहुंचने के लिए 11 विकट मोड़ पार करने पर यहां पहुंचा जा सकता है। यहां शिकार के लिए ओदीया बनी हुई है। जंगली जानवरों का यहां डेरा था। बाद में महाराणा फतह सिंह जी के काल में इस गढ़ की योजना में परिवर्तन कर यह गर्मी के मौसम में अपने आवास के रूप में परिवर्तित कर दिया।</p>
<p>सज्जनगढ़ में प्रवेश द्वार के नीचे गढ़ में एक रेस्टॉरेंट भी है जो शायद राजस्थान हेरिटेज गज़ट का उल्लंघन हो सकता है।</p>
<p>बरहाल दोस्तों जाइए और देखिये।</p>
<p><strong>सज्जनगढ़ विरासत ! विरासत उदयपुर ! अदभुत उदयपुर ! शानदार उदयपुर !शानदार मेवाड़ !</strong></p>
<p><em><strong>इतिहासकार : जोगेन्द्र नाथ पुरोहित</strong></em></p>
<p>शोध :<strong>दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</strong></p>
<p>Email:<strong>erdineshbhatt@gmail.com</strong></p>
<p> </p>
<p> </p>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/sajjangarh-untold-story-of-udaipur-by-newsagencyindia						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/sajjangarh-untold-story-of-udaipur-by-newsagencyindia </guid>
					<pubDate>Sun, 31 Jul 2022 15:13:14 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						वृतान्त : उदयपुर शहर में प्लेग होने पर जब कोई सोना खरीदने को न था तैयार !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>बात सन् 1918 मार्च महीने की है। उदयपुर शहर में यकायक चूहे मरने का सिलसिला शुरू होने लगा। उदयपुर शहर में प्लेग नामक रोग फैलना शुरू हुआ। शहरवासी शहर से पलायन करना शुरू हो ग‌ए। महाराणा ने प्लेग रोग से बचने के लिए जयसमंद चले ग‌ए। रानी जी और कवराणि कंवर जी नाहरमंगरा चली गयी। शहर में चूहों के मरने की गति तेज हो गई और अब साथ में लोग के मरने का सिलसिला शुरू हुआ। मौत ने ऐसा रौद्र रूप दिखाया कि उदयपुर की आबादी एक चौथाई रह गई।</p>
<p>शहर का ये हाल हो गया था कि सुबह 11: 00 बजे बाजार खुलते और दिन 2 :00 बजे तक सब बाजार बंद कर चलें जाते। हाथीपोल से राजमहल तक बमुश्किल से दस आदमी तक नहीं मिलते और शाम को तो एक भी आदमी नज़र नही आता। इस समय शहर में मात्र 2000 लोग रह गए थे। यह चौथी बार था जब उदयपुर में प्लेग नामक रोग आया पर ऐसा हाल कभी नहीं देखा गया। सुबह जिस आदमी से बात करते ,शाम को उसी क़ी अर्थी को कन्धा देकर साण्डेश्वर जी मे अंतिम संस्कार करना पड़ रहा था।</p>
<p>जिनके रोग से बचने के टीके लगें थे वो भी सारणेश्वर शरण (काल ग्रास ) हो ग‌ए। हाल ये हो गया कि लाशें उठाने से लोग इनकार करने लग गए। दहशत का ये हाल था कि सलूम्बर के सेठ रूप चन्द ज्योती चन्द जिनका लडका तीस बर्ष का था। सेठजी की प्लेग से जैसे ही मौत हुई</p>
<p>तुरन्त पता चलते ही सेठ जी लड़का पिता की लाश हवेली में छोड़ ताला लगाकर गांव चला गया। चार दिन सेठ नहीं दिखे तो सलुम्बर रावजी ने ताला तुड़वाकर देखा तो सेठ जी मरे पड़े थें। कोई भी लाश उठाने को तैयार नहीं था । जब ये तकलीफ आई तब सब सेठों ने मिलकर एक कमेटी बनाकर चन्दा इकट्ठा कर थैला गाड़ी बनवायी जिसमें मुर्दों को डाल कर जलाने के लिए ले जाया जाता।</p>
<p>रुपये का हाल ये था की सवा आना रुपये का एक रूपया कलदार ही मिल रहा था। सोना बेचने पर कोई लेने वाला नहीं था। सोने का भाव 35 रुपए था जिसे भी अगर कोई ले रहा था तो 28 रुपये में वो भी जेवर नहीं केवल पासा। कही भी काम के लिए नौकर मिल नहीं रहे थे। जब इतिहासकार के परदादाजी कुम्भलगढ़ गए तों बेदला राव जी ने कहलवाकर एक नौकर सफर के लिए मगवाया तो उन्होंने भी मुश्किल से एक चरवाहे को भेजा था।</p>
<p>उदयपुर शहर विरान हो गया था। अनाज की किल्लत हो गयी। यह प्रकोप डेढ़ महीने तक चला और स्थिति सामान्य होने में चार महीने लग गए।</p>
<p>शहर में शायद ही ऐसा कोई घर था जहां मौत और दहशत नहीं थीं। जनसंख्या एक दम घट ग‌यी थी। बाहर के व्यापारी सामान समेट कर रवाना हो गए थे और लोगों ने पलायन कर दिया था। पर कुछ मेवाड़ी ऐसे भी थे जिन्हें अपना घर और धरती छोड़ना मंज़ूर नहीं था और अंत में वे उदयपुर मे रहकर मौत का इंतज़ार करने लगे।</p>
<p>इतिहासकार : जोगेन्द्र नाथ पुरोहित</p>
<p>शोध :दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</p>
<p> </p>
<p>Email:erdineshbhatt@gmail.com</p>
<p>नोट : उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</p>
<p> </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/udaipur-history-of-plague-in-1918						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/udaipur-history-of-plague-in-1918 </guid>
					<pubDate>Sun, 31 Jul 2022 15:12:53 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						घण्टाघर की कहानी,सगस जी मंदिर और कसौटी ऑफिस !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<div class="grid-section">
<div>
<div class="row clearfix">
<div class="col-md-12 column">
<div><img src="https://megaportal.in/media/1665/ghata.jpg" alt="" />
<h1>घण्टाघर की कहानी,सगस जी मंदिर और कसौटी ऑफिस !</h1>
<p>बात महाराणा फतह सिंह जी के समय की है। एक बार बोहरा समुदाय और महाजन समुदाय में किसी बात को लेकर विवाद हो गया और बात महाराणा तक पहुंच गयी। महाराणा ने दोनों पक्षों को सुना और बोहरा समुदाय की गलती मानते हुए जुर्माना किया। साथ ही महाजन समाज को नजराना अदा करने का आदेश दिया ।</p>
<p>फलस्वरूप जो रकम बनी उससे एक ईमारत खड़ी कर उसमें आम जन की सुविधा के लिए घड़ी लगवायी गयी। बाद में यह लेंड मार्क बना जिसे वर्तमान में भी घंटाघर के नाम से जाना जाता है। यह ईमारत नजुल सम्पत्ति की श्रेणी में आती है। सूत्रों के अनुसार इसमें लगी घड़ी ‘लन्दन’ से लाई हुई थी। घंटाघर की ऊँचाई कुछ 50 फीट के आसपास बतायी जाती है और इसके चारो तरफ चार घड़ियाँ है जो चारो दिशाओं में एक जैसा समय दिखाती है । ये शहर की पहली पब्लिक-वाच (जनता घड़ी) थी । इससे पहले उदयपुर के लोग ‘जल-घड़ियाँ’ इस्तेमाल किया करते थे, हालांकि वो ऊँचे और कुलीन वर्ग के लोगो के पास ही हुआ करती थी ।</p>
<p>इसकी प्रथम मंजिल पर मेवाड़ राज्य की तरफ से एक आदमी बैठता था और यहां एक आफिस चलता था जिसे 'कसौटी' कहा जाता था। कोई भी व्यक्ति उदयपुर में जेवर चाहे वो चांदी के हो या स्वर्ण के हो क्रेता और विक्रेता दोनों वहां उपस्थित होते तब वह सत्यापित किया जाता। इसी साख के कारण मेवाड़ के बाहर से दुर दुर से उदयपुर में जेवर खरीदने आते थे। कसौटी पर ठप्पा लगाया जाता था। ऐसी सुव्यवस्था पुरे भारत में कहीं नहीं थीं।</p>
<p>घंटाघर पर गाईड फिल्म की शूटिंग भी हुई थी। जब नायिका नायक को कहती हैं यहां सपेरों की बस्ती कहाँ है? मुझे ले चलो ! तब गाईड का अभिनय करने वाला नायक उसे यहां लाता है और एक गाना फिल्माया जाता है। आज जहां गाडियां पार्क होती हैं वहाँ बोहरा समुदाय की दुकानें थीं। यह क्षै‌‌त्र घंटाघर बोहरवाडी कहलाता था लेकिन बाद में दूकाने हटा दी गई। दुसरी मंजिल पर मेवाड़ के लोक स्थानक सगस जी वावजी का स्थान है और यहां रोज पुजा होती हैं। छट के दिन विशेष आंगी का श्रृंगार होता है। इस घड़ी के टंनकारे काफी दुर तक आज भी सुनाई देते हैं।</p>
<p>अब यह ऐतिहासिक इमारत पुर्ण रुप से अतिक्रमण से घिर चुकी है। पर्यटक यहां रूक कर इसे निहार नहीं सकते हैं। गाडियां की पार्किंग और सब्जी वाले सभी ने ईमारत को घेर रखा है। हर थोड़े से समय अंतराल में इसे संवारा जाता है रकम खर्च करी जाती है फिर तीन चार साल में दोबारा संरक्षण का काम किया जाता है। लेकिन हाल ढाक के तीन पात जैसे ही रहते है। ऐसी धरोहर को अतिक्रमण मुक्त बना कर इसके इतिहास को बोर्ड पर लिख कर लगाना चाहिए ताकि आने वाली पीढ़ी इन ताबिरो का महत्व जानकर गर्वित महसूस कर सके।</p>
<p>शोधकर्ता :<br /><strong>दिनेश भट्ट</strong><br /><br />इनपुट हेड<br /><strong>न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम</strong></p>
<p> </p>
<p style="box-sizing: border-box; font-weight: 400; font-style: normal; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; color: #000000; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial;"><strong style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;"><span style="box-sizing: border-box;">नोट</span> : उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</strong></p>
<p style="box-sizing: border-box; font-weight: 400; font-style: normal; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; color: #000000; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; font-variant-ligatures: normal; font-variant-caps: normal; letter-spacing: normal; orphans: 2; text-align: start; text-indent: 0px; text-transform: none; white-space: normal; widows: 2; word-spacing: 0px; -webkit-text-stroke-width: 0px; text-decoration-style: initial; text-decoration-color: initial;"><br /><span style="box-sizing: border-box; text-decoration: underline;"><strong style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">Disclaimer</strong></span> :​ All the information on this website is published in good faith and for general information purpose only. www.newsagencyindia.com does not make any warranties about the completeness, reliability and accuracy of this information. Any action you take upon the information you find on this website www.newsagencyindia.com , is strictly at your own risk. www.newsagencyindia.com will not be liable for any losses and/or damages in connection with the use of our website.</p>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/story-of-gantaghar-udaipur						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/story-of-gantaghar-udaipur </guid>
					<pubDate>Sun, 31 Jul 2022 15:11:14 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						उदयपुर(मेवाड़) नगर के माछला मंगरा की दुश्मन भंजक तोप जिसने मराठाओं के छक्के छुड़ाए !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<div class="grid-section">
<div>
<div class="row clearfix">
<div class="col-md-12 column">
<div><img src="https://megaportal.in/media/1576/machlaekling1.jpg" alt="" /> <img src="https://megaportal.in/media/1575/machlaekling.jpg" alt="" />
<h1>उदयपुर(मेवाड़) नगर के माछला मंगरा की दुश्मन भंजक तोप जिसने मराठाओं के छक्के छुड़ाए !</h1>
<p>अरावली पर्वत श्रंखला हमेशा उदयपुर के लिए महत्वपूर्ण रही है इसमें से खनिज पदार्थ पत्थर निकलते हैं। वर्षा जल में सहायक है। सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।इसी श्रृंखला में आधुनिक उदयपुर के बीचो-बीच एक पहाड़ी है जिसका बड़ा भारी एतिहासिक महत्व रहा है और यह उदयपुर के साथ इतिहास की भी धरोहर है। इस पहाड़ी का प्राचीन नाम मत्स्य शैल रहा है बाद में अपभरञ्श होते-होते यह माछला अर्थात् मेवाड़ी मछली का पुर्लिंग शब्द माछला रह गया। इसीलिए इसको माछला मंगरा भी कहते हैं मंगरा पहाड़ी का पुलिंग शब्द है।</p>
<p><strong>इस पहाड़ी पर एक किला एकलिंग गढ़ के नाम से मशहूर है। इस गढ़ का भी अपना इतिहास रहा है। इस गढ़ को बनवाने वाले उदयपुर के प्रधान अमरचंद वडवा नामक ब्राह्मण थे। महाराणा भीम सिंह जी के काल में यहां एक बहुत विशालकाय तोप इस गढ़ पर चढ़वायी ग‌यी। इस तोप का गोला देबारी दरवाजे तक मार करता था। मराठा आक्रमण के समय इस तोप के प्रहार से मराठा सेना को सन्धि पर मजबुर कर दिया था। उस समय आक्रमण को विफल कर दिया।बाद के समय आजादी के काल तक प्रतिदिन में रात बारह बजे तोप से गोला दागा जाता था और फिर उदयपुरी(मेवाड़) के सभी द्वार बंद कर दिए जाते।</strong></p>
<p>उस समय तक आम आदमी तक घड़ी का प्रचलन नहीं था फिर यह तोप लोगों को सचेत करने में काम आती थी जैसे कि अति वृष्टि की परिस्थिति में जब शहर में पानी बेकाबु हो जाता तो तोप का धमाका होते ही शहर मे ऊंची जगहों पर चले जाने की सुचना मानी जाती थी। इस तोप को समय पर चलाने के लिए मेवाड़ का पहला सन डायल अर्थात धुप धडी इतिहासकार जोगेंद्र सिंह के परदादा शम्भु नाथ जी ने लगाई थी। यह तोप महाराणा भूपालसिंह जी के काल तक लगातार काम करती रही।</p>
<p><strong>इस तोप का नाम दुश्मनभंजक था।</strong> यह बड़ी भारी तोप थी और आजादी के बाद यह ऐतिहासिक महत्व की तोप मानी जा सकती है इसमें कोई सन्देह नहीं है। कोई कहता है कि इसे गलवा कर काट कर बेच दिया गया। उस समय के पी डब्ल्यू डी मैनटेनेन्स सुपरवाइजर के अनुसार गढ़ की बाकी की सामग्री पी. डब्ल्यू. डी. डिपार्टमेंट में जमा कराई थी। इसके बाद यह सब प्राचीन इतिहास की सामग्री कहां गयी ? एतिहासिक विरासत की दृष्टि से महत्वपूर्ण सामान गायब हो जाना सन्देह प्रकट करता है।</p>
<p>संकलनकर्ता और इतिहासकार :<br /><strong>जोगेन्द्र पुरोहित</strong> <br />घाणेराव घाटी ,उदयपुर (राजस्थान)</p>
<p>शोध :<strong>दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</strong></p>
<p><strong>Email:erdineshbhatt@gmail.com</strong></p>
<p> </p>
<p><strong>नोट</strong> : उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</p>
<p><br /><strong>Disclaimer</strong> :​ All the information on this website is published in good faith and for general information purpose only. www.newsagencyindia.com does not make any warranties about the completeness, reliability and accuracy of this information. Any action you take upon the information you find on this website www.newsagencyindia.com , is strictly at your own risk. www.newsagencyindia.com will not be liable for any losses and/or damages in connection with the use of our website.</p>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/udaipur-history-mewar-dushamanbhanjak-top-rajasthan						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/udaipur-history-mewar-dushamanbhanjak-top-rajasthan </guid>
					<pubDate>Sun, 31 Jul 2022 15:09:12 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						हॉलीवुड मूवी 300 से ज्यादा वीरता दिखायी 23 माचातोड़ मेवाड़ी योद्धाओं ने जगदीश मन्दिर बचाने में !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<div class="grid-section">
<div>
<div class="row clearfix">
<div class="col-md-12 column">
<div><img src="https://megaportal.in/media/1579/naru.jpg" alt="" />
<p>1579 ई. तक औरंगज़ेब समूचे उत्तर भारत के मंदिरों को लूट चूका था। शहर के शहर बरबाद करता चला जाता उसका कारवाँ। उसके सिपाही न सिर्फ लूटपाट करते बल्कि राज्य की खूबसूरत महिलाओं के साथ बलात्कार करते या उन्हें बन्दी बनाकर सिपाहियों के हरम में ले जाते। सिपाहियों का हरम किसी नरक (दोज़ख ) से कम नहीं होता जहाँ बमुश्किल ही कोई सात दिन जी पाता हो ! बच्चों और आदमियों को उनके सामने पहले की मार दिया जाता वो भी वीभत्स मौत के साथ।</p>
<p><strong>1579</strong> ई.से ही औरंगज़ेब के जेहन में राजपुताना के एक ही रियासत 'मेवाड़' को रौंदने का मन था और जनवरी 1580 की तेज़ कड़कड़ाती ठण्ड में उसकी सेनाओं ने मेवाड़ की सीमा पर आकर डेरा डाल लिया। सैनिक इतने जितने मेवाड़ में नागरिक नहीं और हर मेवाड़ी योद्धा के सामने औरंगज़ेब के 10 योद्धा थे।</p>
<p>तत्कालीन शूरवीर महाराणा राजसिंह द्वारा फौजी जमावड़ा महीनों पहले से चल रहा था। उन्हें पता था कि किस तरह जनता को सबसे पहले बचाना है। <br />बादशाह औरंगज़ेब ने शहज़ादे मुहम्मद आज़म, सादुल्ला खां, इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां को उदयपुर पर हमला कर वहां के मन्दिर वगैरह तोड़ने के साथ उदयपुर को लूटने भेजा।</p>
<p><strong>महाराणा राजसिंह ने अपने जिग़र के टुकड़े को गिर्वा की पहाड़ियों पर कुँवर जयसिंह (महाराणा के पुत्र व भावी महाराणा) को तैनात कर दिया। देसूरी की नाल के इलाक़े में बदनोर के सांवलदास राठौड़ को कमान सौंपी गयी थी। बदनोर-देसूरी के पहाड़ी भाग पर विक्रमादित्य सौलंकी व गोपीनाथ घाणेराव युद्ध के लिए तैयार थे। मालवा सीमा पर मंत्री दयालदास को नियुक्त किया गया। देबारी,नाई और उदयपुर के पहाड़ी नाकों पर स्वयं महाराणा राजसिंह तैनात हुए।</strong></p>
<p>वो दिन आ ही गया जब मुगल फौज लड़ते हुए उदयपुर आ पहुंची, तो वहां इन्होंने पूरा उदयपुर खाली पाया। <br />महाराणा राजसिंह प्रजा व सेना सहित अरावली के पहाड़ों में जा चुके थे। सादुल्ला खां व इक्का ताज खां फौज समेत उदयपुर के जगदीश मंदिर के सामने पहुंचे, जो कि उदयपुर के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक था व इसको बनाने में भारी धन (उस समय के लगभग 6 लाख रूपये ) खर्च हुआ था।</p>
<p><strong>इस मंदिर की रक्षा के लिए नरू बारहठ सहित कुल 23 योद्धा तैनात थे, जिसका विवरण सुनकर आप की आँखे भीग जाएँगी। जब महाराणा राजसिंह राजपरिवार व सामंतों और जनता सहित पहाड़ों में प्रस्थान कर रहे थे तब किसी सामन्त ने महाराणा के बारहठ नरू को ताना दिया कि " जिस दरवाज़े पर तुमने बहुत से दस्तूर (नेग) लिए हैं, उसको लड़ाई के वक़्त ऐसे ही कैसे छोड़ोगे ?"</strong><br /><strong>नरू बारहठ साहब एक क्षण मौन के बाद हुंकारे - "जब तक नरु बारहठ के धड़ पर शीष रहेगा तब तक ठाकुर जी (जगदीश मन्दिर) की सीढ़िया कोई आतातायी नहीं चढ़ सकेगा। एकलिंग विजयते नमः"।</strong></p>
<p><strong>नरू बारहठ के अपने 22 साथी भी कहाँ मानने वाले थे और वे भी उनके साथ यहीं रुक गए। </strong></p>
<p><strong>पूरा उदयपुर ख़ाली था। घण्टाघर से हाथीपोल तक संन्नाटा। एक भी आदमी नहीं। यहाँ तक कि शहर के स्वानो तक को अनहोनी की आशंका हो गयी थी शायद। वो भी गायब थे लेकिन तोते और चिड़ियाओं की आवाज़े सुनसान मरघट जैसे सन्नाटे को यदा कदा चीर रही थी। </strong></p>
<p><strong>सबसे पहले नरु के साथियों ने शहर के सारे मंदिरों की पूजा की।कई शंख एक साथ ऐसे बजाये गए मानों सैकड़ो लोग रणभेरी बजा रहे हो। ठण्ड की इस रात में भी सभी की भुजाएँ फड़क रही थी। मौत का कोई खौंफ नहीं। आँखों में इतना तेज़ मानो सूरज की रश्मियाँ हो। </strong><br /><strong>निर्देशानुसार रात सभी लोग जगदीश मंदिर आ गए।</strong></p>
<p><strong>मेवाड़ (उदयपुर) के सारे दरवाजे जैसे उदयपोल,किशनपोल,एकलिंगगढ़,ब्रह्मपोल,चांदपोल,गड़िया देवरा पोल ,हाथीपोल और दिल्ली दरवाजा बंद किये जा चुके थे। लेकिन उस रात दिवाली मनायी गयी थी मेवाड़ के हर दरवाज़े पर सैकड़ो मशालें और दीप जलायें थे नरु के साथियों ने।</strong></p>
<p><strong>मुग़ल फौज इतनी खौफ़जदा थी कि उसने रात में शहर पर हमला करने की हिम्मत न की। उधर नरु और साथियों ने आखिरी आरती की जगदीश मन्दिर में। एक दूसरे को बधाइयाँ दी गयी शहीद हो जाने की ख़ुशी में। शस्त्रों की पूजा के बाद अश्वों की पूजा की गयी। </strong></p>
<p>केसरिया बाना (पगड़ी) पहने हर योद्धा इतरा रहा था। सभी मन्दिर के पीछे अपने घोड़ों के साथ मरने के लिए तैयार खड़े थे। एक ही सुर में तेज़ आवाज़े जगदीश मंदिर से पूरे शहर में गूंझ रही थी " एकलिंगनाथ की जय !जय माता दी ! हर हर महादेव। हर हर महादेव। हर मेवाड़ी योद्धा की आँखों में ख़ून उतर आया था। <br /><br /><strong>आखिर वो घडी आ गयी जब सारे दरवाजे तोड़ते हुए सुबह 9 बजे के के करीब मुगल फौज जगदीश मंदिर के पास ढलान पर भटियाणी चौहटा और घण्टाघर तक आ गयी। औरंगज़ेब के शहज़ादे मुहम्मद आज़म, सादुल्ला खां, इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां की सेना अब भी आगे बढ़ने से कतरा रही थी क्योंकि पूरा उदयपुर खाली था और रात तक शंख नाद की आवाज़े आ रही थी। हुंकारे आ रही थी।</strong> सेना के साथ शहज़ादे मुहम्मद आज़म भी किसी अनहोनी की आशंका में थे। सादुल्ला खां ने अपने खास 50 सिपाहियों की टोली को आगे टोह लेने भेजा। जगदीश चौक तक आते आते सब के सब 50 हलाक कर दिए गए। खून से सड़क लाल हो चुकी थी। रक्त बहता हुआ ढलान में मुग़ल सेना की ओर आता दिखा। मुग़ल सेना में हड़कम्प मच गया।</p>
<p><strong>स्थिति को इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां ने सम्भाला और सेना से आगे बढ़ने को कहा। तभी हर हर महादेव के नारे बुलंद हो उठे। सुनसान शहर थर्रा उठा। मंदिर की उत्तर वाले दरवाज़े (जहाँ आज स्कूल है )से एक योद्धा लड़ने के लिए बाहर आया और ऐसी गति मानों बिजली चलीं आ रही हो।</strong> केसरिया बाना पहने पहला माचातोड़ यौद्धा अपना अंतिम कर्तव्य निभाने निकल चूका था। हर हर महादेव के हुंकार और घोड़े की टाप की आवाज़ों के साथ पत्थर सड़को पर खुर ज्यादा ही आवाज़ कर रहे थे।हर माचातोड़ यौद्धा कम से कम 50 दुश्मनों को मारकर ही अपना जीवन धन्य समझता। जैसे ही एक माचातोड़ यौद्धा शहीद होता उसी समय दूसरा माचातोड़ यौद्धा ढलान मे हूंकार भरता हुआ नीचे मुग़ल ख़ेमे में घुस कर कई मुग़लो को फ़ना कर देता।ऐसे ही मंदिर से एक-एक कर माचातोड़ यौद्धा बाहर आते गए। शाम होने चली आयी थी। <br />मुग़ल सेना सदमे में डरी हुई थी और हैरान भी थी माचातोड़ यौद्धा की वीरता पर। मुग़ल सेना में माचातोड़ यौद्धा को लेकर फुस फुसाहट हो रही थी और हर कोई नए माचातोड़ यौद्धा का इंतज़ार कर रहा था। किसी को पता नहीं था ऐसे कितने ओर माचातोड़ यौद्धा अभी भी छिपे है ऊपर मन्दिर की ओर ?</p>
<p><strong>लेकिन समय और नियति पहले ही नरु बारहठ की वीरता का किस्सा लिख चुकी थी। आखिर में नरू बारहठ बाहर आए और बड़ी बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। केसरिया बाना पहने जिन्दा रहते हुए उनकी तलवार ने कई मुग़ल सिप्पसालारो को हलाक कर दिया। शीश कटने के बाद भी उनका धड़ तलवार चलाता रहा। मुग़ल सैनिक इधर उधर भागते फ़िरे। नरू बारहठ के शहीद होते ही मुग़ल सेना ने डर कर एक घण्टे ओर इंतज़ार किया। उसके बाद बादशाही फौज ने जगदीश मंदिर में मूर्तियों को तोड़कर मंदिर को तहस-नहस कर दिया। </strong></p>
<p>बाद में इनकी स्मृति में एक चबूतरा मंदिर के पास ही बनवाया गया था लेकिन बाद में किसी ने इस चबूतरे पर मजार बनवा दी।</p>
<p>बाद में दोबारा यह मंदिर बनवाया गया था। यह मन्दिर महाराणा जगत सिंह जी प्रथम ने 6 लाख रूपये लगाकर दुबारा 1652 ईस्वी में बनवाया था लेकिन औरंगजेब द्वारा नुकसान पहुंचाने पर महाराणा संग्राम सिंह ने इसे फिर दुरूस्त करवाया। आज भी जगदीश मन्दिर की बाहर तक्षण शैली की मुर्तियां खण्डित है।</p>
<p><strong>इसका निर्माण गुंगावत पंचोली कमल के पुत्र अर्जुन की निगरानी में भंगोरा वर्तमान में भगोरा सुथार गोत्र भाणा और उसके पुत्र मुकुंद की अध्यक्षता में 13 मई 1652 बैशाखी पुर्णिमा पर भव्य प्राण प्रतिष्ठा हुई।</strong></p>
<p>बाद में गुस्से मे महाराणा राजसिंह ने अपने पुत्र भीम सिंह जी को गुजरात भेजा जिसने एक बडी और तीन सौ छोटी मस्जिदो को ध्वस्त कर इसका बदला लिया। महाराणा राज सिंह मारवाड़ के अजीत सिंह के मामा थे। एक बार मुगलों से एक राजकुमारी को बचाने के लिए और एक बार औरंगजेब द्वारा लगाए गए जजिया कर की निंदा करके राज सिंह ने औरंगजेब का कई बार विरोध किया। राणा राज सिंह को मथुरा के श्रीनाथजी की मूर्ति को संरक्षण देने के लिए भी जाना जाता है, उन्होंने इसे नाथद्वारा में रखा था। कोई अन्य हिंदू शासक अपने राज्य में श्रीनाथजी की मूर्ति लेने के लिए तैयार नहीं था क्योंकि इसका मतलब मुगल सम्राट औरंगजेब का विरोध करना होगा, जो उस समय पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली व्यक्ति था। राणा को अंततः अपने ही प्रमुखों द्वारा जहर दिया गया था, जिन्हें मुगल सम्राट द्वारा रिश्वत दी गई थी।</p>
<p><strong>जगदीश मंदिर को बचाने की इस गौरव गाथा के बाद विडम्बना ही है कि इस मंदिर में आने वाले प्रतिदिन सैंकड़ों श्रद्धालुओं को इस अभूतपूर्व बलिदान की भनक तक नहीं है | मेवाड़ के दुर्ग तो दुर्ग सही, यहां का हर मंदिर राजपूतों के बलिदान की खूनी गाथा अपने अंदर समेटे हुए है।</strong></p>
<p>शोध :<strong>दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</strong></p>
<p><strong>Email:erdineshbhatt@gmail.com</strong></p>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/23-machatod-martyr-of-mewar-rajasthan-who-fought-for-jagdish-temple						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/23-machatod-martyr-of-mewar-rajasthan-who-fought-for-jagdish-temple </guid>
					<pubDate>Sun, 31 Jul 2022 15:08:43 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						चरम तानाशाह शासक था अकबर,नशे के साथ महिलाओं का था आदि !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<div class="grid-section">
<div class="row clearfix">
<div class="col-md-12 column">चरम तानाशाह शासक था अकबर,नशे के साथ महिलाओं का था आदि !
<p>अकबर एक चरम तानाशाह शासक था। अकबर की 40 से अधिक पत्नियाँ और 5000 यौन-दासियाँ थीं। इतिहास में हर समय अनचाहे नायकों के बारे में कभी नहीं कहा गया है और हमेशा कुछ ऐसा दर्शाया गया है जो प्रासंगिक नहीं था। आपको बता दें अकबर एक व्यक्ति के रूप में एक विकृत आदमी था। वह महिलाओं के प्रति कोई सम्मान नहीं दिखाता था। उन्होंने अपने सुखों के लिए महिलाओं का इस्तेमाल किया और वे एक ऐसे व्यक्ति थे, जो अन्य मंत्रियों और राजा की पत्नियों पर भी अधिकार जताते थे। उनके शासन में अफीम और अन्य दवाओं का उत्पादन और व्यापार शिखर पर था। उसकी नीति भारी कर पर आधारित थी और भूमि का अधिग्रहण उसके लिए नया नहीं था।</p>
<p>बेल्जियम के लेखक डिर्क कोलियर ने सम्राट अकबर की एक काल्पनिक आत्मकथा लिखी है, जिसे द इमर्स राइट्स शीर्षक से तथ्यों के साथ प्रकाशित किया गया है। लेखक ने बादशाह की 5,000 पत्नियों होने की बात करता है। अन्य महान मुगल सम्राटों (जहाँगीर और शाहजहाँ सहित) के विपरीत, ऐसा लगता है कि अकबर बहुत रोमांटिक आदमी नहीं थे। जब वह अनगिनत कई महिलाओं के साथ सोया था, खासकर जब वह अभी भी युवा थी, ऐसा लगता है कि उसके पास "अपने जीवन का प्यार" नहीं था। हालांकि यह अच्छी तरह से प्रलेखित है कि उनकी चचेरी बहन सलीमा सुल्ताना, जिनसे उन्होंने बैरम ख़ान की मृत्यु के बाद शादी की, स्पष्ट रूप से उनकी पसंदीदा थीं, इस तथ्य के बावजूद कि उन्होंने उन्हें कोई संतान नहीं दी। वह अत्यधिक प्रभावशाली थी, शायद अकबर की माँ से बहुत अधिक थी, और अकबर ने उसकी राय को बहुत महत्व दिया। वह बुद्धिमान, असाधारण रूप से अच्छी तरह से पढ़ी हुई और एक कुशल कवयित्री के रूप में दिखाई देती है।</p>
<p>यह बताया गया है कि अकबर के महल में 5,000 से कम महिलाएं नहीं रहती थीं,यह याद किया जाना चाहिए, हालांकि, ये यूनियन राजनीतिक रूप से प्रेरित थे, इन सबसे ऊपर: कई स्थानीय शासक अपनी बेटियों को शाही महल में भेजने के लिए उत्सुक से अधिक थे और इस तरह अपने और सम्राट के बीच एक पारिवारिक संबंध स्थापित करते थे।यह भी अच्छी तरह से प्रलेखित है, कि शाही महल की महिलाएं समाज में काफी प्रभावशाली और सक्रिय थीं। मुगल काल के कई मस्जिद, मदरसे और अन्य स्मारक वास्तव में महिलाओं द्वारा कमीशन किए गए हैं! यह भी बताया गया है कि अम्बर (अकबर की पहली हिंदू पत्नी और जहाँगीर की माँ) की राजकुमारी एक अत्यधिक चतुर व्यवसायी महिला थी, जिसने मसाले, रेशम आदि का एक सक्रिय अंतर्राष्ट्रीय व्यापार चलाया ।</p>
<p>एक बच्चे के रूप में अकबर (1542-1605) अपने माता-पिता के प्यार और देखभाल से वंचित था और नर्सों द्वारा कंधार और काबुल में उसके चाचाओं के बहुत अनुकूल घरों में नहीं लाया गया था। उनके पिता हुमायूं, मुगल सम्राट बाबर के पसंदीदा बेटे और उनकी मां, हमीदा बानो बेगम ने उन्हें और उनकी छोटी बहन बख्शी बानू को उनके चाचाओं के लिए छोड़ दिया, जब वह केवल एक साल का था। हुमायूँ ने शेर शाह सूरी (1486-1545) और अपने ही भाइयों से हारने वाले राज्य को वापस जीतने की कोशिश की। हुमायूँ ने काबुल पर एक बार से अधिक बार कब्जा कर लिया और हार गया और अकबर अपने चाचा कामरान मिर्ज़ा के साथ एक बंधक और कैदी बना रहा, जब तक कि उसके पिता ने निर्णायक रूप से 1550 में काबुल नहीं जीता था। उसने 1545 में अपने माता-पिता के साथ एक संक्षिप्त पुन: मिलन किया था।विद्रोहियों को हाथियों के पैरों तले रौंद देता था, लेकिन वह अक्सर क्षमा मांगने पर उसके खिलाफ विद्रोह करने वालों को बहाल कर देता था।</p>
<p>अकबर के पास अरबी, फारसी, संस्कृत, हिंदुस्तानी, लैटिन और ग्रीक में 24,000 पुस्तकों का पुस्तकालय था और हर शाम को पढ़ा जाता था। यद्यपि वह अपने शासनकाल की शुरुआत में रूढ़िवादी सुन्नी इस्लाम की ओर झुका, लेकिन अंततः वह अपनी धार्मिक सहिष्णुता और विचारों के संलयन के लिए प्रसिद्ध हो गया। उनके शिक्षक और रक्षक, बैरम खान, उनके प्रसिद्ध दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़ल, शिया थे और उनके दरबार में नौ ज्वेल्स में से पांच हिंदू थे।</p>
<p>अकबर केवल 13 वर्ष का था जब वह भारत का सम्राट बना और उसके पहले के कई विजय तब हुए जब वह बहुत छोटा था - अपने बिसवां दशा में। वह हमेशा सामने से नेतृत्व करता था। एक आश्चर्य की बात यह है कि एक "अप्रशिक्षित" शासक को अपनी बुद्धि और बौद्धिक जिज्ञासा मिली। वह अपने साम्राज्य का विस्तार ऐसे देश में कर रहा था जो उसके लिए उतना ही अपरिचित था जितना कि उसके बुजुर्गों के लिए। उसने विजय प्राप्त की और शासन किया।</p>
<p><strong>अकबर का एक हरम था, जिसमें सैकड़ों महिलाओं को शामिल किया गया था, कुछ को सोने, चांदी, जवाहरात, हाथी और घोड़े जैसे युद्ध जीतने के बाद लिया गया था। अन्य लोग उन आदमियों के हरम के सदस्य थे जिन्हें अकबर ने हराया था, जैसे कि मालवा के गरीब बाज बहादुर, जिनकी प्यारी रूपमती एक प्रसिद्ध सुंदरी थीं, जिन्होंने मालवा हार जाने पर खुद को जहर दे दिया था। फिर भी अन्य महिलाएं थीं, जिन्होंने राजनीतिक गठबंधनों को मजबूत करने के लिए उनके हरम में प्रवेश किया था, विशेष रूप से राजपूत शासकों के साथ या उन्हें राजकुमारों - हिंदू और मुस्लिमों द्वारा प्रतीक्षा करने के लिए भेजा गया था - जिन्होंने उनके साथ शांति बनाई थी। इन सबसे ऊपर, उसकी माँ और उसकी शाही पत्नियाँ थीं।</strong></p>
<p><strong>अकबर अपनी माँ, हमीदा बेगम से प्यार करता था, उसका सम्मान करता था और महत्वपूर्ण बात पर उसकी सलाह लेता था। आखिरकार, वह उससे केवल 15 साल बड़ी थी, जब उसकी उम्र महज 14 साल थी, तब उसकी शादी हुमायूँ से हुई थी। उनके प्रति उनके सम्मान का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई अवसर पर उन्होंने अपनी माँ की पालकी को स्वयं ढोने में मदद की। जब वह मर रही थी, तो उसने अपने विद्रोही और अदम्य बेटे, सलीम (बाद में जहाँगीर) के साथ अपने बिस्तर पर रहने के लिए अपनी यात्रा को छोड़ दिया। मरने के बाद 1604 में अकबर तबाह हो गया और शोक से त्रस्त हो गया। </strong></p>
<p><strong>"अकबर ने अपने बाल, मूंछें मुंडवा लीं ... और अपनी पगड़ी उतार दी और वेव की माला दान कर दी"। (मुहीब अली, फ्रांसिस रॉबिन्सन (2007) द मुगल एम्परर्स एंड इस्लामिक राजवंशों भारत, ईरान और मध्य एशिया में 1206-1925) के हवाले से। इसके अलावा, उन्होंने अपनी चाची गुलबदन बेगम को उच्च सम्मान में रखा, उन्हें एक कुएं पर भेजा। मक्का की तीर्थयात्रा और एक उत्सव का आयोजन किया, जब वह सात साल बाद लौटी, जिसमें उसने भाग लिया। उन्होंने उनकी सीखने और क्षमता की प्रशंसा की और उन्हें अपने पिता, हुमायूँ के जीवन और शासनकाल का एक लेख लिखने के लिए प्रोत्साहित किया, जिसके परिणामस्वरूप उस उल्लेखनीय पुस्तक, हुमायूँ नामा का जन्म हुआ।</strong></p>
<p>मुगल राजकुमारियाँ बहुत कुशल महिलाएँ थीं। 1551 में, जब वे दोनों केवल नौ साल के थे, अकबर ने अपने पहले चचेरे बहन,रुकैया सुल्तान बेगम (1542-1626) से शादी कर ली थी। शायद वह एकमात्र महिला थी जिसे वह वास्तव में प्यार करता था। हालाँकि वह निःसंतान थी, लेकिन अकबर ने हमेशा अपना सम्मान और स्नेह दिखाया और उसने उसके दरबार में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी दूसरी शाही पत्नी सलीमा सुल्तान बेगम (1539-1612) थीं, जो एक और चचेरी बहन थीं, जिनसे उन्होंने 1561 में शादी की। वह बैरम खान की विधवा थीं और उनसे तीन साल बड़ी थीं। उसने अपनी निजी लाइब्रेरी बना रखी थी और वह एक कवियत्री थी जिसने मखफी (छिपे हुए) के छद्म नाम से लिखा था। अकबर ने उसकी बुद्धिमत्ता और बुद्धिमत्ता को महत्व दिया और राज्य के मामलों में उसकी सलाह ली।</p>
<p>उसके बाद आमेर (जयपुर) के राजा भारमल की सबसे बड़ी बेटी हीर कुंवारी या हरका बाई (1542-1623) थी, जिसकी अकबर ने 1562 में शादी की और जिसे जोधाबाई के रूप में और अकबर के जीवन के महान प्रेम के रूप में गलत तरीके से महिमा मंडित किया गया। उसके बारे में यह भी कहा जाता है कि वह एक कुशल महिला थी। निश्चित रूप से, वह एक चतुर व्यवसायी थी, जो रेशम और मसालों के व्यापार में सक्रिय रूप से लगी हुई थी, जिसके स्वामित्व वाले जहाज थे जो तीर्थयात्रियों को मक्का ले जाते थे। राजपूत राजकुमारियों और अन्य महिलाओं को जिन्हें अकबर के हरम में भर्ती कराया गया था, को उनकी धार्मिक आस्था और व्यवहार को बनाए रखने की अनुमति दी गई थी, हालांकि उनमें से कुछ इस्लाम में परिवर्तित हो गईं।</p>
<p>अकबर के साम्राज्य में आम महिलाओं के बारे में क्या? सबसे पहले, महिलाओं सहित उनके साम्राज्य में सभी समुदाय, उनकी आर्थिक और सामाजिक नीतियों से प्रभावित थे। उन्होंने गैर-मुस्लिमों द्वारा किए गए तीर्थयात्राओं पर लगाए गए कर को वापस लेने के लिए ऐतिहासिक फैसले लिए, जो साम्राज्य में कमाई करने के लिए लाखों का उत्पादन करते थे और बाद में लगभग सभी मुस्लिम शासकों द्वारा गैर-मुस्लिमों पर लगाए जाने वाले कर को भी समाप्त कर दिया।</p>
<p>वह अमीर राजपुताना और उसकी प्रसिद्धि को नहीं देख सका। राजपूत के पास जो साहस था, उससे वह मुग्ध था। वह बस गए और इतनी प्रसिद्धि और शक्ति के भूखे थे कि उन्होंने राजपूत साम्राज्य को नष्ट करने का फैसला किया। उनके तथाकथित गुरु और गुरु महामंगा थे, जिन्होंने उन्हें अच्छे विश्वास की सलाह नहीं दी। वह अशिक्षित था और ज्ञान पर शून्य था। यह महामना की दुष्ट राजनीति की क्षमता थी जिसने उन्हें कुछ राजपूत साम्राज्य पर इतना नियंत्रण दिलाया। चित्तौड़ राजपूतों और राणा उदय सिंह की मुख्य राजधानी थी और परिवार को चुंडावत और डोडियाजी जैसे मेवाड़ के संरक्षकों द्वारा संरक्षित किया गया था। अकबर चित्तौड़ की भूमि को अपने सस्ते युद्ध रणनीति द्वारा कब्जा करने में सक्षम था, हालांकि वह महाराणा प्रताप सिंह और राणा उदय सिंह को कभी नहीं जीत सकता था। राजपुताना महाराणा प्रताप सिंह से युद्ध के बाद के प्रभाव ने चित्तौड़ को मुक्त करने का संकल्प लिया, जो उनके पुत्र राणा अमर सिंह ने पूरा भी किया था। मेवाड़ ने अपने 85% हिस्से को अकबर से वापस जीत लिया और इसलिए अकबर हमेशा के लिए मेवाड़ के प्रति शिथिल कर दिया गया ।</p>
<p>खैर न केवल यह अकबर दिल से इतना बड़ा पराजित था और वह एक बड़ा विकृत था। उन्होंने अपने प्रेमी के लिए अपनी खुशी को पूरा करने के लिए अपने गुरु उर्फ ​​बेहराम खान को मार डाला। दुर्भाग्यवश मुगलों द्वारा लिखे गए इतिहास ने हमेशा उन्हें एक मजबूत नेता के रूप में चित्रित किया है, लेकिन वास्तविकता में हल्दीघाटी में उन्हें बड़ा नुकसान हुआ और इस साम्राज्य वर्ष दर साल यह गिरना शुरू हुआ क्योंकि यह मानसिंह और कुछ हिंदू राजाओं जैसे देशद्रोहियों के कारण था, जिन्हें उन्होंने सुरक्षित रखा था वर्ना महाराणा प्रताप सिंह ने उसे और उसके वंश को नष्ट कर दिया होता ।</p>
<p><strong>हालांकि कई मामलों में कायर अकबर युद्ध के मैदान को छोड़कर भाग गए थे।</strong><br /><strong>याद रखें सच्चे हीरो हमेशा अनसुने होते हैं!</strong></p>
<p><strong>यह गुप्तकाल जैसे शासक नहीं थे जो वास्तव में उदार थे जैसा कि 7 वीं शताब्दी के चीनी विद्वानों ने बताया कि जिन्होंने कहा कि यहां तक ​​कि गुप्त काल में अपराधों को जुर्माना के साथ माफ कर दिया गया था। गुप्तकाल के दौरान कोई शारीरिक दंड नहीं था। पल्लवों ने इस प्रकृति को जारी रखा, उसके बाद पांड्यों ने। मुग़ल ऐसे नहीं थे। वे क्रूर थे और संभवत: इससे वे लंबे समय तक बने रहे। मुसलमानों ने भी अपने वैज्ञानिक ज्ञान को बहुत आगे नहीं बढ़ाया। उन्होंने ज्ञान का आयात किया। यह उन हिंदुओं के लिए फिर से अलग था जिन्होंने बड़े पैमाने पर शोध किया था। वास्तव में इसका श्रेय भारत के शुरुआती विश्वविद्यालयों को दिया जा सकता है जिन्हें महलों से अधिक महत्व दिया गया था।</strong></p>
<p>एक कला और वास्तुकला के दृष्टिकोण से अकबर अच्छा था क्योंकि उसने सभी विश्वास के कलाकारों को सहन किया और सभी को मुगल वास्तुकला में योगदान करने की अनुमति दी। अतः अकबर के काल से लेकर शाहजहाँ तक की मुग़ल वास्तुकला उतनी ही हिंदू थी जितनी मुस्लिम। स्तंभ नक्काशी उस तथ्य को विशेषता दे सकती है। इसके परिणामस्वरूप राजपूत वास्तुकला का विकास हुआ और साथ ही साथ मुगलों से तत्वों का झुकाव हुआ और इसके विपरीत।</p>
<p>हालाँकि हिंदुओं का प्राचीन ज्ञान मुगल राजाओं के रूप में निहित है। इसकी वजह सूफियों की है। सूफी आंदोलन ने हिंदुओं के आध्यात्मिक पहलू के साथ सामान्य आधार पाया था और उनके प्रभाव ने भारत में मुसलमानों की प्रकृति को बदल दिया।</p>
<p>राजस्थान अभी भी लगभग पूरी तरह से हिंदू था। अकबर ने राजस्थान के सत्तारूढ़ घरों में शादी करके और राजपुताना के पूर्वी किनारे पर विभिन्न किलों पर लगातार कब्जा करके क्षेत्र में घुसपैठ की। लेकिन राजस्थान के वरिष्ठ सदन, मेवाड़ के राणा ने मुगलों के साथ किसी भी गठबंधन को गर्व से मना कर दिया। अकबर की सेना ने 1567 में चितौड़ के लिए एक अभियान शुरू किया। मेवाड़ के राणा, उदय सिंह ने अपनी राजधानी छोड़ी, चितौड़ के महान किले को 8,000 राजपूतों ने एक उत्कृष्ट सेनापति, जय माल के तहत बचा लिया और खुद को और अपने परिवार को सुरक्षा के लिए पहाड़ो में शरण ली । 24 अक्टूबर 1567 को अकबर चित्तौड़ पहुँचा और चितोड़ की घेराबंदी की। अकबर की विशाल सेना का शिविर लगभग दस मील तक फैला हुआ था। अकबर ने हमले के दो तरीकों की योजना बनाई और एक 'सबट' का निर्माण किया, एक ऐसी संरचना जो हमलावर सेना को एक ऊंची दीवार का आवरण प्रदान करती है क्योंकि यह किले की दीवार की ओर 'असीम रूप से' बढ़ती है और किले के चारों ओर की नोक को कसती है। दूसरी बार खदान में अकबर के लगभग 200 आदमियों सहित कुछ प्रमुख सैनिकों ने दावा किया कि खनन एक विनाशकारी साबित हुआ। जैसे-जैसे 'सबात' का शोर कसता गया, अकबर की सेना ने किले से आग बुझाने के लिए लगभग 200 लोगों को एक दिन खो दिया। घेराबंदी के लगभग चार महीने बाद 23 फरवरी 1567 को मुगल सेना की ओर से दागे गए एक मस्कट में जय माल की मौत हो गई। अपने नेता जय मल की मृत्यु के साथ, राजपूतों ने कुछ समय के लिए अपना दिल खो दिया। मुग़ल अकबर द्वारा कब्जा किये जाने के लिए मेवाड़ की महिलाओं ने जौहर करना पसंद किया और यह चित्तौड़ के इतिहास में तीसरा जौहर था।</p>
<p>विजयी मुगल सेना ने चितौड़ के किले में प्रवेश किया। उस समय राजपूत सेना के अलावा किले पर 40,000 हिंदू किसान और कारीगर रहते थे। अकबर ने 40,000 हिन्दुओ की गणना की थी, कुछ कारीगरों को वास्तव में बख्शा गया और ले जाया गया। लेकिन कम से कम 30,000 लोगों से अकबर विशेष रूप से बदला लेने के लिए उत्सुक था। महिलाओं और बच्चों को बांधना, और उन्हें नए बंदियों की तरह मोटे तौर पर शर्मसार करने जैसे खेल खेले गए ।</p>
<p>अकबर के द्वारा चित्तौड़ में 30,000 बन्दी हिन्दुओं के नरसंहार ने उनके नाम पर एक अमिट धब्बा छोड़ दिया है। 1303 ई में किले पर कब्जा करने वाले क्रूर अला-उद-दीन खिलजी द्वारा भी इस तरह की कोई भी भयावह घटना नहीं हुई थी। अबुल फजल, अकबर के दरबारी इस कत्लेआम को सही ठहराने की कोशिश कर रहे हैं। अपने शासन के बाद के समय में, बाद में अकबर ने आगरा में अपने शाही महल के द्वार पर, हाथियों पर सवार, पट्टा और जय मल की मूर्तियाँ स्थापित की थीं। यद्यपि संभवतः उनकी वीरता के लिए एक प्रशंसा के रूप में इरादा किया गया था, लेकिन यह गलत इतिहास के लिए खुला था क्योंकि जय चंद ने अपनी बेटी संयोगिता के स्वयंवर में अपने महल (द्वारपाल के रूप में) पर पृथ्वी राज चौहान की एक समान मूर्ति रखी थी।</p>
<p>सर थॉमस रो, जो एक अंग्रेज थे, जो चितौड़ गए, उन्होंने किले को सुनसान पाया। वास्तव में यह अगली शताब्दी के दौरान मुगल नीति का एक दृढ़ सिद्धांत बना रहा, जो कि चित्तोड़ की किलेबंदी थी, जो उस समय तक सबसे मजबूत हिंदू राणा की राजधानी थी, शायद अप्रभावित रहना चाहिए, शायद उन हिंदुओं को सबक के रूप में जिन्होंने मुगलों से लोहा लेने की हिम्मत की।</p>
<p><strong>मेवाड़ के राणा प्रताप सिंह, राणा उदय सिंह के पुत्र, ने राजपूत प्रतिरोध को अकबर के लिए जिंदा रखा और चितोड़ की महिमा को पुनः प्राप्त करने का प्रयास किया।<br /></strong></p>
</div>
</div>
</div>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/akbar-and-the-women-in-his-empire						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/akbar-and-the-women-in-his-empire </guid>
					<pubDate>Sun, 31 Jul 2022 15:08:08 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						मेवाड़ में घोड़ों को भी मिलती थी पेंशन,चेटक की अविश्वसनीय कहानी !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>मेवाड़ पुराकाल से शूरवीरों की धरती रही है और यहाँ के महाराणाओं ने मरना स्वीकारा लेकिन किसी के आगे झुकना नहीं। युद्ध कौशल में निपुण इन योद्धाओं का जो सबसे बड़ा साथी हुआ करता है ऐसे जीव घोड़ों को सदैव यहाँ सम्मान से देखा जाता रहा है।</p>
<p>ऐसी एक कहानी है महाराणा प्रताप के जमाने से जुडी है। एक दिन एक सौदागर आया और उसने महाराणा उदय सिंह जी को 2 घोड़े बताए। एक का नाम ऐटक था और दुसरे का नाम चेटक। जब उदयसिह जी ने सोदागर से खासियत पुछी तब सोदागर ने दो खड्डे खुदवाकर ऐटक घोड़े के खुर उसमें डलवा कर पीघला सीसा भरवा दिया। फिर महाराणा के बहतरिन चाबुक सवार को घोड़े के एड लगाने को कहा। घोड़े ने इतनी ताकत से उछाल मारी कि उसके खुर उस गड्ढे में रह ग‌ए। तभी कुंवर प्रताप ने वह चेटक घोड़ा खरीद लिया ऐसी कथा है।</p>
<p>मेवाड़ में आज भी माणकचौक राजमहल उदयपुर में अश्व पुजन धुमधाम से होता है। यहां पर जब घोड़े बुढ़े हो जाते या बीमार हो जाते तब उन्हें सादड़ी भेज दिया जाता और राजमहलों की तरफ से दाना चारा पानी की आजीवन व्यवस्था कर दी जाती अर्थात घोड़ो को पेंशन दे दी जाती।</p>
<p>मेवाड़ में हर जाति में एक से एक अच्छे सवार हुए। इन्ही में तीन का प्रसंग है। एक जैन जाति के थे ,जो नाथ जी के नाम से राजपुताने में मशहूर थे। दुसरे शालु खां जो मुस्लिम समुदाय के थे और एक शम्भु नाथ जी (इतिहासकार के परदादा जी ) जो ब्राह्मण थे उनके बारे में मेवाड़ में मशहूर था कि घोड़ा व घड़ी शम्भु नाथ जी के मुकाबले कोई नहीं रख सकता है।</p>
<p>बात महाराणा सज्जनसिंह जी के समय से जुडी है। महाराणा एक बार पिछोला के रुण में घोड़े पर सवार होकर निकले। साथ में नाथ जी भी थे। एक खच्चर रुण में घास चर रहा था। महाराणा के साथ वालों ने कहा कि नाथ जी अगर इस खच्चर को फिरत अर्थात चाल सिखा देवे तो जाने ! नाथ जी को बात चुभ ग‌ई हालांकि महाराणा कुछ नहीं बोले। नाथ जी ने एक चाबुक सवार को चुपचाप खच्चर लाकर अपने मकान पर बांधने को कहा। छः माह बाद घोड़े बेचने वाला सौदागर आया। उस समय अमल के कांटे पर घोड़े की खरीद हुआ करती थी। वहां पर एक चबूतरे पर महाराणा विराजते और घोड़ों का मुआयना करते।</p>
<p>लेकिन इससे पहले कि महाराणा पधार कर चबूतरे पर विराजते ,नाथ जी ने पहले ही अपना तैयार किया खच्चर उस सौदागर के घोड़ों के साथ बांध दिया जब राणा पधारे तब सौदागर ने उस खच्चर की चाल महाराणा को बताई।</p>
<p>महाराणा उस खच्चर कि रेवाल चाल देख कर चकित हो कर उस सौदागर से 2000 रूपयों में उसे खरीद लिया तब उन्हें पता लगा कि यह वही खच्चर है जिसे नाथ जी ने माल मसाला खिला कर उसमें बेहतरीन फिरत डाल दी। महाराणा सज्जनसिंह जी ने उस खच्चर का नाम छोटी गुल जी रखा। महाराणा जब तफरीह अर्थात घुमने जाते तब तामझाम के बजाय उसी पर सवार होकर जाते। इस खच्चर का चित्र महलों के दिलखुशाल महल के गोखडे की दिवार पर आज भी लगा है।</p>
<p>एक बार महाराणा जयपुर गए। एक दिन शाम के समय जयपुर महाराजा महाराणा को अपने घोड़ों के बारें में बता रहे थे, तब उन्होंने नाथ जी को भी फिरत दिखाने को कहा तब वे उन्हीं घोड़ों में से एक को लेकर ग‌ए और आ ग‌ए जयपुर। तब नाथ जी ने अनुरोध किया कि आप हमारे सवार घोड़े के पैर के निशान को देखिये। जयपुर महाराजा आश्चर्य चकित हुए हो गए जब उनके सवार ने आकर कहा कि घोड़े के आने के तो निशान हैं पर जाने के नहीं अर्थात घोडा जिस चाल पर गया उन्हीं पर लौटा। तब महाराणा ने प्रसन्न होकर नाथ जी को एक बंदुक इनाम में दी ।</p>
<p>महाराणा फतहसिह जी के काल में शालु खां नाम का चाबुक सवार था। महाराणा ने नाराज होकर उसके फिरत के घोड़े छीन लिए और उसकी ढ्योडी माफ कर दी। वह यहां से वाठेडा चला गया। वहां वाठेडा राव जी के घोड़ों की देखभाल करने लगा। लेकिन वो कभी घोड़े की सवारी नहीं करता। उसने बाठेडा रावजी से एक भैंसा मांगा। उसको तैयार कर उसमे ऐसी रेवाल चाल डाल दी जैसे किसी घोड़े की होती है। एक बार जब महाराणा नाहरमगरा शिकार को जा रहे थे। वह देबारी दरवाजे के बाहर खडा हो गया और जैसे ही महाराणा की बग्घी आयी, तभी खम्मा अन्न दाता कह कर अपने जीन कसे भैंसें को बग्घी के साथ दौड़ा दिया। महाराणा यह देख कर प्रसन्न हुए कि शालु खां ने भैंसे जैसे जानवर को भी घोड़े सरीखा बना दिया और शालु खां की ड्योडी का खुलासा कर उसके हिस्से के घोड़े उसे दुबारा दे दिए।</p>
<p>एक बार जब महाराणा फतहसिह जी मेरठ घोड़े खरीदने ग‌ए। कुछ घोड़े खरीदने के बाद एक विशेष घोड़ी को खरीदने की मनाही की गयी। तब शम्भु नाथ जी ने वह घोड़ी खरीद ली। महाराणा समेत सभी ने खरीदने से मना किया लेकिन शम्भु नाथ जी ने उसे खरीद कर अपनी पुश्तैनी हवेली में बंधवा दिया। उसको दवाई के साथ खास माल मसाले खिलाये गए। नौकरों से प्रतिदिन मालिश करवायी गयी। पांच छः महीने बाद महाराणा फतहसिह जी घोड़े सवार होकर नाहरमगरा शिकार को ग‌ए तब एक खेत पर थुर की बाड देखकर उन्हें खेल सूझा। उन्होंने सभी को थुर पार घोड़ा कुदाने को कहा।</p>
<p>घुड़सवार कोशिश करते और सभी उस मेड पर जा गिरते। इसे देख फिर सभी हंसते। तब सभी ने महाराणा को कहा कि शम्भु नाथ जी को भी कहो। तब शम्भु नाथ जी ने कहा यह मेरठ वाली घोड़ी है। महाराणा ने कहा कि ठीक है तुम भी कूदा कर बताओ और शम्भु नाथ जी ने तुरन्त मेड पार घोडी कुदा दी। ये देख सभी ने तारीफ़ की।</p>
<p>महाराणा ने नाराज होकर अन्य घोड़ो वालो की जागीर जब्ती के आदेश दे दिए और कहां हम अच्छे से अच्छे नस्ल के घोड़े तुमको तैयार करने को देते है और शम्भु नाथ जी को देखो कि खारिज घोड़ी को कैसे तैयार कर बेहतरीन बना दिया। तब राजपरिवार की तरफ से इस घोड़ी के लिए चारा दाना पानी का आजीवन इंतेज़ाम किया गया। उस घोड़ी की जीन आज भी इतिहासकार के संग्रहालय में मौजूद हैं।</p>
<p>तब यह कहावत मशहूर हुई कि घोड़ा और घड़ी शम्भु नाथ जी के मुकाबले कोई नहीं रखना जानता। शम्भु नाथ जी ने ही मेवाड़ की पहली धुप घड़ी माछला मंगरा, शम्भु निवास चित्तौड़गढ़ , लेकपैलैस और इतिहासकार की हवेली में बना कर लगायी।</p>
<p>अब घोड़े की जाति के बारे में मेवाड़ी जानकारी</p>
<p> </p>
<ul>
<li>सफेद घोड़े को नीला कहते हैं।</li>
<li>सफेद घोड़े के अगर काले लाल छापे हो तो उसे कांगड़ा कहते हैं।</li>
<li>सफेद घोड़ा अगर आधा काला आधा सफेद हो तो उसे स्याह‌ अबलग कहते हैं।</li>
<li>लाल घोड़े को लाल अबलक कहते हैं।</li>
<li>काले घोड़े के चारों पैर घुटनों के नीचे नीचे सफेद हो और दोनों आंखों के बीच ललाट पर सफेद टीका हो तो उसको पंच कल्याणक कहते हैं।</li>
<li>काले घोड़े गर्दन के पास और पूँछ सफेद हो तो उसे अष्टमगल कहते हैं यह दुर्लभ होता है।</li>
<li>लाल घोड़े को कुमैद कहते हैं।</li>
<li>चमकीला लाल रंग हो तो सुरंग कहते हैं।</li>
<li>घोड़ा लाल रंग का हो और उपर छोटे छोटे कत्थ‌ई रंग के बिन्दु हो तो उसे गडा कहते हैं।</li>
<li>सभी घोड़ों में मालिक की खैरख्वाह रखने वाला अरबी घोड़ा होता है काठीयावाडी घोड़े और मारवाड़ी नस्ल के घोड़े भी बेहतरीन होते हैं। ये जन्म से ही आपचाल अर्थात तीव्र चाल वाले होते हैं। मारवाड़ी घोड़ो की एक जमाने में सभी जगह धुम थी।</li>
</ul>
<p>इतिहासकार : जोगेन्द्र नाथ पुरोहित</p>
<p> </p>
<p>शोध : दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</p>
<p>Email:erdineshbhatt@gmail.com</p>
<p> </p>
<p>नोट : उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</p>
<p> </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/story-of-chetak-horse-of-mewar						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/story-of-chetak-horse-of-mewar </guid>
					<pubDate>Sun, 31 Jul 2022 15:07:01 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						केसरियाजी ऋषभदेव मंदिर में लगी है जल घडी,मोहम्मद अली जिन्ना ने माना महाराणा का फैसला !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>उदयपुर—अहमदाबाद राष्ट्रीय राज्यमार्ग पर उदयपुर से लगभग 60 किलोमीटर दूर गांव धूलेव में जैन तीर्थंकर ऋषभदेव का मंदिर स्थित है, जिन्हें केसरियाजी या केसरियानाथ के नाम से भी जाना जाता है।</p>
<p>यह प्राचीन तीर्थ अरावली पर्वतमाला की गुफाओं के मध्य कोयल नदी के किनारे स्थित है। आसपास के क्षेत्र में मार्बल की खान है तथा मार्बल का व्यवसाय भी होता है। इस मन्दिर में मूलनायक प्रतिमा जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव की है, जो अतिप्राचीन है। यह मूलनायक प्रतिमा पद्मासन में है। इस मन्दिर में पूजा जैन धर्म के दिगम्बर मत व श्वेताम्बर मत दोनों से होती है। दोनों मतों से पूजा किये जाने हेतु अलग—अलग समय निर्धारित है। यह मंदिर न सिर्फ जैन धर्मावलंबियों, बल्कि वैष्णव हिंदुओं और मीणा व भील आदिवासियों व अन्य समुदायों द्वारा भी पूजा जाता है। ऋषभदेव को तीर्थयात्रियों द्वारा अत्यधिक मात्रा में केसर चढ़ाए जाने के कारण केसरियाजी कहा जाता है।</p>
<p>कई अलग-अलग किंवदंतियों से मंदिर की प्राचीनता का पता लगाने की कोशिश की जाती है। किंवदंतियों में से एक यह है कि एक एक आदिवासी व्यक्ति धूलाभील ने एक टीले के नीचे भगवान ऋषभदेव की मूर्ति की खोज की जहां एक कामधेनु (स्व दुधारू) गाय प्रतिदिन अपना दूध डालती थी। यह तथ्य विवादित नहीं है कि मूर्ति 1200 साल से अधिक पुरानी है। आज यह मंदिर श्वेतांबर, दिगंबर और स्थानीय भीलों की भक्ति का केंद्र है। मंदिर सभी बहुलतावाद के बारे में है- भील मूर्ति की पूजा कालाजी बावजी के रूप में करते हैं, ब्राह्मण इनको भगवान विष्णु का आठवां अवतार मानते हैं जबकि तथ्य यह है कि यह है वास्तव में जैन धर्म के तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव को समर्पित एक जैन मंदिर है। स्वामी की मूर्ति ऋषभदेव को "केसरियाजी" के नाम से जाना जाता है क्योंकि केसर (केसर) का बड़ा चढ़ावा प्रतिदिन चढ़ाया जाता है। स्थानीय भील केशरिया जी का गहरा सम्मान करते हैं और पूजा अर्पित करने के बाद ही सभी गतिविधियों को शुरू करते हैं।</p>
<p>जैन बहुलता होने के कारण महाराणा भी भगवान ऋषभदेव के भक्त बन गए और यहाँ पूजा की। एक हीरा जड़ी आंगी (कोट) भी उदयपुर के महाराज फतेह सिंहजी द्वारा भेंट की गई थी, जिसमें एक लाख रुपये की लागत आई थी। 19 वीं सदी की शुरुआत का मंदिर प्रबंधन आजादी से पहले सीधे उदयपुर के महाराणा के अधीन था। महाराणाओं के शासन समाप्त होने के बाद विवाद पैदा हुए, क्योंकि प्रशासन में सभी पक्षों ने अपना अपना दावा किया था। श्वेतांबर, दिगंबर और अन्य हिंदू समुदाय सहित भील समाज आज भी इस मंदिर को अपना मन्दिर बताता है।</p>
<p>यह माना जाता है कि मंदिर एक हिंदू मंदिर था। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में दिया कि उत्पादित सामग्री पर विचार करने के बाद 1974 में फैसला किया कि यह एक श्वेतांबर जैन मंदिर है। हालाँकि,चूंकि उक्त मंदिर के प्रबंधन का अधिकार मेवाड़ राज्य द्वारा पहले ही ले लिया गया था इसलिए, भारतीय संविधान लागू होने के बाद जैनियों को मंदिर का प्रबंधन करने का कोई अधिकार नहीं था। 18 वीं सदी के अंत से, मंदिर ने कई हिंसक घटनाओं को देखा है। इन समुदायों के बीच झड़पें बहुत कड़वाहट पैदा करती हैं। 2007 का सुप्रीम कोर्ट का फैसला जैन समुदाय के प्रशासन के कारण स्थानीय भीलों ने विरोध और हिंसा की।</p>
<p>यहां ऋषभदेव की काले रंग की प्रतिमा स्थापित है। यहां के आदिवासियों के लिए केसरियाजी कालिया बाबा के नाम से प्रसिद्ध हैं। मन्दिर में कुल 23 प्रतिमाये हैं और इसके बाहर प्रवेश द्वार पर हाथी की प्रतिमाएं हैं। चैत्री वदी 8 व 9 को क्षेत्र में बड़ा उत्सव माना जाता है और यात्रा भी निकाली जाती है। मन्दिर पर सशुल्क भोजनालय और धर्मशाला की व्यवस्था है। वर्तमान में मन्दिर की व्यवस्था राजस्थान सरकार द्वारा की जाती है तथा रुकने के लिये सबसे अच्छी धर्मशाला कीका भाई धर्मशाला है।राजस्थान में उदयपुर जिले में ऋषभदेव में स्थित केसरिया जी मंदिर लगभग डेढ़ हजार साल पुराना है। केसरियाजी में पूजा आज भी एक खास घड़ी के अनुसार होती है। समय देखने के लिए आज कई तरह की घड़ियां है। जिनमें सटीक समय पता लगाया जा सकता है, लेकिन यहां आज भी जल घड़ी (water watch) से ही समय का अनुमान लगाया जाता है। इस जल घड़ी के अनुसार ही पूजा-अर्चना होती है। यह जल घड़ी केसरियाजी के मंदिर के मुख्य प्रवेश द्वार पर स्थापित है। प्राचीन काल में हमारे पूर्वजों ने एक विशेष और अलग तरह की घड़ी को इज़ाद किया था, जो पानी के ऊपर आधारित थी, जिसे घटिका यंत्र कहा गया। यह घड़ी भी वैसी ही है।</p>
<p>प्राचीन भारतीयों ने दिन और रात को पहले 60 भागों में बांट दिया था, जिसे 'घड़ी' कहा गया। रात और दिन को चार भागों में बांट दिया, जिन्हें 'पहर' कहा गया। जल घड़ी को प्राचीन समय मापक उपकरण के रूप में मान्यता प्राप्त है। उस वक्त धूप घड़ी की भी मान्यता थी। जयपुर Jaipur के प्रसिद्ध जंतर-मंतर में धूप घड़ी आज भी विद्यमान है। इस अनोखी घड़ी को लकड़ी के बक्से में ताम्बे के बड़े भगोने में पानी भरकर रखा जाता है। इस भगोने में एक कटोरा होता है। कटोरे में एक छेद होता है। यह कटोरा तैरता रहता है। इस छेद के कारण कटोरा 24 मिनट में पानी से भर जाता है। जैसे ही यह कटोरा भरता है गार्ड घंटी बजाता है और समय की सूचना देता है।भारतीय समय IST Time से मंदिर के कार्यों के समय में 45 मिनट का अंतर होता है। एक घड़ी 24 मिनट की मानी जाती है। आठ घड़ी का एक प्रहर होता है और चार प्रहर का एक दिन माना जाता है।</p>
<p><strong>रिषभदेव मन्दिर और मोहम्मद अली जिन्ना</strong></p>
<p>यहां केसर चढ़ाने का अधिकार हर आदमी को था जो भी आदमी पहले भगवान केसरिया को स्नान करा कर पुरानी चढ़ी केसर धो डालेगा चाहे वह कितनी ही मंहगी हो या कितनी ज्यादा हो फिर वह अपनी लायी हुई केसर चढ़ाएगा चाहे वह सुक्ष्म या सस्ती हो ! भावना को हमेशा बड़ा रखा गया, फिर कोई नया भक्त आएगा और फिर पुरानी को धोकर न‌ई महंगी केसर चढ़ाएगा। यहां पुजा करने व मन्दिर प्रवेश पर कोई भेदभाव नहीं था। जैन सम्प्रदाय के दोनों पक्ष दिगम्बर श्रवेताम्बर पुजा करते भेंट चढ़ाते और ध्वजा दण्ड चढ़ाते रहे है।</p>
<p>महाराणा फतहसिह जी के काल के अन्तिम समय में विवाद छिड़ गया।</p>
<p>श्वेताम्बर जैन कहने लगे कि पुजा प्रबंध हमारा है, वही दिगंबर जैन कहने लगे पुजा प्रबंध हमारा है दोनों ही अपनी अपनी पुजा पद्धति से पुजा करना चाहते थें इसी बात को लेकर दोनों समुदायों में आपस में मारपीट हो गई और मन्दिर में भगदड़ के बाद 2 श्रद्धालुओं की मृत्यु हो गई।</p>
<p>तब महाराणा फतहसिह जी ने इस मामले में हस्तक्षेप किया। मन्दिर का सारा प्रबंध मेवाड़ राजपरिवार का था और देवस्थान से संबंधित था तब महाराणा ने वही के प्रबंध कर्ता और जिला ऑफिस के अफसर को लगाकर कारवाई प्रारंभ की।उधर से दोनों गुटों ने कानुनी उजरदारिया शुरू की। पर महाराणा फतहसिह जी के देवलोकगमन के बाद महाराणा भुपाल सिंह जी ने एक नयी समिति बनाई जिसमें सदस्य निम्न सदस्य थे :</p>
<ol>
<li>राजाधिराज अमरसिंह जी बनेडा</li>
<li>जी सी ट्रेंच रेवेन्यू कमीशनर उदयपुर</li>
<li>बाबु बिन्दुलाल भट्टाचार्य मेम्बर महेंद्राज सभा उदयपुर</li>
<li>रत्तीलाल जी अंतानी मिनिस्टर उदयपुर      </li>
</ol>
<p>इन चारों को महाराणा भुपालसिह जी ने आदेश दिया कि दोनों पक्षों के प्रमाण पत्र देखें और सही रिपोर्ट बना कर पेश करें। दोनों ही पक्ष धनी सम्पन्न थे तो उन्होंने हिन्दुस्तान के बड़े बड़े वकील बुलाए। इन वकीलों में निम्न लोग शामिल थे :</p>
<ol>
<li><span style="color: #e03e2d;"> मोहम्मद अली जिन्ना</span></li>
<li><span style="color: #e03e2d;">कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जो आजादी के बाद युपी के राज्यपाल बने।</span></li>
<li><span style="color: #e03e2d;">चिमनलाल सितलवाड़,मुम्बई</span></li>
<li><span style="color: #e03e2d;"> मोतीलाल सितलवाड़ ,मुम्बई</span></li>
</ol>
<p>सभी ने आपसी बहस और दलिले पेश करी। जब मामले की पुरी सुनवाई हुई तब महाराणा भूपालसिंह जी ने आदेश दिया कि इस मन्दिर की पुरानी रिती अनुसार हर सम्प्रदाय के लोग जैसे पुजा करते आए हैं वैसे ही चलेगी और जो सम्प्रदाय अधिक धन देता है पहली पुजा का अधिकारी वही होता है। यह प्रथा जो पहले से चली आ रही है वह भविष्य में भी प्रचलित रहनी चाहिए इसमें किसी हेर-फेर की आवश्यकता नहीं है। इस फैसले का सभी ने माना और सनातनी ,दिगंबर, भील और श्वेताम्बर सभी सन्तुष्ट हो ग‌ए। यह फैसला सन् 1935 को हुआ था।</p>
<p>संकलनकर्ता और शोध :दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</p>
<p>Email:erdineshbhatt@gmail.com</p>
<p> </p>
<p>इतिहासकार :</p>
<p> </p>
<p><strong>जोगेन्द्र पुरोहित </strong></p>
<p>घाणेराव घाटी ,उदयपुर (राजस्थान)</p>
<p>नोट : उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/history-of-keshriyaji-mandir-of-udaipur						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/history-of-keshriyaji-mandir-of-udaipur </guid>
					<pubDate>Sun, 31 Jul 2022 15:06:33 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						क्या है सूरजपोल दरवाजे का इतिहास, सूरजपोल बुर्ज के नाम और तोप !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<div class="grid-section">
<div class="row clearfix">
<div class="col-md-12 column"><br />
<h1>क्या है सूरजपोल दरवाजे का इतिहास, सूरजपोल बुर्ज के नाम और तोप !</h1>
<img src="https://megaportal.in/media/3729/darwaja-1.jpg" alt="" /><strong>उदयपुर के दरवाजे और इमारतें जो कि हेरिटेज की अदभुत बेमिसाल है</strong>, मेवाड़ी स्थापत्य कला यहाँ के राजमहल के साथ जगदीश मंदिर, सज्जनगढ़ ,शहर कोट की दीवार और शहर कोट के दरवाजे से ये अनुमान लगाया जा सकता है कि निर्माण और भव्यता में यहाँ के कारीगरों का कोई सानी नहीं था। चाहे पीछोला की पाल जो कि बिना सीमेन्ट और लेन्टर (सरियों का झाल ) के बनायी गयी और आज भी <strong>13.08 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी</strong> को रोके है जो आज भी इंजीनियरिंग के लिए शोध का विषय है कि कैसे एक सैकड़ो साल पुरानी मिट्टी और घारें से बनी पाल रूपी दीवार इतने विशाल पानी को रोकें है। मेवाड़ी निर्माण शैली के चमत्कारों और उत्कृष्ट्ता के बारें में लिखते लिखते मेरे शब्द कम पड़ जाएँगे और विस्तृत रूप से इसे आने वाले आलेखों में बताने का प्रयास करेंगे।
<p>कोरोना काल में जहाँ आम आदमी अपने घर में बैठे बीमारी की भयावहता के बारें में सोच रहा है और अवसाद में जा रहा है तो इस पर संज्ञान लेते हुए उदयपुर के ख्यातनाम इतिहासकार जोगेंद्र पुरोहित ने आग्रह किया कि ऐसे दौर में लोगों का ध्यान बटाने के लिए क्यों न उदयपुर की ताबिरो/इमारतों के बारे में लोगों को बताया जाय जिससे न केवल इस बीमारी से कुछ पल के लिए पाठकों का ध्यान कोरोना की भयावहता से दूर हो सके और उदयपुर की हेरिटेज के बारे में लोगों को जानकारी मिल सके। इसी क्रम में कई रोचक जानकारियां उन्होंने सूरजपोल के बारे में साझा की है।</p>
<p>दरअसल माछला मगरा से लगती एक दीवार पुराने उदयपुर शहर को अपनी गोद में समेटे हुए है। इसी दीवार के सहारे ऐतिहासिक इमारत सुरजपोल का दरवाजा सीना ताने आपको दिखायी देता होगा। इसी दरवाजे ने न जाने कितने युद्ध देखे,कितने सैनिक यहाँ काम आ गये और कितने दुश्मन यहाँ मौत के घाट उतार दिए गये। ये दरवाजा चुपचाप मेवाड़ की रखवाली करता रहा और चितौड़गढ़ से आने वाले पथिकों के एक चेक पोस्ट बना रहा। इसके साथ ही इस दरवाजे ने आक्रमणकारियों को उदयपुर की भव्यता के बारे में बुलंद आवाज़ उठाई है।</p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><strong>सुरजपोल के निर्माण की कहानी और मराठाओं का आक्रमण</strong></span></p>
<p>बात महाराणा अरि सिंह के काल 1761 से 1773 के मध्य की है। मेवाड़ का बड़ा ही विकट समय चल रहा था। स्थानीय सामंत विद्रोही होते जा रहे थे। कई सामंत विद्रोही हो गए और अपनी मर्जी से विद्रोह करने लगे। अराजकता का माहौल हो गया और जगह-जगह छोटी-छोटी स्टेट अपने आप एक दूसरे से लड़ने के लिए तैयार हो गए थे। प्रशासनिक व्यवस्था गड़बड़ाने लगी थी ।</p>
<p>कवि श्यामल दास वीर विनोद किताब में लिखते हैं, “जब महाराणा अरि सिंह द्वितीय, महाराणा राज सिंह द्वितीय के 1761 में निधन के बाद सिंहासन पर चढ़े, तो उन्होंने शुभचिंतक और वफादार और महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो प्रधानमंत्री मेवाड़ के अमर चंद बडवा को हटाकर राज्य प्रशासन का पुनर्गठन किया और जसवंतराय पंचोली को प्रभार सौंपा। उन्होंने मेहता आगर चंद बच्छावत को भी अपना सलाहकार नियुक्त किया।</p>
<p>उधर दूसरी और महादजी सिंधिया की सेनाओं ने विद्रोही रतन सिंह और उनके गुट की सहायता की, उज्जैन के पास शिप्रा नदी पर डेरा डाला। 1768 में मराठों के साथ लड़ाई में सलूम्बर, शाहपुरा और बनेड़ा के प्रमुख मारे गए थे। महाराणा अरि सिंह के साथ लड़ने के दौरान प्रधान मेहता अगर चंद गंभीर रूप से घायल हो गए थे। मेहता अगर चंद और अन्य को मराठों द्वारा गिरफ्तार किया गया था। महाराणा रूपाहेली ठाकुर के आदेश पर, शिव सिंह ने कुछ आदिवासियों को भेजा, जो प्रधान अगर चंद को बचाने में कामयाब रहे। बाकी को बाद में छोड़ दिया गया।</p>
<p>कवि श्यामल दास ने वीर विनोद में लिखा है, “1769 में, उज्जैन युद्ध के बाद सलूम्बर के रावत भीम सिंह ने महाराणा अरि सिंह द्वितीय को सुझाव दिया, कि पूर्व प्रधानमंत्री अमर चंद बडवा को वापस बुलाया जाए और उन्हें जिम्मेदारी सौंपी जाए। तदनुसार महाराणा अमर चंद के निवास पर गए और उन्हें प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी स्वीकार करने की पेशकश की। अमर चंद बडवा द्वारा व्यक्त की गयी बातों के बाद महाराणा ने उन्हें किसी भी हद तक मदद करने का वादा किया।</p>
<p>अमर चंद बडवा ने प्रधानमंत्री के रूप में जिम्मेदारी स्वीकार की और महादजी सिंधिया से प्रतिशोध के रूप में उदयपुर की किलेबंदी शुरू की। उदयपुर आकर अमरचंद बड़वा ने सबसे पहले 8 किलोमीटर लंबी शहरकोट शहर के चारों तरफ बनवायी और चार छोटे गढ़/दरवाजे बनवाये जिसमें इंदरगढ़ सारणेश्वरगढ़, <strong>सूरजपोल</strong>,अंबावगढ़। अमरचंद ने शहर के चारों ओर इन्द्रगढ़, सारणेश्वरगढ़, सूरजपोल तथा अम्बावगढ़ पर तौपें लगाई। बुर्ज पर 'जगतशोभा' तोप लगाई गई। अन्य बुर्जों में पुरोहितजी की हवेली के पास बुर्ज पर 'शिव प्रसन्न' तोप, अमर ओटा के पास बुर्ज पर 'कटक बिजली' तोप, हाथीपोल व सूरजपोल के पास बुर्ज पर 'जयअम्बा' और 'मस्तबाण' तोपें लगाई गई।</p>
<p>आक्रमण के समय सूरजपोल के दरवाजे पर कुराबड़ के रावत चुण्डावत कृष्णावत,अर्जुन सिंह ,केसरी सिंहोत ,हमीरगढ़ के राणावत धीरज सिंह,उम्मेद सिंहोत और कायस्थ सुंदरनाथ जमीयत के साथ तैनात किया गया था। सूरजपोल के सामने महलो में रुद का ठाकुर शक्तावत जवान सिंह,गोकुल दासोत पाँच सौ सिंधी सैनिको के साथ तैनात हुए थे। सूरजपोल के उत्तरी ध्रुव बुर्ज पर मूणावास के राणावत बाबा शिवसिंह को तैनात किया गया था।</p>
<p><br /><strong>सूरजपोल दरवाजा उत्तरी अक्षांश 24 डिग्री 3446. 15 एवं पूर्वी देशान्तर 73 डिग्री 4145.87 पर स्थित एक बुर्ज है। लेकिन अब लोग इसे उदयपुर के प्रवेश द्वार /दरवाज़े के रूप में जानते है।</strong> वर्तमान में स्मार्ट सिटी प्रशासन द्वारा इसे सरंक्षित करने का काम किया गया है लेकिन बुर्ज का प्लास्टर इसकी शोभा के अनुसार नहीं है और न ही कोई जानकारी और सुचना पट्ट लगाया गया है जिससे उदयपुर निवासियों सहित पर्यटकों को इसकी जानकारी मिल सके। (वैसे इसकी जानकारी स्मार्ट सिटी के अधिकारियों और स्थानीय प्रशासन को भी नहीं है।)</p>
<p>सबसे महत्वपूर्ण बात सूरजपोल बुर्ज/दरवाजे की ये है कि प्राचीन काल से ही इसे बहुत शुभ माना गया है और लोग पुराने समय से ही इस दरवाजे से ही अपने कार्य प्रयोजन के लिए निकला करते थे और दिल्ली दरवाज़े को खास तौर पर उपेक्षित ही रखा करते थे। इसलिए ही मेवाड़ राजपरिवार में महाराणा की मृत्यु होने पर अग्नि संस्कार के लिए सूरजपोल होकर ही महासतिया ले जाया जाता था। सूरजपोल के दरवाजे के सामने की तरफ एवं कोनों में पेड़ की पत्ती जैसी आकृति की संरचना बनायी गयी थी। इस सूरजपोल के दोनों तरफ समान दूरी पर दो षटकोण आकृति के बुर्ज बनाये गए थे। दरवाजे के ठीक सामने तोप भी रखवायी गयी थी।</p>
<p>इस तरह सूरजपोल पर जो दो बुर्ज बने है उसके नाम है - <strong>उत्तरी ध्रुव बुर्ज</strong> और दूसरे बुर्ज का नाम है <strong>ईशान कोण का ज्वालामुखी बुर्ज</strong>। इसी ज्वालामुखी बुर्ज पर <strong>शम्भूबाण तोप</strong> भी हुआ करती थी। इसके साथ ही सूरजपोल से लगती शहर कोट से सटी हुई खाइयों (वर्तमान बापू बाजार,टाउन हाल रोड,सिटी स्टेशन रोड आदि ) को खोद कर मिट्टी निकाल इसे व्यवस्थित किया गया था ताकि संकटकाल में इनमे पानी भरा जा सके और शत्रु पानी से भरी खाई को लाँघ कर शहर कोट के पास न आ सके।</p>
<p>सूरजपोल को <strong>मेवाड़ का पूर्व दिशा का दरवाजा</strong> भी कहा जाता था और अंग्रेजों के समय इसे <strong>फिरंगी दरवाज़े</strong> का नाम भी दिया गया था क्योंकि यहाँ पर कर्जन वायली का स्मारक भी बनाया गया था। महाराणा भूपाल सिंह जी के समय में महाराणा ने यहाँ एक बड़ा बगीचा बनवा कर फव्वारे भी लगवाये (<em>वर्तमान में स्मार्ट सिटी उदयपुर द्वारा एक बड़े अस्पताल समूह द्वारा लगवाए फव्वारें निराश ही करते है</em> ) और एक बड़ा हौज़ बनवाया ताकि पशु पक्षी ,जंगली सूअर ,वन्य जीव यहाँ आकर पानी पीकर तृष्णा शांत कर सके।</p>
<p>कुल मिलाकर सूरजपोल दरवाजा अपने आप में उदयपुर के इतिहास की भव्यता को लेकर हमेशा से मुझे रोमांचित करता चला आया है और इस आलेख को पढ़ने के बाद आप को भी इस दरवाजे के पास से गुजरते समय गर्व का अनुभव होगा।</p>
</div>
</div>
</div>
<div class="grid-section">
<div class="row clearfix">
<div class="col-md-12 column">
<p><em><strong>इतिहासकार : जोगेन्द्र नाथ पुरोहित</strong></em></p>
<p>शोध :<strong>दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</strong></p>
<p>Email:<strong>erdineshbhatt@gmail.com</strong></p>
<p> </p>
<p><span style="text-decoration: underline;"><strong>नोट : उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</strong></span></p>
<p><br /><br /></p>
</div>
</div>
</div>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/current-news/what-is-the-history-of-surajpol-darwaja-names-and-cannon-of-surajpol-burj						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/current-news/what-is-the-history-of-surajpol-darwaja-names-and-cannon-of-surajpol-burj </guid>
					<pubDate>Tue, 28 Jun 2022 11:44:52 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						हॉलीवुड मूवी 300 से ज्यादा वीरता दिखायी 20  माचातोड़ मेवाड़ी योद्धाओं ने जगदीश मन्दिर बचाने में						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>1679 ई. तक औरंगज़ेब समूचे उत्तर भारत के मंदिरों को लूट चूका था। शहर के शहर बरबाद करता चला जाता उसका कारवाँ। उसके सिपाही न सिर्फ लूटपाट करते बल्कि राज्य की खूबसूरत महिलाओं के साथ बलात्कार करते या उन्हें बन्दी बनाकर सिपाहियों के हरम में ले जाते। सिपाहियों का हरम किसी नरक (दोज़ख ) से कम नहीं होता जहाँ बमुश्किल ही कोई सात दिन जी पाता हो ! बच्चों और आदमियों को उनके सामने पहले की मार दिया जाता वो भी वीभत्स मौत के साथ।</p>
<p>1679 ई.से ही औरंगज़ेब के जेहन में राजपुताना के एक ही रियासत 'मेवाड़' को रौंदने का मन था और जनवरी 1680 की तेज़ कड़कड़ाती ठण्ड में उसकी सेनाओं ने मेवाड़ की सीमा पर आकर डेरा डाल लिया। सैनिक इतने जितने मेवाड़ में नागरिक नहीं और हर मेवाड़ी योद्धा के सामने औरंगज़ेब के 10 योद्धा थे।</p>
<p>तत्कालीन शूरवीर महाराणा राजसिंह द्वारा फौजी जमावड़ा महीनों पहले से चल रहा था। उन्हें पता था कि किस तरह जनता को सबसे पहले बचाना है।</p>
<p>बादशाह औरंगज़ेब ने शहज़ादे मुहम्मद आज़म, सादुल्ला खां, इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां को उदयपुर पर हमला कर वहां के मन्दिर वगैरह तोड़ने के साथ उदयपुर को लूटने भेजा।</p>
<p>महाराणा राजसिंह ने अपने जिग़र के टुकड़े को गिर्वा की पहाड़ियों पर कुँवर जयसिंह (महाराणा के पुत्र व भावी महाराणा) को तैनात कर दिया। देसूरी की नाल के इलाक़े में बदनोर के सांवलदास राठौड़ को कमान सौंपी गयी थी। बदनोर-देसूरी के पहाड़ी भाग पर विक्रमादित्य सौलंकी व गोपीनाथ घाणेराव युद्ध के लिए तैयार थे। मालवा सीमा पर मंत्री दयालदास को नियुक्त किया गया। देबारी,नाई और उदयपुर के पहाड़ी नाकों पर स्वयं महाराणा राजसिंह तैनात हुए।</p>
<p>वो दिन आ ही गया जब मुगल फौज लड़ते हुए उदयपुर आ पहुंची, तो वहां इन्होंने पूरा उदयपुर खाली पाया।</p>
<p>महाराणा राजसिंह प्रजा व सेना सहित अरावली के पहाड़ों में जा चुके थे। सादुल्ला खां व इक्का ताज खां फौज समेत उदयपुर के जगदीश मंदिर के सामने पहुंचे, जो कि उदयपुर के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक था व इसको बनाने में भारी धन (उस समय के लगभग 6 लाख रूपये ) खर्च हुआ था।</p>
<p>इस मंदिर की रक्षा के लिए नरू बारहठ सहित कुल 20 योद्धा तैनात थे, जिसका विवरण सुनकर आप की आँखे भीग जाएँगी। जब महाराणा राजसिंह राजपरिवार व सामंतों और जनता सहित पहाड़ों में प्रस्थान कर रहे थे तब किसी सामन्त ने महाराणा के बारहठ नरू को ताना दिया कि " जिस दरवाज़े पर तुमने बहुत से दस्तूर (नेग) लिए हैं, उसको लड़ाई के वक़्त ऐसे ही कैसे छोड़ोगे ?"</p>
<p>नरू बारहठ साहब एक क्षण मौन के बाद हुंकारे - "<span style="color: #ba372a;"><strong>जब तक नरु बारहठ के धड़ पर शीष रहेगा तब तक ठाकुर जी (जगदीश मन्दिर) की सीढ़िया कोई आतातायी नहीं चढ़ सकेगा। एकलिंग विजयते नमः</strong></span>"।</p>
<p>नरू बारहठ के अपने 20  साथी भी कहाँ मानने वाले थे और वे भी उनके साथ यहीं रुक गए।</p>
<p>पूरा उदयपुर ख़ाली था। घण्टाघर से हाथीपोल तक संन्नाटा। एक भी आदमी नहीं। यहाँ तक कि शहर के स्वानो तक को अनहोनी की आशंका हो गयी थी शायद। वो भी गायब थे लेकिन तोते और चिड़ियाओं की आवाज़े सुनसान मरघट जैसे सन्नाटे को यदा कदा चीर रही थी।</p>
<p>सबसे पहले नरु के साथियों ने शहर के सारे मंदिरों की पूजा की।कई शंख एक साथ ऐसे बजाये गए मानों सैकड़ो लोग रणभेरी बजा रहे हो। ठण्ड की इस रात में भी सभी की भुजाएँ फड़क रही थी। मौत का कोई खौंफ नहीं। आँखों में इतना तेज़ मानो सूरज की रश्मियाँ हो।</p>
<p>निर्देशानुसार रात सभी लोग जगदीश मंदिर आ गए।</p>
<p><strong>मेवाड़ (उदयपुर) के सारे दरवाजे जैसे उदयपोल,किशनपोल,एकलिंगगढ़,ब्रह्मपोल,चांदपोल,गड़िया देवरा पोल ,हाथीपोल और दिल्ली दरवाजा बंद किये जा चुके थे। लेकिन उस रात दिवाली मनायी गयी थी मेवाड़ के हर दरवाज़े पर सैकड़ो मशालें और दीप जलायें थे नरु के साथियों ने।</strong></p>
<p>मुग़ल फौज इतनी खौफ़जदा थी कि उसने रात में शहर पर हमला करने की हिम्मत न की। उधर नरु और साथियों ने आखिरी आरती की जगदीश मन्दिर में। एक दूसरे को बधाइयाँ दी गयी शहीद हो जाने की ख़ुशी में। शस्त्रों की पूजा के बाद अश्वों की पूजा की गयी।</p>
<p>केसरिया बाना (पगड़ी) पहने हर योद्धा इतरा रहा था। सभी मन्दिर के पीछे अपने घोड़ों के साथ मरने के लिए तैयार खड़े थे। एक ही सुर में तेज़ आवाज़े जगदीश मंदिर से पूरे शहर में गूंझ रही थी " एकलिंगनाथ की जय !जय माता दी ! हर हर महादेव। हर हर महादेव। हर मेवाड़ी योद्धा की आँखों में ख़ून उतर आया था।</p>
<p>आखिर वो घडी आ गयी जब सारे दरवाजे तोड़ते हुए सुबह 9 बजे के के करीब मुगल फौज जगदीश मंदिर के पास ढलान पर भटियाणी चौहटा और घण्टाघर तक आ गयी। औरंगज़ेब के शहज़ादे मुहम्मद आज़म, सादुल्ला खां, इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां की सेना अब भी आगे बढ़ने से कतरा रही थी क्योंकि पूरा उदयपुर खाली था और रात तक शंख नाद की आवाज़े आ रही थी। हुंकारे आ रही थी। सेना के साथ शहज़ादे मुहम्मद आज़म भी किसी अनहोनी की आशंका में थे। सादुल्ला खां ने अपने खास 50 सिपाहियों की टोली को आगे टोह लेने भेजा। जगदीश चौक तक आते आते सब के सब 50 हलाक कर दिए गए। खून से सड़क लाल हो चुकी थी। रक्त बहता हुआ ढलान में मुग़ल सेना की ओर आता दिखा। मुग़ल सेना में हड़कम्प मच गया।</p>
<p>स्थिति को इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां ने सम्भाला और सेना से आगे बढ़ने को कहा। तभी हर हर महादेव के नारे बुलंद हो उठे। सुनसान शहर थर्रा उठा। मंदिर की उत्तर वाले दरवाज़े (जहाँ आज स्कूल है )से एक योद्धा लड़ने के लिए बाहर आया और ऐसी गति मानों बिजली चलीं आ रही हो। केसरिया बाना पहने पहला माचातोड़ यौद्धा अपना अंतिम कर्तव्य निभाने निकल चूका था। हर हर महादेव के हुंकार और घोड़े की टाप की आवाज़ों के साथ पत्थर सड़को पर खुर ज्यादा ही आवाज़ कर रहे थे।हर माचातोड़ यौद्धा कम से कम 50 दुश्मनों को मारकर ही अपना जीवन धन्य समझता। जैसे ही एक माचातोड़ यौद्धा शहीद होता उसी समय दूसरा माचातोड़ यौद्धा ढलान मे हूंकार भरता हुआ नीचे मुग़ल ख़ेमे में घुस कर कई मुग़लो को फ़ना कर देता।ऐसे ही मंदिर से एक-एक कर माचातोड़ यौद्धा बाहर आते गए। शाम होने चली आयी थी।</p>
<p>मुग़ल सेना सदमे में डरी हुई थी और हैरान भी थी माचातोड़ यौद्धा की वीरता पर। मुग़ल सेना में माचातोड़ यौद्धा को लेकर फुस फुसाहट हो रही थी और हर कोई नए माचातोड़ यौद्धा का इंतज़ार कर रहा था। किसी को पता नहीं था ऐसे कितने ओर माचातोड़ यौद्धा अभी भी छिपे है ऊपर मन्दिर की ओर ?</p>
<p>लेकिन समय और नियति पहले ही नरु बारहठ की वीरता का किस्सा लिख चुकी थी। आखिर में नरू बारहठ बाहर आए और बड़ी बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। केसरिया बाना पहने जिन्दा रहते हुए उनकी तलवार ने कई मुग़ल सिप्पसालारो को हलाक कर दिया। शीश कटने के बाद भी उनका धड़ तलवार चलाता रहा। मुग़ल सैनिक इधर उधर भागते फ़िरे। नरू बारहठ के शहीद होते ही मुग़ल सेना ने डर कर एक घण्टे ओर इंतज़ार किया। उसके बाद बादशाही फौज ने जगदीश मंदिर में मूर्तियों को तोड़कर मंदिर को तहस-नहस कर दिया।</p>
<p>बाद में इनकी स्मृति में एक चबूतरा मंदिर के पास ही बनवाया गया था ।</p>
<p>बाद में दोबारा यह मंदिर बनवाया गया था। यह मन्दिर महाराणा जगत सिंह जी प्रथम ने 6 लाख रूपये लगाकर दुबारा 1652 ईस्वी में बनवाया था लेकिन औरंगजेब द्वारा नुकसान पहुंचाने पर महाराणा संग्राम सिंह ने इसे फिर दुरूस्त करवाया। आज भी जगदीश मन्दिर की बाहर तक्षण शैली की मुर्तियां खण्डित है।</p>
<p>इसका निर्माण गुंगावत पंचोली कमल के पुत्र अर्जुन की निगरानी में भंगोरा वर्तमान में भगोरा सुथार गोत्र भाणा और उसके पुत्र मुकुंद की अध्यक्षता में 13 मई 1652 बैशाखी पुर्णिमा पर भव्य प्राण प्रतिष्ठा हुई।</p>
<p>बाद में गुस्से मे महाराणा राजसिंह ने अपने पुत्र भीम सिंह जी को गुजरात भेजा जिसने एक बडी और तीन सौ छोटी मस्जिदो को ध्वस्त कर इसका बदला लिया। महाराणा राज सिंह मारवाड़ के अजीत सिंह के मामा थे। एक बार मुगलों से एक राजकुमारी को बचाने के लिए और एक बार औरंगजेब द्वारा लगाए गए जजिया कर की निंदा करके राज सिंह ने औरंगजेब का कई बार विरोध किया। राणा राज सिंह को मथुरा के श्रीनाथजी की मूर्ति को संरक्षण देने के लिए भी जाना जाता है, उन्होंने इसे नाथद्वारा में रखा था। कोई अन्य हिंदू शासक अपने राज्य में श्रीनाथजी की मूर्ति लेने के लिए तैयार नहीं था क्योंकि इसका मतलब मुगल सम्राट औरंगजेब का विरोध करना होगा, जो उस समय पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली व्यक्ति था। राणा को अंततः अपने ही प्रमुखों द्वारा जहर दिया गया था, जिन्हें मुगल सम्राट द्वारा रिश्वत दी गई थी।</p>
<p>जगदीश मंदिर को बचाने की इस गौरव गाथा के बाद विडम्बना ही है कि इस मंदिर में आने वाले प्रतिदिन सैंकड़ों श्रद्धालुओं को इस अभूतपूर्व बलिदान की भनक तक नहीं है | मेवाड़ के दुर्ग तो दुर्ग सही, यहां का हर मंदिर राजपूतों के बलिदान की खूनी गाथा अपने अंदर समेटे हुए है।</p>
<p> </p>
<p>शोध :दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</p>
<p> </p>
<p>Email:erdineshbhatt@gmail.com</p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/hollywood-movie-showed-more-than-300-bravery-20-machatod-mewari-warriors-saved-jagdish-temple						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/hollywood-movie-showed-more-than-300-bravery-20-machatod-mewari-warriors-saved-jagdish-temple </guid>
					<pubDate>Sun, 29 May 2022 09:28:18 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						जगदीश मंदिर बचाने में यूनानियो जैसे 20 मेवाड़ी माचातोड़ योद्धा कैसे लड़े अपनी जंग !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>जगदीश मंदिर उदयपुर का बड़ा ही सुन्दर ,प्राचीन और विख्यात मंदिर है। आद्यात्मिक्ता के क्षेत्र में इसका अपना एक विशेष स्थान हैं। साथ ही मेवाड़ के इतिहास में भी इसका बड़ा योगदान रहा है। यह मंदिर उदयपुर में रॉयल पैलेस के समीप ही स्थित है। जगदीश मन्दिर की कुल बत्तीस सीढ़िया है।</p>
<p>इसे जगन्नाथ मंदिर के नाम से भी जाना जाता है । इसकी ऊंचाई 125 फीट है । यह मंदिर 50 कलात्मक खंभों पर टिका है । यहाँ से सिटी पेलेस का बारा पोल सीधा देखा जा सकता है एवं गणगौर घाट भी यहाँ से नज़दीक ही है । मंदिर में भगवान जगन्नाथ का श्रृंगार बेहद खूबसूरत होता है । शंख, घधा ,पद्म व चक्र धारी श्री जगन्नाथ जी के दर्शन कर हर कोई धन्य महसूस करता है ।</p>
<p> </p>
<p>जगदीश मंदिर पुराने उदयपुर शहर के मध्य में स्थित एक विशाल मंदिर है। इस मंदिर को जगन्नाथराय का मंदिर भी कहते हैं। इसका निर्माण 1651 में पूरा हुआ था। उदयपुर के महाराणा जगत सिंह प्रथम ने इस भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। इसके निर्माण में कुल 25 साल लगे थे।</p>
<p> </p>
<p>कहा जाता है कि महाराजा जगत सिंह की जगन्नाथ पुरी के विष्णु भगवान में अखंड आस्था थी। एक दिन सपने में उन्हें विष्णु भगवान ने कहा कि वह उनका मंदिर उदयपुर में बनवाएं, वह वहीं आकर निवास करेंगे। इसी सपने के बाद इस मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। मंदिर आधार तल से 125 फीट ऊंचाई पर है। इसका शिखर 100 फीट ऊंचा है। मंदिर में कुल 50 कलात्मक स्तंभ हैं। इस मंदिर में जो प्रतिमा स्थापित है, वह राजस्थान के डूंगरपुर के कुनबा गांव के नजदीक पश्वशरण पर्वत से लाई गई थी। गर्भ गृह में काले पत्थर की सुंदर विष्णु प्रतिमा स्थापित की गई है। इस मंदिर को जागृत मंदिर माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि साक्षात जगदीश यहां वास करते हैं। शिखर और गर्भ गृह के लिहाज से यह नागर शैली में बना मंदिर है। मंदिर परिसर में कई छोटे मंदिरों का निर्माण कराया गया है, जो पंचायतन शैली का उदाहरण है। मंदिर परिसर में एक शिलालेख भी है, जो गुहिल राजाओं के बारे में जानकारी देता है।</p>
<p> </p>
<p>यह मंदिर मारू-गुजराना स्थापत्य शैली का भी उत्कृष्ट उदाहरण है। नक्काशीदार खंभे, सुंदर छत और चित्रित दीवारों के साथ यह मंदिर एक चमत्कारी वास्तुशिल्प की संरचना प्रतीत होता है। यह मंदिर एक ऊंचे विशाल चबूतरे पर निर्मित है। मंदिर के बाहरी हिस्सों में चारों तरफ अत्यन्त सुंदर नक्काशी का काम किया गया है। इसमें गजथर, अश्वथर तथा संसारथर को प्रदर्शित किया गया है।</p>
<p> </p>
<p>जगदीश मंदिर के पत्थरों की कारीगरी भदेसर के पत्थरों से करी गयी है और जहाँ इन पत्थरों की गढ़ाई हुई वह आज उदयपुर में भदेसर का चौक कहलाता है ऐसा पुराने लोग कहते है। मंदिर में जहां पंक्ति पर लोग दर्शन कर के बैठ जाते थे, वहां पगल्या जी लगाए गए ताकि लोग उस पंक्ति पर नही बैठे क्योंकि जमाने से लोग अपने दर्द को दूर करने शरीर के अंग को जैसे कमर घुटनें पेट आदि को उस शिला से रगड़ते थे मान्यता है ऐसा करने से लोग दर्द से राहत पाते है। मन्दिर में जगदीश भगवान की मूर्ति काले पाषाण से बनी है जो कि कसोटी नामक पाषाण से बनी है जिसे सोनी लोग सोने को परखने के लिए करते हैं।</p>
<p> </p>
<p> </p>
<p>मन्दिर पुराने उदयपुर के सिटी पैलेस (महलों) के बाद दुसरी सबसे ऊंची चोटी पर बना है। यह बात इसके कुर्सी लैवल यानि धरातल से शिखर तक पुरानी सिटी में हर जगह से दिखता है लेकिन अब ताबड़तोड़ निर्माण से यह इमारतों के बीच छुप गया है। वर्तमान में शायद ही कोई ऐसा सैलानी होगा जो इस मंदिर से होकर न गुज़रे।</p>
<p> </p>
<p>यह मन्दिर महाराणा जगत सिंह जी प्रथम ने 6 लाख रूपये लगाकर 1652 ईस्वी में बनवाया था। लेकिन औरंगजेब द्वारा नुकसान पहुंचाने पर महाराणा संग्राम सिंह ने इसे फिर दुरूस्त करवाया। मन्दिर की परिकृमा में सुर्य शक्ति गणपति शिव के चार अन्य मन्दिर है।आज भी जगदीश मन्दिर की बाहर तक्षण शैली की मुर्तियां खण्डित है। इस मन्दिर में इन्हीं महाराणा ने रत्नों का कल्पवृक्ष दान किया था।</p>
<p> </p>
<p>महाराणा ने जो रत्नों का कल्प वृक्ष चढ़ाया वो स्फटीक की शिला पर था। उसके मूल में नीलम, सर पर लहसनिया हीरे थे । शाखाओं पर माणिक पत्तों की जगह मुंगा फुलों की जगह मोतीयों के गुच्छे फल रत्नों के उसके नीचे पांच शाखाएं जिसके नीचे बह्मा विष्णु शिव कामदेव की मुर्तियां थी। यह मन्दिर पंचायतन है।</p>
<p> </p>
<p>इसका निर्माण गगावत पंचोली कमल के पुत्र अर्जुन की निगरानी में भंगोरा वर्तमान में भगोरा सुथार गोत्र भाणा और उसके पुत्र मुकुंद की अध्यक्षता में 13 मई 1652 बैशाखी पुर्णिमा पर भव्य प्राण प्रतिष्ठा हुई। महाराणा राजसिंह औरंगजेब की लड़ाई में औरंगजेब के सिपहसालार सादुल्ला खां और इक्का ताज खां ने इस मन्दिर को खूब हानि पहुँचायी और इसी गुस्से मे महाराणा राजसिंह ने अपने पुत्र भीम सिंह जी को गुजरात भेजा जिसने एक बडी और तीन सौ छोटी मस्जिदो को ध्वस्त कर इसका बदला लिया। राजसिंह महाराणा के काल में मन्दिर को बचाने के लिए महाराणा ने बीस माचातोड सिपाहियों को लगाया जिनका शाश्वत सत्य लड़कर मरना था वे एक एक कर बाहर आते ओर क‌ई दुश्मनों को मारकर वीर गति पाते थे।महाराणा राज सिंह मारवाड़ के अजीत सिंह के मामा थे। एक बार मुगलों से एक राजकुमारी को बचाने के लिए और एक बार औरंगजेब द्वारा लगाए गए जजिया कर की निंदा करके राज सिंह ने औरंगजेब का कई बार विरोध किया। राणा राज सिंह को मथुरा के श्रीनाथजी की मूर्ति को संरक्षण देने के लिए भी जाना जाता है, उन्होंने इसे नाथद्वारा में रखा था। कोई अन्य हिंदू शासक अपने राज्य में श्रीनाथजी की मूर्ति लेने के लिए तैयार नहीं था क्योंकि इसका मतलब मुगल सम्राट औरंगजेब का विरोध करना होगा, जो उस समय पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली व्यक्ति था। राणा को अंततः अपने ही प्रमुखों द्वारा जहर दिया गया था, जिन्हें मुगल सम्राट द्वारा रिश्वत दी गई थी। </p>
<p> </p>
<p>मेवाड़ महाराणा स्वरूप सिंह जी के साथ मेवाड़ की आखरी सती एक पासवान ऐंजा बाई हुई जब महाराणा की अन्तिम डोल यात्रा चली तब वह घोड़े पर सवार थी और उसने बहुत से ज़ेवर जगदीश मन्दिर में अर्पित दिये । समय समय-समय पर महाराणा की तरफ से भरपूर चढ़ावा चढ़ाया जाता रहा ।</p>
<p> </p>
<p>सन 1736 में मुगल बादशाह औरंगजेब के आक्रमण के समय मंदिर का अगला हिस्सा टूट गया। इसके गजथर के कई हाथी तथा बाहरी द्वार के पास का कुछ भाग आक्रमणकारियों ने तोड़ डाला था। बाद में महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय ने फिर से मंदिर की मरम्मत कराई।</p>
<p> </p>
<p>साभार :जोगेन्द्रनाथ पुरोहित,उदयपुर- इतिहासकार</p>
<p> </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/jagdish-temple-in-udaipur						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/jagdish-temple-in-udaipur </guid>
					<pubDate>Sun, 29 May 2022 09:25:33 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						हाड़ी रानी का बलिदान, ऋणी रहेगा हिंदुस्तान,निशानी स्वरूप दे दिया काट के अपना सिर						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>हाड़ी रानी को न सिर्फ मेवाड़ बल्कि समूचे विश्व की धर्म परायण जनता सदैव मान सम्मान और श्रद्धा से याद करती है। हाड़ी रानी सलुम्बर के सरदार चुंडावत राव रतन सिंह की पत्नी थी। हाड़ी रानी की शादी को महज एक सप्ताह ही हुआ था। न हाथों की मेहंदी छूटी थी और न ही उनके पैरों का आलता हल्का पड़ा था । तभी अल सुबह के समय दरबान आकर वहां खड़ा हो गया।</p>
<p> </p>
<p>राजा रतन सिंह का ध्यान न जाने पर रानी ने कहा - "महाराणा का दूत काफी देर से खड़ा है। वह आप से तुरंत मिलना चाहते हैं। आपके लिए कोई आवश्यक पत्र लाया है। " इस पर राव रतन सिंह हाड़ी रानी को अपने कक्ष में जाने को कहा।</p>
<p> </p>
<p>औपचारिकता के बाद ठाकुर ने दूत से कहा, अरे शार्दूल तू ! इतनी सुबह कैसे? क्या भाभी ने घर से खदेड़ दिया है ?</p>
<p>सरदार ने फिर दूत से कहा, तेरी नई भाभी अवश्य तुम पर नाराज होकर अंदर गई होगी। नई नई है न। इसलिए बेचारी कुछ नहीं बोली। ऐसी क्या आफत आ पड़ी थी। दो दिन तो चैन की बंसी बजा लेने देते। मियां बीवी के बीच में क्यों कबाब में हड्डी बनकर आ बैठे। अच्छा बोलो राणा ने मुझे क्यों याद किया है? वह ठहाका मारकर हंस पड़ा।</p>
<p>दोनों में गहरी दोस्ती थी। सामान्य दिन अगर होते तो वह भी हंसी में जवाब देता। शार्दूल खुद भी बड़ा हंसोड़ था। वह हंसी मजाक के बिना एक क्षण को भी नहीं रह सकता था, लेकिन इस बार वह बड़ा गंभीर था। दोस्त हंसी छोड़ो। सचमुच बड़ी संकट की घड़ी आ गई है। मुझे भी तुरंत वापस लौटना है। यह कहकर सहसा वह चुप हो गया।</p>
<p>अपने इस मित्र के विवाह में बाराती बनकर गया था। उसके चेहरे पर छाई गंभीरता की रेखाओं को देखकर राव रतन का मन आशंकित हो उठा। सचमुच कुछ अनहोनी तो नहीं हो गयीं है। दूत संकोच रहा था कि इस समय महाराणा की चिट्ठी वह मित्र को दे या नहीं ? </p>
<p>चुंडावत सरदार को तुरंत युद्ध के लिए प्रस्थान करने का निर्देश लेकर वह लाया था। उसे मित्र के शब्द स्मरण हो रहे थे। राव रतन सिंह के पैरों के नाखूनों में लगे महावर की लाली के निशान अभी भी वैसे के वैसे ही दिख रही थी। नव विवाहित हाड़ी रानी के हाथों की मेंहदी भी तो अभी सूखी न होगी। पति पत्नी ने एक दूसरे को ठीक से देखा पहचाना नहीं होगा। कितना दुखदायी होगा उनका बिछोह? यह स्मरण करते ही वह सिहर उठा।</p>
<p> </p>
<p>पता नहीं युद्ध में क्या हो ? वैसे तो राजपूत मृत्यु को खिलौना ही समझता हैं। अंत में जी कड़ा करके उसने  सरदार राव रतन सिंह के हाथों में महाराणा राजसिंह का पत्र थमा दिया।</p>
<p>राणा का उसके लिए संदेश था। हे वीर मातृभूमि तुम्हें पुकार रही है। मैंने (महाराणा राजसिंह) औरंगजेब को चारों और से घेर लिया है। औरंगजेब ने अपनी सहायता के लिए दिल्ली से विशाल सैन्य टुकड़ी मंगवाई है। उस टुकड़ी को रोकने के लिए अरावली में मेरे ज्येष्ठ पुत्र कुंवर जयसिंह और अजमेर में छोटे पुत्र कुंवर भीमसिंह तैनात है। मैं चाहता हूं तीसरे मोर्चे पर आप जाओ, उस टुकड़ी को रोकने के लिए। यधपि मुझे मालूम है कि अभी आपकी शादी को कुछ दिन ही हुए हैं ,किंतु मातृभूमि आपको पुकार रही है। </p>
<p> </p>
<p>राव रतन सिंह की उस वक़्त ना सिर्फ मेवाड़ बल्कि दुनियां के सर्वश्रेष्ठ वीर योद्धाओं में गिनती होती थी। शादी के वक़्त वो युद्ध से लौटे ही थे और राणा राजसिंह ने उनसे कहा था 4-6 महीने मौज करो, आपको युद्ध पर नहीं भेजूंगा। किंतु स्तिथि आपात थी। राव रतन सिंह की आँखों के सामने अपनी नव ब्याहता हाड़ी रानी का चेहरा आ जाता है और अनेक ख्याल मन में आते हैं।</p>
<p> </p>
<p>किंतु कर्तव्य की बलि वेदी और मातृभूमि की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध वो वीर तुरन्त केसरिया बाना (साफा) पहन कर युद्ध के लिए तैयार होते है। हाड़ी रानी अपने पति को देख के अपने आंसू रोक लेती है। वीरांगना को मालूम था उसके आंसू उनके पति को कमजोर कर देंगे । वो अपने पति को कहती है क्षत्राणी तो पैदा ही इसी दिन के लिए होती है जब वो अपने हाथों से विजय तिलक कर के अपने पति को युद्ध के लिए रवाना करे।</p>
<p> </p>
<p>स्वर्ण थाल में हाड़ी रानी अपने पति राव रतन सिंह की आरती और पूजा तिलक करती है। राव रतन सिंह युद्ध के लिए प्रस्थान करते हैं और बार बार पत्नी मोह में व्याकुल होकर पलट के महलों की और देखते हैं। नियत समय पर सलूम्बर की अल्प सेना और मुगलों की विशाल सेना आमने सामने होती है। भीषण युद्ध आरम्भ होता है। राव रतन सिंह एक दूत को पत्नी की कुशलक्षेम पूछने सलूम्बर भेजते है और दूत को कहते है कि रानी की कोई निशानी अपने साथ ले कर आना।</p>
<p> </p>
<p>दूत जब रानी की निशानी मांगता है, तो हाड़ी रानी समझ जाती है कि पति मेरे मोहपाश में बंधे हुए हैं। वो दूत को आवश्यक निर्देश देती है और अपनी कमर से कटार निकालकर एक झटके में अपने सर को धड़ से अलग कर देती है।</p>
<p> </p>
<p>सैनिक स्वर्ण थाल में रानी का कटा हुआ सर रखता है और उस सर को सुहाग की चुनर से ढक के युद्ध भूमि की और प्रस्थान करता है। आँखों के सामने पत्नी का धड़ से अलग सर देख के हाड़ा राजा राव रतन सिंह के पांवों के नीचे से धरती खिसक जाती है। किंतु अगले ही पल खुद को सम्हालते हुए वो वीर पत्नी के कटे सर को रस्सी में बांध के गले में माला के जैसे धारण करते है और घोड़े पर सवार होकर शत्रु मुगल सेना पर टूट पड़ते है। </p>
<p> </p>
<p>अल्प सलूम्बर सेना ने विशाल मुगलिया सेना को देखते ही देखते गाजर मूली की तरह काट देती है । भीषण वेग से राव रतन सिंह शत्रु सेना पर प्रचण्डता से कहर बरसाते हैं। वैसा युद्ध इतिहास में देखने और सुनने को नहीं मिलता है। राव रतन सिंह उस युद्ध में पत्नी का सर गले में लटकाए वीरगति को प्राप्त हो जाते हैं। मातृभूमि को अपना सर्वस्व न्योछावर कर देते हैं। वही एक अन्य मोर्चे पर औरंगजेब महाराणा राजसिंह से अपनी जान बचा कर दिल्ली भाग जाता है। मेवाड़ पूरा मुगलों की दासता से मुक्त हो चूका होता है।सलूम्बर का सपूत वीर राव रतन सिंह और हाड़ी रानी मातृभूमि के लिए अपने प्राणों का बलिदान देकर इतिहास में अमर हो गए हैं।</p>
<p>किवंदती है कि मेवाड़ी और मारवाड़ी सहित समस्त राजपूताने के योद्धाओं का खून इतना गर्म होता था कि.अगर युद्धभूमि में शत्रु के ऊपर खून गिर जाए तो शत्रु के शरीर पर फफोले निकल आते थे !"</p>
<p> </p>
<p>"<span style="color: #ba372a;"><strong>चुंडावत मांगी सैनाणी (निशानी) , शीश काट दे दियो क्षत्राणी" </strong></span></p>
<p> </p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>धन्य है वो मातृभूमि जहां ऐसे वीर ,वीरांगना को जन्म होते है।</strong></span></p>
<p> </p>
<p><span style="color: #4a4a4a; font-family: -apple-system, BlinkMacSystemFont, 'Segoe UI', Roboto, Oxygen, Ubuntu, Cantarell, 'Fira Sans', 'Droid Sans', 'Helvetica Neue', Arial, sans-serif; background-color: #f2f3f5;">नोट : उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</span></p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/hadi-ranis-sacrifice-hindustan-will-remain-indebted-gave-a-sign-by-cutting-off-her-head						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/hadi-ranis-sacrifice-hindustan-will-remain-indebted-gave-a-sign-by-cutting-off-her-head </guid>
					<pubDate>Thu, 31 Mar 2022 13:17:13 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप जीते, मुग़ल सेना लगी थी मैदान छोड भागने						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>उदयपुर के के मीरा कन्या महाविधालय के प्रोफेसर डाक्टर चंद्रशेखर शर्मा ने एक शोध किया । इस शोध में उन्होंने पाया कि हल्दीघाटी की 18 जून 1576 की लड़ाई में महराणा प्रताप ने अकबर को हराया था। डॉ. शर्मा ने अपने रिसर्च में प्रताप की जीत के पक्ष में ताम्र पत्रों के प्रमाण जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय में जमा कराए हैं। शर्मा की खोज के अनुसार युद्ध के बाद अगले एक साल तक महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के आस-पास के गांवों की जमीनों के पट्टे ताम्र पत्र के रूप में बांटे थे, जिन पर एकलिंगनाथ के दीवान प्रताप के हस्ताक्षर हैं। उस समय जमीनों के पट्टे जारी करने का अधिकार सिर्फ राजा को ही होता था। जो साबित करता है कि प्रताप हीं युद्ध जीते थे। </p>
<p> </p>
<p>डॉ. शर्मा ने शोध किया है कि हल्दीघाटी युद्ध के बाद मुगल सेनापति मान सिंह व आसिफ खां के युद्ध हारने से अकबर नाराज हुए थे। दोनों को छह महीनें तक दरबार में नहीं आने की सजा दी गई थी। शर्मा कहते हैं कि अगर मुगल सेना जीतती तो अकबर अपने प्रिय सेनापतियों को दंडित नहीं करते। इससे साफ जाहिर है कि महाराणा ने हल्दीघाटी के युद्ध को संपूर्ण साहस के साथ जीता था।</p>
<p> </p>
<p><img src="https://megaportal.in/uploads/0222/20_1645170408.jpg" alt="" width="640" height="800" /></p>
<p>लोगों का एक खास तबका इस सच्चे ‘इतिहास’ को बहुत पसंद कर रहा है। आइए नजर डालते हैं जून 1576 में हुए हल्दीघाटी के इस युद्ध की ऐसी बातों पर जो अब तक हमारी जानकारी में नहीं रही है। ये जानकारियां सदियों तक सार्वजनिक दायरे से बाहर थी। हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 ई. को खमनोर एवं बलीचा गांव के मध्य तंग पहाड़ी दर्रे से आरम्भ होकर खमनोर गांव के किनारे बनास नदी के सहारे मोलेला तक कुछ घंटों तक चला था । मेवाड़ी सेनाओं ने मुग़लो के छक्के छुड़ा दिए थे । इस युद्ध मे महाराणा प्रताप के सहयोगी राणा पूंजा का सहयोग रहा । इसी युद्ध में महाराणा प्रताप के सहयोगी झाला मान, हाकिम खान,ग्वालियर नरेश राम शाह तंवर सहित देश भक्त कई सैनिक देशहित बलिदान हुए । उनका प्रसिद्ध घोड़ा चेतक भी मारा गया था।</p>
<p> </p>
<p>हल्दीघाटी राजस्थान की दो पहाड़ियों के बीच एक पतली सी घाटी है। मिट्टी के हल्दी जैसे रंग के कारण इसे हल्दी घाटी कहा जाता है। इतिहास का ये युद्ध हल्दीघाटी के दर्रे से शुरू हुआ लेकिन महाराणा वहां नहीं लड़े थे, उनकी लड़ाई खमनौर में चली थी। मुगल इतिहासकार अबुल फजल ने इसे “खमनौर का युद्ध” कहा है । राणा प्रताप के चारण कवि रामा सांदू ‘झूलणा महाराणा प्रताप सिंह जी रा’ में लिखते हैं-“महाराणा प्रताप अपने अश्वारोही दल के साथ हल्दीघाटी पहुंचे, परंतु भयंकर रक्तपात खमनौर में हुआ। ”</p>
<p> </p>
<p><strong><span style="color: #ba372a;">हॉलीवुड फिल्म ‘300’ वाली थी योजना</span></strong></p>
<p>  </p>
<p>2006 में रिलीज हुई डायरेक्टर ज़ैक श्नाइडर की हॉलीवुड फिल्म है ‘300’ । इतिहास के एक चर्चित युद्ध पर बनी इस फिल्म में राजा लियोनाइडस अपने 300 सैनिकों के साथ 1 लाख लोगों की फौज से लड़ता है। पतली सी जगह में दुश्मन एक-एक कर अंदर आता है और मारा जाता है। राणा प्रताप ने इसी तरह की योजना बनाई थी। मगर मुगलों की ओर से लड़ने आए सेनापति मानसिंह घाटी के अंदर नहीं आए। मुगल जानते थे कि घाटी के अंदर इतनी बड़ी सेना ले जाना सही नहीं रहेगा। कुछ समय सब्र करने के बाद राणा की सेना खमनौर के मैदान में पहुंच गई। इसके बाद ज़बरदस्त नरसंहार हुआ। कह सकते हैं कि 4 घंटों में 400 साल का इतिहास तय हो गया। </p>
<p> </p>
<p>महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गये, इसी क्रम में मानसिंह (1573 ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में ) तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश ही किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और हमें हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध देखने को मिला। अल बदायुनी के अनुसार जो युद्ध का गवाह भी था, राणा की सेना में 3,000 घुड़सवारों और लगभग 400 भील धनुर्धारियों की गिनती की, जो मेरजा के प्रमुख पुंजा के नेतृत्व में थे। दोनों पक्षों के पास युद्ध के हाथी थे, लेकिन राजपूतों के पास कोई गोला-बारूद या तोपे नहीं थी। दोनों सेनाओं के बीच असमानता के कारण, राणा ने मुगलों पर एक जोरदार हमला करने का विकल्प चुना, जिससे कई लोग मारे गए। हकीम खान सूर और रामदास राठौर ने मुग़लो को भागने पर मजबूर कर दिया और जबकि राम साह तनवार और भामा शाह ने मुगलो पर कहर बरपाया, जो भागने के लिए मजबूर थे। मुल्ला काज़ी ख़ान और फतेहपुर सीकरी शेखज़ादों के कप्तान दोनों घायल हो गए, लेकिन बरहा के सैयदों ने दृढ़ता से काम किया और माधो सिंह के अग्रिम पंक्ति के लिए पर्याप्त समय दिया।</p>
<p> </p>
<p>मुग़लो को खदेड़ने के बाद, राम साह तोवर ने अपने कमांडर से जुड़ने के लिए खुद को केंद्र की ओर बढ़ाया। वह जगन्नाथ कच्छवा द्वारा मारे जाने तक प्रताप सिंह की सफलतापूर्वक रक्षा में सफल रहे थे। जल्द ही मुगल सेना, माधो सिंह के आगमन से चकित हो घबरा गयी थी,और सामने अकबर की सेना से सैय्यद हाशिम के होश खट्टे हो गए । डोडिया के कबीले नेता भीम सिंह, मुगल सेनापति को अपने हाथी से मार डाला । महाराणा ने अपने हाथी जिसका नाम राम प्रसाद था ,को मैदान में लाने का आदेश दिया। अपने युद्ध के हाथियों के के साथ मेवाड़ियों ने मुग़लो को भागने पर मजबूर कर दिया। राणा प्रताप की तरफ से प्रसिद्ध ‘रामप्रसाद’ और ‘लूना’ समेत 100 हाथी थे। मुगलों के पास इनसे तीन गुना हाथी थे। मुगल सेना के सभी हाथी किसी बख्तरबंद टैंक की तरह सुरक्षित होते थे और इनकी सूंड पर धारदार खांडे बंधे होते थे। राणा प्रताप के पास चेतक समेत कुल 3,000 घोड़े थे। मुगल घोड़ों की गिनती कुल 10,000 से ऊपर थी।लेकिन एक मेवाड़ी योद्धा के सामने 5 मुग़ल थे। धीरे धीरे लड़ाई का ज्वार शिफ्ट हो रहा था और राणा प्रताप ने जल्द ही तीर और भाले से से घायल हो गए। यह महसूस करते हुए कि दिन खत्म होने वाला है और समय के साथ मेवाड़ को महाराणा प्रताप की ज्यादा जरुरत है,वीर बिंदा झाला ने अपने सेनापति से शाही छतरी अपने घोड़े पर लेकर सजा ली और मेवाड़ी मुकुट पहन खुद को राणा बताते हुए मुग़लो की सेना के हुजुम की तरफ चल पड़े। पता था उन्हें ये उनका आखरी युद्ध है। फिर भी जोश और आँखों में चमक लिए उन्होंने सैकड़ो मुगलों को अपनी तलवार का निशाना बना दिया । उनके बलिदान और 350 अन्य सैनिकों जो पीछे रह गए जो समय को खरीदने के लिए लड़े और उनके राणा और उनकी सेना के आधे भाग को मेवाड़ की रक्षा हेतु बचा लिया । </p>
<p> </p>
<p>रामदास राठौर तीन घंटे की लड़ाई के बाद मैदान पर मारे गए लोगों में से एक थे। राम साह टोनवर के तीन बेटे- सलिवाहन, बहान, और प्रताप टोनवार - मृत्यु में अपने पिता के साथ शामिल हो गए। उग्र संघर्ष में एक स्तर पर, बदायुनी ने आसफ खान से पूछा कि मैत्रीपूर्ण और दुश्मन राजपूतों के बीच अंतर कैसे किया जाए। आसफ खान ने जवाब दिया, "जिसको भी आप पसंद करते हैं, जिस तरफ भी वे मारे जा सकते हैं, उसे मार दें, यह इस्लाम के लिए एक लाभ होगा।"</p>
<p> </p>
<p>1572 ईस्वी में राणा उदय सिंह की मृत्यु हो गई और थोड़े समय के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई हुई| राणा प्रताप गोगुन्दा में मेवाड़ के शासक के रूप में सफल हुए। शीघ्र ही बाद में उन्होंने अपनी राजधानी को कुंभलगढ़ नामक एक बहुत सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर दिया। मेवाड़ को अकबर ने लगातार अधीनता स्वीकार करने के लिए उन्हीं शर्तों पर मुगलों की अधीनता में शामिल होने को कहा जो अन्य राजपूत सरदारों को पेश की गई थी। सितम्बर 1572 को राणा प्रताप के दरबार में जलाल खान कुरची अकबर के दूत बनकर आये , पर वह प्रताप को मुगलों के अधिपत्य को स्वीकार करने के लिए समझाने में नाकाम रहे और निराश होकर लौटे। अकबर के दूत राजा यार सिंह जो 1573 में भेजे गए थे वो भी वांछित परिणाम प्राप्त करने में विफल रहे। अक्टूबर 1573 में अकबर ने प्रताप को लुभाने मुगल में अग्रणी राजपूत राजा भगवंत दास कच्छवाहा प्रमुख को भेजने का एक और प्रयास किया। अकबर चाहता था कि महाराणा प्रताप अकबर के दरबार में व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज़ कर मित्रता का हाथ पकड़ दासता स्वीकार कर ले। व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत करने के लिए प्रताप की अनिच्छा भगवंत दास और अकबर के सन्देश की शर्तों को खारिज कर दिया।  </p>
<p> </p>
<p>अकबर राणा प्रताप की व्यक्तिगत उपस्थिति पर जोर देते थे। दूतो द्वारा किए गए असफल प्रयासो के बाद अकबर का रवैया और सख्त हो गया था और फिर फलस्वरूप मान सिंह की कमान के तहत एक शक्तिशाली सेना को राणा प्रताप को दंडित करने के लिए भेजा गया। अकबर की विशाल सेना के सामने राजपूतो ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।</p>
<p> </p>
<p>महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 20000 राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80000 की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने अपना अश्व दे कर महाराणा को बचाया। उनके प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें 17000 लोग मारे गए। यह युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- हकीम खाँ सूरी। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया था । इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों  'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गए ।</p>
<p> </p>
<p><span style="color: #ba372a;">नोट: उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</span></p>
<p> </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/maharana-pratap-won-the-battle-of-haldighati-the-mughal-army-was-engaged-to-leave-the-field						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/maharana-pratap-won-the-battle-of-haldighati-the-mughal-army-was-engaged-to-leave-the-field </guid>
					<pubDate>Fri, 18 Feb 2022 14:18:23 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						देबारी दरवाज़े ने झेले कई युद्ध,वीरता और पराक्रम की कहानी है देबारी						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>3 मार्च 1707 में औरंगजेब की मृत्यु के बाद राजस्थान के राजाओं और महाराजाओं ने अपनी पैतृक सत्ता हासिल करने के लिए देबारी में मेवाड़,मारवाड़ और जोधपुर के राजा के बीच एक सन्धि हूई जिसके अनुसार राजकुमार अजीत सिंह कच्छवाहा ,राजा सवाई जयसिंह व मेवाड़ महाराणा अमरसिंह द्वितीय के मघ्य समझौता हुआ।</p>
<p>समझौता जिसके अनुसार अजीतसिंह की मारवाड़ में, सवाई जयसिंह को आमेर मे पदस्थापित करने तथा महाराणा अमरसिंह द्वितीय की पुत्री का विवाह सवाई जयसिंह से करने एवं इस विवाह से उत्पन्न पुत्र की सवाई जयसिंह का उत्तराधिकारी घाषित करने पर सहमति हुई। महाराजा अजीतसिंह ने वीर दुर्गादास व अन्य सैनिको की मदद से जोधपुर पर अधिकार कर लिया और 12 मार्च, 1707 को उन्होंने अपने पैतृक शहर जोधपुर में प्रवेश किया। बाद में गलत लोंगों के बहकावे में आकर महाराजा अजीतसिंह ने वीर दुर्गादास जैसे स्वामीभक्त वीर को अपने राज्य से निर्वासित कर दिया, जहाॅ से वीर दुर्गादास दुःखी मन से मेवाड़ की सेवा में चले गए।</p>
<p>23 जून 1724 को महाराजा अजीतसिंह की इनके छोटे पुत्र बख्तसिंह की सोते हुए में हत्या कर दी। महाराणा उदय सिंह जी ने जब सन 1559 में अपनी राजधानी उदयपुर बनायी तभी सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण इस देबारी दरवाजे का निर्माण करवाया था। इस दरवाजे ने अनेक उतार-चढ़ाव देखे हैं। अकबर, जहांगीर और औरंगजेब के साथ मेवाड़ में युद्ध में यह दरवाजा दो बार तोड़ डाला गया था। काफी समय बाद महाराणा राज सिंह जी प्रथम ने सन 1629 और 1680 नए सिरे से दरवाजा पुनः बनवाया। उसके बाद आज तक अपनी प्राचीन वैभव की कहानी सुनाने वाले द्वार के साथ अनेक ऐतिहासिक प्रसंग घटनाएं और किंवदंतियां इस दरवाजे से जुड़े हुए है।</p>
<p>एक किवदंती यह भी है कि जिन दिनों महाराणा प्रताप अरावली की गोद में उदयपुर के पश्चिम में 15 किलोमीटर दूर उबेश्वर महादेव मंदिर के पास अपनी सेना के पुनर्गठन में लगे हुए थे तब मुगलों ने उन्हें वहीं घेरने का प्रयास किया। तभी एक आश्चर्यजनक घटना घटी। उबेश्वर महादेव का शिवलिंग बीच में से फट गया और उसमें से करोड़ों मधुमक्खियां निकली और मुगल सेना पर आक्रमण करके उसे देबारी दरवाजे के बाहर तक खदेड़ दिया। उस दिन से मधुमक्खियों ने देबारी दरवाजे पर ही अपना छत्ता बनाकर रहना शुरू कर दिया जिसे आज भी आप छत्तों के रूप में देख सकते है। </p>
<p>एक ओर किवदंती जो कि इस बात को ओर भी प्रमाणित करते हैं वो है इस देबारी दरवाजे के नजदीक 223 वर्ष पुराना एक शिव मंदिर का होना। इस मंदिर का निर्माण महाराणा राज सिंह जी के माता जाला वंशी बसंत कूदी ने महाराणा की मृत्यु के बाद 1817 से 1819 के बीच में करवा कर, उसका नाम राजराजेश्वर महादेव रखा। देबारी दरवाजे को पुराने नाम देव बारी से भी कहा जाता है। देव बारी का अर्थ यहाँ देवताओं की खिड़की भी होता है। यहां पर मंदिर और बावडी है। जमीन से लगभग 15 फुट ऊंचाई पर बना हुआ मंदिर है और यह 20 स्तंभों पर टिका हुआ बहुत ही सुंदर मंदिर है। इसी मंदिर के नजदीक धर्मशाला बनी हुई थी जो 1555 में महारानी सोंगारिजी ने देबारी गेट पर एक बावड़ी और सराय (सराय / यात्रियों के लिए विश्राम गृह) का निर्माण कराया;जो खंडहर हो चुकी है।पास में ही विक्रमी संवत 1736 में जब औरंगजेब ने लड़ाई युद्ध छेड़ा था उनके विरुद्ध देबारी द्वार पर लड़े हुए युद्ध में वीरता दिखाने वाले राठौड़ गोरा सिंह जिन्हें घेर सिंह के नाम से जाना जाता है ,शहीद हो गये जिनकी याद में छतरी बनाई गयी जो अभी अच्छी हालत में नहीं है।</p>
<p> </p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>इतिहासकार : जोगेन्द्र नाथ पुरोहित</strong></span></p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>शोध :दिनेश भट्ट</strong> </span>(न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम) </p>
<p>नोट: उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/debari-darwaza-has-faced-many-wars-the-story-of-valor-and-valor-is-debari						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/debari-darwaza-has-faced-many-wars-the-story-of-valor-and-valor-is-debari </guid>
					<pubDate>Mon, 24 Jan 2022 13:49:09 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						उदयपुर में तोप को माता मान होती है पूजा,भक्त माँगते है मुराद स्लिप और नारियल से ,आते है गुजरात सहित अन्य जगहों से भक्त						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>उदयपुर में तोप माता के मंदिर का इतिहास बहुत पुराना है। उदयपुर को महाद जी सिंधिया की सेनाओं से बचाने इस तोप को वर्तमान रेलवे स्टेशन के सामने बुर्ज पर तत्कालीन मेवाड़ के प्रधानमंत्री अमर चंद बड़वा ने लगवाया था। इस तोप का नाम जगत शोभा तोप है और इसका गोला काफ़ी दूर तक जाता था। एकलिंगगढ़ पर एक ओर तोप दुश्मन भंजक तोप लगवायी गयी और जगत शोभा और दुश्मन भंजक तोप ने छह महीने तक महाद जी सिंधिया को देबारी दरवाज़े तक रोके रखा और मेवाड़ में इनकी सेनाये कभी प्रवेश ही नहीं कर पायी।</p>
<p>कालान्तर में इस तोप को माता का स्वरुप मानकर इसका मंदिर बनवाया गया और नगर निगम उदयपुर के द्वारा छोटा मोटा निर्माण भी किया गया लेकिन ज्यादातर उदयपुर वासी इन तोप माता के मंदिर से अनजान है जबकि गुजरात सहित अन्य जगहों से दर्शनार्थी यहाँ मंन्नत लेकर आते है और नारियल के साथ मन्नत की स्लिप भी चढ़ा कर जाते है।</p>
<p><iframe title="YouTube video player" src="https://www.youtube.com/embed/gp-ej1v_vQs" width="560" height="315" frameborder="0" allowfullscreen="allowfullscreen"></iframe></p>
<p>कवि श्यामल दास ने वीर विनोद में लिखा है, “1769 में, उज्जैन युद्ध के बाद सलूम्बर के रावत भीम सिंह ने महाराणा अरि सिंह द्वितीय को सुझाव दिया, कि पूर्व प्रधान अमर चंद बडवा को वापस बुलाया जाए और उन्हें जिम्मेदारी सौंपी जाए। । तदनुसार महाराणा अमर चंद के निवास पर गए और उन्हें प्रधान की जिम्मेदारी स्वीकार करने की पेशकश की। अमर चंद बडवा द्वारा व्यक्त की गयी बातों के बाद महाराणा ने उन्हें किसी भी हद तक मदद करने का वादा किया।</p>
<p>अमर चंद बडवा ने प्रधानमंत्री के रूप में जिम्मेदारी स्वीकार की और महादजी सिंधिया से प्रतिशोध के रूप में उदयपुर की किलेबंदी शुरू की। उदयपुर आकर अमरचंद बड़वा ने सबसे पहले 9 किलोमीटर लंबी शहरकोट शहर के चारों तरफ बनवायी और चार छोटे गढ़ बनवाये जिसमें इंदरगढ़ सारणेश्वरगढ़, सूरजपोल,अंबावगढ़। अमरचंद ने शहर के चारों ओर इन्द्रगढ़, सारणेश्वरगढ़, सूरजपोल तथा अम्बावगढ़ पर तौपें लगाई। बुर्ज पर 'जगतशोभा' तोप लगाई गई। अन्य बुर्जों में पुरोहितजी की हवेली के पास बुर्ज पर 'शिव प्रसन्न' तोप, अमर ओटा के पास बुर्ज पर 'कटक बिजली' तोप, हाथीपोल व सूरजपोल के पास बुर्ज पर 'जयअम्बा' और 'मस्तबाण' तोपें लगाई गई। एक ओर दरवाजा बनवाया गया जिसका नाम पूर्व में कृष्ण पोल था। यही प्राचीन नाम बाद में किशनपोल में बदल गया।</p>
<p>जब सिंधिया का आक्रमण हुआ ,तब जगत शोभा तोप और दुश्मन भंजक तोप दोनों की जोड़ी ने चमत्कारिक रुप से दुश्मनों को छह माह तक ( सिंधिया सेना ) को गोलों की बरसात से नहला दिया ,फलस्वरूप सिंधिया सेना सन्धि को मजबुर हो गयी।</p>
<p> </p>
<p>नोट: उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/cannon-is-worshiped-as-mother-in-udaipur-devotees-ask-for-wishes-from-slips-and-coconuts-devotees-co						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/cannon-is-worshiped-as-mother-in-udaipur-devotees-ask-for-wishes-from-slips-and-coconuts-devotees-co </guid>
					<pubDate>Fri, 21 Jan 2022 12:54:33 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						महाराणा प्रताप के डर से अकबर लाहौर ले गया राजधानी,प्रताप की मौत की ख़बर पर छलक आये थे अकबर के आँसू						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>महाराणा प्रताप सिंह उदयपुर, मेवाड में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है।उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया।महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था। महाराणा प्रताप की माता का नाम जयवंता बाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था।राणा उदयसिंह केे दूसरी रानी धीरबाई जिसे राज्य के इतिहास में रानी भटियाणी के नाम से जाना जाता है, यह अपने पुत्र कुंवर जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी। प्रताप केे उत्तराधिकारी होने पर इसकेे विरोध स्वरूप जगमाल अकबर केे खेमे में चला जाता है। महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक मेंं 28 फरवरी, 1572 में गोगुन्दा में होता हैै, लेकिन विधि विधानस्वरूप राणा प्रताप का द्वितीय राज्याभिषेक 1572 ई. में ही कुुंभलगढ़़ दुुर्ग में हुआ, दूूूसरे राज्याभिषेक में जोधपुर का राठौड़ शासक राव चन्द्रसेेन भी उपस्थित थे।</p>
<p>1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 20000 राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80000 की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने अपना अश्व (घोड़ा)दे कर महाराणा को बचाया। उनके प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें 17000 लोग मारे गए।मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था,इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गये, इसी क्रम में मानसिंह (1573 ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में )तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे,लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश ही किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और हमें हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध देखने को मिला ।</p>
<p> </p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>हल्दीघाटी का युद्ध</strong></span></p>
<p>ये युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- हकीम खाँ सूरी। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया था । इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह' 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गए ।</p>
<p>इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजयी नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए।अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर ऐसा है नहीं,ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।</p>
<p><strong><span style="color: #ba372a;">दिवेेेेर का युुद्ध</span></strong></p>
<p>राजस्थान के इतिहास 1582 में दिवेर का युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण कर्नल जेम्स टाॅड ने इस युद्ध को "मेवाड़ का मैराथन" कहा ।</p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>सफलता और अवसान</strong></span>:</p>
<p>1579 से 1585 तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उलझा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने 1585 में मेवाड़ से मुगलो से मुक्ति के प्रयत्नों को और भी तेज कर लिया। महाराणा की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया ,उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था ,पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत 1585 में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए,परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई।</p>
<p> </p>
<p><strong>महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया</strong> और महाराणा के स्वर्ग सीधारणे के बाद पुनः आगरा ले आया।'एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।</p>
<p><strong><span style="color: #ba372a;">महाराणा प्रताप सिंह के मृत्यु पर अकबर की प्रतिक्रिया</span></strong></p>
<p>अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था,लेकिन उनकी यह लड़ाई कोई व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम नहीं थी, हालांकि अपने सिद्धांतों और मूल्यों की लड़ाई थी। एक तरह अकबर जो अपने क्रूर साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था,दुसरी तरफ महाराणा प्रताप थे जो अपनी भारत मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जानता था कि महाराणा जैसा वीर कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आंसू आ गए।महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के समय अकबर लाहौर में था और वहीं उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है।अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है:-</p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी</strong></span></p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी</strong></span></p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली</strong></span></p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी</strong></span></p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी</strong></span></p>
<p>अर्थात हे ! गहलोत राणा प्रतापसिंह ,आपकी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निश्वास के साथ आंसू टपकाए। क्योंकि आपने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया। आपने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि आप अपना आडा यानि यश या राज्य तो गवां गये लेकिन फिर भी आपने अपने राज्य की धूरी को बांए कंधे से ही चलाता रहे। आपकीं रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही आप खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गये। आप कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहे और आपका रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा। इसलिए मैं कहता हूं कि आप सब तरह से जीत गये और बादशाह हार गया।</p>
<p>अकबर द्वारा गुजरात की विजय के बाद मेवाड़ ने फिर से ध्यान आकर्षित किया। वह पूरी तरह से जानता था कि मेवाड़ समस्या का समाधान किए बिना उसके अन्य राजपूत राज्यों के साथ गठबंधन स्थिर नहीं हो सका। संयोग से उसी वर्ष (1572) राणा उदय सिंह की मृत्यु हो गई और थोड़े समय के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई हुई। राणा प्रताप गोगुन्दा में मेवाड़ के शासक के रूप में सफल हुए। शीघ्र ही बाद में उन्होंने अपनी राजधानी को कुंभलगढ़ नामक एक बहुत सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर दिया।मेवाड़ को अकबर ने लगातार आधीनता स्वीकार करने के लिए उन्हीं शर्तों पर मुगलों की अधीनता में शामिल करने को कहा जो अन्य राजपूत सरदारों को पेश की गई थी। सितम्बर 1572 को राणा प्रताप के दरबार में जलाल खान कुरची अकबर के दूत बनकर आये पर वह प्रताप को मुगलों के अधिपत्य को स्वीकार करने के लिए समझाने में नाकाम रहे और निराश होकर लौटे। अकबर के दूत राजा यार सिंह जो 1573 में भेजे गए थे वो भी वांछित परिणाम प्राप्त करने में विफल रहे। अक्टूबर 1573 में अकबर ने प्रताप को लुभाने मुगल में अग्रणी राजपूत राजा भगवंत दास कच्छवाहा प्रमुख और को भेजने का एक और प्रयास किया।अकबर चाहता था कि महाराणा प्रताप अकबर के दरबार में व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज़ कर मित्रता का हाथ पकड़ दासता स्वीकार कर ले । व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत करने के लिए प्रताप की अनिच्छा भगवंत दास और अकबर के सन्देश की शर्तों को खारिज कर दिया। अकबर राणा प्रताप की व्यक्तिगत उपस्थिति पर जोर देते थे। दूतो द्वारा किए गए असफल प्रयासो के बाद अकबर का रवैया और सख्त हो गया था और फिर फलस्वरूप मान सिंह की कमान के तहत एक शक्तिशाली सेना को राणा प्रताप को दंडित करने के लिए भेजा गया। युद्ध योजना की निगरानी हेतू अकबर सम्राट 1576 को व्यक्तिगत रूप से अजमेर गए थे पर जैसा कि सर्वविदित है कि मुगल सेना राजपूत सेना पर भारी पड़ी और राणा प्रताप 1576 में हल्दीघाटी के युद्ध के बाद कोलियारी ठिकाने पर आ गए और एक पहाड़ी शहर में शरण ली। इसके बाद सम्राट अकबर राजधानी आगरा लौट गए । राणा प्रताप पर अपनी चोटों से उबरने के बाद कुंभलगढ़ लौट आए अपने खोए हुए भू भाग को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया। मुगलों के खिलाफ राजपूत प्रमुखों के एक समूह का एक गठबंधन करने में उन्होंने सफलता प्राप्त की । प्रताप की इन शत्रुतापूर्ण गतिविधियों का पता अकबर को व्यक्तिगत रूप से अजमेर में ही चल गया और भगवंत दास और मान सिंह को उनके और अन्य के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मेवाड़ की और भेजा। अजमेर में सम्राट अकबर की उपस्थिति मजबूत थी और सैन्य कार्रवाई के वांछित परिणाम आ सकते थे। उधर ईडर और सिरोही के शासको ने एक के बाद एक कर अकबर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और मुग़ल अधिपत्य स्वीकार कर लिया। साथ ही राणा प्रताप को भी गोगुन्दा से भागने के लिए मजबूर किया गया था और वे शाही अधिकार को तब तक टालते रहे जब तक कि उनकी 1597 में मृत्यु हो गई लेकिन मेवाड़ राजपूताना में पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया था । हालांकि कई महत्वपूर्ण सैन्य कमांडर जैसे भगवंत दास (1577) , शाहबाज़ खान कम्बोह (1577),अब्दुर रहीम खान-इकन (1580) और राजा जगमीमथ (1584 ) को उनके खिलाफ भेजा गया लेकिन वे राणा को शाही सेवा में शामिल होने के लिए मजबूर करने में विफल रहे। उन्होंने चावंड में एक नई राजधानी की नींव भी रखी।1597 में उनके बड़े बेटे और उत्तराधिकारी ने अमर सिंह की मृत्यु के बाद कुछ समय के लिए अपने पिता की नीति को जारी रखा। लेकिन लगातार युद्धों के कारण उनकी सैन्य शक्ति में काफी गिरावट आई और उन्होंने अपने कई क्षेत्रों को खो दिया। अमर सिंह ने इसे बेहतर बनाने के लिए कड़ी मेहनत की अपने राज्य के आंतरिक कामकाज और उसके साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश की। अगम ने 1599 में मेवाड़ पर आक्रमण शुरू किया।अकबर ने राजकुमार सलीम के साथ सेना के कमांडर राजा मान सिंह को अजमेर से मेवाड़ जाने को कहा लेकिन सलीम ने ऑपरेशन में कोई दिलचस्पी नहीं ली क्योंकि वह मुगल सिंहासन पर कब्जा करने की साजिश रचने में लगे हुआ था। बाद में उदयपुर की एक छोटी यात्रा करते हुए उन्होंने इसे पूरी तरह से राजा मान सिंह पर छोड़ दिया। इनमें मुग़ल सेनाएँ केवल अटाला में पद स्थापित करने में सफल रहीं और मोही, बागोर, माण्डल ,मांडलगढ़, चित्तौड़ और अन्य स्थानों पर मुग़ल सेना कब्ज़े में असफल रही। कुछ समय बाद मान सिंह को बंगाल जाना पड़ा और उस्मान के विद्रोह के कारण सलीम ने आगरा की ओर प्रस्थान किया। 1603 में एक बार फिर अकबर ने मेवाड़ पर अभियान चलाने का फैसला किया। राजकुमार सलीम के साथ कई प्रमुख राजपूत राजाओ के जैसे साजगरैयाथ, माधो सिंह, सादिक खान आदि) को आदेश दिया कि वे सभी 1599 में अधूरे रह गए कार्य को पूरा करने के लिए मेवाड़ की ओर चलें। लेकिन सलीम ने आदेशों का पालन करने से इनकार कर दिया। बिना किसी और इंतजार के अकबर ने खुसरू को कमान संभालने के लिए नियुक्त किया गया लेकिन अभियान नहीं चल सका। अकबर की बीमारी के बाद उनकी मृत्यु हो गयी ।</p>
<p><strong>स्पष्ट है कि अकबर अपने जीवन काल के दौरान अपने समकालीन सिसोदिया प्रमुख राणा प्रताप और अमर सिंह को पूरी तरह हराने में असफल रहे और मुगलिया सल्तनत का अधिपत्य मेवाड़ पर हो न पाया ।</strong></p>
<p> </p>
<p><em>उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</em></p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/fearing-maharana-pratap-akbar-took-the-capital-to-lahore-akbars-tears-had-spilled-on-the-news-of-pra						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/fearing-maharana-pratap-akbar-took-the-capital-to-lahore-akbars-tears-had-spilled-on-the-news-of-pra </guid>
					<pubDate>Wed, 19 Jan 2022 09:04:37 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						मेवाड़ के राणा कुम्भा की जयंती आज, दुश्मन कांपते थे नाम से						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>राणा कुम्भा (1433-1468 ई०) का जन्म 1423 ई० में चितौडगढ़ दुर्ग में हुआ। राणा कुंभा का राज्यभिषेक 10 वर्ष की आयु में 1433 ई० में चितौडगढ़ दुर्ग में हुआ। राजस्थान में कला व स्थापत्य कला की दृष्टि से राणा कुंभा का काल स्वर्ण काल कहलाता है। राणा कुंभा को स्थापत्य कला का जनक कहते है।कुंभा के पिता का नाम मोकल व माता का नाम सौभाग्यदेवी था। <span style="color: #ba372a;"><strong>राणा कुंभा को हाल गुरू (गिरी दुर्गों का स्वामी), राजगुरू (राजनीति में दक्ष), राणारासो, अभिनव भरताचार्य , नाटकराजक (कुंभा ने 4 नाटक लिखे), प्रज्ञापालक, रायरायन, मराजाधिराज, महाराणा, चापगुरू (धनुर्विद्या में पारंगत ),शैलगुरू, नरपति,परमगुरू,हिन्दू सूत्राण,दान गुरू,तोडरमल (संगीत की तीनों विधाओं में श्रेष्ठ), नंदनदीश्वर(शैव धर्म का उपासक) आदि उपाधियां</strong></span> प्राप्त थी।राणा कुंभा को अश्वपति, गणपति, छाप गुरू (छापामार पद्धति में कुशल) आदि सैनिक उपाधियां भी प्राप्त थी।</p>
<p>मेवाड़ के राणा कुम्भा व मारवाड़ के राव जोधा के बीच <strong>आवल-बावल की संधि</strong> हुई। इस संधि के द्वारा मेवाड़ व मारवाड़ की सीमा का निर्धारण किया गया तथा जोधा ने अपनी पुत्री श्रृंगारी देवी का विवाह राणा कुम्भा के पुत्र रायमल से किया। इसकी जानकारी श्रृंगारी देवी द्वारा बनाई गयी घोसुण्डी की बावड़ी (चितौडग़ढ) पर लगी प्रशस्ति से मिलता है।</p>
<p>राणा मोकल के पश्चात् उनके ज्येष्ठ पुत्र कुम्भा वि.सं. १४९० (ई.सं. १४३३) में चित्तौड़ के राज्य सिंहासन पर बैठे । कुम्भा राजाओं का शिरोमणि, विद्वान, दानी और महाप्रतापी था। राणा कुम्भा ने गद्दी पर बैठते ही सबसे पहले अपने पिता के हत्यारों से बदला लेने का निश्चय किया। राणा मोकल की हत्या चाचा, मेरा और महपा परमार ने की थी। वे तीनों दुर्गम पहाड़ों में जा छिपे। इनको दण्डित करने के लिए रणमल राठौड़ (मण्डर) को भेजा। रणमल ने इन विद्रोहियों पर आक्रमण किया। रणमल ने चाचा और मेरा को मार दिया, किन्तु महपा चकमा देकर भाग गया। चाचा का पुत्र और महपा ने भागकर माण्डू (मालवा) के सुलतान के यहाँ शरण ली। राणा ने अपने विद्रोहियों को सुपुर्द करने के लिए सुल्तान के पास सन्देश भेजा। सुल्तान ने उत्तर दिया कि मैं अपने शरणागत को किसी भी तरह नहीं छोड़ सकता। अतः दोनों में युद्ध की सम्भावना हो गई।</p>
<p>वि.सं. १४९४ (1437 ई०) में सारंगपुर के पास मालवा सुल्तान महमूद खिलजी पर राणा कुम्भा ने आक्रमण किया। सुल्तान हारकर भाग गया और माण्डू के किले में शरण ली। कुम्भा ने माण्डू पर आक्रमण किया। अन्त में सुल्तान पराजित हुआ और उसे बन्दी बनाकर चित्तौड़ ले आए। उसे कुछ समय कैद में रख कर क्षमा कर दिया। इस <strong>विजय के उपलक्ष में राणा कुम्भा ने चित्तौड़ दुर्ग में कीर्ति स्तम्भ</strong> बनवाया । विजय स्तम्भ भगवान विष्णु को समर्पित है अत: इसे विष्णु ध्वज या विष्णु स्तम्भ भी कहते है।विजय स्तम्भ के शिल्पी जैता, नापा और पुंजा थे। <strong>विजयस्तम्भ 122 फीट ऊँचा व 9 मंजिला इमारत है। इसमें 157 सीढ़ीयां है और यह राणा कुंभा के समय की सर्वाेतम कलाकृति है। विजय स्तंभ बनाने में उस समय कुल 90 लाख रूपये खर्च हुए। कर्नल टॉड ने विजय स्तंभ को कुतुब मिनार से बेहतरीन इमारत बताया है तथा फग्र्यूसन ने विजय स्तंभ की तुलना रोम के टार्जन से की है।</strong></p>
<p><strong>राणा कुम्भा ने अपने प्रबल प्रतिद्वन्द्वी मालवा के शासक हुसंगशाह को परास्त कर 1448 ई. में चित्तौड़ में एक ‘कीर्ति स्तम्भ’</strong> की स्थापना की। स्थापत्य कला के क्षेत्र में उसकी अन्य उपलब्धियों में मेवाड़ में निर्मित 84 क़िलों में से 32 क़िले हैं, जिसे राणा कुम्भा ने बनवाया था। मध्यकालीन भारत के शासकों में राणा कुम्भा कि गिनती एक महान् शासक के रूप में होती थी।</p>
<p>कुंभलगढ़ दुर्ग कुंभा द्वारा अपनी पत्नी कुंभलदेवी की याद में 1443-59 ई० के बीच बनवाया गया। <strong>कुंभलगढ़ दुर्ग को कुंभलमेर दुर्ग,मछींदरपुर दुर्ग,बैरों का दुर्ग, मेवाड़ के राजाओं की शरण स्थली, कुंभपुर दुर्ग, कमल पीर दुर्ग</strong> भी कहा जाता है। कुंभलगढ़ दुर्ग में कृषि भूमि भी है। अत: कुंभलगढ़ दुर्ग को राजस्थान का आत्मनिर्भर दुर्ग कहा जाता है। कुंभलगढ़ दुर्ग में 50 हजार व्यक्ति निवास करते थे। कुंभलगढ़ दुर्ग हाथी की नाल दर्रे पर अरावली की जरगा पहाड़ी पर कुंभलगढ़ अभयारण्य में राजसमंद जिले में स्थित है। कुंभलगढ़ दुर्ग की प्राचीर भारत में सभी दुर्गों की प्राचीर से लम्बी है। इसकी प्राचीर 36 किमी० लम्बे परकोटे से घिरी है। अत: इसे भारत की मीनार भी कहते है। इसकी प्राचीर पर एक साथ चार घोड़े दौड़ाए जा सकते है। कुंभलगढ़ दुर्ग के लिए अबुल फजल ने कहा है कि ‘यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना है कि नीचे से ऊपर देखने पर सिर पर रखी पगड़ी गिर जाती है।’कर्नल टॉड ने कुंभलगढ़ दुर्ग की दृढ़ता के कारण इसको ‘एट्रूस्कन’ दुर्ग की संज्ञा दी है।</p>
<p>1456 ई० में गुजरात के कुतुबद्दीनशाह व मालवा शासक महमूद खिलजी प्रथम के बीच कुम्भा के विरूद्ध चम्पानेर की संधि हुई। इस संधि में तय किया गया कि दोनों मेवाड़ के राणा कुंभा को मारकर मेवाड़ आपस में बांट लेंगे। लेकिन कुम्भा ने इस संधि को विफल कर दिया। कुम्भगढ़ दुर्ग में सबसे ऊँचाई पर बना एक छोटा दुर्ग कटारगढ़ है। जहाँ से पूरा मेवाड़ दिखाई देता है अत: <strong>कटारगढ़ दुर्ग को मेवाड़ की आंख</strong> कहते है। कटारगढ़ दुर्ग/मामदेव मंदिर कुम्भा का निवास स्थल था तथा इसी दुर्ग में कुम्भा के पुत्र ऊदा/उदयकरण ने कुम्भा की हत्या की।कुंभलगढ़ दुर्ग में पन्नाधाय उदयसिंह को बचा कर लाई थी तथा कुम्भगढ दुर्ग में ही 1537 ई० में उदयसिंह का राज्यभिषेक हुआ। कटारगढ़ दुर्ग (कुंभलगढ़ दुर्ग) में 9 मई 1540 ई० को महाराणा प्रताप का जन्म हुआ। हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई०) के बाद 1578 ई० ई में महाराणा प्रताप ने कुंभलगढ़ दुर्ग को अपनी राजधानी बनाया तथा यहीं महाराणा प्रताप का 1578 ई० में दूसरा व औपचारिक राज्यभिषेक हुआ।</p>
<p>राणा कुंभा द्वारा रचित रसिकप्रिया (जयदेव की गीतगोविन्द पर टीका) तथा अत्रि व महेश द्वारा विजय स्तम्भ पर लिखी गयी कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति (1460) में राणा हम्मीर को विषमघाटी पंचानन (युद्ध में सिंह के समान) बताया गया है। चितौड़ का नाम धाई बा पीर की दरगाह के अभिलेख में मिलता है। <strong>राणा कुम्भा ने अचलगढ़ दुर्ग (सिरोही) का पुन:निर्माण करवाया, बंसतीगढ दुर्ग (सिरोही), भीलों से सुरक्षा हेतु भोमट दुर्ग (सिरोही) तथा मेरों के प्रभाव को रोकने के लिए बैराठ दुर्ग (बदनौर, भीलवाड़ा) का निर्माण करवाया।</strong> भोमट क्षेत्र भीलों का निवास क्षेत्र कहलाता है।</p>
<p>कुम्भा ने <strong>संगीतराज, संगीतसार, संगीत मीमांशा, सूढ प्रबंध व रसिकप्रिया</strong> (जयदेव की गीत गोविन्द पर टीका) आदि ग्रंथों की रचना की। कुंभा द्वारा लिखे गए संगीत ग्रंथों में सबसे बड़ा ग्रंथ संगीतराज है।कुंभा का संगीत गुरू सारंगव्यास था तथा चित्रकला गुरू हीरानंद था। हीरानंद ने 1423 ई में (राणा मोकल के समय) मेवाड़ चित्रकला शैली का सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘सुपास नाहचरियम’ की रचना की।कुम्भा की पुत्री रमाबाई संगीत की विदुषी थी जिसे वागेश्वरी की उपाधि प्राप्त थी। कुम्भा का दरबारी कवि कान्हव्यास था जिसने एकलिंगनाथ माहात्मय (संस्कृत भाषा) की रचना की। एकलिंग महात्मय संगीत के स्वरों से संबंधित ग्रंथ है। जिसका प्रथम भाग राजवर्णन कुम्भा द्वारा लिखा गया है। राणा कुम्भा के समय 1439 ई० में पाली में राणकपुर के जैन मन्दिर (कुम्भलगढ अभयारण्य) में का निर्माण धरणक सेठ द्वारा करवाया गया इन मंदिरों का शिल्पी देपाक/ देपा था।रणकपुर के जैन मंदिर मथाई नदी के किनारे स्थित है। रणकपुर के जैन मन्दिरो को चौमुखा मन्दिर भी कहते है। यह मन्दिर प्रथम जैन तीर्थकर आदिनाथ (ऋषभदेव) को समर्पित है।रणकपुर के जैन मन्दिर में 1444 खम्भे है। अत: इन्हें वनों का मन्दिर या खम्भों का मन्दिर या स्तम्भों का वन भी कहते है।राणा कुम्भा द्वारा बदनौर (भीलवाड़ा) में कुशाल माता का मंदिर बनवाया गया।कुंभा ने चितौडगढ़ दुर्ग का पुन: निर्माण करवाया। कुंभा धर्म सहिष्णु शासक था। उन्होंने आबू पर जाने वाले तीर्थ यात्रियों से लिया जाने वाला कर भी समाप्त कर दिया था।</p>
<p> </p>
<p><span style="color: #ba372a;">उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है</span></p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/today-the-birth-anniversary-of-rana-kumbha-of-mewar-enemies-trembled-at-the-name						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/today-the-birth-anniversary-of-rana-kumbha-of-mewar-enemies-trembled-at-the-name </guid>
					<pubDate>Fri, 14 Jan 2022 12:14:38 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						न काशी विश्वनाथ का ज्योतिर्लिंग और न उदयपुर का जगदीश मंदिर तोड़ पाया औरंगजेब						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को बाबा विश्वनाथ के मंदिर में पूजा-अर्चना करने के बाद ‘काशी विश्वनाथ कॉरिडोर’ का लोकार्पण किया। पीएम मोदी ने कहा-" आतातायियों ने इस नगरी पर आक्रमण किए, इसे ध्वस्त करने के प्रयास किए हैं। औरंगजेब के अत्याचार, उसके आतंक का इतिहास साक्षी है,  जिसने सभ्यता को तलवार के बल पर बदलने की कोशिश की। जिसने संस्कृति को कट्टरता से कुचलने की कोशिश की।  लेकिन इस देश की मिट्टी बाकी दुनिया से कुछ अलग है, यहां अगर औरंगजेब आता है तो शिवाजी भी उठ खड़े होते हैं।  </p>
<p>कुछ ऐसे शिवाजी मेवाड़ की धरा में इतिहास में पहले ही अपनी उपस्थिति दर्शा चुके थे वो भी एक नहीं 20 और एक ही काल खंड में। ऐसे शिवाजी रूपी योद्धा जिन्होंने केवल 20 साथियों के दम पर तत्कालीन इतिहास के भारत के सबसे समृद्ध मंदिरो में एक जगदीश मंदिर को औरंगजेब की हज़ारो आतताइयों की फौज से बचाया था। इस मन्दिर को महाराणा जगत सिंह जी प्रथम ने 6 लाख रूपये लगाकर 1652 ईस्वी में बनवाया था।</p>
<p><strong>आखिर औरंगजेब को मंदिरों से क्‍या थी दिक्‍कत ?</strong></p>
<p>औरंगजेब ने अपने शासन में बनारस के विश्वनाथ मंदिर,उदयपुर के जगदीश मंदिर और मथुरा के केशव राय मंदिर को तुड़वाने का प्रयास किया था। साथ ही अपने शासनकाल में कई हिंदू विरोधी फैसले जैसे- लाखों हिंदुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनने पर मजबूर किया था। औरंगजेब की सेना </p>
<p>ने 1669 ने बनारस विश्वनाथ मंदिर को ध्‍वस्त कर दिया था, लेकिन शिवलिंग और नंदी की प्रतिमा को नुकसान नहीं पहुंचा पाया। वैसे ही औरंगजेब की सेना को जगदीश मंदिर ध्वस्त करने में मुँह की खानी पड़ी थी। केवल 20 मुट्ठीभर मेवाड़ी माचातोड़ योद्धाओं ने औरंगजेब की विशाल सेना को पुरे दिन छका दिया और 20 योद्धाओं के पराक्रम के आगे मुग़ल सेना इतनी डर गयी थी कि ये जगदीश मंदिर को भी ज्यादा नुकसान नहीं पंहुचा सकी और केवल मंदिर के बाहर की दीवारों की कुछ मूर्तियों को ही ध्वस्त कर सकी और मुख्य गर्भ ग्रह को कोई नुकसान भी नहीं पहुँचा सकी थी। </p>
<p><strong>वही दूसरी और बनारस के विश्वनाथ मंदिर में हमले के दौरान ज्योतिर्लिंग को बचाने के लिए मंदिर के महंत शिवलिंग को लेकर ज्ञानवापी कुंड में कूद गए थे। साथ ही मुगल सेना मंदिर प्रांगण में स्‍थापित विशाल नंदी की प्रतिमा को तोड़ पाने में भी असफल रही थी। </strong></p>
<p>प्रसिद्ध इतिहासकार रिचर्ड ईटन के अनुसार, मुगल शासन के दौरान जो भी मंदिर तोड़े गए, उसके पीछे का कारण राजनीतिक ही रहा। ईटन के मुताबिक, वही मंदिर तोड़े गए जिनमें विद्रोहियों को शरण मिलती थी या फिर जहां शासन के खिलाफ साजिश रची जाती थी या ऐसे शासक जो औरंगजेब के खिलाफ थे ,उनके शहर और मंदिरों को तोड़ने का फरमान औरंगजेब जारी किया करता था। </p>
<p><strong>जगदीश मंदिर का निर्माण और प्रतिष्ठा महाराणा जगतसिंह ने 13 मई 1652 ईस्वी (चैत्रादि वि.स.1703 वैशाखी पूर्णिमा ) गुरुवार के दिन भव्य समारोह के साथ की थी। समारोह भी ऐसा जिसमे उस समय पूरे शहर सहित समूचे मेवाड़ को आमंत्रित किया गया। महाराणा ने हज़ार गायें ,सैकड़ो हाथी,घोड़े,सोना और 05 गाँवो को मन्दिर व्यवस्था हेतू ब्राह्मणों को दान किया था।</strong> साथ ही मंदिर बनाने वाले सूत्रधार भाणा उसके पुत्र मुकुंद को सोने और चाँदी के हाथी के साथ चित्तौड़ के पास एक गांव दान किया गया।</p>
<p><strong>सिन्धुर दीधा सातसै ,हय वय पाँच हज़ार।</strong></p>
<p><strong>एकावन सासन दिया,जगपत जगदातार।।</strong></p>
<p><strong>'अर्थात जगत के दाता जगत सिंह 700 हाथी ,5 हज़ार घोड़े और 51 गाँव दान किये।'</strong></p>
<p>जगदीश मंदिर की प्रशस्ति शिला प्रथम श्लोक 110 -111 के अनुसार उस समय महाराणा जगतसिंह ने लाखों रुपयों का कल्पवृक्ष जो स्फटिक की वेदी पर बना था जिसके मूल में नीलम मणि ,सर पर वैडूर्यमणि (लहसनिया) और कंधो पर हीरे ,शाखों पर मरकत (माणिक) ,पत्तो की जगह विद्रुम (मूंगा) और उसके नीचे ब्रह्मा,विष्णु ,शिव और कामदेव की मूर्तियाँ बनी थी। ये दान वि.सम्वत 1705 भाद्रपद सुदि 3 के दिन ब्राह्मणों को दिया गया था।</p>
<p><strong>मन्दिर का वैभव धीरे धीरे दिल्ली के बादशाह के कानों तक भी पहुँचा । उस पर औरंगजेब ने जब 1679 ईस्वी में हिन्दुओं पर जजिया कर (टैक्स) लगाया ,तब इस कर का सशक्त और मुखर विरोध महाराणा राजसिंह ने किया। बादशाह औरंगजेब तिलमिला उठा और उसने मेवाड़ सहित जगदीश मंदिर को लूटने का प्रण लेकर मेवाड़ की ओर कूच कर डाली। </strong></p>
<p><strong>1679 ई. तक औरंगज़ेब समूचे उत्तर भारत के मंदिरों को लूट चूका था।</strong> शहर के शहर बरबाद करता चला जाता उसका कारवाँ। उसके सिपाही न सिर्फ लूटपाट करते बल्कि राज्य की खूबसूरत महिलाओं के साथ बलात्कार करते या उन्हें बन्दी बनाकर सिपाहियों के हरम में ले जाते। सिपाहियों का हरम किसी नरक (दोज़ख ) से कम नहीं होता जहाँ बमुश्किल ही कोई सात दिन जी पाता हो ! बच्चों और आदमियों को उनके सामने पहले की मार दिया जाता वो भी वीभत्स मौत के साथ।</p>
<p>1679 ई.से ही औरंगज़ेब के जेहन में राजपुताना के एक ही रियासत 'मेवाड़' को रौंदने का मन था और जनवरी 1680 की तेज़ कड़कड़ाती ठण्ड में उसकी सेनाओं ने मेवाड़ की सीमा पर आकर डेरा डाल लिया। सैनिक इतने जितने मेवाड़ में नागरिक नहीं और हर मेवाड़ी योद्धा के सामने औरंगज़ेब के 10 योद्धा थे।</p>
<p>तत्कालीन शूरवीर महाराणा राजसिंह द्वारा फौजी जमावड़ा महीनों पहले से चल रहा था। उन्हें पता था कि किस तरह जनता को सबसे पहले बचाना है।</p>
<p>बादशाह औरंगज़ेब ने शहज़ादे मुहम्मद आज़म, सादुल्ला खां, इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां को उदयपुर पर हमला कर वहां के मन्दिर वगैरह तोड़ने के साथ उदयपुर को लूटने भेजा।</p>
<p>महाराणा राजसिंह ने अपने जिग़र के टुकड़े को गिर्वा की पहाड़ियों पर कुँवर जयसिंह (महाराणा के पुत्र व भावी महाराणा) को तैनात कर दिया। देसूरी की नाल के इलाक़े में बदनोर के सांवलदास राठौड़ को कमान सौंपी गयी थी। बदनोर-देसूरी के पहाड़ी भाग पर विक्रमादित्य सौलंकी व गोपीनाथ घाणेराव युद्ध के लिए तैयार थे। मालवा सीमा पर मंत्री दयालदास को नियुक्त किया गया। देबारी,नाई और उदयपुर के पहाड़ी नाकों पर स्वयं महाराणा राजसिंह तैनात हुए।</p>
<p>वो दिन आ ही गया जब मुगल फौज लड़ते हुए उदयपुर आ पहुंची, तो वहां इन्होंने पूरा उदयपुर खाली पाया।</p>
<p>महाराणा राजसिंह प्रजा व सेना सहित अरावली के पहाड़ों में जा चुके थे। सादुल्ला खां व इक्का ताज खां फौज समेत उदयपुर के जगदीश मंदिर के सामने पहुंचे, जो कि उदयपुर के सबसे प्रसिद्ध मंदिरों में से एक था व इसको बनाने में भारी धन (उस समय के लगभग 6 लाख रूपये ) खर्च हुआ था।</p>
<p>इस मंदिर की रक्षा के लिए <strong>नरू बारहठ</strong> सहित कुल 20 योद्धा तैनात थे, जिसका विवरण सुनकर आप की आँखे भीग जाएँगी। जब महाराणा राजसिंह राजपरिवार व सामंतों और जनता सहित पहाड़ों में प्रस्थान कर रहे थे तब किसी सामन्त ने महाराणा के बारहठ नरू को ताना दिया कि " <strong>जिस दरवाज़े पर तुमने बहुत से दस्तूर (नेग) लिए हैं, उसको लड़ाई के वक़्त ऐसे ही कैसे छोड़ोगे ?</strong>"</p>
<p>नरू बारहठ साहब एक क्षण मौन के बाद हुंकारे - "<strong>जब तक नरु बारहठ के धड़ पर शीष रहेगा तब तक ठाकुर जी (जगदीश मन्दिर) की सीढ़िया कोई आतातायी नहीं चढ़ सकेगा। एकलिंग विजयते नमः"</strong>।</p>
<p>नरू बारहठ के अपने 20  साथी भी कहाँ मानने वाले थे और वे भी उनके साथ यहीं रुक गए।</p>
<p>पूरा उदयपुर ख़ाली था। घण्टाघर से हाथीपोल तक संन्नाटा। एक भी आदमी नहीं। यहाँ तक कि शहर के स्वानो तक को अनहोनी की आशंका हो गयी थी शायद। वो भी गायब थे लेकिन तोते और चिड़ियाओं की आवाज़े सुनसान मरघट जैसे सन्नाटे को यदा कदा चीर रही थी।</p>
<p>सबसे पहले नरु के साथियों ने शहर के सारे मंदिरों की पूजा की।कई शंख एक साथ ऐसे बजाये गए मानों सैकड़ो लोग रणभेरी बजा रहे हो। ठण्ड की इस रात में भी सभी की भुजाएँ फड़क रही थी। मौत का कोई खौंफ नहीं। आँखों में इतना तेज़ मानो सूरज की रश्मियाँ हो।</p>
<p>निर्देशानुसार रात सभी लोग जगदीश मंदिर आ गए।</p>
<p>मेवाड़ (उदयपुर) के सारे दरवाजे जैसे उदियापोल ,किशनपोल,एकलिंगगढ़,ब्रह्मपोल,गड़िया देवरा पोल ,हाथीपोल और दिल्ली दरवाजा बंद किये जा चुके थे। लेकिन उस रात दिवाली मनायी गयी थी मेवाड़ के हर दरवाज़े पर सैकड़ो मशालें और दीप जलायें थे नरु के साथियों ने। <strong>मुग़ल फौज इतनी खौफ़जदा थी कि उसने रात में शहर पर हमला करने की हिम्मत न की।</strong> उधर नरु और साथियों ने आखिरी आरती की जगदीश मन्दिर में। एक दूसरे को बधाइयाँ दी गयी शहीद हो जाने की ख़ुशी में। शस्त्रों की पूजा के बाद अश्वों की पूजा की गयी।</p>
<p>केसरिया बाना (पगड़ी) पहने हर योद्धा इतरा रहा था। सभी मन्दिर के पीछे अपने घोड़ों के साथ मरने के लिए तैयार खड़े थे। एक ही सुर में तेज़ आवाज़े जगदीश मंदिर से पूरे शहर में गूंझ रही थी " <strong>एकलिंगनाथ की जय ! जय माता दी ! हर हर महादेव। हर हर महादेव।</strong> हर मेवाड़ी योद्धा की आँखों में ख़ून उतर आया था।</p>
<p>आखिर वो घडी आ गयी जब सारे दरवाजे तोड़ते हुए सुबह 9 बजे के के करीब मुगल फौज जगदीश मंदिर के पास ढलान पर भटियाणी चौहटा और घण्टाघर तक आ गयी। औरंगज़ेब के शहज़ादे मुहम्मद आज़म, सादुल्ला खां, इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां की सेना अब भी आगे बढ़ने से कतरा रही थी क्योंकि पूरा उदयपुर खाली था और रात तक शंख नाद की आवाज़े आ रही थी। हुंकारे आ रही थी। सेना के साथ शहज़ादे मुहम्मद आज़म भी किसी अनहोनी की आशंका में थे। सादुल्ला खां ने अपने खास 50 सिपाहियों की टोली को आगे टोह लेने भेजा। जगदीश चौक तक आते आते सब के सब 50 हलाक कर दिए गए। खून से सड़क लाल हो चुकी थी। रक्त बहता हुआ ढलान में मुग़ल सेना की ओर आता दिखा। मुग़ल सेना में हड़कम्प मच गया।</p>
<p>स्थिति को इक्का ताज खां और रुहुल्ला खां ने सम्भाला और सेना से आगे बढ़ने को कहा। तभी हर हर महादेव के नारे बुलंद हो उठे। सुनसान शहर थर्रा उठा। मंदिर की उत्तर वाले दरवाज़े (जहाँ आज स्कूल है )से एक योद्धा लड़ने के लिए बाहर आया और ऐसी गति मानों बिजली चलीं आ रही हो। केसरिया बाना पहने पहला माचातोड़ यौद्धा अपना अंतिम कर्तव्य निभाने निकल चूका था। हर हर महादेव के हुंकार और घोड़े की टाप की आवाज़ों के साथ पत्थर सड़को पर खुर ज्यादा ही आवाज़ कर रहे थे।हर माचातोड़ यौद्धा कम से कम 50 दुश्मनों को मारकर ही अपना जीवन धन्य समझता। जैसे ही एक माचातोड़ यौद्धा शहीद होता उसी समय दूसरा माचातोड़ यौद्धा ढलान मे हूंकार भरता हुआ नीचे मुग़ल ख़ेमे में घुस कर कई मुग़लो को फ़ना कर देता।ऐसे ही मंदिर से एक-एक कर माचातोड़ यौद्धा बाहर आते गए। शाम होने चली आयी थी।</p>
<p><strong>मुग़ल सेना सदमे में डरी हुई थी और हैरान भी थी माचातोड़ यौद्धा की वीरता पर। मुग़ल सेना में माचातोड़ यौद्धा को लेकर फुस फुसाहट हो रही थी और हर कोई नए माचातोड़ यौद्धा का इंतज़ार कर रहा था। किसी को पता नहीं था ऐसे कितने ओर माचातोड़ यौद्धा अभी भी छिपे है ऊपर मन्दिर की ओर ?</strong></p>
<p>लेकिन समय और नियति पहले ही नरु बारहठ की वीरता का किस्सा लिख चुकी थी। आखिर में नरू बारहठ बाहर आए और बड़ी बहादुरी से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। केसरिया बाना पहने जिन्दा रहते हुए उनकी तलवार ने कई मुग़ल सिप्पसालारो को हलाक कर दिया। शीश कटने के बाद भी उनका धड़ तलवार चलाता रहा। मुग़ल सैनिक इधर उधर भागते फ़िरे। नरू बारहठ के शहीद होते ही मुग़ल सेना ने डर कर एक घण्टे ओर इंतज़ार किया। उसके बाद बादशाही फौज ने जगदीश मंदिर में मूर्तियों को तोड़कर मंदिर को तहस-नहस कर दिया।</p>
<p>महाराणा राज सिंह मारवाड़ के अजीत सिंह के मामा थे। एक बार मुगलों से एक राजकुमारी को बचाने के लिए और एक बार औरंगजेब द्वारा लगाए गए जजिया कर की निंदा करके राज सिंह ने औरंगजेब का कई बार विरोध किया। राणा राज सिंह को मथुरा के श्रीनाथजी की मूर्ति को संरक्षण देने के लिए भी जाना जाता है, उन्होंने इसे नाथद्वारा में रखा था। कोई अन्य हिंदू शासक अपने राज्य में श्रीनाथजी की मूर्ति लेने के लिए तैयार नहीं था क्योंकि इसका मतलब मुगल सम्राट औरंगजेब का विरोध करना होगा, जो उस समय पृथ्वी पर सबसे शक्तिशाली व्यक्ति था। </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/aurangzeb-was-unable-to-break-neither-the-jyotirlinga-of-kashi-vishwanath-nor-the-jagdish-temple-of-						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/aurangzeb-was-unable-to-break-neither-the-jyotirlinga-of-kashi-vishwanath-nor-the-jagdish-temple-of- </guid>
					<pubDate>Tue, 14 Dec 2021 22:03:08 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						मेवाड़ के महाराणाओ के राज्य काल में बैंक की व्यवस्था और जोरावरमल बापना की हवेली						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>महाराणा भीमसिह जी ने अपने राज्य काल में इन्दौर के प्रसिद्ध व्यापारी जोरावर मल बापना को बुलवाया और एक सरकारी दुकान कायम करवाई जिसे रावली दुकान कहा जाता था और इसकी तुलना आधुनिक बैंक से की जा सकती है। महाराणा भीमसिह जी ने जोरावर मल बापना को कहा कि राज्य के काम में जो रूपये खर्च हो वह तुम इस दुकान से दो और राज्य की सारी आय तुम्हारे यहां जमा रहेगी। आम आदमी भी इस रावली दुकान से रकम साहुकारी ब्याज दर पर ले सकता था।</p>
<p>यह व्यवस्था चलती रही लेकिन बाद में महाराणा स्वरुप सिंह जी के काल में अकाल की वजह से मेवाड़ राज्य पर कर्ज हो गया और यह रकम बीस लाख रुपए थी।महाराणा स्वरुप सिंह जी इस कर्ज का निपटारा करना चाहते थे। यह बात जोरावर मल बा‌पना को महाराणा के मध्यस्तो के द्वारा पता लगी।</p>
<p>महाराणा के मन में भी संकोच था कि कहीं बात खाली नहीं चली जाए ! यह एक स्वाभाविक बात थी।</p>
<p>तब जोरावर मल बा‌‌पना की हवेली जो कि जड़ियों की औल ,बदनौर कि हवेली के पास स्थित है, में महाराणा को पामणा अर्थात मेहमान बना कर पधरावणि करी और यह एक बहुत ही बडी इज्जत मानी जाती थी जिसमे एक विशाल कार्यक्रम होता था। कार्यक्रमानुसार महाराणा जोरावर मल बापना की हवेली में पधारे।</p>
<p>महाराणा के मन में उस समय भी संशय था कि क्या बापना उनकी बात बिना किसी शर्त मानेंगे ?अतः महाराणा ने परीक्षा ली कि जिसके सामने वो वैठे है उसका इतना वकार भी है या नहीं?</p>
<p>तब खाना खाते हुए महाराणा ने कहा तुमने खाने मे घी इतना डाला कि मेरे हाथ कि अंगुठी फिसलकर खो गई है।</p>
<p>जोरावर मल बा‌‌पना तुरन्त महाराणा का इशारा समझ गया उसने तुरन्त नौकरों को कहा कि अंगुठी ढूंढकर लाओ। सेठ का इशारा पाकर नौकर थाली भर भर कर जवाहरात ओर जेवर लाकर सेठ के सामने रखते। तब सेठ ने महाराणा से विनय कि अभी अंगुठी ढूंढवाता हूँ। जोरावर मल के इस वैभव को देखकर महाराणा अभिभुत हुए और विश्वास के साथ कर्ज सम्बंधित अपनी बात रखी।</p>
<p>28 मार्च 1846 को जोरावर मल बापना की हवेली से मेवाड़ के कर्ज का निपटारा हो गया।</p>
<p>तब जोरावर मल बापना को नगर सेठ की उपाधि से नवाज़ा गया और जिकारा, ताजिम और पालकी की इज्जत उन्हें बख्शी गयी।</p>
<p>यह हवेली आज भी अपने वैभव कि दास्तां कि गवाह हैं। कुछ हिस्से में होटल बन गई और कुछ में किरायेदार है। कुछ हिस्सा जर्जर है। नगर निगम को इसे हेरिटेज वॉक में डालकर इसका इतिहास बाहर लगाना चाहिए ताकि पर्यटक बाहर से गोखडे दरवाजे देख कर वैभव की शान इस जोरावर मल बापना हवेली को निहार कर मेवाड़ के इतिहास को जान सके।</p>
<p>इतिहासकार : जोगेन्द्र राजपुरोहित</p>
<p> </p>
<p>शोध :दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</p>
<p> </p>
<p>Email: erdineshbhatt@gmail.com</p>
<p> </p>
<p> </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/bank-arrangement-and-joravarmal-bapna-ki-haveli-during-the-reign-of-maharana-of-mewar						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/bank-arrangement-and-joravarmal-bapna-ki-haveli-during-the-reign-of-maharana-of-mewar </guid>
					<pubDate>Thu, 02 Dec 2021 17:27:26 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						हल्दीघाटी का युद्ध महाराणा प्रताप जीते, बनायी थी हॉलीवुड फिल्म ‘300’ वाली योजना						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>उदयपुर के के मीरा कन्या महाविधालय के एक प्रोफेसर डाक्टर चंद्रशेखर शर्मा ने एक शोध किया । इस शोध में उन्होंने पाया कि कि हल्दीघाटी की 18 जून 1576 की लड़ाई में महराणा प्रताप ने अकबर को हराया था। डॉ. शर्मा ने अपने रिसर्च में प्रताप की जीत के पक्ष में ताम्र पत्रों के प्रमाण जनार्दनराय नागर राजस्थान विद्यापीठ विश्वविद्यालय में जमा कराए हैं। शर्मा की खोज के अनुसार युद्ध के बाद अगले एक साल तक महाराणा प्रताप ने हल्दीघाटी के आस-पास के गांवों की जमीनों के पट्टे ताम्र पत्र के रूप में बांटे थे जिन पर एकलिंगनाथ के दीवान प्रताप के हस्ताक्षर हैं।</p>
<p>उस समय जमीनों के पट्टे जारी करने का अधिकार सिर्फ राजा को ही होता था। जो साबित करता है कि प्रताप हीं युद्ध जीते थे। डॉ. शर्मा ने शोध किया है कि हल्दीघाटी युद्ध के बाद मुगल सेनापति मान सिंह व आसिफ खां के युद्ध हारने से अकबर नाराज हुए थे। दोनों को छह महीनें तक दरबार में नहीं आने की सजा दी गई थी। शर्मा कहते हैं कि अगर मुगल सेना जीतती तो अकबर अपने प्रिय सेनापतियों को दंडित नहीं करते। इससे साफ जाहिर है कि महाराणा ने हल्दीघाटी के युद्ध को संपूर्ण साहस के साथ जीता था।</p>
<p>लोगों का एक खास तबका इस नए ‘इतिहास’ को बहुत पसंद कर रहा है। लेकिन सच्चाई क्या मानी जाए? आइए नजर डालते हैं जून 1576 में हुए हल्दीघाटी के इस युद्ध की ऐसी बातों पर जो अब तक हमारी जानकारी में नहीं रही है। ये जानकारियां सदियों तक सार्वजनिक दायरे से बाहर थी।</p>
<p>हल्दीघाटी का युद्ध 18 जून 1576 ई. को खमनोर एवं बलीचा गांव के मध्य तंग पहाड़ी दर्रे से आरम्भ होकर खमनोर गांव के किनारे बनास नदी के सहारे मोलेला तक कुछ घंटों तक चला था। युद्ध में निर्णायक विजय किसी को भी हासिल नहीं हो सकी थी लेकिन मेवाड़ी सेनाओं ने मुग़लो के छक्के छुड़ा दिए थे । इस युद्ध मे महाराणा प्रताप के सहयोगी राणा पूंजा का सहयोग रहा ।इसी युद्ध में महाराणा प्रताप के सहयोगी झाला मान, हाकिम खान,ग्वालियर नरेश राम शाह तंवर सहित देश भक्त कई सैनिक देशहित बलिदान हुए। उनका प्रसिद्ध घोड़ा चेतक भी मारा गया था।</p>
<p>हल्दीघाटी राजस्थान की दो पहाड़ियों के बीच एक पतली सी घाटी है। मिट्टी के हल्दी जैसे रंग के कारण इसे हल्दी घाटी कहा जाता है। इतिहास का ये युद्ध हल्दीघाटी के दर्रे से शुरू हुआ लेकिन महाराणा वहां नहीं लड़े थे, उनकी लड़ाई खमनौर में चली थी। मुगल इतिहासकार अबुल फजल ने इसे “खमनौर का युद्ध” कहा है । राणा प्रताप के चारण कवि रामा सांदू ‘झूलणा महाराणा प्रताप सिंह जी रा’ में लिखते हैंः“महाराणा प्रताप अपने अश्वारोही दल के साथ हल्दीघाटी पहुंचे, परंतु भयंकर रक्तपात खमनौर में हुआ। ”</p>
<p><strong>हॉलीवुड फिल्म ‘300’ वाली योजना थी !</strong></p>
<p>2006 में रिलीज हुई डायरेक्टर ज़ैक श्नाइडर की हॉलीवुड फिल्म है ‘300’ । इतिहास के एक चर्चित युद्ध पर बनी इस फिल्म में राजा लियोनाइडस अपने 300 सैनिकों के साथ 1 लाख लोगों की फौज से लड़ता है। पतली सी जगह में दुश्मन एक-एक कर अंदर आता है और मारा जाता है।</p>
<p>राणा प्रताप ने इसी तरह की योजना बनाई थी। मगर मुगलों की ओर से लड़ने आए सेनापति मानसिंह घाटी के अंदर नहीं आए। मुगल जानते थे कि घाटी के अंदर इतनी बड़ी सेना ले जाना सही नहीं रहेगा। कुछ समय सब्र करने के बाद राणा की सेना खमनौर के मैदान में पहुंच गई। इसके बाद ज़बरदस्त नरसंहार हुआ. कह सकते हैं कि 4 घंटों में 400 साल का इतिहास तय हो गया।</p>
<p>महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गये, इसी क्रम में मानसिंह (1573 ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में ) तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश ही किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और हमें हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध देखने को मिला |</p>
<p>अल बदायुनी के अनुसार जो युद्ध का गवाह भी था, राणा की सेना में 3,000 घुड़सवारों और लगभग 400 भील धनुर्धारियों की गिनती की, जो मेरजा के प्रमुख पुंजा के नेतृत्व में थे। दोनों पक्षों के पास युद्ध के हाथी थे, लेकिन राजपूतों के पास कोई गोला-बारूद या तोपे नहीं थी।</p>
<p>दोनों सेनाओं के बीच असमानता के कारण, राणा ने मुगलों पर एक जोरदार हमला करने का विकल्प चुना, जिससे कई लोग मारे गए। हकीम खान सूर और रामदास राठौर ने मुग़लो को भागने पर मजबूर कर दिया और जबकि राम साह तनवार और भामा शाह ने मुगलो पर कहर बरपाया, जो भागने के लिए मजबूर थे। मुल्ला काज़ी ख़ान और फतेहपुर सीकरी शेखज़ादों के कप्तान दोनों घायल हो गए, लेकिन बरहा के सैयदों ने दृढ़ता से काम किया और माधो सिंह के अग्रिम पंक्ति के लिए पर्याप्त समय दिया।</p>
<p>मुग़लो को खदेड़ने के बाद, राम साह तोवर ने अपने कमांडर से जुड़ने के लिए खुद को केंद्र की ओर बढ़ाया। वह जगन्नाथ कच्छवा द्वारा मारे जाने तक प्रताप सिंह की सफलतापूर्वक रक्षा में सफल रहे थे। जल्द ही मुगल सेना, माधो सिंह के आगमन से चकित हो घबरा गयी थी,और सामने अकबर की सेना से सैय्यद हाशिम के होश खट्टे हो गए ।डोडिया के कबीले नेता भीम सिंह, मुगल सेनापति को अपने हाथी से मार डाला ।</p>
<p>महाराणा ने अपने हाथी जिसका नाम राम प्रसाद था ,को मैदान में लाने का आदेश दिया।अपने युद्ध के हाथियों के के साथ मेवाड़ियों ने मुग़लो को भागने पर मजबूर कर दिया।राणा प्रताप की तरफ से प्रसिद्ध ‘रामप्रसाद’ और ‘लूना’ समेत 100 हाथी थे। मुगलों के पास इनसे तीन गुना हाथी थे। मुगल सेना के सभी हाथी किसी बख्तरबंद टैंक की तरह सुरक्षित होते थे और इनकी सूंड पर धारदार खांडे बंधे होते थे।राणा प्रताप के पास चेतक समेत कुल 3,000 घोड़े थे। मुगल घोड़ों की गिनती कुल 10,000 से ऊपर थी।</p>
<p>लेकिन एक मेवाड़ी योद्धा के सामने 5 मुग़ल थे। धीरे धीरे लड़ाई का ज्वार शिफ्ट हो रहा था और राणा प्रताप ने जल्द ही तीर और भाले से से घायल हो गए। यह महसूस करते हुए कि दिन खत्म होने वाला है और समय के साथ मेवाड़ को महाराणा प्रताप की ज्यादा जरुरत है,वीर बिंदा झाला ने अपने सेनापति से शाही छतरी अपने घोड़े पर लेकर सजा ली और मेवाड़ी मुकुट पहन खुद को राणा बताते हुए मुग़लो की सेना के हुजुम की तरफ चल पड़े। पता था उन्हें ये उनका आखरी युद्ध है। फिर भी जोश और आँखों में चमक लिए उन्होंने सैकड़ो मुगलों को अपनी तलवार का निशाना बना दिया । उनके बलिदान और 350 अन्य सैनिकों जो पीछे रह गए जो समय को खरीदने के लिए लड़े और उनके राणा और उनकी सेना के आधे भाग को मेवाड़ की रक्षा हेतु बचा लिया ।</p>
<p>रामदास राठौर तीन घंटे की लड़ाई के बाद मैदान पर मारे गए लोगों में से एक थे। राम साह टोनवर के तीन बेटे- सलिवाहन, बहान, और प्रताप टोनवार - मृत्यु में अपने पिता के साथ शामिल हो गए।</p>
<p>दोनों तरफ राजपूत सैनिक थे। उग्र संघर्ष में एक स्तर पर, बदायुनी ने आसफ खान से पूछा कि मैत्रीपूर्ण और दुश्मन राजपूतों के बीच अंतर कैसे किया जाए। आसफ खान ने जवाब दिया, "जिसको भी आप पसंद करते हैं, जिस तरफ भी वे मारे जा सकते हैं, उसे गोली मार दें, यह इस्लाम के लिए एक लाभ होगा।"</p>
<p>1572 ईस्वी में राणा उदय सिंह की मृत्यु हो गई और थोड़े समय के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई हुई| राणा प्रताप गोगुन्दा में मेवाड़ के शासक के रूप में सफल हुए। शीघ्र ही बाद में उन्होंने अपनी राजधानी को कुंभलगढ़ नामक एक बहुत सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर दिया। मेवाड़ को अकबर ने लगातार आधीनता स्वीकार करने के लिए उन्हीं शर्तों पर मुगलों की अधीनता में शामिल करने को कहा जो अन्य राजपूत सरदारों को पेश की गई थी| सितम्बर 1572 को राणा प्रताप के दरबार में जलाल खान कुरची अकबर के दूत बनकर आये पर वह प्रताप को मुगलों के अधिपत्य को स्वीकार करने के लिए समझाने में नाकाम रहे और निराश होकर लौटे। अकबर के दूत राजा यार सिंह जो 1573 में भेजे गए थे वो भी वांछित परिणाम प्राप्त करने में विफल रहे| अक्टूबर 1573 में अकबर ने प्रताप को लुभाने मुगल में अग्रणी राजपूत राजा भगवंत दास कच्छवाहा प्रमुख और को भेजने का एक और प्रयास किया|</p>
<p>अकबर चाहता था कि महाराणा प्रताप अकबर के दरबार में व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज़ कर मित्रता का हाथ पकड़ दासता स्वीकार कर ले |</p>
<p>व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत करने के लिए प्रताप की अनिच्छा भगवंत दास और अकबर के सन्देश की शर्तों को खारिज कर दिया| अकबर राणा प्रताप की व्यक्तिगत उपस्थिति पर जोर देते थे। दूतो द्वारा किए गए असफल प्रयासो के बाद अकबर का रवैया और सख्त हो गया था और फिर फलस्वरूप मान सिंह की कमान के तहत एक शक्तिशाली सेना को राणा प्रताप को दंडित करने के लिए भेजा गया।</p>
<p>इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजयी नहीं हुआ था। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूतो ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।</p>
<p>महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 20000 राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80000 की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने अपना अश्व दे कर महाराणा को बचाया। उनके प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें 17000 लोग मारे गए।</p>
<p>हल्दीघाटी का युद्ध: यह युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- हकीम खाँ सूरी।इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया था । इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गए ।</p>
<p>अब यहां मुख्य रूप से देखने योग्य युद्ध स्थल रक्त तलाई,शाहीबाग,हल्दीघाटी दर्रा,प्रताप गुफा,चेतक समाधी एवं महाराणा प्रताप स्मारक देखने योग्य है। युद्धभूमि रक्त तलाई में शहीदों की स्मृति में बनी हुई है। भारतीय पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित सभी स्थल निःशुल्क दर्शनीय है।</p>
<p>नोट : उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/maharana-pratap-won-the-battle-of-haldighati-planned-hollywood-film-300						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/maharana-pratap-won-the-battle-of-haldighati-planned-hollywood-film-300 </guid>
					<pubDate>Thu, 02 Dec 2021 16:17:43 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						उदयपुर(मेवाड़) नगर के माछला मंगरा की दुश्मन भंजक तोप जिसने मराठाओं के छक्के छुड़ाए						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>अरावली पर्वत श्रंखला हमेशा उदयपुर के लिए महत्वपूर्ण रही है इसमें से खनिज पदार्थ पत्थर निकलते हैं। वर्षा जल में सहायक है। सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।इसी श्रृंखला में आधुनिक उदयपुर के बीचो-बीच एक पहाड़ी है जिसका बड़ा भारी एतिहासिक महत्व रहा है और यह उदयपुर के साथ इतिहास की भी धरोहर है। इस पहाड़ी का प्राचीन नाम मत्स्य शैल रहा है बाद में अपभरञ्श होते-होते यह माछला अर्थात् मेवाड़ी मछली का पुर्लिंग शब्द माछला रह गया। इसीलिए इसको माछला मंगरा भी कहते हैं मंगरा पहाड़ी का पुलिंग शब्द है।</p>
<p>इस पहाड़ी पर एक किला एकलिंग गढ़ के नाम से मशहूर है। इस गढ़ का भी अपना इतिहास रहा है। इस गढ़ को बनवाने वाले उदयपुर के प्रधान अमरचंद वडवा नामक ब्राह्मण थे। महाराणा भीम सिंह जी के काल में यहां एक बहुत विशालकाय तोप इस गढ़ पर चढ़वायी ग‌यी। इस तोप का गोला देबारी दरवाजे तक मार करता था। मराठा आक्रमण के समय इस तोप के प्रहार से मराठा सेना को सन्धि पर मजबुर कर दिया था। उस समय आक्रमण को विफल कर दिया।बाद के समय आजादी के काल तक प्रतिदिन में रात बारह बजे तोप से गोला दागा जाता था और फिर उदयपुरी(मेवाड़) के सभी द्वार बंद कर दिए जाते।</p>
<p>उस समय तक आम आदमी तक घड़ी का प्रचलन नहीं था फिर यह तोप लोगों को सचेत करने में काम आती थी जैसे कि अति वृष्टि की परिस्थिति में जब शहर में पानी बेकाबु हो जाता तो तोप का धमाका होते ही शहर मे ऊंची जगहों पर चले जाने की सुचना मानी जाती थी। इस तोप को समय पर चलाने के लिए मेवाड़ का पहला सन डायल अर्थात धुप धडी इतिहासकार जोगेंद्र सिंह के परदादा शम्भु नाथ जी ने लगाई थी। यह तोप महाराणा भूपालसिंह जी के काल तक लगातार काम करती रही।</p>
<p>इस तोप का नाम दुश्मनभंजक था। यह बड़ी भारी तोप थी और आजादी के बाद यह ऐतिहासिक महत्व की तोप मानी जा सकती है इसमें कोई सन्देह नहीं है। कोई कहता है कि इसे गलवा कर काट कर बेच दिया गया। उस समय के पी डब्ल्यू डी मैनटेनेन्स सुपरवाइजर के अनुसार गढ़ की बाकी की सामग्री पी. डब्ल्यू. डी. डिपार्टमेंट में जमा कराई थी। इसके बाद यह सब प्राचीन इतिहास की सामग्री कहां गयी ? एतिहासिक विरासत की दृष्टि से महत्वपूर्ण सामान गायब हो जाना सन्देह प्रकट करता है।</p>
<p> </p>
<p>संकलनकर्ता और इतिहासकार :</p>
<p>जोगेन्द्र पुरोहित </p>
<p>घाणेराव घाटी ,उदयपुर (राजस्थान)</p>
<p> </p>
<p>शोध : दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</p>
<p>Email:erdineshbhatt@gmail.com</p>
<p>नोट : उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</p>
<p> </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/the-enemy-blasting-cannon-of-machla-mangra-of-udaipur-mewar-city						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/the-enemy-blasting-cannon-of-machla-mangra-of-udaipur-mewar-city </guid>
					<pubDate>Thu, 02 Dec 2021 16:13:21 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						महाराणा प्रताप के शौर्य की ऐसी कहानी जो आपको अब तक होगी न मालूम						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>महाराणा प्रताप सिंह उदयपुर, मेवाड में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है। उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया।महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था। महाराणा प्रताप की माता का नाम जयवंता बाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था।</p>
<p>राणा उदयसिंह केे दूसरी रानी धीरबाई जिसे राज्य के इतिहास में रानी भटियाणी के नाम से जाना जाता है, यह अपने पुत्र कुंवर जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी। प्रताप केे उत्तराधिकारी होने पर इसकेे विरोध स्वरूप जगमाल अकबर केे खेमे में चला जाता है। महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक मेंं 28 फरवरी, 1572 में गोगुन्दा में होता हैै, लेकिन विधि विधानस्वरूप राणा प्रताप का द्वितीय राज्याभिषेक 1572 ई. में ही कुुंभलगढ़़ दुुर्ग में हुआ, दूूूसरे राज्याभिषेक में जोधपुर का राठौड़ शासक राव चन्द्रसेेन भी उपस्थित थे।</p>
<p>राणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल 11 शादियाँ की थी उनके पत्नियों और उनसे प्राप्त उनके पुत्रों पुत्रियों के नाम है:-</p>
<p>महारानी अजब्धे पंवार :- अमरसिंह और भगवानदास</p>
<p>अमरबाई राठौर :- नत्था</p>
<p>शहमति बाई हाडा :-पुरा</p>
<p>अलमदेबाई चौहान:- जसवंत सिंह</p>
<p>रत्नावती बाई परमार :-माल,गज,क्लिंगु</p>
<p>लखाबाई :- रायभाना</p>
<p>जसोबाई चौहान :-कल्याणदास</p>
<p>चंपाबाई जंथी :- कल्ला, सनवालदास और दुर्जन सिंह</p>
<p>सोलनखिनीपुर बाई :- साशा और गोपाल</p>
<p>फूलबाई राठौर :-चंदा और शिखा</p>
<p>खीचर आशाबाई :- हत्थी और राम सिंह</p>
<p>1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 20000 राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80000 की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने आपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने अपना अश्व (घोड़ा)दे कर महाराणा को बचाया। उनके प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हुई। यह युद्ध तो केवल एक दिन चला परन्तु इसमें 17000 लोग मारे गए। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये। महाराणा की हालत दिन-प्रतिदिन चिंताजनक होती चली गई ।</p>
<p>महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गये, इसी क्रम में मानसिंह (1573 ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में ) तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश ही किया, इस तरह राणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और हमें हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध देखने को मिला ।</p>
<p>हल्दीघाटी का युद्ध: यह युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- हकीम खाँ सूरी। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया था । इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह' 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गए ।</p>
<p>इतिहासकार मानते हैं कि इस युद्ध में कोई विजयी नहीं हुआ। पर देखा जाए तो इस युद्ध में महाराणा प्रताप सिंह विजय हुए। अकबर की विशाल सेना के सामने मुट्ठीभर राजपूत कितनी देर तक टिक पाते, पर ऐसा है नहीं,ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।</p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>दिवेेेेर का युुद्ध:</strong></span></p>
<p>राजस्थान के इतिहास 1582 में दिवेर का युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में राणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण कर्नल जेम्स टाॅड ने इस युद्ध को "मेवाड़ का मैराथन" कहा |</p>
<p><span style="color: #ba372a;"><strong>सफलता और अवसान:</strong></span></p>
<p>1579 से 1585 तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उलझा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने 1585 में मेवाड़ से मुगलो से मुक्ति के प्रयत्नों को और भी तेज कर लिया। महाराणा की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया ,उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था ,पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत 1585 में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए,परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई।महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्ग सीधारणे के बाद पुनः आगरा ले आया।</p>
<p>'एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।</p>
<p><span style="color: #ba372a;">महाराणा प्रताप सिंह के मृत्यु पर अकबर की प्रतिक्रिया:</span></p>
<p>अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था पर उनकी यह लड़ाई कोई व्यक्तिगत द्वेष का परिणाम नहीं थी, हालांकि अपने सिद्धांतों और मूल्यों की लड़ाई थी। एक तरह अकबर जो अपने क्रूर साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था,दुसरी तरफ महाराणा प्रताप थे जो अपनी भारत मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जानता था कि महाराणा जैसा वीर कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आंसू आ गए।महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के समय अकबर लाहौर में था और वहीं उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है।</p>
<p>अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है:-</p>
<p><strong>"अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी</strong></p>
<p><strong>गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी</strong></p>
<p><strong>नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली</strong></p>
<p><strong>न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली</strong></p>
<p><strong>गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी</strong></p>
<p><strong>निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी"</strong></p>
<p>अर्थात्</p>
<p><strong>हे ! गहलोत राणा प्रतापसिंह ,आपकी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निश्वास के साथ आंसू टपकाए। क्योंकि तूने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया। तूने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि तू अपना आडा यानि यश या राज्य तो गंवा गया लेकिन फिर भी तू अपने राज्य के धूरी को बांए कंधे से ही चलाता रहा। तेरी रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही तू खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गया। तू कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़ा रहा और तेरा रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा। इसलिए मैं कहता हूं कि तू सब तरह से जीत गया और बादशाह हार गया।</strong></p>
<p>अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना पूरा जीवन का बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और उनके स्वामिभक्त अश्व चेतक को शत-शत कोटि-कोटि प्रणाम।</p>
<p>अकबर द्वारा गुजरात की विजय के बाद मेवाड़ ने फिर से ध्यान आकर्षित किया। वह पूरी तरह से जानता था कि मेवाड़ समस्या का समाधान किए बिना उसके अन्य राजपूत राज्यों के साथ गठबंधन स्थिर नहीं हो सका। संयोग से उसी वर्ष (1572) राणा उदय सिंह की मृत्यु हो गई और थोड़े समय के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई हुई। राणा प्रताप गोगुन्दा में मेवाड़ के शासक के रूप में सफल हुए। शीघ्र ही बाद में उन्होंने अपनी राजधानी को कुंभलगढ़ नामक एक बहुत सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर दिया। मेवाड़ को अकबर ने लगातार आधीनता स्वीकार करने के लिए उन्हीं शर्तों पर मुगलों की अधीनता में शामिल करने को कहा जो अन्य राजपूत सरदारों को पेश की गई थी। सितम्बर 1572 को राणा प्रताप के दरबार में जलाल खान कुरची अकबर के दूत बनकर आये पर वह प्रताप को मुगलों के अधिपत्य को स्वीकार करने के लिए समझाने में नाकाम रहे और निराश होकर लौटे। अकबर के दूत राजा यार सिंह जो 1573 में भेजे गए थे वो भी वांछित परिणाम प्राप्त करने में विफल रहे। अक्टूबर 1573 में अकबर ने प्रताप को लुभाने मुगल में अग्रणी राजपूत राजा भगवंत दास कच्छवाहा प्रमुख और को भेजने का एक और प्रयास किया।</p>
<p>अकबर चाहता था कि महाराणा प्रताप अकबर के दरबार में व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज़ कर मित्रता का हाथ पकड़ दासता स्वीकार कर ले ।</p>
<p>व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत करने के लिए प्रताप की अनिच्छा भगवंत दास और अकबर के सन्देश की शर्तों को खारिज कर दिया| अकबर राणा प्रताप की व्यक्तिगत उपस्थिति पर जोर देते थे। दूतो द्वारा किए गए असफल प्रयासो के बाद अकबर का रवैया और सख्त हो गया था और फिर फलस्वरूप मान सिंह की कमान के तहत एक शक्तिशाली सेना को राणा प्रताप को दंडित करने के लिए भेजा गया। युद्ध योजना की निगरानी हेतू अकबर सम्राट 1576 को व्यक्तिगत रूप से अजमेर गए थे पर जैसा कि सर्वविदित है कि मुगल सेना राजपूत सेना पर भारी पड़ी और राणा प्रताप 1576 में हल्दीघाटी के युद्ध के बाद कोलियारी ठिकाने पर आ गए और एक पहाड़ी शहर में शरण ली।</p>
<p>इस जीत के बाद सम्राट अकबर राजधानी आगरा लौट गए । राणा प्रताप पर अपनी चोटों से उबरने के बाद कुंभलगढ़ लौट आए अपने खोए हुए भू भाग को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया। मुगलों के खिलाफ राजपूत प्रमुखों के एक समूह का एक गठबंधन करने में उन्होंने सफलता प्राप्त की । प्रताप की इन शत्रुतापूर्ण गतिविधियों का पता अकबर को व्यक्तिगत रूप से अजमेर में ही चल गया और भगवंत दास और मान सिंह को उनके और अन्य के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मेवाड़ की और भेजा। अजमेर में सम्राट अकबर की उपस्थिति मजबूत थी और सैन्य कार्रवाई के वांछित परिणाम आ सकते थे। उधर ईडर और सिरोही के शासको ने एक के बाद एक कर अकबर के सामने आत्मसमर्पण कर दिया और मुग़ल अधिपत्य स्वीकार कर लिया।साथ ही राणा प्रताप को भी गोगुन्दा से भागने के लिए मजबूर किया गया था और वे शाही अधिकार को तब तक टालते रहे जब तक कि उनकी 1597 में मृत्यु हो गई लेकिन मेवाड़ राजपूताना में पूरी तरह से अलग-थलग पड़ गया था ।</p>
<p>हालांकि कई महत्वपूर्ण सैन्य कमांडर जैसे भगवंत दास (1577) , शाहबाज़ खान कम्बोह (1577),अब्दुर रहीम खान-इकन (1580) और राजा जगमीमथ (1584 ) को उनके खिलाफ भेजा गया लेकिन वे राणा को शाही सेवा में शामिल होने के लिए मजबूर करने में विफल रहे। उन्होंने चावंड में एक नई राजधानी की नींव भी रखी।1597 में उनके बड़े बेटे और उत्तराधिकारी ने अमर सिंह की मृत्यु के बाद कुछ समय के लिए अपने पिता की नीति को जारी रखा। लेकिन लगातार युद्धों के कारण उनकी सैन्य शक्ति में काफी गिरावट आई और उन्होंने अपने कई क्षेत्रों को खो दिया। अमर सिंह ने इसे बेहतर बनाने के लिए कड़ी मेहनत की अपने राज्य के आंतरिक कामकाज और उसके साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश की। अगम ने 1599 में मेवाड़ पर आक्रमण शुरू किया।</p>
<p>अकबर ने राजकुमार सलीम के साथ सेना के कमांडर राजा मान सिंह को अजमेर से मेवाड़ जाने को कहा लेकिन सलीम ने ऑपरेशन में कोई दिलचस्पी नहीं ली क्योंकि वह मुगल सिंहासन पर कब्जा करने की साजिश रचने में लगे हुआ था। बाद में उदयपुर की एक छोटी यात्रा करते हुए उन्होंने इसे पूरी तरह से राजा मान सिंह पर छोड़ दिया। इनमें मुग़ल सेनाएँ केवल अटाला में पद स्थापित करने में सफल रहीं और मोही, बागोर, माण्डल ,मांडलगढ़, चित्तौड़ और अन्य स्थानों पर मुग़ल सेना कब्ज़े में असफल रही। कुछ समय बाद मान सिंह को बंगाल जाना पड़ा और उस्मान के विद्रोह के कारण सलीम ने आगरा की ओर प्रस्थान किया। 1603 में एक बार फिर अकबर ने मेवाड़ पर अभियान चलाने का फैसला किया। राजकुमार सलीम के साथ कई प्रमुख राजपूत राजाओ के जैसे साजगरैयाथ, माधो सिंह, सादिक खान आदि) को आदेश दिया कि वे सभी 1599 में अधूरे रह गए कार्य को पूरा करने के लिए मेवाड़ की ओर चलें। लेकिन सलीम ने आदेशों का पालन करने से इनकार कर दिया। बिना किसी और इंतजार के अकबर ने खुसरू को कमान संभालने के लिए नियुक्त किया गया लेकिन अभियान नहीं चल सका। अकबर की बीमारी के बाद उनकी मृत्यु हो गयी । स्पष्ट है कि अकबर अपने जीवन काल के दौरानअपने समकालीन सिसोदिया प्रमुख राणा प्रताप और अमर सिंह को पूरी तरह हराने में असफल रहे और मुगलिया सल्तनत का अधिपत्य मेवाड़ पर हो न पाया ।</p>
<p> </p>
<p>नोट : उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</p>
<p> </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/such-a-story-of-maharana-prataps-bravery-that-you-will-not-know-till-now						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/such-a-story-of-maharana-prataps-bravery-that-you-will-not-know-till-now </guid>
					<pubDate>Thu, 02 Dec 2021 15:51:25 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						मेवाड़ की विचित्र ब्राह्मणी डाक व्यवस्था और ब्राह्मण सम्मान						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>राजस्थान के मेवाड़ राज्य में अपनी डाक व्यवस्था थी. आपको यकीन भले नहीं हो लेकिन ये डाक व्यवस्था स्वतंत्रता के बाद भी काम करती रही। इसका नाम भी बेहद दिलचस्प था- ब्राह्मणी डाक सेवा. इसे उदयपुर के महाराणा सज्जन सिंह ने शुरू किया था।</p>
<p>मेवाड़ में सदैव ब्राह्मणों को सम्मान दिया जाता रहा और शुरू से इनका पद उच्च स्तरीय रहा जिसका उन्होंने ईमानदारी और कर्त्तव्य निष्ठा से योगदान दिया ।मेवाड़ के महाराणा आरम्भ से ब्राह्मणों की बातों को प्रमुखता देते आये है ।बात महाराणा फतह सिंह जी के जमाने की है जब डाकखाने प्रचलन में नहीं थे । तब मेवाड़ में डाकखाने की आवश्यकता महसूस हुई और इसके लिए महाराणा ने अपने ख़ास लोगो के साथ विचार विमर्श किया जिसमें ऐसी व्यवस्था की बात की गयी जिससे महत्वपूर्ण डाक ,गोपनीय डाक एक जगह से दुसरी जगह पहुंचाने के लिए एक ऐसी टीम की बनाई जावे जो यह कार्य सुचारू रूप से अंजाम दे सके ।</p>
<p>18 वीं शताब्दी में भारत में मालवा और मेवाड़ राज्यों में एक प्रचलित डाक प्रणाली मौजूद थी। इसे ब्राह्मणी डाक के रूप में जाना जाता है क्योंकि यह ब्राह्मणों द्वारा चलाया जाता था जो हिंदुओं में सबसे ऊंची जाति के रूप में थे और उन्हें उच्च सम्मान में रखा गया था। उन दिनों पत्रों को भेजने का सबसे सुरक्षित तरीका यह था कि वे किसी यात्रा करने वाले ब्राह्मण को सौंप दें। कहा जाता है कि केशुराम शर्मा नामक ब्राह्मण ने मेवाड़ राज्य और मालवा क्षेत्र में मेल भेजने की इस लोकप्रिय पद्धति का आयोजन किया था। यह पद यथोचित रूप से ब्राह्मणी डाक कहलाता था। मेवाड़ राज्य में भारत के स्वतंत्र होने के बाद भी यह डाक व्यवस्था जारी रही और सभी रियासतों का विलय हो गया।</p>
<p>फलस्वरूप एक जाति विशेष ब्राह्मण को इस कार्य के लिए तैयार किया गया।</p>
<p>ब्राह्मण नियुक्ति के निम्न कारण थे:</p>
<p> </p>
<p>1 ब्राह्मण ज्ञानी पढ़ें लिखे थे ।</p>
<p>2 ब्राह्मण ईमानदार थे ।</p>
<p>3 ब्राह्मणों को लोग ससममान रास्ता देते थे ताकि डाक तुरन्त पहुंचे ।</p>
<p>4 ब्राह्मण को लुटने का डर नही था अतः डाक सुरक्षित सरंक्षित तरीके से पहुंच सकती थी ।</p>
<p>5 लोग ब्राह्मण डाकिये को जलपान की व्यवस्था कराने मे प्रसन्नता पाते थे।</p>
<p>इस डाक को महाराणा के काल में ब्राह्ममणि डाक कहा जाता था अतः इसके लिए इस व्यवस्था हेतु महाराणा फतहसिह जी ने शिवनारायण शर्मा को जिम्मेदारी सौंपी थी।</p>
<p>तब मेवाड़ का पहला डाकखाना स्थापित हुआ इसमें केवल ब्राह्मण कर्मचारी ही थे। इन कर्मचारियों को तनख्वाह दी जाती थी क्योंकि इतिहास साक्षी है कि मेवाड़ में ब्राह्मण से कोई बैगार नहीं ले सकता और यहाँ धर्म की पालना नियम है ।</p>
<p>स्वतंत्रता पूर्व शुरू हुई यह डाक सेवा मेवाड़ में वर्ष 1950 तक प्रभावी रही। जादूराम गौड़ (ब्राह्मण) इस डाक सेवा के प्रमुख थे और इसलिए इसका नाम “ब्राह्मणी डाक” रखा गया। वे जयपुर रियासत में खेतड़ी के रहने वाले थे। जादूराम जनता और सरकारी कार्यालयों दोनों ही से डाक एकत्र करते थे।</p>
<p>यह व्यवस्था पुश्तैनी तरीके से चली जिसका जनता के लिए दो भीलवाड़ी पैसे (स्थानीय मुद्रा) प्रति पत्र शुल्क था जबकि यह ब्राह्मणी डाक सरकारी कार्यालयों के लिए निशुल्क थी।</p>
<p>जादूराम गौड़ को वर्ष 1932 से प्रतिवर्ष 1200 रुपए सालाना दिया जाता था जब वे निजी तौर पर इस डाक सेवा को चलाते थे। उस समय मेवाड़ रियासत का सालाना बजट बारह हज़ार रुपए था।</p>
<p>महाराणा के काल में आवागमन के साधनों की अत्यन्त कमी थी ।घोड़े, ऊंट और बैलगाड़ी प्रचलन में थीं परन्तु इस डाकखाने की व्यवस्था देखने लायक थी जिसका नजारा लोगों के आनन्द का विषय था। इसमें ब्राह्मण डाकिया डाक का एक थैला हाथ में ,दूसरे हाथ मे लकड़ी और लकड़ी पर घंटी बंधी रहती थी। ये दौड़ते दौड़ते घंटी बजाते हुए आते लोग तुरंत उन्हें रास्ता दे देते । यह आधुनिक जमाने की रिले रैस टाईप होता था और ये ब्राह्मणी डाक 4 से 5 दिनों में मेवाड़ के एक कोने से दूसरे कोने में पहुंचा देते थे।</p>
<p>इसमें पत्र प्राप्त करता डाक प्राप्त होने पर 6 पाई देकर वह पत्र छुड़ा लेता था यह डाक व्यवस्था सन् 1935 तक चलती रही ।यह मेवाड़ की विधिवत डाक व्यवस्था थी और फिर जब अंग्रेजी डाकखाने कायम हुए तब यह ब्राह्मणी डाक व्यवस्था बन्द हो गई ।</p>
<p>मेवाड़ राज्य में महाराणा सज्जन सिंह ने काशी राम के पुत्र जादू राम को आंतरिक डाक सेवा के लिए एकाधिकार प्रदान किया। यह समझौता विक्रम संवत 1906 के जेठ सुदी दोज (ग्रेगियन कैलेंडर 24 मई, 1849 ए डी बुधवार) को हुआ था।</p>
<p>इस अवधि के दौरान इंपीरियल पोस्ट ऑफिस ने मेवाड़ राज्य में भी सेवा की। हालाँकि यह सभी दूरस्थ स्थानों को जोड़ता नहीं था। इसलिए, ब्राह्मणी डाक ने जल्द ही लोगो को सेवा देने में देर नहीं की। मेल को हकारस (मेल धावक), रेलवे और मोटर बस सेवा के संचालन तक ऊंट, घोड़े, बैलगाड़ी द्वारा ले जाया गया। ब्राह्मणी डाक एक सुव्यवस्थित डाक प्रणाली थी। इस सेवा के लिए एक मामूली राशि ली गई थी। दूरी के बावजूद दरें समान थीं। साधारण "पद का भुगतान" पत्र 5 तोला वजन तक का शुल्क लिया गया था।</p>
<p>प्रेषक द्वारा डाक का भुगतान नकद में किया जा सकता है और इस तरह के पत्रों को हिंदी में "माहुल चकुआ" (महसूल किया गया) के रूप में चिह्नित किया गया था। यह हिंदी में "MAHSULI" (महसूली) के रूप में चिह्नित किए गए अक्षरों के रिसीवर द्वारा भुगतान किया जा सकता है।</p>
<p>यह प्रणाली लगभग 101 वर्षों तक संचालित रही ।</p>
<p>ब्राह्मणी डाक के मेवाड़ राज्य में 60 दफ्तर थे। हर चिट्ठी पर ठप्पा होता था “महसूल चुका” या “महसूली” , महसूली का ठप्पा उन चिट्ठियों पर लगता था जिनका शुल्क अदा नहीं किया हो पर यह चिट्ठियां “बैरंग” नहीं मानी जाती थीं। ब्राह्मणी डाक का मुख्यालय था उदयपुर जिसमें आठ कर्मचारी काम करते थे। मेवाड़ की इस डाक व्यवस्था का ज़िक्र भारत के इम्पीरियल गजट 1908 के 26वें भाग में पृष्ठ 97-98 पर भी किया गया है ।</p>
<p> </p>
<p>  </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/mewars-strange-brahmin-postal-system-and-brahmin-honor						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/mewars-strange-brahmin-postal-system-and-brahmin-honor </guid>
					<pubDate>Thu, 02 Dec 2021 15:44:50 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						मेवाड़ का पहला विद्रोह अंग्रेजों के ख़िलाफ़ वो भी महाराणा की सौगंध के लिए						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>मेवाड़ में एक दस्तुर प्राचीन काल से चला आया था। मेवाड़ राजवंश के महाराणाओ में परम विश्वास होने से मेवाड़ के महाजन बोहरा मुस्लिम और हर समुदाय के लोग आपसी लेन-देन में शपथ रखते थे कि "बदलु नहीं बदलु तो राणा जी आण" । </p>
<p>यह शपथ सैकड़ों सालों से चली आ रही थी क्योंकि मेवाड़ के राजा स्वयं राम के कुल के है और मेवाड़ में राजा राम के काल से दोहा प्रचलन में था- "रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई" और "जो दढ राखे धर्म का तेहि राखे करतार"।</p>
<p>इतिहास साक्षी है कि इस वंश ने कभी भी अपना वचन भंग नहीं किया इसलिए ही मेवाड़ की प्रजा ने सदैव इनको आराध्य मानकर इनके नाम की शपथ से कार्य किए गए। राणा सांगा, महाराणा प्रताप ,राणा राजसिंह ,अमर सिंह इसके उदाहरण है।</p>
<p>बात महाराणा फतहसिह जी के काल की है। अंग्रेजी हुकूमत ने हिन्दुस्तान में एक कानुन पास किया की किसी भी प्रकार के लेन-देन में महाराणा जी की आण नामक शपथ नहीं चलेगी और अदालत से हर लिखा पढ़ी की पैमाइश करवाईं जाए। लेकिन सभी मेवाड़ वासियों ने इस बात को स्वीकार कारण से इनकार कर दिया और कहा हम जमाने से चली आ रही परंपरा को नहीं छोड़ेंगे। हम मेवाड़ वासियों को राणा जी की आण की शपथ पर भरोसा है।</p>
<p>अंग्रेजी गवर्नमेंट ने कहा कि जो यह आदेश नहीं मानेगा उसे दण्डित किया जाएगा।</p>
<p>आखिरकर जनता ने चैत्र कृष्ण 7 संवत 1920 को सैकड़ों लोगों के साथ मिलकर इस आदेश के खिलाफ हड़ताल कर दी और सभी लोग रेजिडेंसी (जहाँ आज रेजीडेंसी गर्ल्स स्कूल है ) पहुंचे। वहां पर अँग्रेज रेजिडेंट ने हल्ला सुना पर कुछ मालुम नहीं पड़ने पर सिपाहियों से उसने जनता के साथ दुर्व्यवहार करने का हुक्म दिया। इससे जनता बिदक गई और पत्थर बाजी करने लगीं। दोनों पक्षों के क‌ई लोग घायल हो गये।</p>
<p>वहां से सभी लोग हुजूम बनाकर सहेलियों की बाड़ी में इकट्ठा होने लगे और जब महाराणा फतहसिह जी को इस घटना के बारे में मालुम पडा तो वे सहेलियों की बाड़ी पहुँचे और रेजिडेंट को बुलाकर जनता को समझाइश कर कानुन में रद्दोबदल करवाया तब कही जाकर बलवा शान्त हुआ और जनता अपने घरों की तरफ लौटी।</p>
<p>निर्णय हुआ कि जनता परम्परा अनुसार सौगंध शपथ और महाराणाओ को ईश्वर तुल्य सदा से मानते आए है और मानेंगे। ऐसी ही एक घटना महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय की है। एक दिन जब उनकी सवारी निकल रही थी जिसमें राजकुंवर जगतसिंह भी थे। एक व्यापारी जो कि कुंवर से कुछ पैसे मांगता था, सवारी के आगे आकर कुंवर जी को कहा आपको राणा जी की आण आप पैसे चुकाए बिना आगे नहीं जा सकते ! कुंवर चाहते तो व्यापारी को धमका सकते थे परन्तु महाराणा संग्राम सिंह जी ने कुंवर को सवारी से अलग कर दिया और व्यापारी के पैसे दिलवाएं। जब ऐसा सच्चा न्याय सदियों से होता आया हो तो और आण (आन ) की इज्जत सर्वोपरि मानी जाती हो तब जनता को यकायक अंग्रेजी कानून पर भरोसा कैसे हो सकता था। यही कारण था कि मेवाड़ में पहला विद्रोह अंग्रेजी हकुमत के खिलाफ मेवाड़ की आन बाण बचाने के लिए जनता ने किया।</p>
<p> </p>
<p>संकलनकर्ता और इतिहासकार :</p>
<p>जोगेन्द्र पुरोहित </p>
<p>घाणेराव घाटी ,उदयपुर (राजस्थान)</p>
<p> </p>
<p>शोध :दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</p>
<p>Email:erdineshbhatt@gmail.com</p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/mewars-first-rebellion-against-the-british-that-too-for-the-promise-of-maharana						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/mewars-first-rebellion-against-the-british-that-too-for-the-promise-of-maharana </guid>
					<pubDate>Thu, 02 Dec 2021 15:39:51 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						मेवाड़ का पहला विद्रोह अंग्रेजों के ख़िलाफ़ वो भी महाराणा की सौगंध के लिए !						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>मेवाड़ में एक दस्तुर प्राचीन काल से चला आया था। मेवाड़ राजवंश के महाराणाओ में परम विश्वास होने से मेवाड़ के महाजन बोहरा मुस्लिम और हर समुदाय के लोग आपसी लेन-देन में शपथ रखते थे कि "बदलु नहीं बदलु तो राणा जी आण" । </p>
<p>यह शपथ सैकड़ों सालों से चली आ रही थी क्योंकि मेवाड़ के राजा स्वयं राम के कुल के है और मेवाड़ में राजा राम के काल से दोहा प्रचलन में था- "रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई" और "जो दढ राखे धर्म का तेहि राखे करतार"।</p>
<p>इतिहास साक्षी है कि इस वंश ने कभी भी अपना वचन भंग नहीं किया इसलिए ही मेवाड़ की प्रजा ने सदैव इनको आराध्य मानकर इनके नाम की शपथ से कार्य किए गए। राणा सांगा, महाराणा प्रताप ,राणा राजसिंह ,अमर सिंह इसके उदाहरण है।</p>
<p> </p>
<p>बात महाराणा फतहसिह जी के काल की है। अंग्रेजी हुकूमत ने हिन्दुस्तान में एक कानुन पास किया की किसी भी प्रकार के लेन-देन में महाराणा जी की आण नामक शपथ नहीं चलेगी और अदालत से हर लिखा पढ़ी की पैमाइश करवाईं जाए। लेकिन सभी मेवाड़ वासियों ने इस बात को स्वीकार कारण से इनकार कर दिया और कहा हम जमाने से चली आ रही परंपरा को नहीं छोड़ेंगे। हम मेवाड़ वासियों को राणा जी की आण की शपथ पर भरोसा है।</p>
<p>अंग्रेजी गवर्नमेंट ने कहा कि जो यह आदेश नहीं मानेगा उसे दण्डित किया जाएगा।</p>
<p> </p>
<p>आखिरकर जनता ने चैत्र कृष्ण 7 संवत 1920 को सैकड़ों लोगों के साथ मिलकर इस आदेश के खिलाफ हड़ताल कर दी और सभी लोग रेजिडेंसी (जहाँ आज रेजीडेंसी गर्ल्स स्कूल है ) पहुंचे। वहां पर अँग्रेज रेजिडेंट ने हल्ला सुना पर कुछ मालुम नहीं पड़ने पर सिपाहियों से उसने जनता के साथ दुर्व्यवहार करने का हुक्म दिया। इससे जनता बिदक गई और पत्थर बाजी करने लगीं। दोनों पक्षों के क‌ई लोग घायल हो गये।</p>
<p> </p>
<p>वहां से सभी लोग हुजूम बनाकर सहेलियों की बाड़ी में इकट्ठा होने लगे और जब महाराणा फतहसिह जी को इस घटना के बारे में मालुम पडा तो वे सहेलियों की बाड़ी पहुँचे और रेजिडेंट को बुलाकर जनता को समझाइश कर कानुन में रद्दोबदल करवाया तब कही जाकर बलवा शान्त हुआ और जनता अपने घरों की तरफ लौटी।</p>
<p> </p>
<p>निर्णय हुआ कि जनता परम्परा अनुसार सौगंध शपथ और महाराणाओ को ईश्वर तुल्य सदा से मानते आए है और मानेंगे। ऐसी ही एक घटना महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय की है। एक दिन जब उनकी सवारी निकल रही थी जिसमें राजकुंवर जगतसिंह भी थे। एक व्यापारी जो कि कुंवर से कुछ पैसे मांगता था, सवारी के आगे आकर कुंवर जी को कहा आपको राणा जी की आण आप पैसे चुकाए बिना आगे नहीं जा सकते ! कुंवर चाहते तो व्यापारी को धमका सकते थे परन्तु महाराणा संग्राम सिंह जी ने कुंवर को सवारी से अलग कर दिया और व्यापारी के पैसे दिलवाएं। जब ऐसा सच्चा न्याय सदियों से होता आया हो तो और आण (आन ) की इज्जत सर्वोपरि मानी जाती हो तब जनता को यकायक अंग्रेजी कानून पर भरोसा कैसे हो सकता था। यही कारण था कि मेवाड़ में पहला विद्रोह अंग्रेजी हकुमत के खिलाफ मेवाड़ की आन बाण बचाने के लिए जनता ने किया।</p>
<p> </p>
<p>संकलनकर्ता और इतिहासकार :</p>
<p>जोगेन्द्र पुरोहित </p>
<p>घाणेराव घाटी ,उदयपुर (राजस्थान)</p>
<p> </p>
<p>शोध :दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</p>
<p> </p>
<p>Email:erdineshbhatt@gmail.com</p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/first-rebel-of-mewar-against-britishers-in-rajasthan						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/first-rebel-of-mewar-against-britishers-in-rajasthan </guid>
					<pubDate>Thu, 02 Dec 2021 15:35:50 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						मेवाड़ में घोड़ों को भी मिलती थी पेंशन,चेटक की अविश्वसनीय कहानी						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p>मेवाड़ पुराकाल से शूरवीरों की धरती रही है और यहाँ के महाराणाओं ने मरना स्वीकारा लेकिन किसी के आगे झुकना नहीं। युद्ध कौशल में निपुण इन योद्धाओं का जो सबसे बड़ा साथी हुआ करता है ऐसे जीव घोड़ों को सदैव यहाँ सम्मान से देखा जाता रहा है।</p>
<p>ऐसी एक कहानी है महाराणा प्रताप के जमाने से जुडी है। एक दिन एक सौदागर आया और उसने महाराणा उदय सिंह जी को 2 घोड़े बताए। एक का नाम ऐटक था और दुसरे का नाम चेटक। जब उदयसिह जी ने सोदागर से खासियत पुछी तब सोदागर ने दो खड्डे खुदवाकर ऐटक घोड़े के खुर उसमें डलवा कर पीघला सीसा भरवा दिया। फिर महाराणा के बहतरिन चाबुक सवार को घोड़े के एड लगाने को कहा। घोड़े ने इतनी ताकत से उछाल मारी कि उसके खुर उस गड्ढे में रह ग‌ए। तभी कुंवर प्रताप ने वह चेटक घोड़ा खरीद लिया ऐसी कथा है।</p>
<p>मेवाड़ में आज भी माणकचौक राजमहल उदयपुर में अश्व पुजन धुमधाम से होता है। यहां पर जब घोड़े बुढ़े हो जाते या बीमार हो जाते तब उन्हें सादड़ी भेज दिया जाता और राजमहलों की तरफ से दाना चारा पानी की आजीवन व्यवस्था कर दी जाती अर्थात घोड़ो को पेंशन दे दी जाती।</p>
<p>मेवाड़ में हर जाति में एक से एक अच्छे सवार हुए। इन्ही में तीन का प्रसंग है। एक जैन जाति के थे ,जो नाथ जी के नाम से राजपुताने में मशहूर थे। दुसरे शालु खां जो मुस्लिम समुदाय के थे और एक शम्भु नाथ जी (इतिहासकार के परदादा जी ) जो ब्राह्मण थे उनके बारे में मेवाड़ में मशहूर था कि घोड़ा व घड़ी शम्भु नाथ जी के मुकाबले कोई नहीं रख सकता है।</p>
<p>बात महाराणा सज्जनसिंह जी के समय से जुडी है। महाराणा एक बार पिछोला के रुण में घोड़े पर सवार होकर निकले। साथ में नाथ जी भी थे। एक खच्चर रुण में घास चर रहा था। महाराणा के साथ वालों ने कहा कि नाथ जी अगर इस खच्चर को फिरत अर्थात चाल सिखा देवे तो जाने ! नाथ जी को बात चुभ ग‌ई हालांकि महाराणा कुछ नहीं बोले। नाथ जी ने एक चाबुक सवार को चुपचाप खच्चर लाकर अपने मकान पर बांधने को कहा। छः माह बाद घोड़े बेचने वाला सौदागर आया। उस समय अमल के कांटे पर घोड़े की खरीद हुआ करती थी। वहां पर एक चबूतरे पर महाराणा विराजते और घोड़ों का मुआयना करते।</p>
<p>लेकिन इससे पहले कि महाराणा पधार कर चबूतरे पर विराजते ,नाथ जी ने पहले ही अपना तैयार किया खच्चर उस सौदागर के घोड़ों के साथ बांध दिया जब राणा पधारे तब सौदागर ने उस खच्चर की चाल महाराणा को बताई।</p>
<p>महाराणा उस खच्चर कि रेवाल चाल देख कर चकित हो कर उस सौदागर से 2000 रूपयों में उसे खरीद लिया तब उन्हें पता लगा कि यह वही खच्चर है जिसे नाथ जी ने माल मसाला खिला कर उसमें बेहतरीन फिरत डाल दी। महाराणा सज्जनसिंह जी ने उस खच्चर का नाम छोटी गुल जी रखा। महाराणा जब तफरीह अर्थात घुमने जाते तब तामझाम के बजाय उसी पर सवार होकर जाते। इस खच्चर का चित्र महलों के दिलखुशाल महल के गोखडे की दिवार पर आज भी लगा है।</p>
<p>एक बार महाराणा जयपुर गए। एक दिन शाम के समय जयपुर महाराजा महाराणा को अपने घोड़ों के बारें में बता रहे थे, तब उन्होंने नाथ जी को भी फिरत दिखाने को कहा तब वे उन्हीं घोड़ों में से एक को लेकर ग‌ए और आ ग‌ए जयपुर। तब नाथ जी ने अनुरोध किया कि आप हमारे सवार घोड़े के पैर के निशान को देखिये। जयपुर महाराजा आश्चर्य चकित हुए हो गए जब उनके सवार ने आकर कहा कि घोड़े के आने के तो निशान हैं पर जाने के नहीं अर्थात घोडा जिस चाल पर गया उन्हीं पर लौटा। तब महाराणा ने प्रसन्न होकर नाथ जी को एक बंदुक इनाम में दी ।</p>
<p>महाराणा फतहसिह जी के काल में शालु खां नाम का चाबुक सवार था। महाराणा ने नाराज होकर उसके फिरत के घोड़े छीन लिए और उसकी ढ्योडी माफ कर दी। वह यहां से वाठेडा चला गया। वहां वाठेडा राव जी के घोड़ों की देखभाल करने लगा। लेकिन वो कभी घोड़े की सवारी नहीं करता। उसने बाठेडा रावजी से एक भैंसा मांगा। उसको तैयार कर उसमे ऐसी रेवाल चाल डाल दी जैसे किसी घोड़े की होती है। एक बार जब महाराणा नाहरमगरा शिकार को जा रहे थे। वह देबारी दरवाजे के बाहर खडा हो गया और जैसे ही महाराणा की बग्घी आयी, तभी खम्मा अन्न दाता कह कर अपने जीन कसे भैंसें को बग्घी के साथ दौड़ा दिया। महाराणा यह देख कर प्रसन्न हुए कि शालु खां ने भैंसे जैसे जानवर को भी घोड़े सरीखा बना दिया और शालु खां की ड्योडी का खुलासा कर उसके हिस्से के घोड़े उसे दुबारा दे दिए।</p>
<p>एक बार जब महाराणा फतहसिह जी मेरठ घोड़े खरीदने ग‌ए। कुछ घोड़े खरीदने के बाद एक विशेष घोड़ी को खरीदने की मनाही की गयी। तब शम्भु नाथ जी ने वह घोड़ी खरीद ली। महाराणा समेत सभी ने खरीदने से मना किया लेकिन शम्भु नाथ जी ने उसे खरीद कर अपनी पुश्तैनी हवेली में बंधवा दिया। उसको दवाई के साथ खास माल मसाले खिलाये गए। नौकरों से प्रतिदिन मालिश करवायी गयी। पांच छः महीने बाद महाराणा फतहसिह जी घोड़े सवार होकर नाहरमगरा शिकार को ग‌ए तब एक खेत पर थुर की बाड देखकर उन्हें खेल सूझा। उन्होंने सभी को थुर पार घोड़ा कुदाने को कहा।</p>
<p>घुड़सवार कोशिश करते और सभी उस मेड पर जा गिरते। इसे देख फिर सभी हंसते। तब सभी ने महाराणा को कहा कि शम्भु नाथ जी को भी कहो। तब शम्भु नाथ जी ने कहा यह मेरठ वाली घोड़ी है। महाराणा ने कहा कि ठीक है तुम भी कूदा कर बताओ और शम्भु नाथ जी ने तुरन्त मेड पार घोडी कुदा दी। ये देख सभी ने तारीफ़ की।</p>
<p>महाराणा ने नाराज होकर अन्य घोड़ो वालो की जागीर जब्ती के आदेश दे दिए और कहां हम अच्छे से अच्छे नस्ल के घोड़े तुमको तैयार करने को देते है और शम्भु नाथ जी को देखो कि खारिज घोड़ी को कैसे तैयार कर बेहतरीन बना दिया। तब राजपरिवार की तरफ से इस घोड़ी के लिए चारा दाना पानी का आजीवन इंतेज़ाम किया गया। उस घोड़ी की जीन आज भी इतिहासकार के संग्रहालय में मौजूद हैं।</p>
<p>तब यह कहावत मशहूर हुई कि घोड़ा और घड़ी शम्भु नाथ जी के मुकाबले कोई नहीं रखना जानता। शम्भु नाथ जी ने ही मेवाड़ की पहली धुप घड़ी माछला मंगरा, शम्भु निवास चित्तौड़गढ़ , लेकपैलैस और इतिहासकार की हवेली में बना कर लगायी।</p>
<p> </p>
<p><strong>अब घोड़े की जाति के बारे में मेवाड़ी जानकारी</strong></p>
<p>सफेद घोड़े को नीला कहते हैं।</p>
<ul>
<li>सफेद घोड़े के अगर काले लाल छापे हो तो उसे कांगड़ा कहते हैं।</li>
<li>सफेद घोड़ा अगर आधा काला आधा सफेद हो तो उसे स्याह‌ अबलग कहते हैं।</li>
<li>लाल घोड़े को लाल अबलक कहते हैं।</li>
<li>काले घोड़े के चारों पैर घुटनों के नीचे नीचे सफेद हो और दोनों आंखों के बीच ललाट पर सफेद टीका हो तो उसको पंच कल्याणक कहते हैं।</li>
<li>काले घोड़े गर्दन के पास और पूँछ सफेद हो तो उसे अष्टमगल कहते हैं यह दुर्लभ होता है।</li>
<li>लाल घोड़े को कुमैद कहते हैं।</li>
<li>चमकीला लाल रंग हो तो सुरंग कहते हैं।</li>
<li>घोड़ा लाल रंग का हो और उपर छोटे छोटे कत्थ‌ई रंग के बिन्दु हो तो उसे गडा कहते हैं।</li>
<li>सभी घोड़ों में मालिक की खैरख्वाह रखने वाला अरबी घोड़ा होता है काठीयावाडी घोड़े और मारवाड़ी नस्ल के घोड़े भी बेहतरीन होते हैं। ये जन्म से ही आपचाल अर्थात तीव्र चाल वाले होते हैं। मारवाड़ी घोड़ो की एक जमाने में सभी जगह धुम थी।</li>
<li>इतिहासकार : जोगेन्द्र नाथ पुरोहित</li>
</ul>
<p> </p>
<p>शोध :दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</p>
<p>Email:erdineshbhatt@gmail.com</p>
<p>नोट : उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</p>
<p> </p>
<p> </p>
<p> </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/horses-also-got-pension-in-mewar-the-incredible-story-of-chetak						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/horses-also-got-pension-in-mewar-the-incredible-story-of-chetak </guid>
					<pubDate>Thu, 02 Dec 2021 15:26:35 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						कैसे बसा उदयपुर,क्यों कोई भी महाराणा उदयपुर संभालने पर महल की इस धुणी पर शीश नवाता है ?						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">आयड नदी का इतिहास बहुत पुराना है और इसके किनारे किनारे 4500 से ज्यादा वर्ष पूर्व से सभ्यताएँ रहती आयी है। विभिन्न उत्खनन के स्तरों से पता चलता है कि प्रारम्भिक बसावट से लेकर 18 वीं सदी तक यहाँ कई बार बस्तियां बसी और उजड़ी। ऐसा लगता है कि आहड़ के आस-पास तांबे की उपलब्धता होने से सतत रूप से इस स्थान के निवासी इस धातु के उपकरण बनाते रहे और उन्हें एक ताम्रयुगीन कौशल केंद्र बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। आज भी उदयपुर बसने से पुर्व क‌ई ग्राम बसे हुए थे जिनके अपने अवशेष आज भी मिलते है।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">पिछोली गांव भी उदयपुर के बसने से पहले का है यह काल महाराणा लाखा का काल था ( 1382 to 1421)। कुछ बंजारे जिसमे छीतर नाम का बनजारा भी था और वे जब वर्तमान के पिछोला से गुजर रहे थे तब उनकी बैलगाड़ी नमी वाली जगह में धस ग‌ई उस समुह ने पानी का स्त्रोत जानकर खुदाई की और फलस्वरूप पिछोला झील का निर्माण हुआ यहां चारों तरफ पहाड़ी इलाके थे।</span></p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">उसी समय महाराणा उदय सिंह जी का चित्तौड़गढ़ निरन्तर आक्रमण झेल रहा था ।उन्ही दिनों महाराणा उदय सिंह जी अपने पोत्र कुंवर अमरसिंह के जन्म के उपलक्ष्य में एकलिंग जी मन्दिर दर्शन को आए फिर शिकार के लिए आयड गांव में डेरे डलवाए। लेकिन दिमाग में निरन्तर चित्तोड पर मुग़ल आताताइयों के आक्रमण से दिमाग में एक योजना चल रहीं थी कि एक सुरक्षित राजधानी बनाई जाए ताकि स्थिरता आ सकें।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"> </p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">उन्ही दिनों की एक शाम में सभी सामंत और मुख्य व्यक्तियों के सामने महाराणा ने उदयपुर नगर बसाने का विचार रखा। सामंतों मंत्रीयो ने सुझाव का समर्थन किया और जगह की तलाश करवाई ग‌ई फलस्वरूप मोतीमहल जिसके खण्डर वर्तमान में मोतीमगरी पर है, महल तैयार किया गया। इसका मतलब ये हुआ कि <span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">मोतीमहल उदयपुर का पहला महल था और एक तरह से यह न‌ए उदयपुर नगर की शुरूआत थी।</span><br style="box-sizing: border-box;" />स्थापना का दिन 15 अप्रैल 1553 इतिहास कारों द्वारा मान्य है और उस दिन आखातीज थी। (<em style="box-sizing: border-box;">यहाँ पर उदयपुर की स्थापना को लेकर संशय और विवाद भी है। कुछ इतिहासकार उदयपुर की स्थापना का वर्ष 1558 और कुछ 1559 भी मानते है। </em>)यही दिन उदयपुर स्थापना दिवस माना गया यह सभी वर्तमान इतिहास कारों ने सहमति से माना है क्योंकि क‌ही भी उदयपुर स्थापना दिवस का शिलालेख या अन्य कोई प्रमाण नहीं मिलता है।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">एक बार महाराणा उदय सिंह जी मोतीमहल मे निवास कर रहे थे तब शिकार कि भावना से खरगोश का पीछा करते हुए वर्तमान फतहसागर ‌जो की उस समय वजूद मे नही था और केवल एक सहायक नदी रूप था। नदी किनारे घोड़ा दोडाते हुए वर्तमान चांदपोल के रास्ते उदयपुर की सबसे ऊंची पहाड़ी जहां वर्तमान में राजमहल है वहां पहुंच कर विश्राम लिया। तभी वहां पहाड़ी पर एक साधु की धुणी से धुआं उठते देख महाराणा वहां पहुंचे। वहां पर योगी धुणी पर विराजमान सन्त का नाम जगतगिरी जी जो कि बहुत पहुँचे हुए संत थे,उन्होंने महाराणा के दिल का हाल जानकर जहां धुणी थी वहीं राज्य बसाने का आदेश दिया।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">यह धुणी वर्तमान मे भी राजमहल में स्थित है और कोई भी महाराणा उदयपुर की सत्ता संभालने पर इस धुणी पर आशिर्वाद लेने निश्चित रूप से जाते है। यह एक उदयपुर स्थापना से लगाकर वर्तमान महाराणा महेंद्र सिंह जी तक यह दस्तुर चला आ रहा है।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">आज भी राजमहल उदयपुर शहर की सबसे बड़ी चोटी पर है जो शहर मे हर तरफ से दिखता है और यह भव्य राजमहल क‌ई चरणों में अलग-अलग महाराणा के काल में बना। बाद मे कालान्तर में सरदार राव उमराव पासवान सभी को राजमहल के नजदीक बसाया। जितने भी जागिरदार उमराव सरदारों की हवेली हे वे राजमहल के निकट घाटीयो पर ही बसी है।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><em style="box-sizing: border-box;"><strong style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">उपरोक्त जानकारी शहर के जाने माने इतिहासकार जोगेन्द्र राजपुरोहित संकलित की है और आप मेवाड़ सहित राजस्थान के इतिहास पर अच्छी पकड़ रखते है। साथ ही आपके पास पुरातत्व और ऐतिहासिक ढेरों चीज़ो का संग्रह भी है जिसे आप उनके निवास अक्षय सदन में जाकर देख सकते है।</strong></em></p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><em style="box-sizing: border-box;"><strong style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;"><span style="box-sizing: border-box; font-style: normal;">नोट</span><span style="font-style: normal; font-weight: 400; text-decoration-line: underline;"> : उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</span></strong></em></p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-size: medium; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"> </div>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/how-udaipur-was-settled-why-any-maharana-when-he-takes-over-udaipur-bows-his-head-to-this-dhuni-of-t						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/how-udaipur-was-settled-why-any-maharana-when-he-takes-over-udaipur-bows-his-head-to-this-dhuni-of-t </guid>
					<pubDate>Thu, 02 Dec 2021 15:07:40 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						मेवाड़ का पहला विद्रोह अंग्रेजों के ख़िलाफ़ वो भी महाराणा की सौगंध के लिए						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">मेवाड़ में एक दस्तुर प्राचीन काल से चला आया था। मेवाड़ राजवंश के महाराणाओ में परम विश्वास होने से मेवाड़ के महाजन बोहरा मुस्लिम और हर समुदाय के लोग आपसी लेन-देन में शपथ रखते थे कि<span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;"> "बदलु नहीं बदलु तो राणा जी आण" </span>। <br style="box-sizing: border-box;" />यह शपथ सैकड़ों सालों से चली आ रही थी क्योंकि मेवाड़ के राजा स्वयं राम के कुल के है और मेवाड़ में राजा राम के काल से दोहा प्रचलन में था- <span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">"रघुकुल रीत सदा चली आई प्राण जाए पर वचन न जाई"</span> और "<span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">जो दढ राखे धर्म का तेहि राखे करतार"।</span><br style="box-sizing: border-box;" />इतिहास साक्षी है कि इस वंश ने कभी भी अपना वचन भंग नहीं किया इसलिए ही मेवाड़ की प्रजा ने सदैव इनको आराध्य मानकर इनके नाम की शपथ से कार्य किए गए। राणा सांगा, महाराणा प्रताप ,राणा राजसिंह ,अमर सिंह इसके उदाहरण है।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">बात <span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">महाराणा फतहसिह</span> जी के काल की है। अंग्रेजी हुकूमत ने हिन्दुस्तान में एक कानुन पास किया की किसी भी प्रकार के लेन-देन में महाराणा जी की आण नामक शपथ नहीं चलेगी और अदालत से हर लिखा पढ़ी की पैमाइश करवाईं जाए। लेकिन सभी मेवाड़ वासियों ने इस बात को स्वीकार कारण से इनकार कर दिया और कहा हम जमाने से चली आ रही परंपरा को नहीं छोड़ेंगे। हम मेवाड़ वासियों को राणा जी की आण की शपथ पर भरोसा है।<br style="box-sizing: border-box;" />अंग्रेजी गवर्नमेंट ने कहा कि जो यह आदेश नहीं मानेगा उसे दण्डित किया जाएगा।</p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_1_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_1_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_1" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=2163350709&pi=t.aa~a.3262126219~i.7~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638364248&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Ffirst-rebel-of-mewar-against-britishers-in-rajasthan%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638364248241&bpp=5&bdt=1335&idt=5&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0&nras=2&correlator=2939519931884&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638364248&ga_hid=1027866615&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=1566&biw=1343&bih=568&scr_x=0&scr_y=0&eid=31063759%2C31063182&oid=2&pvsid=3690555380176733&pem=696&tmod=2100573866&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D259&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C1360%2C728%2C1360%2C568&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=2&uci=a!2&btvi=1&fsb=1&xpc=npqA21aEEp&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=28" name="aswift_1" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!2" data-google-query-id="CL7bhqbWwvQCFQePSwUdzdcJ6w" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">आखिरकर जनता ने चैत्र कृष्ण 7 संवत 1920 को सैकड़ों लोगों के साथ मिलकर इस आदेश के खिलाफ हड़ताल कर दी और सभी लोग रेजिडेंसी (जहाँ आज रेजीडेंसी गर्ल्स स्कूल है ) पहुंचे।</span> वहां पर अँग्रेज रेजिडेंट ने हल्ला सुना पर कुछ मालुम नहीं पड़ने पर सिपाहियों से उसने जनता के साथ दुर्व्यवहार करने का हुक्म दिया। इससे जनता बिदक गई और पत्थर बाजी करने लगीं। दोनों पक्षों के क‌ई लोग घायल हो गये।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">वहां से सभी लोग हुजूम बनाकर <span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">सहेलियों की बाड़ी</span> में इकट्ठा होने लगे और जब महाराणा फतहसिह जी को इस घटना के बारे में मालुम पडा तो वे सहेलियों की बाड़ी पहुँचे और रेजिडेंट को बुलाकर जनता को समझाइश कर कानुन में रद्दोबदल करवाया तब कही जाकर बलवा शान्त हुआ और जनता अपने घरों की तरफ लौटी।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">निर्णय हुआ कि जनता परम्परा अनुसार सौगंध शपथ और महाराणाओ को ईश्वर तुल्य सदा से मानते आए है और मानेंगे।</span> ऐसी ही एक घटना महाराणा संग्राम सिंह द्वितीय की है। एक दिन जब उनकी सवारी निकल रही थी जिसमें राजकुंवर जगतसिंह भी थे। एक व्यापारी जो कि कुंवर से कुछ पैसे मांगता था, सवारी के आगे आकर कुंवर जी को कहा आपको राणा जी की आण आप पैसे चुकाए बिना आगे नहीं जा सकते ! कुंवर चाहते तो व्यापारी को धमका सकते थे परन्तु महाराणा संग्राम सिंह जी ने कुंवर को सवारी से अलग कर दिया और व्यापारी के पैसे दिलवाएं। जब ऐसा सच्चा न्याय सदियों से होता आया हो तो और आण (आन ) की इज्जत सर्वोपरि मानी जाती हो तब जनता को यकायक अंग्रेजी कानून पर भरोसा कैसे हो सकता था। यही कारण था कि मेवाड़ में पहला विद्रोह अंग्रेजी हकुमत के खिलाफ मेवाड़ की आन बाण बचाने के लिए जनता ने किया।</p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_2_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_2_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_2" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=2911792039&pi=t.aa~a.3262126219~i.13~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638364248&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Ffirst-rebel-of-mewar-against-britishers-in-rajasthan%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638364248248&bpp=2&bdt=1341&idt=2&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0%2C700x280&nras=3&correlator=2939519931884&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638364248&ga_hid=1027866615&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=2106&biw=1343&bih=568&scr_x=0&scr_y=0&eid=31063759%2C31063182&oid=2&pvsid=3690555380176733&pem=696&tmod=2100573866&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D259&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C1360%2C728%2C1360%2C568&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=3&uci=a!3&btvi=2&fsb=1&xpc=Qs6tExBc8b&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=274" name="aswift_2" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!3" data-google-query-id="CKOglqbWwvQCFdFQfQodNjgA9Q" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">संकलनकर्ता और इतिहासकार :<br style="box-sizing: border-box;" /><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">जोगेन्द्र पुरोहित</span><span style="box-sizing: border-box;"> </span><br style="box-sizing: border-box;" />घाणेराव घाटी ,उदयपुर (राजस्थान)</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">शोध :<span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">दिनेश भट्ट (न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम)</span></p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/mewars-first-rebellion-against-the-british-that-too-for-the-promise-of-maharana						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/mewars-first-rebellion-against-the-british-that-too-for-the-promise-of-maharana </guid>
					<pubDate>Thu, 02 Dec 2021 15:06:52 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						क्यों नहीं जाते कांग्रेस वाले द स्टैच्यू ऑफ यूनिटी पर ?क्या विवाद था नेहरू और पटेल के बीच?						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">द स्टैच्यू ऑफ यूनिटी(Statue of Unity) भारतीय राजनेता और स्वतंत्रता सेनानी लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की एक विशालकाय प्रतिमा है जिन्होंने भारत के 562 रियासतों को भारत को एक बड़े संघ के रूप में एकजुट करने में सबसे बड़ा योगदान दिया था ।यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है जिसकी ऊंचाई 182 मीटर (597 फीट) है जो कि एक नदी द्वीप पर स्थित है और गुजरात के वड़ोदरा शहर के दक्षिण पूर्व में 100 किलोमीटर (62 मील) की दूरी पर केवडिया कॉलोनी में नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बांध पर स्थित है |</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">इस परियोजना को पहली बार 2010 में घोषित किया गया था और लार्सन एंड टुब्रो द्वारा अक्टूबर 2013 में प्रतिमा का निर्माण शुरू हुआ जो भारतीय मूर्तिकार राम वी सुतार द्वारा डिजाइन किया गया था और इसका उद्घाटन 31 अक्टूबर 2018 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा किया गया था| पटेल के जन्म की 143 वीं वर्षगांठ नरेंद्र मोदी ने पहली बार सरदार वल्लभभाई पटेल को 7 अक्टूबर 2010 को गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में अपने 10 वें वर्ष की शुरुआत को यादगार बनाने के लिए एक संवाददाता सम्मेलन में परियोजना की घोषणा की। सरदार वल्लभभाई पटेल राष्ट्रीय एकता ट्रस्ट (SVPRET) नाम का एक विशेष योजना द्वारा गुजरात सरकार द्वारा क्रियान्वयन के लिए गठित किया गया था।<br style="box-sizing: border-box;" />स्टैच्यू ऑफ यूनिटी मूवमेंट नाम की प्रतिमा के निर्माण के समर्थन में शुरू करने के लिए किसानों को उनके इस्तेमाल किए गए कृषि उपकरणों को दान करने के लिए कहकर मूर्ति के लिए आवश्यक लोहे को इकट्ठा करने में मदद का आवाहन किया गया था और 2016 तक कुल 135 मीट्रिक टन स्क्रैप लोहा एकत्र किया गया था और लगभग 109 टन टन स्क्रैप लोहा का उपयोग प्रसंस्करण के बाद प्रतिमा की नींव बनाने के लिए किया गया था।प्रोजेक्ट के समर्थन में 15 दिसंबर 2013 को सूरत में रन फॉर यूनिटी नामक मैराथन आयोजित की गई थी।</p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_1_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_1_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_1" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=2163350709&pi=t.aa~a.3262126219~i.7~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638361199&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Fwhy-congress-leader-avoid-to-go-to-statue-of-unity%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638361107786&bpp=4&bdt=1692&idt=4&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0&nras=2&correlator=2003726317371&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638361107&ga_hid=1725435843&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=1189&biw=1343&bih=568&scr_x=0&scr_y=0&eid=31063752%2C44753656&oid=2&pvsid=3113188200053340&pem=696&tmod=682413963&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D283&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C568&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=2&uci=a!2&btvi=1&fsb=1&xpc=ywYvoHbzTN&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=92062" name="aswift_1" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!2" data-google-query-id="CPvAt_jKwvQCFVdDnQkdFoQHkw" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">देश भर में पटेल की कई प्रतिमाओं का अध्ययन करने के बाद इतिहासकारों, कलाकारों और शिक्षाविदों की एक टीम ने भारतीय मूर्तिकार राम वी सुतार द्वारा प्रस्तुत डिजाइन ऐसी बनाई गयी कि प्रतिमा 180 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाली हवाओं का सामना कर सके और रिक्टर पैमाने पर 6.5 मापी भूकंप को सह सके | स्मारक का निर्माण अक्टूबर 2018 के मध्य में पूरा हुआ और उद्घाटन समारोह 31 अक्टूबर 2018 को आयोजित किया गया था जिसकी अध्यक्षता प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने की थी। स्टैच्यू ऑफ यूनिटी 182 मीटर (597 फीट) की दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति है। यह पिछले रिकॉर्ड धारक की तुलना में 54 मीटर (177 फीट) ऊंचा है, जो चीन के हेनान प्रांत में स्प्रिंग टेम्पल बुद्ध है। भारत में पहले यह रिकॉर्ड पहले आंध्र प्रदेश राज्य में विजयवाड़ा के पास स्थित पारिताला अंजनेय मंदिर में हनुमान की 41 मीटर (135 फीट) प्रतिमा के पास था जिसे 7 किमी (4.3 मील) के दायरे में देखा जा सकता था ।</p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_2_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_2_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_2" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=2911792039&pi=t.aa~a.3262126219~i.9~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638361199&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Fwhy-congress-leader-avoid-to-go-to-statue-of-unity%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638361107794&bpp=2&bdt=1699&idt=2&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0%2C700x280&nras=3&correlator=2003726317371&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638361107&ga_hid=1725435843&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=1776&biw=1343&bih=568&scr_x=0&scr_y=0&eid=31063752%2C44753656&oid=2&pvsid=3113188200053340&pem=696&tmod=682413963&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D283&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C568&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=3&uci=a!3&btvi=2&fsb=1&xpc=ooRoJBL3kX&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=92077" name="aswift_2" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!3" data-google-query-id="CPuHvPjKwvQCFRWEcAoduGcDlg" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">15 नवंबर को सैन फ्रांसिस्को स्थित एक इमेजिंग कंपनी प्लैनेट लैब्स ने अपने ट्विटर अकाउंट के जरिए स्टैच्यू ऑफ यूनिटी की तस्वीर जारी की। कुछ ही घंटों के भीतर, भारतीय मीडिया और सोशल नेटवर्क सरदार पटेल के व्यक्तित्व को लेकर बड़े पैमाने पर जगह बना चुके थे। मानव निर्मित संरचनाओं में से जो पृथ्वी के ऊपर से देखी जा सकती है जैसे कि दुबई के तट पर पाम द्वीप और गीज़ा के महान पिरामिड के साथ 182 मीटर की द स्टैच्यू ऑफ यूनिटी(Statue of Unity) अब अंतरिक्ष से भी दिखाई देती है।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">जवाहर लाल नेहरू को भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में चुना गया था और सरदार पटेल उनके डिप्टी बने थे आधिकारिक इतिहास ने हमेशा भारत के लौह पुरुष सरदार वल्लभ भाई पटेल के प्रति घोर अन्याय किया है । कांग्रेस के पूरी तात्कालीन टीम ने सरदार पटेल को सबसे योग्य उम्मीदवार के रूप में देखा था जिन्हें स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में शपथ दिलाई जा सकती थी | 1946 तक यह स्पष्ट हो गया था कि भारत की स्वतंत्रता के अब कुछ ही समय बचा था।साथ ही द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त हो गया था और ब्रिटिश शासकों ने भारतीयों को सत्ता हस्तांतरित करने के संदर्भ में सोचना भी शुरू कर दिया था।</p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_3_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_3_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_3" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=2935951234&pi=t.aa~a.3262126219~i.13~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638361200&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Fwhy-congress-leader-avoid-to-go-to-statue-of-unity%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638361107798&bpp=2&bdt=1703&idt=2&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0%2C700x280%2C700x280&nras=4&correlator=2003726317371&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638361107&ga_hid=1725435843&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=2171&biw=1343&bih=568&scr_x=0&scr_y=0&eid=31063752%2C44753656&oid=2&pvsid=3113188200053340&pem=696&tmod=682413963&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D283&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C1360%2C728%2C1360%2C568&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=4&uci=a!4&btvi=3&fsb=1&xpc=iefx3gTPeQ&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=92411" name="aswift_3" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!4" data-google-query-id="CMvxzfjKwvQCFfBBnQkdEw4HZw" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">इस हेतु एक अंतरिम सरकार का गठन किया जाना था जिसका नेतृत्व कांग्रेस अध्यक्ष को करना था क्योंकि 1946 के चुनावों में कांग्रेस ने सबसे अधिक सीटें जीती थीं। अचानक कांग्रेस अध्यक्ष का पद बहुत महत्वपूर्ण हो गया क्योंकि यह वही व्यक्ति था जो स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री बनने जा रहा था।उस समय मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष थे। वास्तव में वह पिछले छह वर्षों से अध्यक्ष थे क्योंकि कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए चुनाव नहीं हो सकते थे| कांग्रेस के अध्यक्ष पद के लिए नामांकन 15 राज्य / क्षेत्रीय कांग्रेस समितियों द्वारा किए जाने थे। कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में नेहरू के लिए गांधी की खास पसंद के बावजूद एक भी कांग्रेस समिति ने नेहरू का नाम नहीं लिया।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">इसके विपरीत 15 में से 12 कांग्रेस समितियों ने सरदार वल्लभ भाई पटेल को नामित किया। शेष तीन कांग्रेस समितियों ने किसी भी नाम को नामित ही नहीं किया। जाहिर है कि भारी बहुमत सरदार पटेल के पक्ष में था।यह महात्मा गांधी के लिए भी एक चुनौती थी। उन्होंने आचार्य जे बी कृपलानी को निर्देश दिया कि नेहरू के लिए कुछ प्रस्तावकों को कांग्रेस कार्य समिति (सीडब्ल्यूसी) के सदस्यों से पूरी तरह से अच्छी तरह से जानने के बावजूद कि केवल प्रदेश कांग्रेस समितियों को ही अध्यक्ष नामित करने के लिए अधिकृत किया गया था। कृपलानी ने सीडब्ल्यूसी के कुछ सदस्यों को पार्टी अध्यक्ष के लिए नेहरू के नाम का प्रस्ताव देने के लिए मना लिया।</p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_4_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_4_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_4" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=975187430&pi=t.aa~a.3262126219~i.17~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638361816&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Fwhy-congress-leader-avoid-to-go-to-statue-of-unity%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638361107802&bpp=1&bdt=1697&idt=1&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0%2C700x280%2C700x280%2C700x280&nras=5&correlator=2003726317371&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638361107&ga_hid=1725435843&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=2343&biw=1343&bih=568&scr_x=0&scr_y=74&eid=31063752%2C44753656&oid=2&pvsid=3113188200053340&pem=696&tmod=682413963&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D283&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C1360%2C728%2C1360%2C568&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=5&uci=a!5&btvi=4&fsb=1&xpc=0lGRS2ris4&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=M" name="aswift_4" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!5" data-google-query-id="CO7vtJ7NwvQCFRSRcAodbkUCDA" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">ऐसा नहीं है कि गांधी को इस अभ्यास की अनैतिकता के बारे में पता नहीं था। उन्होंने पूरी तरह से महसूस किया था कि वह जो लाने की कोशिश कर रहे थे वह गलत और पूरी तरह से अनुचित था।वास्तव में उन्होंने नेहरू को वास्तविकता समझाने की कोशिश भी की थी । उन्होंने नेहरू को बताया कि किसी भी पीसीसी ने उनका नाम नहीं लिया है और केवल कुछ ही सीडब्ल्यूसी सदस्यों ने उन्हें नामित किया है। फिर भी गांधी ने नेहरू की बात मान ली और सरदार पटेल को अपना नाम वापस लेने को कहा। सरदार पटेल का गांधी के प्रति बहुत सम्मान था और उन्होंने बिना समय बर्बाद किए अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली। और इसने भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में पंडित जवाहर लाल नेहरू के राज्याभिषेक का मार्ग प्रशस्त किया।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">लेकिन गांधी ने सरदार वल्लभ भाई पटेल के समर्थन की अनदेखी क्यों की? वह नेहरू के साथ इतने आसक्त क्यों थे?<br style="box-sizing: border-box;" />जब डॉ राजेंद्र प्रसाद ने सरदार पटेल के नामांकन वापस लेने की बात सुनीतो उन्हें निराशा हुई और उन्होंने टिप्पणी की कि गांधी ने एक बार फिर 'ग्लैमरस नेहरू' के पक्ष में अपने भरोसेमंद लेफ्टिनेंट की बलि दे दी थी।क्या यह नेहरू का 'ग्लैमर' और 'परिष्कार' था जिसने गांधी को इतना प्रभावित किया कि उन्होंने पटेल के साथ घोर अन्याय करने में संकोच नहीं किया?</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">इस सवाल का जवाब इतना आसान नहीं है। लेकिन पटेल और नेहरू के प्रति गांधी के दृष्टिकोण का घनिष्ठ विश्लेषण कुछ तथ्यों पर प्रकाश डालता है जो इस रहस्य को उजागर कर सकते हैं।इस तथ्य से कोई इनकार नहीं है कि गांधी के पास शुरू से ही नेहरू के लिए एक ’सॉफ्ट कॉर्नर’ था और उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष के पद के लिए 1946 से पहले दो बार सरदार पटेल पर नेहरू को प्राथमिकता दी थी। गांधी हमेशा नेहरू के आधुनिक दृष्टिकोण से प्रभावित थे। नेहरू की तुलना में सरदार पटेल थोड़ा रूढ़िवादी थे और गांधी ने सोचा कि भारत को एक ऐसे व्यक्ति की जरूरत है जो उनके दृष्टिकोण में आधुनिक हो।</p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_5_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_5_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_5" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=2039377920&pi=t.aa~a.3262126219~i.23~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638361817&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Fwhy-congress-leader-avoid-to-go-to-statue-of-unity%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638361107806&bpp=3&bdt=1700&idt=3&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0%2C700x280%2C700x280%2C700x280%2C700x280&nras=6&correlator=2003726317371&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638361107&ga_hid=1725435843&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=2999&biw=1343&bih=568&scr_x=0&scr_y=737&eid=31063752%2C44753656&oid=2&pvsid=3113188200053340&pem=696&tmod=682413963&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D283&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C1360%2C728%2C1360%2C568&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=6&uci=a!6&btvi=5&fsb=1&xpc=7iVDi2GTHN&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=M" name="aswift_5" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!6" data-google-query-id="CNeu-J7NwvQCFU2NjwodBFwFTw" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">लेकिन किसी भी चीज से ज्यादा गांधी हमेशा से जानते थे कि सरदार पटेल उन्हें कभी नहीं टालेंगे। वह नेहरू के बारे में इतना आश्वस्त नहीं थे। गांधी की आशंका तब पूरी हुई जब नेहरू ने उन्हें यह स्पष्ट कर दिया कि वह किसी के लिए दूसरी भूमिका निभाने को तैयार नहीं हैं।शायद, गांधी चाहते थे कि नेहरू और पटेल दोनों देश को नेतृत्व प्रदान करें। उन्होंने नेहरू के पक्ष में अपनी वीटो शक्ति का इस्तेमाल किया क्योंकि उन्हें डर था कि अगर नेहरू को भारत का प्रधानमंत्री बनने का मौका नहीं दिया गया तो स्वतंत्रता के रास्ते में समस्या हो सकती है ।कुछ विश्लेषकों ने यह भी दावा किया है कि नेहरू ने कांग्रेस को प्रधानमंत्री नहीं बनाए जाने की स्थिति में विभाजित करने की धमकी दी थी।इन विश्लेषकों के अनुसार नेहरू ने गांधी का समर्थन करते हुए कहा कि यदि उन्होंने कांग्रेस का विभाजन किया तो पूरी स्वतंत्रता योजना चरमरा जाएगी क्योंकि अंग्रेजों को देरी का बहाना मिल जाएगा।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">गांधी ने सोचा होगा कि सरदार पटेल को नेहरू के साथ त्याग करने के लिए कहना सुरक्षित होगा। वास्तव में उन्होंने टिप्पणी की थी कि नेहरू सत्ता-पागल हो गए थे।वह जानते थे कि सरदार पटेल एक सच्चे देशभक्त थे और वे कभी कोई खेल नहीं खेलेंगे।लेकिन गांधी का निर्णय राष्ट्र के लिए बहुत महंगा साबित हुआ।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">सबसे पहले गांधी ने तथाकथित उच्च-आदेशों ’द्वारा मजबूर फैसलों की अवधारणा को पेश किया, जिसका अर्थ है आमतौर पर राज्य इकाइयों पर हावी होना। राजनीतिक प्रचलन के दौरान इस प्रथा का पालन किया गया जिसने आंतरिक पार्टी लोकतंत्र की अवधारणा को नकार ही दिया । नेहरू के कश्मीर और चीन पर उपद्रव इस तथ्य से परे साबित हुए कि गांधी ने सरदार पटेल के लिए पीसीसी के बहुमत से भारी समर्थन की उपेक्षा करते हुए नेहरू को समर्थन देने में गलती की।यहां तक ​​कि सरदार पटेल के दो ज्ञात आलोचकों ने इस बात को स्वीकार किया कि गांधी द्वारा पटेल पर नेहरू को चुनने का निर्णय गलत था।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने 1959 में मरणोपरांत प्रकाशित होने वाली अपनी आत्मकथा में स्वीकार किया, “यह मेरी ओर से एक गलती थी कि मैंने सरदार पटेल का समर्थन नहीं किया। हम कई मुद्दों पर अलग हुए | जब मैं सोचता हूँ कि अगर मैंने ये गलतियाँ नहीं की होती तो शायद पिछले दस सालों का इतिहास कुछ और होता। ”इसी तरह, सी राजगोपालाचार्य जिन्होंने सरदार पटेल को स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री पद से वंचित करने के लिए दोषी ठहराया गया, ने लिखा कि- “निस्संदेह यह बेहतर होता अगर नेहरू को विदेश मंत्री बनाया जाता और पटेल को प्रधानमंत्री बनाया जाता। मैं भी यह मानने की भूल में पड़ गया कि जवाहरलाल दो लोगों में से अधिक प्रबुद्ध व्यक्ति थे | एक मिथक पटेल के बारे में खड़ा हो गया था कि वह मुसलमानों के प्रति कठोर होगा। यह एक गलत धारणा थी लेकिन यह प्रचलित पूर्वाग्रह था। ”</p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_6_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_6_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_6" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=1879253995&pi=t.aa~a.3262126219~i.31~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638361818&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Fwhy-congress-leader-avoid-to-go-to-statue-of-unity%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638361107812&bpp=1&bdt=1706&idt=1&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0%2C700x280%2C700x280%2C700x280%2C700x280%2C700x280&nras=7&correlator=2003726317371&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638361107&ga_hid=1725435843&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=3857&biw=1343&bih=568&scr_x=0&scr_y=1587&eid=31063752%2C44753656&oid=2&pvsid=3113188200053340&pem=696&tmod=682413963&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D283&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C1360%2C728%2C1360%2C568&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=7&uci=a!7&btvi=6&fsb=1&xpc=mResMtikj6&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=M" name="aswift_6" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!7" data-google-query-id="CJCizp_NwvQCFRFWjwod9OQECQ" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">इतिहास ने इसे संदेह से परे साबित किया है कि नेहरू के स्थान पर पटेल पीएम होते तो देश को 1962 के युद्ध का अपमान नहीं झेलना पड़ा होगा।अपनी मृत्यु के कुछ दिन पहले, पटेल ने नेहरू को एक पत्र लिखा था जिसमें उन्होंने चीन के नापाक इरादों के बारे में चेतावनी दी थी, लेकिन नेहरू ने उस पत्र पर कोई ध्यान नहीं दिया।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"> </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/why-dont-congress-people-go-to-the-statue-of-unity-what-was-the-dispute-between-nehru-and-patel						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/why-dont-congress-people-go-to-the-statue-of-unity-what-was-the-dispute-between-nehru-and-patel </guid>
					<pubDate>Wed, 01 Dec 2021 19:03:12 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						महाराणा प्रताप जीते जी नही हारे ,मौत पर अकबर भी रोया						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">महाराणा प्रताप राजस्थान के वर्तमान उदयपुर और तत्कालीन मेवाड में सिसोदिया राजपूत राजवंश के राजा थे। उनका नाम इतिहास में वीरता और दृढ प्रण के लिये अमर है और सदैव रहेगा। उन्होंने कई सालों तक मुगल सम्राट अकबर के साथ संघर्ष किया। महाराणा प्रताप का जन्म कुम्भलगढ़ दुर्ग में हुआ था। महाराणा प्रताप की माता का नाम जयवंता बाई था, जो पाली के सोनगरा अखैराज की बेटी थी। महाराणा प्रताप को बचपन में कीका के नाम से पुकारा जाता था।</p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_1_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_1_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_1" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=2163350709&pi=t.aa~a.3262126219~i.7~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638360636&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Fmaharana-prataphistoric-hero-of-mewar%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638360636335&bpp=3&bdt=1267&idt=3&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0&nras=2&correlator=4835333871417&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638360636&ga_hid=327312901&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=1308&biw=1343&bih=625&scr_x=0&scr_y=0&eid=31063752%2C31063182%2C31063246%2C44748552&oid=2&pvsid=3359012749316369&pem=696&tmod=682413963&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D283&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C1360%2C728%2C1360%2C625&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=2&uci=a!2&btvi=1&fsb=1&xpc=xFN9UOrMBA&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=44" name="aswift_1" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!2" data-google-query-id="CLO94OvIwvQCFdvVcwEdL2YNbA" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">राणा उदयसिंह केे दूसरी रानी धीरबाई जिसे राज्य के इतिहास में रानी भटियाणी के नाम से जाना जाता है, यह अपने पुत्र कुंवर जगमाल को मेवाड़ का उत्तराधिकारी बनाना चाहती थी । प्रताप केे उत्तराधिकारी होने पर इसकेे विरोध स्वरूप जगमाल अकबर केे खेमे में चला गया। महाराणा प्रताप का प्रथम राज्याभिषेक 28 फरवरी, 1572 में गोगुन्दा में हुआ , लेकिन विधि विधानस्वरूप महाराणा प्रताप का द्वितीय राज्याभिषेक 1572 ई. में ही कुुंभलगढ़़ दुुर्ग में हुआ, दूूूसरे राज्याभिषेक में जोधपुर के राठौड़ शासक राव चन्द्रसेेन भी उपस्थित थे |</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">राणा प्रताप ने अपने जीवन में कुल 11 शादियाँ की थी। उनके पत्नियों और उनसे प्राप्त उनके पुत्रों पुत्रियों के नाम है:-</p>
<ul style="box-sizing: border-box; margin: 20px; padding: 0px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">
<li style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.5; padding: 5px 0px;">महारानी अजब्धे पंवार :- अमरसिंह और भगवानदास</li>
<li style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.5; padding: 5px 0px;">अमरबाई राठौर :- नत्था</li>
<li style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.5; padding: 5px 0px;">शहमति बाई हाडा :-पुरा</li>
<li style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.5; padding: 5px 0px;">अलमदेबाई चौहान:- जसवंत सिंह</li>
<li style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.5; padding: 5px 0px;">रत्नावती बाई परमार :-माल,गज,क्लिंगु</li>
<li style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.5; padding: 5px 0px;">लखाबाई :- रायभाना</li>
<li style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.5; padding: 5px 0px;">जसोबाई चौहान :-कल्याणदास</li>
<li style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.5; padding: 5px 0px;">चंपाबाई जंथी :- कल्ला, सनवालदास और दुर्जन सिंह</li>
<li style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.5; padding: 5px 0px;">सोलनखिनीपुर बाई :- साशा और गोपाल</li>
<li style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.5; padding: 5px 0px;">फूलबाई राठौर :-चंदा और शिखा</li>
<li style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.5; padding: 5px 0px;">खीचर आशाबाई :- हत्थी और राम सिंह</li>
</ul>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">महाराणा प्रताप सिंह ने मुगलों को कईं बार युद्ध में भी हराया। 1576 के हल्दीघाटी युद्ध में 20000 राजपूतों को साथ लेकर राणा प्रताप ने मुगल सरदार राजा मानसिंह के 80000 की सेना का सामना किया। शत्रु सेना से घिर चुके महाराणा प्रताप को झाला मानसिंह ने अपने प्राण दे कर बचाया ओर महाराणा को युद्ध भूमि छोड़ने के लिए बोला। शक्ति सिंह ने अपना अश्व दे कर महाराणा को युद्धभूमि से दूर भेजने में मदद की क्योंकि युद्ध में उनके प्रिय अश्व चेतक की भी मृत्यु हो गयी थी । यह युद्ध तो केवल एक दिन चला, परन्तु इसमें 17000 लोग मारे गए। मेवाड़ को जीतने के लिये अकबर ने सभी प्रयास किये लेकिन सारे प्रयास विफल ही रहे।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">महाराणा प्रताप के शासनकाल में सबसे रोचक तथ्य यह है कि मुगल सम्राट अकबर बिना युद्ध के महाराणा प्रताप को अपने अधीन लाना चाहता था इसलिए अकबर ने प्रताप को समझाने के लिए चार राजदूत नियुक्त किए जिसमें सर्वप्रथम सितम्बर 1572 ई. में जलाल खाँ प्रताप के खेमे में गये, इसी क्रम में मानसिंह (1573 ई. में ), भगवानदास ( सितम्बर, 1573 ई. में ) तथा राजा टोडरमल ( दिसम्बर,1573 ई. ) प्रताप को समझाने के लिए पहुँचे, लेकिन राणा प्रताप ने चारों को निराश ही किया। इस तरह महाराणा प्रताप ने मुगलों की अधीनता स्वीकार करने से मना कर दिया और हमें हल्दी घाटी का ऐतिहासिक युद्ध देखने को मिला ।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; text-decoration-line: underline;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">हल्दीघाटी का युद्ध:</span></span></p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">यह युद्ध 18 जून 1576 ईस्वी में मेवाड़ तथा मुगलों के मध्य हुआ था। इस युद्ध में मेवाड़ की सेना का नेतृत्व महाराणा प्रताप ने किया था। इस युद्ध में महाराणा प्रताप की तरफ से लड़ने वाले एकमात्र मुस्लिम सरदार थे- हकीम खाँ सूरी। इस युद्ध में मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह तथा आसफ खाँ ने किया था । इस युद्ध का आँखों देखा वर्णन अब्दुल कादिर बदायूनीं ने किया। इस युद्ध को आसफ खाँ ने अप्रत्यक्ष रूप से जेहाद की संज्ञा दी। इस युद्ध में बींदा के झालामान ने अपने प्राणों का बलिदान करके महाराणा प्रताप के जीवन की रक्षा की। वहीं ग्वालियर नरेश 'राजा रामशाह तोमर' भी अपने तीन पुत्रों 'कुँवर शालीवाहन', 'कुँवर भवानी सिंह, 'कुँवर प्रताप सिंह' और पौत्र बलभद्र सिंह एवं सैकडों वीर तोमर राजपूत योद्धाओं समेत चिरनिद्रा में सो गए ।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">ये युद्ध पूरे एक दिन चला ओेैर राजपूतों ने मुग़लों के छक्के छुड़ा दिया थे और सबसे बड़ी बात यह है कि युद्ध आमने सामने लड़ा गया था। महाराणा की सेना ने मुगलों की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया था और मुगल सेना भागने लग गयी थी।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; text-decoration-line: underline;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;"><img style="box-sizing: border-box; border: 0px; max-width: 100%; margin: 0px 0px 20px;" src="https://www.newsagencyindia.com/media/3316/xx.jpg" alt="" /></span></span></p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; text-decoration-line: underline;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">दिवेेेेर का युुद्ध:</span></span></p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">राजस्थान के इतिहास 1582 में दिवेर का युद्ध एक महत्वपूर्ण युद्ध माना जाता है, क्योंकि इस युद्ध में महाराणा प्रताप के खोये हुए राज्यों की पुनः प्राप्ती हुई, इसके पश्चात राणा प्रताप व मुगलो के बीच एक लम्बा संघर्ष युद्ध के रुप में घटित हुआ, जिसके कारण कर्नल जेम्स टाॅड ने इस युद्ध को "<span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">मेवाड़ का मैराथन</span>" कहा ।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; text-decoration-line: underline;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">सफलता और अवसान</span></span></p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">1579 से 1585 तक पूर्व उत्तर प्रदेश, बंगाल, बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा प्रताप भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे, अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उलझा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने 1585 में मेवाड़ से मुगलो से मुक्ति के प्रयत्नों को और भी तेज कर लिया। महाराणा की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरंत ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया। महाराणा प्रताप ने जिस समय सिंहासन ग्रहण किया ,उस समय जितने मेवाड़ की भूमि पर उनका अधिकार था ,पूर्ण रूप से उतने ही भूमि भाग पर अब उनकी सत्ता फिर से स्थापित हो गई थी। बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लंबी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अंत 1585 में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख-सुविधा में जुट गए, परंतु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावंड में उनकी मृत्यु हो गई। महाराणा प्रताप सिंह के डर से अकबर अपनी राजधानी लाहौर लेकर चला गया और महाराणा के स्वर्गारोहण के बाद पुनः आगरा ले आया।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">'एक सच्चे राजपूत, शूरवीर, देशभक्त, योद्धा, मातृभूमि के रखवाले के रूप में महाराणा प्रताप दुनिया में सदैव के लिए अमर हो गए।'</p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_2_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_2_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_2" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=2911792039&pi=t.aa~a.3262126219~i.35~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638360639&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Fmaharana-prataphistoric-hero-of-mewar%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638360636341&bpp=2&bdt=1273&idt=2&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0%2C700x280&nras=3&correlator=4835333871417&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638360636&ga_hid=327312901&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=4059&biw=1343&bih=625&scr_x=0&scr_y=1592&eid=31063752%2C31063182%2C31063246%2C44748552&oid=2&pvsid=3359012749316369&pem=696&tmod=682413963&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D283&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C1360%2C728%2C1360%2C625&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=3&uci=a!3&btvi=2&fsb=1&xpc=V7Fcy826H0&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=3447" name="aswift_2" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!3" data-google-query-id="CKjdsO3IwvQCFWfNcwEdYNIC1Q" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; text-decoration-line: underline;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">महाराणा प्रताप सिंह के मृत्यु पर अकबर की प्रतिक्रिया</span></span></p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">अकबर महाराणा प्रताप का सबसे बड़ा शत्रु था, पर उनकी यह लड़ाई कोई व्यक्तिगत द्धेष का परिणाम नहीं थी, बल्कि अपने सिद्धांतों और मूल्यों की लड़ाई थी। एक तरह अकबर जो अपने क्रूर साम्राज्य का विस्तार करना चाहता था,दुसरी तरफ महाराणा प्रताप थे जो अपनी भारत मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष कर रहे थे। महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जानता था कि महाराणा जैसा वीर कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आंसू आ गए। महाराणा प्रताप के स्वर्गावसान के समय अकबर लाहौर में था और वहीं उसे सूचना मिली कि महाराणा प्रताप की मृत्यु हो गई है।</span></p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_3_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_3_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_3" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=2935951234&pi=t.aa~a.3262126219~i.39~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638360640&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Fmaharana-prataphistoric-hero-of-mewar%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638360636346&bpp=2&bdt=1278&idt=2&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0%2C700x280%2C700x280&nras=4&correlator=4835333871417&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638360636&ga_hid=327312901&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=4396&biw=1343&bih=625&scr_x=0&scr_y=1900&eid=31063752%2C31063182%2C31063246%2C44748552&oid=2&pvsid=3359012749316369&pem=696&tmod=682413963&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D283&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C1360%2C728%2C1360%2C625&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=4&uci=a!4&btvi=3&fsb=1&xpc=fWaI9ffJx5&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=3743" name="aswift_3" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!4" data-google-query-id="COX4we3IwvQCFZsetwAdulQG4w" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">अकबर की उस समय की मनोदशा पर अकबर के दरबारी दुरसा आढ़ा ने राजस्थानी छंद में जो विवरण लिखा वो कुछ इस तरह है:-</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">अस लेगो अणदाग पाग लेगो अणनामी</span><br style="box-sizing: border-box;" /><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">गो आडा गवड़ाय जीको बहतो घुरवामी</span><br style="box-sizing: border-box;" /><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">नवरोजे न गयो न गो आसतां नवल्ली</span><br style="box-sizing: border-box;" /><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">न गो झरोखा हेठ जेठ दुनियाण दहल्ली</span><br style="box-sizing: border-box;" /><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">गहलोत राणा जीती गयो दसण मूंद रसणा डसी</span><br style="box-sizing: border-box;" /><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">निसा मूक भरिया नैण तो मृत शाह प्रतापसी</span></p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">अर्थात्</span></p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">हे ! गहलोत राणा प्रतापसिंह ,आपकी मृत्यु पर शाह यानि सम्राट ने दांतों के बीच जीभ दबाई और निःश्वास के साथ आंसू टपकाए। क्योंकि आपने कभी भी अपने घोड़ों पर मुगलिया दाग नहीं लगने दिया। आपने अपनी पगड़ी को किसी के आगे झुकाया नहीं, हालांकि आप अपना आडा यानि यश या राज्य तो गंवा गये लेकिन फिर भी आप अपने राज्य की धूरी को बांए कंधे से ही चलाते रहे। आपकी रानियां कभी नवरोजों में नहीं गईं और ना ही आप खुद आसतों यानि बादशाही डेरों में गये। आप कभी शाही झरोखे के नीचे नहीं खड़े रहे और आपका रौब दुनिया पर निरंतर बना रहा। इसलिए मैं कहता हूं कि आप सब तरह से जीत गए और बादशाह हार गया।</span></p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">अपनी मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए अपना पूरा जीवन का बलिदान कर देने वाले ऐसे वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और उनके स्वामिभक्त अश्व चेतक को शत-शत कोटि-कोटि प्रणाम।</p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_4_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_4_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_4" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=975187430&pi=t.aa~a.3262126219~i.49~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638360640&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Fmaharana-prataphistoric-hero-of-mewar%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638360636350&bpp=2&bdt=1282&idt=2&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0%2C700x280%2C700x280%2C700x280&nras=5&correlator=4835333871417&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638360636&ga_hid=327312901&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=5082&biw=1343&bih=625&scr_x=0&scr_y=2599&eid=31063752%2C31063182%2C31063246%2C44748552&oid=2&pvsid=3359012749316369&pem=696&tmod=682413963&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D283&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C1360%2C728%2C1360%2C625&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=5&uci=a!5&btvi=4&fsb=1&xpc=xic8p3J42v&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=4488" name="aswift_4" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!5" data-google-query-id="CKDY7-3IwvQCFWjTcwEdEX4HFQ" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">अकबर द्वारा गुजरात की विजय के बाद मेवाड़ ने फिर से ध्यान आकर्षित किया। वह पूरी तरह से जानता था कि मेवाड़ समस्या का समाधान किए बिना उसके अन्य राजपूत राज्यों के साथ गठबंधन स्थिर नहीं हो सका। संयोग से उसी वर्ष (1572) राणा उदय सिंह की मृत्यु हो गई और थोड़े समय के बाद उत्तराधिकार की लड़ाई हुई| राणा प्रताप गोगुन्दा में मेवाड़ के शासक के रूप में सफल हुए। शीघ्र ही बाद में उन्होंने अपनी राजधानी को कुंभलगढ़ नामक एक बहुत सुरक्षित स्थान पर स्थानांतरित कर दिया। मेवाड़ को अकबर ने लगातार आधीनता स्वीकार करने के लिए उन्हीं शर्तों पर मुगलों की अधीनता में शामिल करने को कहा जो अन्य राजपूत सरदारों को पेश की गई थी| सितम्बर 1572 को राणा प्रताप के दरबार में जलाल खान कुरची अकबर के दूत बनकर आये पर वह प्रताप को मुगलों के अधिपत्य को स्वीकार करने के लिए समझाने में नाकाम रहे और निराश होकर लौटे। अकबर के दूत राजा यार सिंह जो 1573 में भेजे गए थे वो भी वांछित परिणाम प्राप्त करने में विफल रहे। अक्टूबर 1573 में अकबर ने प्रताप को लुभाने के लिए मुगल खेमे में अग्रणी राजपूत राजा भगवंत दास कच्छवाहा प्रमुख को भेजने का एक और प्रयास किया।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">अकबर चाहता था कि महाराणा प्रताप अकबर के दरबार में व्यक्तिगत उपस्थिति दर्ज़ कर मित्रता का हाथ पकड़ दासता स्वीकार कर ले ।</span></p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत करने के लिए प्रताप की अनिच्छा ने भगवंत दास और अकबर के सन्देश की शर्तों को खारिज कर दिया। अकबर राणा प्रताप की व्यक्तिगत उपस्थिति पर जोर देते थे। दूतो द्वारा किए गए असफल प्रयासो के बाद अकबर का रवैया और सख्त हो गया था और फिर फलस्वरूप मान सिंह की कमान के तहत एक शक्तिशाली सेना को राणा प्रताप को दंडित करने के लिए भेजा गया। युद्ध योजना की निगरानी हेतू अकबर सम्राट 1576 को व्यक्तिगत रूप से अजमेर गए थे।</p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_5_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_5_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_5" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=2039377920&pi=t.aa~a.3262126219~i.55~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638360672&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Fmaharana-prataphistoric-hero-of-mewar%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638360636354&bpp=3&bdt=1286&idt=3&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0%2C700x280%2C700x280%2C700x280%2C700x280&nras=6&correlator=4835333871417&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638360636&ga_hid=327312901&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=5709&biw=1343&bih=625&scr_x=0&scr_y=3212&eid=31063752%2C31063182%2C31063246%2C44748552&oid=2&pvsid=3359012749316369&pem=696&tmod=682413963&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D283&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C1360%2C728%2C1360%2C625&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=6&uci=a!6&btvi=5&fsb=1&xpc=LksOmk7pfV&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=35999" name="aswift_5" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!6" data-google-query-id="COio-vzIwvQCFcrLcwEd_JkMOA" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">राणा प्रताप पर अपनी चोटों से उबरने के बाद कुंभलगढ़ लौट आए अपने खोए हुए भू भाग को पुनः प्राप्त करने के लिए प्रयास करना शुरू कर दिया। मुगलों के खिलाफ राजपूत प्रमुखों के एक समूह का एक गठबंधन करने में उन्होंने सफलता प्राप्त की। प्रताप की इन शत्रुतापूर्ण गतिविधियों का पता अकबर को व्यक्तिगत रूप से अजमेर में ही चल गया और भगवंत दास और मान सिंह को उनके और अन्य के खिलाफ कार्रवाई करने के लिए मेवाड़ की और भेजा। अजमेर में सम्राट अकबर की उपस्थिति मजबूत थी और सैन्य कार्रवाई के वांछित परिणाम आ सकते थे।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">हालांकि कई महत्वपूर्ण सैन्य कमांडर जैसे भगवंत दास (1577) , शाहबाज़ खान कम्बोह (1577),अब्दुर रहीम खान-इकन (1580) और राजा जगमीमथ (1584 ) को उनके खिलाफ भेजा गया लेकिन वे राणा को शाही सेवा में शामिल होने के लिए मजबूर करने में विफल रहे। उन्होंने चावंड में एक नई राजधानी की नींव भी रखी। 1597 में उनके बड़े बेटे और उत्तराधिकारी ने अमर सिंह ने महाराणा प्रताप की मृत्यु के बाद कुछ समय के लिए अपने पिता की नीति को जारी रखा। लेकिन लगातार युद्धों के कारण उनकी सैन्य शक्ति में काफी गिरावट आई और उन्होंने अपने कई क्षेत्रों को खो दिया। अमर सिंह ने इसे बेहतर बनाने के लिए कड़ी मेहनत की अपने राज्य के आंतरिक कामकाज और उसके साथ अपने संबंधों को बेहतर बनाने की कोशिश की।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">फिर 1599 में मुग़लो ने मेवाड़ पर आक्रमण शुरू किया। अकबर ने राजकुमार सलीम के साथ सेना के कमांडर राजा मान सिंह को अजमेर से मेवाड़ जाने को कहा। लेकिन सलीम ने ऑपरेशन में कोई दिलचस्पी नहीं ली क्योंकि वह मुगल सिंहासन पर कब्जा करने की साजिश रचने में लगे हुआ था। बाद में उदयपुर की एक छोटी यात्रा करते हुए उन्होंने इसे पूरी तरह से राजा मान सिंह पर छोड़ दिया। इनमें मुग़ल सेनाएँ केवल अटाला में कब्ज़ा स्थापित करने में सफल रहीं और मोही, बागोर, माण्डल ,मांडलगढ़, चित्तौड़ और अन्य स्थानों पर मुग़ल सेना कब्ज़े में असफल रही | कुछ समय बाद मान सिंह को बंगाल जाना पड़ा और उस्मान के विद्रोह के कारण सलीम ने आगरा की ओर प्रस्थान किया। 1603 में एक बार फिर अकबर ने मेवाड़ पर अभियान चलाने का फैसला किया। राजकुमार सलीम के साथ कई प्रमुख राजपूत राजाओ (जैसे साजगरैयाथ, माधो सिंह, सादिक खान आदि) को आदेश दिया कि वे सभी 1599 में अधूरे रह गए कार्य को पूरा करने के लिए मेवाड़ की ओर चलें। लेकिन सलीम ने आदेशों का पालन करने से इनकार कर दिया। बिना किसी और इंतजार के अकबर ने खुसरू को कमान संभालने के लिए नियुक्त किया गया लेकिन अभियान नहीं चल सका। अकबर की बीमारी के बाद उनकी मृत्यु हो गयी । स्पष्ट है कि अकबर अपने जीवन काल के दौरान अपने समकालीन सिसोदिया प्रमुख राणा प्रताप और अमर सिंह को पूरी तरह हराने में असफल रहे और मुगलिया सल्तनत का अधिपत्य मेवाड़ पर हो न पाया ।</p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"><ins class="adsbygoogle adsbygoogle-noablate" style="box-sizing: border-box; display: block; margin: auto; height: 0px;" data-ad-format="auto" data-ad-client="ca-pub-8603993153072544" data-adsbygoogle-status="done" data-ad-status="unfilled"><ins id="aswift_6_expand" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: inline-table;" tabindex="0" title="Advertisement" aria-label="Advertisement"><ins id="aswift_6_anchor" style="box-sizing: border-box; border: none; height: 0px; width: 700px; margin: 0px; padding: 0px; position: relative; visibility: visible; display: block; overflow: hidden; opacity: 0;"><iframe id="aswift_6" style="box-sizing: border-box; margin: 0px 0px 20px; left: 0px; position: absolute; top: 0px; border-width: 0px; border-style: initial; width: 700px; height: 0px;" src="https://googleads.g.doubleclick.net/pagead/ads?client=ca-pub-8603993153072544&output=html&h=280&adk=100108639&adf=1879253995&pi=t.aa~a.3262126219~i.61~rp.4&w=700&fwrn=4&fwrnh=100&lmt=1638360672&num_ads=1&rafmt=1&armr=3&sem=mc&pwprc=7707431039&psa=1&ad_type=text_image&format=700x280&url=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2Fmaharana-prataphistoric-hero-of-mewar%2F&flash=0&fwr=0&pra=3&rh=175&rw=700&rpe=1&resp_fmts=3&wgl=1&fa=27&uach=WyJXaW5kb3dzIiwiMC4wLjAiLCJ4ODYiLCIiLCI5Ni4wLjQ2NjQuNDUiLFtdLG51bGwsbnVsbCwiNjQiXQ..&dt=1638360636360&bpp=3&bdt=1292&idt=3&shv=r20211111&mjsv=m202111110101&ptt=9&saldr=aa&abxe=1&cookie=ID%3Df5b83c262db9d052-222af47a51cf0046%3AT%3D1638340758%3ART%3D1638340758%3AS%3DALNI_Ma-KMFXjpnTMnbZDaL2y4UDKgju2A&prev_fmts=0x0%2C700x280%2C700x280%2C700x280%2C700x280%2C700x280&nras=7&correlator=4835333871417&frm=20&pv=1&ga_vid=701393832.1638340124&ga_sid=1638360636&ga_hid=327312901&ga_fc=1&u_tz=330&u_his=1&u_h=768&u_w=1360&u_ah=728&u_aw=1360&u_cd=24&u_sd=1&dmc=4&adx=322&ady=6565&biw=1343&bih=625&scr_x=0&scr_y=4068&eid=31063752%2C31063182%2C31063246%2C44748552&oid=2&pvsid=3359012749316369&pem=696&tmod=682413963&ref=https%3A%2F%2Fwww.newsagencyindia.com%2Fcurrent-news%2F%3Fpage%3D283&eae=0&fc=1408&brdim=0%2C0%2C0%2C0%2C1360%2C0%2C1360%2C728%2C1360%2C625&vis=1&rsz=%7C%7Cs%7C&abl=NS&fu=128&bc=31&ifi=7&uci=a!7&btvi=6&fsb=1&xpc=rG5DuY1ORg&p=https%3A//www.newsagencyindia.com&dtd=36521" name="aswift_6" width="700" height="0" frameborder="0" marginwidth="0" marginheight="0" scrolling="no" sandbox="allow-forms allow-popups allow-popups-to-escape-sandbox allow-same-origin allow-scripts allow-top-navigation-by-user-activation" allowfullscreen="allowfullscreen" data-google-container-id="a!7" data-google-query-id="CPvKk_3IwvQCFYwwtwAd4msFuA" data-load-complete="true"></iframe></ins></ins></ins></div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">नोट</span> : उपरोक्त तथ्य लोगों की जानकारी के लिए है और काल खण्ड ,तथ्य और समय की जानकारी देते यद्धपि सावधानी बरती गयी है , फिर भी किसी वाद -विवाद के लिए अधिकृत जानकारी को महत्ता दी जाए। न्यूज़एजेंसीइंडिया.कॉम किसी भी तथ्य और प्रासंगिकता के लिए उत्तरदायी नहीं है।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; text-decoration-line: underline;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">Disclaimer</span></span> :​All the information on this website is published in good faith and for general information purpose only. www.newsagencyindia.com does not make any warranties about the completeness, reliability and accuracy of this information. Any action you take upon the information you find on this website www.newsagencyindia.com , is strictly at your own risk. www.newsagencyindia.com will not be liable for any losses and/or damages in connection with the use of our website.</p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/maharana-pratap-did-not-lose-but-akbar-also-cried-on-his-death						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/maharana-pratap-did-not-lose-but-akbar-also-cried-on-his-death </guid>
					<pubDate>Wed, 01 Dec 2021 18:59:04 +0530</pubDate>
				</item>

							<item>
					<title>
						<![CDATA[
						मेवाड़ का वो इतिहास जो आपको आजतक किसी ने बताया न होगा						]]>
					</title>
					<description>
						<![CDATA[
						<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">मेवाड़ राज्य की स्थापना के लिए 565 ईस्वी में गुहादित्य ने गुहिल वंश की नींव रखी थी।</span> मेवाड़ को मेदपाट/प्राग्वाट व शिवि जनपद के नाम से जाना जाता था। इस क्षेत्र में मेद अर्थात् मेर जाति रहती थी।शिवि जनपद की राजधानी मध्यमिका/मझयमिका थी और मध्यमिका को वर्तमान में नगरी कहा जाता है जो चितौडग़ढ़ में स्थित है। मेद का शाब्दिक अर्थ - मलेच्छों को मारने वाला है। मेवाड़ के राजा स्वयं को राम का वंशज मानते थे।मेवाड़ राजाओं को ‘रघुवंशी’ या ‘हिन्दुआ सूरज’ भी कहा जाता है।मेवाड़ सबसे प्राचीन रियासत थी।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">संसार में एक ही क्षेत्र में अधिक समय तक राज करने वाला एकमात्र राजवंश मेवाड़ राजवंश है| राजस्थान में मेवाड़ सबसे प्राचीन राजवंश था। 565 ई में गुहादित्य ने मेवाड़ में गुहिल वंश की स्थापना की।मेवाड़ में गुहिल वंश का संस्थापक गुहादित्य ने 565 ईस्वी में गुहिलवंश की नींव रखी।<br style="box-sizing: border-box;" />मेवाड़ में गुहिल वंश का प्रथम प्रतापी राजा बप्पा रावल (734 ई.-753 ई.)थे ।बप्पारावल को कालभोज के नाम से भी जाना जाता है। बप्पारावल को मेवाड़ का वास्तविक संस्थापक कहा जाता है। बप्पारावल हारित ऋषि की गाय को चराते थे। बप्पा रावल के पास इतनी ताकत थी कि वो एक झटके में दो भैसों की बली दे देते थे | साथ पैंतीस हाथ की धोती और सौलह हाथ का दुपट्टा पहनते थे । उनकी तलवार 32 मन (1 मन=40 किलो ) की थी। खानपान ऐसा कि चार बकरों के भोजन से ही उनका पेट भरा करता था। उनकी सेना में 12 लाख 72 हजार सैनिक थे।मेवाड़ के राजा एकलिंग नाथ के दीवान के रूप में शासन करते है| 734 ई. में बप्पारावल मौर्य शासक मानमौरी से चितौडग़ढ़ का किला जीता तथा नागदा (उदयपुर) को राजधानी बनाया। नागदा मेवाड़ के गुहिल वंश की प्रारम्भिक राजधानी बनाया।734 ई. में बप्पारावल ने मौर्य शासक मानमौरी से चितौडग़ढ़ का किला जीता तथा नागदा (उदयपुर) को राजधानी बनाया। नागदा मेवाड़ के गुहिल वंश की सबसे पहली राजधानी थी जो कैलाशपुरी से मात्र 6 किमी दूर है ।बप्पा रावल की समाधि भी नागदा, उदयपुर में बनी है।इसके बाद अल्लट (951-953ई०) ने आहड़ को दूसरी राजधानी बनाया।मेवाड़ में नौकरशाही प्रथा की शुरूआत महाराणा अल्लट ने ही की थी ।महाराणा जैत्रसिहं के समय इल्तुतमिश 1222-29 ई० के बीच ने नागदा पर आक्रमण किया। महाराणा जैत्रसिंह ने नागदा से राजधानी हटाकर चितौड़ को राजधानी बनाया।महाराणा तेजसिंह ने 1260 ई० में मेवाड़ चित्र शैली का प्रथम ग्रन्थ श्रावक प्रतिकर्मण सूत्र चूर्णि (कमल चंद्र द्वारा रचित) तेजसिंह के काल में लिखा गया है।<br style="box-sizing: border-box;" /><br style="box-sizing: border-box;" />मेवाड़ के कुलदेवता एकलिंगनाथ जी का मन्दिर बप्पारावल ने कैलाशपुरी (उदयपुर) में बनवाया था । एकलिंगनाथ मन्दिर राजस्थान में पाशुपात सम्प्रदाय/लकुलिश संप्रदाय का एकमात्र स्थल है। पाशुपात सम्प्रदाय शैवधर्म का सबसे प्राचीन सम्प्रदाय है जिसके प्रर्वतक लकुलिश मुनि है।एकलिंग जी का मेला फाल्गुन कृष्ण त्रयोदशी को कैलाशपुरी, उदयपुर में लगता है।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="font-weight: bold;">कैसे गुहिल वंश से सिसोदिआ वंश में तब्दील हुआ मेवाड़ का राजपरिवार ?</span></p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">गुहिल वंश के राजा राहप ने उदयपुर के सिसोदा ग्राम में जाकर रहना शुरू किया। राहप के ही वंश में लक्ष्मण देव सिसोदिया हुआ।रावल रत्नसिंह मेवाड़ के गुहिल या रावल वंश का अंतिम राजा थे ।1303 ई० में चितौडग़ढ़ में रावल रत्न सिंह का शासन था। 28 जनवरी 1303 ई० में अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड़ पर आक्रमण किया व 26 अगस्त 1303 ई० को चितौडगढ़ के किले को जीत लिया । इस युद्ध में रावल रत्न सिंह व उसकी सेना के साथ दो वीर सैनिक गौरा व बादल मारे गए तथा रानी पद्मिनी ने जौहर किया(गौरा पद्मिनी का चाचा था व बादल चचेरा भाई था।)। इसे चितौड़ का पहला साका कहते है। अलाउद्दीन खिलजी ने चितौड़ को 8 माह तक घेरे रखा।अलाउद्दीन खिलजी के पास पत्थर फेंकने के उपकरण थे। जिसकी सहायता से चितौडगढ़ पर पत्थर फेंके गए।चितौड़ के पहले साके में इतिहासकार अमीर खुसरो मौजूद था जिसने इस साके का वर्णन अपनी रचना खजाइनुल कुतुह या तारीख-ए-अलाई में किया है।चितौडग़ढ़ दुर्ग जीतने के बाद अलाउद्दीन खिलजी ने इस दुर्ग का नाम खिज्राबाद रखा। 1303 ईस्वी में अल्लाउददीन खिलजी ने 5 साल बाद दूसरी बार चित्तौड़ पर हमला किया। चित्तौड़ की पहली घेराबंदी के दौरान अधिकांश लड़ाई करने वाले पुरुष चारो ओर से गिर गए थे। मेवाड़ की आन-बान को बचाने के प्रयास में सभी राजपूत पुरुष अंतिम चरण के दौरान लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। इस बीच रानी पद्मिनी ने सभी राजपूत महिलाओं के साथ जौहर कर आत्मदाह कर लिया। मुस्लिम आक्रमणकारियों ने बच गई महिलाओं पर कब्जा कर लिया। मेवाड़ राजवश से जुड़े परिवार के कुछ युवा लड़के हमले के दौरान किले में नहीं थे इसलिए वंश बच गया। बचे हुए लोगों में हम्मीर था जो सिसोदा गाँव का रहने वाला था। हमीर की रानी और मल देव सोंगिरा की बेटी ने उन्हें चित्तौड़ को पुनः प्राप्त करने में मदद की। अंततः राणा हमीर ने 16 साल के मुस्लिम कब्जे के बाद चित्तौड़ पर फिर से शासन किया। "सिसोदा" के उनके गांव के बाद उनके वंश का नाम सिसोदिया रखा गया।लक्ष्मण देव सिसोदिया के सात पुत्रों में से छ: पुत्र चितौड़ के पहले साके (1303) में मारे गऐ तथा सातवां पुत्र हम्मीर सिसोदिया ने मेवाड़ में सिसोदिया राजवंश की नींव रखी।राणा हम्मीर ने दिल्ली के सुल्तान मुहम्मद तुगलक के चितौडगढ पर आक्रमण को विफल कर दिया।राणा कुंभा द्वारा रचित रसिकप्रिया (जयदेव की गीतगोविन्द पर टीका) तथा अत्रि व महेश द्वारा विजय स्तम्भ पर लिखी गयी कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति (1460) में राणा हम्मीर को विषमघाटी पंचानन (युद्ध में सिंह के समान) बताया गया है। चितौड़ का नाम धाई बा पीर की दरगाह के अभिलेख में मिलता है।कुम्भा ने अचलगढ़ दुर्ग (सिरोही) का पुन:निर्माण करवाया, बंसतीगढ दुर्ग (सिरोही), भीलों से सुरक्षा हेतु भोमट दुर्ग (सिरोही) तथा मेरों के प्रभाव को रोकने के लिए बैराठ दुर्ग (बदनौर, भीलवाड़ा) का निर्माण करवाया। भोमट क्षेत्र भीलों का निवास क्षेत्र कहलाता है।कुम्भा ने संगीतराज, संगीतसार, संगीत मीमांशा, सूढ प्रबंध व रसिकप्रिया (जयदेव की गीत गोविन्द पर टीका) आदि ग्रंथों की रचना की। कुंभा द्वारा लिखे गए संगीत ग्रंथों में सबसे बड़ा ग्रंथ संगीतराज है।कुंभा का संगीत गुरू सारंगव्यास था तथा चित्रकला गुरू हीरानंद था। हीरानंद ने 1423 ई में (राणा मोकल के समय) मेवाड़ चित्रकला शैली का सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण ग्रंथ ‘सुपास नाहचरियम’ की रचना की।कुम्भा की पुत्री रमाबाई संगीत की विदुषी थी जिसे वागेश्वरी की उपाधि प्राप्त थी।कुम्भा का दरबारी कवि कान्हव्यास था जिसने एकलिंगनाथ माहात्मय (संस्कृत भाषा) की रचना की। एकलिंग महात्मय संगीत के स्वरों से संबंधित ग्रंथ है। जिसका प्रथम भाग राजवर्णन कुम्भा द्वारा लिखा गया है। राणा कुम्भा के समय 1439 ई० में पाली में राणकपुर के जैन मन्दिर (कुम्भलगढ अभयारण्य) में का निर्माण धरणक सेठ द्वारा करवाया गया इन मंदिरों का शिल्पी देपाक/ देपा था।रणकपुर के जैन मंदिर मथाई नदी के किनारे स्थित है। रणकपुर के जैन मन्दिरो को चौमुखा मन्दिर भी कहते है। यह मन्दिर प्रथम जैन तीर्थकर आदिनाथ (ऋषभदेव) को समर्पित है।रणकपुर के जैन मन्दिर में 1444 खम्भे है। अत: इन्हें वनों का मन्दिर या खम्भों का मन्दिर या स्तम्भों का वन भी कहते है।राणा कुम्भा द्वारा बदनौर (भीलवाड़ा) में कुशाल माता का मंदिर बनवाया गया।कुंभा ने चितौडगढ़ दुर्ग का पुन: निर्माण करवाया। कुंभा धर्म सहिष्णु शासक था। उन्होंने आबू पर जाने वाले तीर्थ यात्रियों से लिया जाने वाला कर भी समाप्त कर दिया था।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">इसके बाद महाराणा लाखा/लक्षसिंह (1382-1421) का राज आया और राणा लाखा का विवाह मारवाड़ के रणमल की बहिन हंसाबाई से हुआ। राणा मोकल इन्ही की संतान थी जिसने बाद में मेंवाड़ का शासन सम्भाला।राणा मोकल ने चितौडगढ़ में समिद्वेश्वर मंदिर (त्रिभुवन नारायण मंदिर) का पुननिर्माण करवाया था। समिद्वेश्वर मंदिर का निर्माण पूर्व में परमार राजा भोज ने करवाया।राणा लाखा का पुत्र राणा चुण्डा को मेवाड़ का भीष्म कहा जाता है। रघुकुल वंश श्री रामचंद्र के बाद पितृ भक्ति का ज्वलंत उदाहरण राणा चूंडा का मिलता है।राणा लाखा के समय 1387 ई० में छित्तरमल नामक बनजारे ने पिछोला झील (उदयपुर) का निर्माण करवाया । सीसे जस्ते (जुड़वा खनिज)की प्रसिद्ध खान जावर खान (उदयपुर) की खोज भी राणा लाखा के समय हुई थी।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">राणा कुम्भा (1433-1468 ई०) का जन्म 1423 ई० में चितौडगढ़ दुर्ग में हुआ।राणा कुंभा का राज्यभिषेक 10 वर्ष की आयु में 1433 ई० में चितौडगढ़ दुर्ग में हुआ।राजस्थान में कला व स्थापत्य कला की दृष्टि से राणा कुंभा का काल स्वर्ण काल कहलाता है। राणा कुंभा को स्थापत्य कला का जनक कहते है।कुंभा के पिता का नाम मोकल व माता का नाम सौभाग्यदेवी था।राणा कुंभा को हाल गुरू (गिरी दुर्गों का स्वामी), राजगुरू (राजनीति में दक्ष), राणारासो,अभिनव भरताचार्य ,नाटकराजक(कुंभा ने 4 नाटक लिखे), प्रज्ञापालक, रायरायन, महराजाधिराज, महाराणा, चापगुरू (धनुर्विद्या में पारंगत ),शैलगुरू, नरपति,परमगुरू,हिन्दू सूत्राण,दान गुरू,तोडरमल (संगीत की तीनों विधाओं में श्रेष्ठ), नंदनदीश्वर(शैव धर्म का उपासक) आदि उपाधियां प्राप्त थी।राणा कुंभा को अश्वपति, गणपति, छाप गुरू (छापामार पद्धति में कुशल) आदि सैनिक उपाधियां भी प्राप्त थी।मेवाड़ के राणा कुम्भा व मारवाड़ के राव जोधा के बीच आवल-बावल की संधि हुई। इस संधि के द्वारा मेवाड़ व मारवाड़ की सीमा का निर्धारण किया गया तथा जोधा ने अपनी पुत्री श्रृंगारी देवी का विवाह राणा कुम्भा के पुत्र रायमल से किया। इसकी जानकारी श्रृंगारी देवी द्वारा बनाई गयी घोसुण्डी की बावड़ी (चितौडग़ढ) पर लगी प्रशस्ति से मिलता है।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">1437 ई० में राणा कुम्भा व मालवा के शासक महमूद खिलजी प्रथम के बीच सारंगपुर का युद्ध हुआ। इस युद्ध में राणा कुम्भा विजयी हुआ तथा युद्ध विजयी की खुशी में चितौडग़ढ़ दुर्ग में विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया। विजय स्तम्भ भगवान विष्णु को समर्पित है अत: इसे विष्णु ध्वज या विष्णु स्तम्भ भी कहते है।विजय स्तम्भ के शिल्पी जैता, नापा और पुंजा थे। विजयस्तम्भ 122 फीट ऊँचा व 9 मंजिला इमारत है। इसमें 157 सीढ़ीयां है और यह राणा कुंभा के समय की सर्वाेतम कलाकृति है। विजय स्तंभ बनाने में उस समय कुल 90 लाख रूपये खर्च हुए। कर्नल टॉड ने विजय स्तंभ को कुतुब मिनार से बेहतरीन इमारत बताया है तथा फग्र्यूसन ने विजय स्तंभ की तुलना रोम के टार्जन से की है।कुंभलगढ़ दुर्ग कुंभा द्वारा अपनी पत्नी कुंभलदेवी की याद में 1443-59 ई० के बीच बनवाया गया। कुंभलगढ़ दुर्ग को कुंभलमेर दुर्ग,मछींदरपुर दुर्ग,बैरों का दुर्ग, मेवाड़ के राजाओं की शरण स्थली, कुंभपुर दुर्ग, कमल पीर दुर्ग भी कहा जाता है।कुंभलगढ़ दुर्ग में कृषि भूमि भी है। अत: कुंभलगढ़ दुर्ग को राजस्थान का आत्मनिर्भर दुर्ग कहा जाता है। कुंभलगढ़ दुर्ग में 50 हजार व्यक्ति निवास करते थे।कुंभलगढ़ दुर्ग हाथी की नाल दर्रे पर अरावली की जरगा पहाड़ी पर कुंभलगढ़ अभयारण्य में राजसमंद जिले में स्थित है। कुंभलगढ़ दुर्ग की प्राचीर भारत में सभी दुर्गों की प्राचीर से लम्बी है। इसकी प्राचीर 36 किमी० लम्बे परकोटे से घिरी है। अत: इसे भारत की मीनार भी कहते है। इसकी प्राचीर पर एक साथ चार घोड़े दौड़ाए जा सकते है।कुंभलगढ़ दुर्ग के लिए अबुल फजल ने कहा है कि ‘यह दुर्ग इतनी बुलंदी पर बना है कि नीचे से ऊपर देखने पर सिर पर रखी पगड़ी गिर जाती है।’कर्नल टॉड ने कुंभलगढ़ दुर्ग की दृढ़ता के कारण इसको ‘एट्रूस्कन’ दुर्ग की संज्ञा दी है।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;">1456 ई० में गुजरात के कुतुबद्दीनशाह व मालवा शासक महमूद खिलजी प्रथम के बीच कुम्भा के विरूद्ध चम्पानेर की संधि हुई। इस संधि में तय किया गया कि दोनों मेवाड़ के राणा कुंभा को मारकर मेवाड़ आपस में बांट लेंगे। लेकिन कुम्भा ने इस संधि को विफल कर दिया।कुम्भगढ़ दुर्ग में सबसे ऊँचाई पर बना एक छोटा दुर्ग कटारगढ़ है। जहाँ से पूरा मेवाड़ दिखाई देता है अत: कटारगढ़ दुर्ग को मेवाड़ की आंख कहते है। कटारगढ़ दुर्ग/मामदेव मंदिर कुम्भा का निवास स्थल था तथा इसी दुर्ग में कुम्भा के पुत्र ऊदा/उदयकरण ने कुम्भा की हत्या की।कुंभलगढ़ दुर्ग में पन्नाधाय उदयसिंह को बचा कर लाई थी तथा कुम्भगढ दुर्ग में ही 1537 ई० में उदयसिंह का राज्यभिषेक हुआ।कटारगढ़ दुर्ग (कुंभलगढ़ दुर्ग) में 9 मई 1540 ई० को महाराणा प्रताप का जन्म हुआ। हल्दीघाटी युद्ध (1576 ई०) के बाद 1578 ई० ई में महाराणा प्रताप ने कुंभलगढ़ दुर्ग को अपनी राजधानी बनाया तथा यहीं महाराणा प्रताप का 1578 ई० में दूसरा व औपचारिक राज्यभिषेक हुआ।</p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"><span style="box-sizing: border-box; font-weight: bold;">मतभेद :देपाक या देपा द्वारा रचित रणकपुर प्रशस्ति (1439 ई०) में बप्पारावल व कालभोज को अलग-अलग व्यक्ति बताया गया है। विजय स्तंभ पर लिखी गई कीर्तिस्तम्भ प्रशस्ति (अत्रि व उसके पुत्र महेश द्वारा रचित)1460 ई०में बप्पारावल से कुंभा तक के राजाओं की उपलब्धियों व युद्ध विजयों का वर्णन है। संस्कृत भाषा में लिखित इस प्रशस्ति में कुंभा द्वारा रचित ग्रंथों का वर्णन किया गया है।कुम्भलगढ़ प्रशस्ति (महेश द्वारा रचित 1460 ई०) में बप्पा रावल को ब्राह्मण या विप्रवंशीय बताया है। 5 शिलाओं पर उत्कीर्ण कुंभश्याम मंदिर/मामदेव मंदिर में संस्कृत भाषा में लिखी है।एकलिंग नाथ के दक्षिण द्वार की प्रशस्ति 1488 ई० में बप्पा रावल के संन्यास लेने का उल्लेख है।संग्राम सिंह द्वितीय के काल में 1719 ई० में लिखी गयी वैद्यनाथ प्रशस्ति में हारित ऋषि से बप्पा रावल को मेवाड़ साम्राज्य मिलने का उल्लेख है। वैद्यनाथ प्रशस्ति रूप भट्ट द्वारा लिखित पिछोला झील के निकट सीसा रास गांव के वैद्यनाथ मेंदिर में स्थित है।</span></p>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-size: medium; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"> </div>
<div class="google-auto-placed ap_container" style="box-sizing: border-box; font-family: 'Noto Sans', sans-serif; width: 700px; height: auto; clear: both; text-align: center;"> </div>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"> </p>
<p style="box-sizing: border-box; font-size: 18px; line-height: 1.6em; margin-bottom: 30px; font-family: 'Noto Sans', sans-serif;"> </p>						]]>
					</description>
					<link>
						<![CDATA[
						https://newsagencyindia.com/history/history-of-mewar-that-no-one-would-have-told-you-till-today						]]>
					</link>
					<guid isPermaLink="true"> https://newsagencyindia.com/history/history-of-mewar-that-no-one-would-have-told-you-till-today </guid>
					<pubDate>Wed, 01 Dec 2021 18:58:53 +0530</pubDate>
				</item>

				</channel>
</rss>